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Mismatching Coalition Can Never Be Successful: बेमेल गठबंधन कभी सफल नहीं हो सकते

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गठबंधन जिनके भी बीच होता है, जरूरी है कि उनके उद्देश्य बड़े होने चाहिए। उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दलों या व्यक्तियों जिनके बीच गठबंधन हो रहा है, वो अपने स्वार्थों की आहुति उसमें दें। उनको अपना दिल बड़ा करने की आवश्यकता होती है, जिसमें छोटी-छोटी बातें दफन कर दी जाती हैं। सियासत में गठबंधन तब टिकते हैं जब बड़े विचारों-उद्देश्यों पर आधारित होते हैं, अन्यथा हल्के झटके में टूट जाते हैं। फकत स्वार्थ पर आधारित गठबंधन कभी सफल नहीं हो सकते। बहुजन समाज पार्टी ने एक बार फिर से गठबंधन तोड़ दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती की अपेक्षाओं के मुताबिक सीटें न मिलने से वह दुखी थीं। यह भी सच है कि इसी गठबंधन के बूते उनकी पार्टी शून्य से 10 लोकसभा सदस्यों वाली बन गई है। यह पहला मौका नहीं है, जब माया ने गठबंधन तोड़ा हो। शायद उनकी नियत में ही जोड़ फिर तोड़ रहा है। यही वजह है कि उनको सत्ता का चेहरा दिखाने वाले दलों और नेताओं से भी वह लंबे वक्त तक बनाकर नहीं रख पार्इं। मायावती के लिए अपने स्वार्थ के आगे कोई भी बात मायने नहीं रखती है। इस लोकसभा चुनाव में बसपा यूपी में 19.26 फीसदी मत पाई जबकि जिन 26 राज्यों में वह लड़ी थी। 26 में से 14 राज्यों में तो बसपा के मत नोटा से भी कम रहे। 21 राज्यों में वह दो फीसदी से कम पर सिमट गई।
हमें उत्तर प्रदेश के वह दिन याद आते हैं, जब 1991 में बसपा के संस्थापक कांशीराम ने चुनाव जीतने के लिए मुलायम सिंह यादव के आगे सिर झुकाया था। मुलायम ने उन्हें अपने गृह जिले इटावा से चुनाव जितवाकर संसद भेजा था। उसी साल जब बसपा अकेले राज्य में चुनाव लड़ी थी तो उसको 9.44 फीसदी मत मिले थे। 1993 में सपा के साथ मिलकर लड़ने से बसपा के मत 11.12 फीसदी हो गए थे। 1995 में लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस कांड के साथ ही दोनों का रिश्ता टूट गया। भाजपा ने स्वार्थ का रिश्ता जोड़कर मायावती को मुख्यमंत्री बनवा दिया मगर अधिक दिनों तक गठबंधन नहीं चला। 1996 में बसपा ने कांग्रेस का सहारा लिया और उसका मत प्रतिशत 19.64 हो गया। कांग्रेस को इस गठबंधन से कुछ हासिल नहीं हुआ बल्कि उसका दलित वोटबैंक खिसक कर बसपा में चला गया। बसपा ने बाद में भाजपा के साथ फिर दो बार सरकार बनाई। सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर उसने जातिगत गठबंधन किया। 2007 में बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई, तो ब्राह्मणों के गठबंधन को ठेंगा दिखाना शुरू किया। 2012 में वह सत्ता से आउट हो गई। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन किया मगर 2019 आते-आते फायदे के लिए बेमेल गठबंधन की ओर चल दिए, नतीजतन अपने घर की सीटें भी नहीं बचा सके और वोट शेयर भी धड़ाम से नीचे आ गया।
बेमेल गठबंधनों का इतिहास पुराना है। 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस को हराने के लिए वामपंथी और दक्षिणपंथी सब एक हो गए थे। उनके गठबंधन ने सत्ता हासिल की मगर चंद सालों में ही जूतम पैजार होने लगी। जनसंघ ने ही मोराजी देसाई की सरकार गिरवा दी थी। कांग्रेस ने झट से जाट नेता चौधरी चरण सिंह को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवाई और फिर गिरवा भी दी थी। 