Home संपादकीय पल्स Learn to differentiate between truth and falsehood: सच और झूठ में अंतर करना सीखिये

Learn to differentiate between truth and falsehood: सच और झूठ में अंतर करना सीखिये

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लोकतंत्र में आमचुनाव देश का भविष्य तय करते हैं। 17वीं लोकसभा के गठन के लिए निर्वाचन की अधिसूचना जारी हो चुकी है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की दिशा और दशा तय करने वाला यह चुनाव कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सच और झूठ के अंतर को पहचानने के साथ ही सही चयन करने का वक्त है। एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर आप देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं, यह आपका मत ही तय करेगा। सात चरणों में मतदान कराने का आशय भी यही है कि आपको सोचने समझने और सच को पहचाने के लिए वाजिब वक्त मिले। इस वक्त का सदुपयोग करना आपका काम है। झूठ-फरेब से न घर चलता है और न ही देश। इनके लिए जमीनी तौर पर काम करना होता है। हमारे हित चिंतकों ने गहन अध्ययन के बाद संविधान में किसी भी सरकार के लिए पांच साल का कार्यकाल रखा था, जिससे सत्ता में काबिज जन और दल परियोजनाओं से लेकर जनापेक्षाओं को इस समय सीमा में पूरा कर सकें। पांच साल का वक्त पर्याप्त माना जाता है। अगर कोई व्यक्ति या पार्टी इस समय सीमा में भी अपने किए वादों को पूरा नहीं कर पाती तो यह तय है कि उसकी दिशा और दशा दोनों भ्रमित हैं।
16वीं लोकसभा के लिए जब 2014 में चुनाव की बयार बह रही थी, तब लोग बदलाव की बात कर रहे थे। यह बदलाव सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए था। नरेंद्र मोदी की अगुआई में सत्ता के लिए संघर्ष कर रही भाजपा पर लोगों ने यकीन किया। मोदी ने जनता की अपेक्षाओं के अनुकूल ओज से परिपूर्ण वादे किए। इन वादों पर मोदी सरकार कितनी खरी उतरी और जनता उनके काम से कितना संतुष्ट है? यह जनता का मत के तय करेगा। हमारा दायित्व है कि सच बतायें और दिखायें। इसी तरह हर किसी का अपना कर्तव्य है। सच की ताकत ऐसी होती है जो न केवल झूठ को बेनकाब करती है बल्कि हमें भविष्य के तमाम खतरों से बचाता है। चुनाव जीतने के लिए अब सियासी जन वे सभी हथकंडे अपनाने लगे हैं, जो कभी निंदनीय और घृणित माने जाते थे। नेताओं की हालत यह है कि निजी जीवन पर भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाये जाते हैं। व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के अंतर को खत्म कर दिया गया है। विपक्ष में रहते हुए जो लोग और दल जिन कार्यों पर सवाल उठाते थे, सत्ता में आते ही वे भी वही करने लगते हैं। राजनीति में मर्यादाओं और नैतिकता का स्थान खत्म होता जा रहा है।
हमें देखना होगा कि जब 1952 में देश को पहली लोकसभा मिली थी। वो चुनौती भरा वक्त था, हर नागरिक के लिए खाना, रोजगार और विकास करना था मगर उसके लिए धन नहीं था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री बनते वक्त कहा था कि जब तक देश के किसी भी नागरिक की आंख में आंसू है तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। निश्चित रूप से उस वक्त इन चुनौतियों को पूरा करना बेहद मुश्किल था क्योंकि हमारा देश भुखमरी, गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा था। न इंफ्रास्ट्रेक्चर था और न ही उसके लिए वित्तीय संसाधन। कंगाल देश के नेता के रूप में जब नेहरू ने काम किया तो देश में हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति, औद्योगिक क्रांति, आयुध क्रांति, शैक्षिक क्रांति, वैज्ञानिक तकनीक क्रांति के साथ ही राष्ट्रीय विकास हुआ। देश