Home संपादकीय MANTHAN: दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों

MANTHAN: दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों

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आज मंथन से पहले भारतीय वायुसेना के एक शहीद जांबाज के उस भाई की कलम से निकली इन चंद पंक्तियों को पढ़ें, जो उसने अपनी शहीद भाई के पार्थिव शरीर के पास बैठकर लिखी थी। वह भाई लिखता है कि….

और जैसे ही वह आसमां से जमीन पर गिरा, उसकी हड्डियां टूट चुकी थीं,
सब बिखर गया बस एक ब्लैक बॉक्स मिला।
वह सुरक्षित निकला लेकिन पैराशूट ने आग पकड़ ली,
इसने उसकी और परिवार की सारी इच्छाओं को तोड़ दिया।
इस तरह की टूटती हुई सांसें उसने कभी नहीं ली जिस तरह की वह आखिरी बार ले रहा था,
जबकि नौकरशाही ने अपनी भ्रष्ट चीज और वाइन का लुत्फ उठाया।
हम हमारे योद्धाओं को पुरानी पड़ चुकी मशीनें लड़ने के लिए देते हैं,
फिर भी वे अपनी ताकत और जज्बे से नतीजे देते हैं।
जैसे ही वह आसमां से जमीन पर गिरा,
एक बार फिर से एक शहीद मारा गया।
एक टेस्ट पायलट का काम कितना अक्षम्य है
पर किसी को तो रास्ता दिखाने के लिए यह जोखिम लेना होगा।

बेंगलुरु में पिछले दिनों मिराज 2000 एयरक्राफ्ट के क्रैश के दौरान जान गंवाने वाले स्क्वाड्रन लीडर समीर अब्रॉल पर लिखी गई यह कविता सोशल मीडिया में खूब ट्रेंड हुई। यह कविता समीर के भाई सुशांत अब्रॉल ने सोशल मीडिया पर डाली थी। उन्होंने बताया था कि जब वह अपने भाई के पार्थिव शरीर को लेकर लौट रहे थे तब उन्होंने यह कविता लिखी थी। एक फरवरी को बेंगलुरु में टेस्ट फ्लाइट के दौरान मिराज क्रैश हो गया था। इस हादसे में स्क्वाड्रन लीडर समीर अब्रॉल और उनके साथी स्क्वाड्रन लीडर सिद्धार्थ नेगी शहीद हो गए थे। समीर की पत्नी गरिमा के नाम से भी इसे खूब शेयर किया गया।
शेयर चाहे किसी के नाम से हो, पर उसके भावों से सभी को इत्तेफाक रखना चाहिए। इत्तेफाक इसलिए कि इसी वायुसेना को मिलने वाले अत्याधुनिक विमान राफेल पर 2019 का पूरा लोकसभा चुनाव लड़ा जाना है। आपके पास कोई और मुद्दा नहीं होगा। देश हित के मुद्दे गौण होंगे। आपके सरोकार का मुद्दा भी केंद्र में नहीं होगा। रोजी रोजगार का मुद्दा भी शायद ही आपको समझ में आएगा, लेकिन राफेल को लेकर किसने कितना पैसा खाया, किसने दलाली की। किसने नोटिंग में क्या लिखा। किसने क्या जवाब दिया। यही सब आपको बताने का प्रयास किया जाएगा।
इसीलिए आप उस पर मंथन करें कि एक भाई और पत्नी का दर्द क्या रहा होगा जब एक पुराने विमान को उड़ाने में उसकी मौत हो जाती है। राफेल एक अत्याधुनिक विमान है। लंबे समय से इसके भारतीय वायुसेना में शामिल होने का इंतजार किया जा रहा है। यूपीए गवर्नमेंट के समय से ही इसमें देर होती आई है। अब जब इस पर सबकुछ फाइनल हो चुका है, जल्द की इसकी पहली खेप मिलने वाली है तो इसमें विवाद ने हर दिन नए रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। हर चीज को राजनीति के चश्मे से देखने वालों को इसमें इतना बड़ा स्कैम नजर आने लगा है जिसके जरिए 2019 की नैय्या पार करने की तैयारी कर ली गई है। यह सब तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील को क्लिन चिट दे रखी है।
राजनीति एक ऐसी चीज है जिसके जितना अंदर जाकर देखा जाए वह उतनी ही प्रदूषित मिलेगी। यह प्रदूषण कई तरह का होता है। फिलहाल जो प्रदूषण है वह राफेल डील में हुए सौदेबाजी को लेकर है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इस डील में सौदेबाजी को जायज करार दिया है, लेकिन राजनीति इसे मानने को तैयार नहीं।