1989 में भी यही हुआ, वीपी सिंह का जनता दल 143 सीटें पाया जबकि कांग्रेस 197 सीटें। कई दल कांग्रेस को समर्थन देने को तैयार थे। राष्ट्रपति ने राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने यह कहते हुए नकार दिया था कि जनादेश उनको सरकार बनाने का नहीं, विपक्ष में बैठने का मिला है। इस पर वीपी सिंह भाजपा और वामपंथी गठबंधन के सहारे सत्ता में पहुंच गए। एक साल के भीतर ही गठबंधन चकनाचूर हो गया। कांग्रेस ने चंद्रशेखर को बाहर से समर्थन दिया और वह प्रधानमंत्री बन गए। चार महीने बाद ही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद राजीव गांधी की हत्या हो गई। बेमेल गठबंधनों का ही नतीजा रहा कि एक बार 13 दिन और दूसरी बार 13 महीने सरकार चलाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार खोनी पड़ी थी। 182 सीटों वाली भाजपा सत्ता में आई थी, तो उसकी बैसाखी गठबंधन वाले दल थे।
समान विचारधारा वाले दलों में अगर गठबंधन होता है, तो उसके लंबे वक्त तक टिकने की गुंजाइश होती है। वहीं, जब बगैर विचारधारा के मेल और संकुचित सियासत का खेल होता है, तब लंबी दोस्ती की उम्मीद बेमानी हो जाती है। सत्ता सुख मात्र के लिए गठबंधन करके सियासी यात्रा करने वाले दल कभी भी धोखा खा सकते हैं। उनकी सोच में राष्ट्र और समाजहित नहीं होता है, बल्कि सत्ता होती है। सत्ता हासिल करना हर सियासी दल का हक है, इसके लिए सार्थक प्रयास करना उनका चुनावी अभियान। सियासी दल और उनके नेता इस अभियान की सफलता के लिए जनहित के मुद्दों को लेकर गठजोड़ करें तो उनकी सफलता तय है मगर सिर्फ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए गठबंधन करने पर उनकी सफलता की गुंजाइश नहीं रहती है। असल में राज्यों में जो छोटे-छोटे दल अपने जातिगत गणित के आधार पर खड़े हो गए हैं, उनसे देश और समाज का कोई भला नहीं हुआ है। ऐसे दल बनिया की दुकान की तरह हैं, जो सिर्फ अपने फायदे के अलावा कुछ नहीं देखता। वह डंडी भी मारता है और मिलावट भी करता है। ऐसे दलों के चलते ही देश कभी जाति के आधार पर तो कभी धर्म और क्षेत्र के आधार पर बंटा नजर आता है। जो वैश्विक रूप से हमें कमजोर बनाता है।
हमें और हमारे देश के सियासी दलों को समझना होगा कि यह देश किसी एक जाति या धर्म का नहीं है। यह किसी एक क्षेत्र विशेष या किसी क्षत्रप का भी नहीं है। यह देश विविधताओं से भरा है। उसको बनाने में सभी का योगदान है। देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र स्थापित करने वाली कांग्रेस पार्टी इसी कारण लोकप्रिय थी क्योंकि उसके उद्देश्य बड़े थे। उसके नेता जनता के बीच सम्मान पाते थे। धीरे-धीरे उसमें स्वार्थ साधने वाले नेताओं की जमात बढ़ी तो कांग्रेस की नीव हिल गई। नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा भले ही कट्टर हिंदू सोच के आधार पर पहली बार सत्ता में आई थी मगर दोबारा उसने सबको जोड़ने का काम किया। उन 40 दलों को भी साथ लिया जो बहुत मित्रवत नहीं थे मगर विचारधारा का मेल था। समाज के उस तबके को भी जोड़ा, जो खुद को क्षत्रप दलों से ठगा महसूस कर रहा था। नतीजतन मोदी की भाजपा 303 सीटें जीतकर सत्ता में पुन: आ गई। पूर्ण बहुमत के बाद भी भाजपा ने सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने का फैसला किया। यह गठबंधन निश्चित रूप से बड़े उद्देश्य पर आधारित है। कांग्रेस की अगुआई में यूपीए के दलों वाला गठबंधन भी अगर सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाए और जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरे तो यह राष्ट्र और राष्ट्रवासियों के लिए हितकर होगा। संभव है जनता एक बार फिर कांग्रेस पर यकीन कर सके। सत्ता पाने के लिए स्वार्थी बेमेल गठबंधन कभी न तो सफल हो सकते हैं और न सार्थक। ऐसे गठबंधन जनता को भी स्वीकार्य नहीं हैं।
जयहिंद।
अयज शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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