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Litigation written to the Prime Minister and the judiciary: प्रधानमंत्री को लिखे पत्र पर मुकदमा और न्यायपालिका

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 मुजफ्फरपुर बिहार के सीजेएम ने एक एडवोकेट सुधीर कुमार ओझा के प्रार्थना पत्र पर 49 बुद्धिजीवियों के विरुद्ध, प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिखने के आरोप में मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है। दुनियाभर के लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले किसी भी देश में किसी भी अदालत ने ऐसा आदेश नहीं दिया होगा। आज का विमर्श न्यायपालिका के ऐसे ही हैरान करने वाले कुछ कदमों पर है। देश के 49 नामचीन हस्तियों, जो फिल्म, अकादमिक और विद्वत्ता के विभिन्न क्षेत्रों में अपना मजबूत दखल रखते हैं ने जुलाई 2019 में प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा था, जिसमे उन्होंने प्रधानमंत्री से देश मे बढ़ रही भीड़ हिंसा पर रोक लगाने के लिये प्रभावी कदम उठाने का अनुरोध किया था। यह पत्र 23 जुलाई को लिखा गया था। प्रधानमंत्री मोदी जी को पत्र लिखने वाले इन 49 महानुभावों में इतिहासकार रामचंद्र गुहा, अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा, फिल्मकार श्याम बेनेगल, अनुराग कश्यप और मणि रत्नम समेत अलग-अलग क्षेत्रों की हस्तियां शामिल थीं। उन्होंने पत्र में लिखा है, कि, मुस्लिमों, दलितों और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रही लिंचिंग पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।
इन दिनों जय श्री राम हिंसा भड़काने का एक नारा बन गया है। इसके नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाएं हो रही हैं। यह दुखद है। इन बुद्धिजीवियों ने शांतिप्रिय और गर्वित भारतीय होने के नाते, बीते कुछ दिनों में देश में हुई भयंकर और दुखद घटनाओं से भी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुुुसार, संविधान में देश को धर्म निरपेक्ष समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य कहा गया है जहां हर धर्म, लिंग और जाति के लोग एक समान हैं।
चिट्ठी में प्रधानमंत्री मोदी के सामने मूलत: निम्न बातें रखी गईं :
1. मुस्लिम, दलितों और अल्पसंख्यकों की लिचिंग बंद हो, क्योंकि एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से अब तक दलितों के साथ अत्याचार के 840 मामले सामने आए हैं। पत्र में दिए गए आंकडो के अनुसार, 1 जनवरी, 2009 से 29 अक्टबूर 2018 के बीच धर्म के नाम पर हिंसा और नफरती व्यवहार के 254 मामले सामने आए हैं। इनमें से 62% मामले मुस्लिमों के खिलाफ हैं।
2. बिना मतभेद, अहसमति के कैसा गणतंत्र ? सरकार से मतभेद होने पर या अपने विचार रखने पर लोगों को एंटी-नेशनल, अर्बन नक्सल नहीं कहा जाना चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 19 किसी को भी अपनी बात रखने का अधिकार देता है। पत्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि इन घटनाओं को गैर-जमानती अपराध घोषित करते हुए तत्काल अदालत द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए। यदि हत्या की तुलना में यह बड़ा और अधिक जघन्य अपराध है। नागरिकों को डर के साए में नहीं जीना चाहिए। सरकार के विरोध के नाम पर लोगों को राष्ट्र-विरोधी या शहरी नक्सल नहीं कहा जाना चाहिए और न ही उनका विरोध करना चाहिए। अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। असहमति जताना इसका ही एक भाग है। पत्र का उद्देश्य भीड़ हिंसा पर रोक लगाना था, तो देश के पिछले कुछ सालों में हुई भीड़ हिंसा से जुड़े आंकड़ों पर भी एक नजर डालते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट्स के अनुसार, 2016 में दलितों के खिलाफ उत्पीड़न की 840 घटनाएं दर्ज हुईं। लेकिन इसके विपरीत, इन मामलों के दोषियों को मिलने वाली सजा का प्रतिशत कम हुआ। जनवरी 2009 से 29 अक्टूबर 2018 तक धार्मिक पहचान के आधार पर देश भर में, 254 घटनाएं दर्ज की गयीं। इसमें 91 लोगों