Home विचार मंच Maha coalition is failed in UP! यूपी में विफल हुआ महागठबंधन का महाप्रयोग!

Maha coalition is failed in UP! यूपी में विफल हुआ महागठबंधन का महाप्रयोग!

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उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की सियासी दोस्ती आखिरकार टूट गई। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के एक एलान के बाद महाप्रयोग विफल हो गया। बदलते सियासी दौर में लोहिया की समाजवादी विचारधारा और कांशीराम की दलित चेतना के दो विपरीत धु्रव अपनी नीति में कामयाब नहीं हुए। निश्चित रूप से यूपी में सपा-बसपा और रालोद का एक मंच पर आना बड़ा प्रयोग था। जिसे लेकर भाजपा खुद उलझन में थी।
यह बात अलग है कि परिणाम आने के बाद भाजपा को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं थी कि भाजपा इस दोस्ती से बेहद डरी हुई थी। राजनीतिक हल्कों और मीडिया में इसकी खूब चर्चा थी लेकिन परिणाम ने इस दोस्ती को जमींदोज कर दिया। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी सभाओं में बार-बार महागठबंधन पर महामिलावटी होने का आरोप मढ़ते रहे थे। उन्होंने कहा भी था कि इसकी उम्र अधिक नहीं होगी। लेकिन जमींनी सच्चाई यहीं थी यह एक चुनावी कयास भर था। वैसे मायावती और अखिलेश ने अधिकृत रूप से गठबंधन टूटने का एलान अभी तक नहीं किया है। दोनों ने अभी तक भविष्य की संभावनाएं बचा रखी हैं। मायावती ने अखिलेश और डिंपल की खूब सराहना भी की है। कहा भी उनकी तरफ से उन्हें काफी सम्मान मिला। लेकिन शिवपाल सिंह यादव पर वह काफी तल्ख दिखी। मायावती राज्य में 11 विधानसभाओं के लिए होने वाले उपचुनाव में अकेले उतरने का फैसला किया है। बसपा अभी तक उपचुनाव से किनारा करती रही है। वह पूरे नौ साल बाद चुनवा में उतरेगी।बसपा अपनी रणनीति में कितनी कामयाब होगी यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इस एलान से मायावती की साख गिरी है। उन्होंने गठबंधन धर्म को तोड़ने का अपराध किया है। 2019 में उन्होंने जो सफलता हासिल कि उसकी वजह सपा ही है। मायावती चुनावी सभाओं में बार-बार यह कहती थीं कि यह गठबंधन टूटने वाला नहीं है। लेकिन वह खुद अपनी जमींन पर टिक नहीं पाई। मायावती मुलायम सिंह यादव के लिए अपनी 24 साल पुरानी दुश्मनी भूला कर मैनपुरी में एक मंच पर पहुंची। मायावती ने उस दौरान यह कहा भी था कि हमें पुराने जख्म भूले नहीं है, लेकिन सियासी हालात कुछ ऐसे हैं जिसकी वजह से एक मंच पर आना पड़ा। उसी मंच पर डिंपल यादव ने मायावती के पैर भी छुए थे। जिसे लेकर समाजवादी समर्थकों में काफी उबाल था।
कहा यह भी गया कि अखिलेश ने मुलायम की विरासत को मायावती के चरणों में समर्पित कर दिया।पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने चुनाव पराजय के लिए जो आरोप लगाए हैं वह सच भी हो सकते हैं कि यादव वोट बसपा को स्थानांतरित नहीं हुए, ऐसा कहना गलत है। अगर ऐसा न होता था उन्हें 10 लोकसभा सीटों पर सफलता कैसे मिलती। जबकि समाजवादी पार्टी को 37 में से सिर्फ पांच सीटें मिली। कन्नौज से डिंपल यादव, बदांयू से धर्मेंद यादव और फिरोजाबाद से रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय प्रताप यादव अपनी सीट नहीं बचा पाए। इस पराजय की मूल वजह समाजवादी पार्टी का खुद में बिखराव रहा है। शिवपाल सिंह यादव की नाराजगी का नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा है। सपा-बसपा सिर्फ यादव, दलित और मुस्लिम मतों तक सीमट गई जबकि भाजपा ने दूसरी दलित और ओबीसी जातियों में अपनी सेंध लगाने में सफल रही। जिसकी वजह से महागठबंधन की महापराजय हुई। वर्तमान समय में राज्य की जो सियासी हालात है उसमें भाजपा काफी मजबूत दिखती है। राज्य में कमजोर होती सपा-बसपा की दोस्ती से सबसे बड़ी दिक्कत मुस्लिम मतदाताओं के सामने है। क्योंकि अभी तक मुस्लिमों को समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता रहा है। लोकसभा चुनाव 2019 के पूर्व सपा-बसपा के बीच हुए गठबंधन से अल्पसंख्यक मतदाताओं में काफी उम्मीद जगी थी।