बडेÞ ही अजीज शायर हैं बशीर बद्र। आज के मौजूं वक्त पर ही शायद उन्होंने यह दो पंक्ति लिख रखी है। वो कहते हैं …
दुश्मनी का सफर इक कदम दो कदम
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएंगे

यह राजनीतिक दुश्मनी कभी किसी की नहीं हुई है। पर जो कुछ हमारे शहीद हो रहे जांबाजों के साथ हो रहा है वह किसी के भी हृदय को बेध सकता है। राफेल को लेकर जिस तरह के विवाद सामने आ रहे हैं वह राष्टÑ के लिए कहीं से भी सही नहीं है। चाहे वह पीएमओ और रक्ष ामंत्रालय के आपसी समन्वय में कमी के कारण डील में हस्तक्षेप की बात हो या फिर किसी प्रतिष्ठित अखबार द्वारा डील के संबंध में दी गई आधी अधूरी जानकारी हो। और हद तो यह कि राजनीति की पराकाष्ठा लांघते हुए आधी अधूरी जानकारी के दम पर प्रधानमंत्री जैसे प्रतिष्ठित पद को ही गाली गलौच से संबोधित कर सभी मर्यादाओं को धूल मिलाना।
सभी के अपने हित हैं। सभी की अपनी राजनीति है। जिन दस्तावेजों के दम पर अखबार ने पूरे देश को भ्रमित कर दिया। राजनीतिक विवाद पैदा कर दिया। लोकसभा में हल्ला करवाया। वह भी कहीं से स्वीकार करने योग्य नहीं है। अगर अखबार इतना ही खुद को पाक साफ बता रहा है तो दूसरे दिन उस अधूरे दस्तावेज को पूरा छापने की क्या जरूरत पड़ गई जो पहले दिन आधी-अधूरी की छापी गई थी।
क्यों उस सत्य को छिपाने की कोशिश की गई जो सभी को जानने का अधिकार है। अखबार ने अपनी खबर से ये संकेत दिया कि रक्षा मंत्रालय राफेल रक्षा सौदे को कमजोर किए जाने के खिलाफ प्रधानमंत्री कार्यालय का विरोध कर रहा था। पर अर्धसत्य की उम्र बहुत छोटी होती है। जल्द ही ये सच सामने आ गया कि अखबार ने जो दस्तावेज छापा उसमें कांट-छांट की गई थी और रक्षा मंत्री की टिप्पणी को बड़ी चालाकी से छिपा लिया गया था। जब विवाद अधिक बढ़ गया तो दूसरे दिन अखबार ने उस दस्तावेज को ज्यों का त्यों प्रकाशित कर अपनी साख को बचाने का प्रयास किया गया। अब जब यह बात सामने आ चुकी है कि जिस दस्तावेज को आधार बनाकर केंद्र सरकार पर हमला किया जा रहा था उसमें आधी अधूरी ही जानकारी थी, तब सभी खामोश हैं। अब हमलावार मोदी सरकार है। नॉर्थ ईस्ट के दौरों पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जमकर कांग्रेस पर अपनी भड़ास निकाली है।
मंथन करना जरूरी है कि इस वार प्रतिवार से क्या होगा। अखबार ने अपनी साख कायम रखने के लिए पूरा दस्तावेज तो छाप दिया पर क्या उस साख को कायम रखा जा सकेगा जिसमें हमारे शहीद हुए सैनिकों का दर्द छिपा है। अखबार की एक खबर ने राजनीतिक पार्टियों के चेहरे भी खिला दिए। कांग्रेस ने तो बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रधानमंत्री को ही चोर साबित कर दिया। हद तो यह कि यहां तक कह डाला कि जिस तीस हजार करोड़ रुपए की चोरी के आरोप लग रहे हैं उन पैसों को वायुसेना के उन पायलट को मिल सकते थे जो भविष्य में किसी न किसी क्रैश में मारे जाते। मंथन का वक्त है कि हम किस तरह की राजनीति करना चाहते हैं। शयर बशीर बद्र ही लिखते हैं कि ..
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो र्शमिंदा न हों।

Kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं )

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