Home संपादकीय Mayawati vs Chautala family: मायावती का चौटाला परिवार को फिर झटका

Mayawati vs Chautala family: मायावती का चौटाला परिवार को फिर झटका

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मायावती के लिए गठजोड़ अपनी सुविधा का संतुलन होता है। अपने फायदे को लेकर वे हमेशा गंभीर रहीं। वे हमेशा अपनी सुविधा का संतुलन देखती हैं। उनके लिए रिश्ते-नाते मायने नहीं रखते। वे भावनाओं में जीने की बजाय यथार्थ के कठोर धरातल पर जीना पसंद करती हैं। इसके विपरीत जो लोग उनसे जुड़ते हैं, वे भावनात्मकता का साथ नहीं छोड़ पाते। ऐसे में जब गठबंधन टूटता है तो उन्हें दिल पर चोट लगती है। इंडियन नेशनल लोकदल के साथ भी कुछ ऐसा ही है। भाई-बहन के प्यार वाला बसपा-इनेलो गठबंधन टूट गया है और इनेलो की जगह लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी ने ले ली है। मायावती को लगता है कि पिछड़ा वर्ग और दलितों को साधने के लिए ऐसा करना जरूरी है। इंडियन नेशनल लोकदल से जुड़ने से भी उनका यह लक्ष्य पूरा होता, लेकिन परिवार में विभाजन के बाद इंडियन नेशनल लोकदल की ताकत घट गई थी। जननायक जनता पार्टी के गठन का असर जींद विधानसभा के उपचुनाव में दिखा भी। इनेलो की आंतरिक कलह की वजह से ही भाजपा जींद में भगवा ध्वज लहरा सकी। हालांकि इस चुनाव के बाद ही मायावती ने सुस्पष्ट कर दिया था कि अगर यह परिवार एकजुट नहीं होता तो इनेलो से बसपा के गठबंधन को निरंतरता नहीं दी जा सकती।

मायावती ने दो दशक पहले भी इंडियन नेशनल लोकदल से गठबंधन किया था। यह और बात है कि तब भी यह गठबंधन बहुत टिकाऊ नहीं रहा। कभी अभय चौटाला ने इन दोनों दलों के गठबंधन को भाई-बहन का प्यार का रक्षाबंधन बताया था। इस गठबंधन को भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ तीसरे मोर्चे के गठन की नींव बताया है। डॉ. मेघराज ने कहा कि देश में बसपा सुप्रीमो मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की दिशा में यह गठबंधन आगे बढ़ेगा। चौटाला ने मायावती को बहन बताते हुए गठबंधन को रक्षाबंधन की तरह पवित्र करार दिया है। अभय चौटाला ने कहा कि दोनों पार्टियों का गठबंधन भाई-बहन के मिलने जैसा है।लेकिन बहन ने भाई के प्यार को नकार दिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हरियाणा में नया सियासी समीकरण बन गया है। भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी ने अपनी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के साथ ‘हाथी’ की सवारी स्वीकार कर ली है। बसपा ने भी इनेलो से गठबंधन तोड़ने की घोषणा कर दी है। नए गठबंधन के तहत उक्त दोनों पार्टियां मिलकर हरियाणा में लोकसभा की 10 और विधानसभा की 90 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी।

हरियाणा में बसपा लोकसभा की 8 और विधानसभा की 35 सीट पर चुनाव लड़ेगी जबकि विधानसभा की शेष 55 सीटों और लोकसभा की 2 सीट पर राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी चुनाव लड़ेगी। नए गठबंधन का संयुक्त सम्मेलन इसी 17 फरवरी को पानीपत में होना है। उसमें तस्वीर का रुख और साफ होगा। जींद उपचुनाव में सैनी की पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। उनकी पार्टी से जुड़कर उन्हें लगता है कि वे हरियाणा में भी उत्तर प्रदेश जैसा ही चमत्कार कर सकेंगी। पिछड़े और दलितों को साधने का उन्हें भरोसा है। चूंकि सैनी भाजपा से आए हैं, ऐसे में भाजपा की रणनीतिक काट भी उनसे मिलेगी। चौटाला परिवार के संबंधों में गांठ पड़ गई है। उसे जोड़ना अब बहुत आसान नहीं है। ऐसे में उसके साथ जुड़ने का मतलब है अपने अभीष्ठ को दांव पर रखना। जींद उपचुनाव के बाद से दोनों दलों में खटास आ गई थी। संशय तो उसी वक्त उत्पन्न हो गया था कि इनेलो-बसपा गठबंधन की हार के बाद दोनों पार्टियों का गठबंधन रहेगा या नहीं। कयास यह भी लगाया जाने लगा था कि जेल से छुट्टी पर बाहर आने के बाद 6 फरवरी को इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला मायावती की शर्त का जवाब देंगे।