उन्हें लगा था कि राज्य में कमजोर कांग्रेस के मुकाबले यह एक अच्छा विकल्प बनेगा, लेकिन वह जमींन पर उतरने के पहले ही ध्वस्त हो गया। राज्य के 19 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के समाने सबसे बड़ी चुनौती है वह अब कहां जाएं। क्योंकि भाजपा को सबक सींखाने के लिए दोनों दलों ने जो नया प्रयोग किया था वह विफल रहा है। यूपी में सपा-बसपा की दोस्ती टूटना भाजपा के लिए सबसे बड़ी सियासी सफलता है।यूपी में सपा-बसपा की दोस्ती पर पूरे देश की निगाहें थीं, लेकिन वह अपने मंजिल तक पहुंचने में कामयाब नहीं हुई। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के वोट कम हुए हैं, जिसकी वजह से दोनों दलों को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए। राज्य में अब तक 26 फीसदी वोट पाने वाले दल की सरकार बनती है। सिर्फ तीन फीसदी वोटों के बिखराव से सत्ता गंवानी पड़ती है। गठबंधन ने अपना जनाधार खोया है। सपा के साथ बसपा को भी 2014 के मुकाबले कम वोट मिले जबकि रालोद का वोट प्रतिशत बढ़ा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दल को 73 सीटों पर जीत मिली है। जबकि इस बार 62 पर है। बसपा की झोली में गई 10 सीटों का नुकसान भाजपा को हुआ है।
2014 में भाजपा को जहां 42.65 फीसदी वोट मिले थे। वहीं 2019 में यह बढ़कर 49.5 फीसदी पर पहुंच गया। जबकि बसपा को 20 और सपा को तकरीबन 23 फीसदी वोट मिले। 2014 में सपा-बसपा और रालोद का कुल वोट फीसद 42.98 फीसदी था। यह 2019 में 4.39 कम होकर 38.93 पर ठहर गया। बसपा का वोट बैंक 0.47 घटा है। सपा का वोट बैंक भी चार फीसद कम हुआ है। जबकि रालोद एक भी सीट भले जीत न पाई हो लेकिन उसके वोट बैंक में 0.81 फीसदी का इजाफा हुआ है।राज्य में तकरीबन 22 फीसदी दलित मतदाता है जिसमें 14 प्रतिशत जाटव हैं जो बसपा का मजबूत वोट बैंक हैं। इसके अलावा आठ फीसदी दलित जातियों में तकरीबन 60 जातियां शामिल हैं। जिसमें कोली, पासी, धोबी, खटिक, वाल्मीकि, गोंड जैसी अन्य जातियां हैं। जबकि राज्य में 45 फीसदी पिछड़ी जाति के मतदाता है। जिसमें तकरीबन 10 फीसदी यादव हैं। बाकि 16 फीसदी में कुर्मी, लोध, मौर्या और जाट शामिल हैं। जबकि 19 फीसदी में मल्लाह, गुर्जर, चौरसिया, प्रजाति, राजभर, निषाद, बिंद, कहार और कुम्भार के अलवा दूसरी जातियां हैं।
2014 में सपा-बसपा और रालोद के वोट शेयर को मिलाने से भाजपा कहीं नहीं टिक रही थी। लेकिन पार्टी के कुशल चुनाव प्रबंधन ने यह कमाल कर दिखाया, जिसकी वजह से महागठबंधन हवा हो गया। मायावती ने समाजवादी पार्टी यह आरोप भले लगाया है कि यादवों का वोट बसपा की झोली में नहीं आया। जमींनी पड़ताल तो यह कहती है कि दलित, मुस्लिम और यादवों के अलावा दूसरे दलित और ओबीसी जातियों को एकजुट करने में सपा-बसपा नाकाम रही जिसकी वजह से दोनों दल पराजित हुए। यूपी में बदले सियासी हालात में सपा-बसपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी। दोनों दल भाजपा से अभी काफी पीछे दिखते हैं। सपा को अपना बिखरा कुनबा जोड़ना होगा। मायावती ने गठबंधन धर्म को तोड़कर जल्दबाजी दिखाई है। उन्हें 2022 तक इंतजार करना चाहिए था। राज्य के सियासी हालात एक बार फिर साबित करते हैं कि भाजपा 2022 की लड़ाई में सबसे मजबूत दिखती है। जनता का भरोसा जीतने के लिए गैर भाजपाई दलों को अपनी रणनीति बदलनी होगी।
प्रभुनाथ शुक्ल
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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