की मृत्यु हुई जबकि 579 लोग घायल हुए। अगर धर्मवार आंकड़े देखें तो, मुस्लिमों, जिनकी संख्या, कुल जनसंख्या के 14% है, के खिलाफ 62% मामले, ईसाइयों जिनका कुल प्रतिशत, जनसंख्या के 2% है, के खिलाफ 14% मामले दर्ज किए गए। मई 2014 के बाद से जबसे यूपीए 2 की सरकार सत्ता में आई, तब से इनके खिलाफ हमले के 90% मामले देश भर में दर्ज हुये है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी अपनी एक रिपोर्ट में माना कि वर्ष 2014 से लेकर 3 मार्च 2018 के बीच नौ राज्यों में भीड़ हिंसा की 40 घटनाओं में 45 लोगों की मौत हो गई। हांलाकि मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि उनके पास इस बाबत विश्वनीय तथ्य नहीं हैं कि ये घटनाएं गौ रक्षकों की गुंडागर्दी, सांप्रदायिक या जातीय विलेष या बच्चा चुराने की अफवाह की वजह से ही घटी हैं। 12 राज्यों में ऐसी घटनाओं से संबंधित मुकदमों में दो आरोपियों को सजा सुनाई गई। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली संस्था इंडियास्पेंड की रिपोर्ट है कि वर्ष 2012 से 2019 में अब तक सामुदायिक घृणा से प्रेरित 128 घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 47 लोगों की मृत्यु हुई है। इंडियास्पेंड के मुताबिक, 2010 के बाद से नफरत जनित अपराधों की 87 घटनाएं हुई हैं।
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने गौ रक्षकों पर कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के मद्देनजर अपने लिखित जवाब में इन आंकड़ों का उल्लेख किया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील अनुकूल चंद्र प्रधान ने अदालत में कहा, कि लोगों को पीट-पीट कर मार डालने की घटनाओं में वृद्धि हो रही है और सरकारें इस समस्या से निपटने के लिए शीर्ष अदालत द्वारा जुलाई, 2018 में दिए गए निदेर्शों पर अमल के लिए कोई कदम नहीं उठा रहीं। इस पत्र के सार्वजनिक होते ही देश मे दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं हुई। एक सरकार के पक्ष में तो दूसरी सरकार के विपक्ष में। 49 नामचीन हस्तियों के पत्र के विरोध में 62 अन्य नामचीन लोगो ने पत्र लिख कर उनकी निंदा की और कहा कि 49 लोगों द्वारा लिखा गया पत्र, पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, और उसे केवल दलितों और अल्पसंख्यक तक ही सीमित रखा गया है। 49 को अगर अपनी बात पत्र लिखकर कहने का अधिकार है तो वही अधिकार 62 लोगों को भी प्राप्त है। इस पत्र पर प्रधानमंत्री या उनका कार्यालय कोई जवाब दे पाता, उसके पहले बौद्धिकोंं-सिनेमा से जुड़े लेखक-कलाकारों के 62 लोगों के अन्य एक समूह ने प्रतिक्रियात्मक पत्र जारी कर दिया। समूह-62 ने 49 बौद्धिकों पर सवाल दागे कि माओवादी हिंसा, कश्मीरी अलगाववादियों की कारगुजारियों और देशद्रोह के मामलों पर आप लोगों की चुप्पी क्यों?
पर समस्या, 49 के उत्तर में 62 का खड़े हो जाना नहीं, बल्कि समस्या यह है कि, 49 महानुभावों द्वारा लिखे गए पत्र को देश की क्षवि खराब करने का षडयंत्र बताते हुए। अदालत में उन 49 लोगो के खिलाफ कार्यवाही हेतु प्रार्थनापत्र दिया गया। प्रधानमंत्री को लिखे गए इस पत्र के बारे में सुधीर कुमार ओझा के इस प्रार्थनापत्र पर उन 49 बुद्धिजीवियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करके जांच करने का आदेश सीजेएम मुजफ्फरपुर द्वारा दिया गया। यह संभवत: देश के न्यायिक इतिहास की पहली घटना होगी जब किसी नागरिक द्वारा अपने ही प्रधानमंत्री को पत्र लिखने पर किसी अदालत में कोई प्रार्थनापत्र दायर हुआ हो और अदालत ने उस पर संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया हो। अब यह प्रकरण एक न्यायिक प्रक्रिया का भाग बन गया है। इसका निस्तारण अब न्यायिक रास्ते से ही होगा। इस संबंध में जो एफआईआर दर्ज हुयी है वह आइपीसी की धारा 124अ, सेडिशन या देशद्रोह, 153इ, 160, 190, 290, 297 और 504, जो देशद्रोह और देशविरोधी कृत्यों से जुड़े अपराध हैं से संबंधित हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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