इनेलो ने कहा भी था कि वह मायावती की भावनाओं के अनुरूप ओम प्रकाश चौटाला और अभय सिंह चौटाला से चर्चा करेगी और इसके बाद ही अगला कदम उठाया जाएगा। मायावती को भी पता है कि नई पीढ़ी को समझाना मुश्किल है। नया खून गर्म होता है तो मुश्किल से ठंडा होता है। दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला को फिर साथ लाकर इनेलो को पहले वाले रूप में लाना फिलहाल तो नामुमिकन ही है। इनेलो से निकाले जाने के बाद डॉ. अजय सिंह चौटाला के पुत्रों सांसद दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला अपनी पार्टी जननायक जनता पार्टी के साथ बहुत आगे बढ़ चुके हैं। अभय सिंह चौटाला और डॉ. अजय चौटाला के परिवारों में विवाद लगभग न समाप्त होने के कगार पर है। बसपा का तर्क यह है कि उसने इनेलो से तब समझौता किया था जब उसमें पारिवारिक संघर्ष नहीं था। उस समय जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला भी गठबंधन के साथ थे। अब जब अजय चौटाला ने अलग पार्टी बना ली है तो ऐसे में कमजोर पार्टी इनेलो के साथ गठबंधन रखना पार्टी के हित में नहीं है। अपना भला-बुरा सोचने का अधिकार सभी को है, बसपा अगर ऐसा सोचती है तो उसमें कुछ बुरा भी नहीं है। बसपा और इनेलो के बीच 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर फिर गठबंधन हुआ था लेकिन जींद विधानसभा उपचुनाव में यह गठबंधन भाजपा को हराने के अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया।

गौरतलब है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा था कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस समेत सभी दलों को एक मंच पर लाना होगा जबकि मायावती और अभय चौटाला की पार्टी के बीच जब गठबंधन हुआ था तब कहा गया था कि उनका गठबंधन भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ है। इन्हें सत्ता से बाहर करना है। हरियाणा में इनेलो किसानों की पार्टी है। किसान और दलित एक जुट हो जाते तो भी इन दोनों दलों की दाल हरियाणा में गल जाती लेकिन जब चौटाला परिवार में ही मतभेद है तो गठबंधन का भविष्य क्या होता, इसकी परिकल्पना मायावती ने पहले ही कर ली है। जैसी की परिचर्चा है की दुष्यंत चौटाला की जननायक पार्टी अरविंद केजरीवाल की पार्टी से हरियाणा में हाथ मिला सकती है और अगर ऐसा होता है तो बसपा का यह प्रयोग भी बहुत सार्थक नहीं होगा। बसपा और इनेलो ने वर्ष 1998 में मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें बसपा को एक और इनेलो को चार सीटें मिली थीं लेकिन, विधानसभा चुनाव में दोनों दलों की राहें जुदा हो गई थीं। 1998 में बसपा के अमन नागरा अंबाला लोकसभा सीट से जीते थे। 1991 में पहली बार बसपा प्रत्याशी सुरजीत सिंह नारायणगढ़ से विधायक बने थे। इसके बाद लगभग हर विधानसभा चुनाव में बसपा का एक न एक विधायक बनता रहा है। वर्तमान में पृथला से टेकचंद शर्मा बसपा के विधायक हैं। हर बार सत्तारूढ़ दल को समर्थन बसपा विधायक देते रहे हैं।

शिव कुमार शर्मा

(लेखक इंडिया न्यूज के डिप्टी एडिटर हैं)

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