तेजी के साथ आगे बढ़ा और हम वैश्विक मंच पर खड़े हो गए। हमारी संस्थाओं ने विश्व में बड़ी जगह बनाई। हमारे लोगों को देश-विदेश में रोजगार और सम्मान मिला। भारतीय ज्ञान-विज्ञान की साख बनी, क्योंकि यह सब सच पर आधारित था, झूठ-फरेब के प्रचार पर नहीं। यह वो वक्त था, जब हमें पाकिस्तान और चीन दोनों से युद्ध में भी जूझना पड़ा। पंडित नेहरू के बाद की पीढ़ी पर उनकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का जिम्मा था, जो उन्होंने किया। जनता ने उनके कामों को न केवल सराहा बल्कि मुहर लगाई।
अब 17वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव में दो बातें अहम हैं। पहली, जो वादे किए गए, उन पर क्या हुआ? दूसरी, किसने झूठ और फरेब का सहारा लिया और किसने सच को तोड़ा मरोड़ा? 2014 में मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों और 10 साल के सरकार के सत्ताविरोधी लहर से जूझ रही थी। भाजपा ने कारपोरेट स्टाइल में नरेंद्र मोदी को हिंदुत्व विकास पुरुष के साथ ही अच्छे दिनों के रूप में प्रस्तुत किया। देश की जनता जनार्दन ने मोदी पर भरोसा जताया। लंबे वक्त बाद किसी दल को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी। मोदी का नाम अच्छे दिनों का पर्याय बन गया, नतीजतन देश के डेढ़ दर्जन राज्यों में भी भाजपा ने सरकार बनाई। मोदी सरकार ने कई कड़े फैसले लिए और बदलाव किए। सरकार ने अपने रिपोर्ट कार्ड में यही कहा कि उसने देश को अच्छे दिन लौटा दिए हैं। पड़ोसी देशों के साथ ही वैश्विक मंच पर भारत को सशक्त बनाने का दावा किया गया है। इन सब दावों के पीछे तमाम दलीलें प्रस्तुत की जा रही हैं। दूसरी तरफ मोदी सरकार पर राफेल विमान खरीद घोटाले सहित भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लग रहे हैं। कई मंत्रियों की योग्यता सवालों के घेरे में है। मोदी सरकार को झूठी-जुमलेबाज सरकार के आरोपों से भी दो चार होना पड़ रहा है।
विपक्ष ने मोदी सरकार को चौकीदार चोर है और झूठी सरकार के स्लोगन से घेरा है, तो मोदी ने मैं भी चौकीदार कहकर बचाव किया है। आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच उन मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं कर रहा, जिनसे देश आगे बढ़ता है और युवा रोजगार पाता है। हर मुद्दे पर निजी हमले, सोशल मीडिया का राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम की चर्चाएं हावी हैं। सवाल 2014 के उन नारों के बीच उलझा है कि क्या देश में अच्छे दिन लौट आए हैं? किसके अच्छे दिन आए हैं और किसने झूठ बोला? 2019 के चुनाव में मतदाता किस बात को सही समझता है और किसको गलत? उसे कैसा भारत चाहिए? भविष्य में बेरोजगार और असमानता की ओर बढ़ता भारत कहां खड़ा होगा? प्रचार माध्यमों पर टिका विकास देश को कहां ले जाएगा? सभी सवालों पर चर्चा और वास्तविकता को देखना आवश्यक है।
गंगा-जमुनी तहजीब और सूफी-संतों की सोच वाले देश को हमें कहां ले जाना है? इस बारे में देश और देशवासियों को मतदान करते वक्त सोचना होगा। किसी के आरोपों प्रत्यारोपों से कुछ होने वाला नहीं, क्योंकि अंतत: नागरिक को ही अपने मत से तय करना है कि सरकार पास है या फेल। उसे ही तय करना है कि वह क्या चाहती है और क्यों? लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि है और उसका फैसला भाग्यविधाता। ऐसे में सच को जानना-पहचानना आपकी जिम्मेदारी है क्योंकि झूठ परोसने से किसी को रोका नहीं जा सकता। सागर में मोती उसी को मिलता है जो जितना अंदर जाकर उसे खोजता है।
जय हिंद।

 अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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