Home संपादकीय पल्स Keep the dignity of the Parliament ‘Honorable’: संसद की गरिमा तो बनाये रखिये ‘माननीयों’

Keep the dignity of the Parliament ‘Honorable’: संसद की गरिमा तो बनाये रखिये ‘माननीयों’

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हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि जब कभी कोई शख्स गलत या गरिमा के विपरीत शब्दों का प्रयोग करता था, तब उसको समझाया जाता था कि संसदीय भाषा का इस्तेमाल करिये। 17वीं लोकसभा के शुरूआती दो दिनों में हमने चुनकर आए अधिकतर सदस्यों की जो हरकतें देखीं, उसके बाद उनके लिए ‘माननीय’ शब्द का इस्तेमाल न्यायोचित प्रतीत नहीं हो रहा है। संवैधानिक परंपरा है कि सदस्यों के लिए ‘माननीय सदस्य’ शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है और किया भी जाएगा। वजह, यह एक परंपरा है मगर सदस्यों के जिस सद्व्यवहार के कारण उन्हें माननीय कहा जाता था, वह चूर-चूर हो गया है। 16वीं लोकसभा के गठन तक हुए किसी भी शपथ ग्रहण में हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई या राज्यों को लेकर नारेबाजी नहीं होती थी और न ही किसी नेता के शपथ लेने पर उसके नाम के जयकारे लगते थे। यह भी सच है कि इसी सदन के कई ऐसे नेता सदस्य रहे, जो पद से भी बड़ी हैसियत के माने जाते थे। लोकतंत्र के सबसे बड़े सदन में इन ओछी हरकतों से न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी भारत की हंसी उड़ रही है। जनता के इन प्रतिनिधियों ने कुपोषण और बदतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण जापानी बुखार से मरने वाले सैकड़ों बच्चों के प्रति संवेदना व्यक्त करने के बजाय मदारी की तरह व्यवहार किया। आखिर हम यह क्यों नहीं समझते कि हम पर पूरे विश्व की नजर रहती है क्योंकि हम सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं।
संविधान के दायरे में 17 अप्रैल, 1952 में पहली बार लोकसभा का गठन हुआ था और 13 मई, 1952 को पहली बैठक हुई थी। अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के बाद यह पहला मौका था, जब भारत गणराज्य के नागरिकों ने अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सरकार चलाने को भेजा था। उस वक्त एक जुनून भी था और जज्बा भी मगर जोश में न किसी सदस्य ने आपा खोया और न नेहरू-नेहरू का शोर मचाकर सदन की गरिमा गिराई गई। हर किसी ने एक दूसरे को सम्मान दिया और मुद्दों पर सरकार को उलाहना भी। यही लोकतंत्र की खूबी है। किसी को सिर्फ अपमानित करने के लिए नारे लगाना, कम से कम लोकतंत्र के सबसे बड़े सदन में उचित नहीं कहा जा सकता। वंदे मातरम का नारा देश को जोड़ने वाला है, जो हमारे देश को आजादी दिलाने में अहम रहा। यह किसी अभिमान का प्रतीक या मर्यादाएं तोड़ने वाला नहीं था। हमारे देश के तमाम हिस्सों में अभिवादन करने के लिए राम-राम करते हैं। तुलसीदास ने राम को भगवान के तुल्य इसीलिए कहा क्योंकि उन्होंने मर्यादाओं और गरिमा को स्थापित करने के लिए सब कुछ त्यागा था। मर्यादाओं के पालन ने ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया था। अब इस नाम का प्रयोग मर्यादाओं और गरिमा को गिराने के लिए किया जा रहा है। इस वक्त अगर स्वयं राम होते, तो वह खुद ऐसे भक्तों के कृत्य देखकर र्शमिंदा हो रहे होते।
प्रावधान है कि संविधान के अनुच्छेद 99 के उपबंध के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन का सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले संविधान की तीसरी अनुसूची में दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ या प्रतिज्ञान करेगा। वह उस पर अपने हस्ताक्षर भी करेगा। 17वीं लोकसभा में भी प्रोटेम स्पीकर के समक्ष ऐसी ही प्रक्रिया हुई। इस दौरान जब सदन के नेता नरेंद्र मोदी सदस्य के रूप में शपथ लेने को उठे तो भाजपा सदस्यों ने मर्यादा के विपरीत ‘मोदी-मोदी’ चिल्लाते हुए विपक्ष को नीचा दिखाने की कोशिश की, हालांकि मोदी ने मर्यादा का पालन किया। जब एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी का नाम शपथ के लिए पुकारा गया तो भाजपा के सदस्यों ने जय श्रीराम और वंदे मातरम के नारे लगाए। इसके जवाब में ओवैसी ने भी अल्लाह हू अकबर, जय भीम, जयहिंद सहित कई नारे लगाए। इसी तरह गोरखपुर के सांसद रवि किशन शुक्ला ने पार्वती पतये हर-हर महादेव, मथुरा की सांसद हेमामालिनी ने राधे-राधे और उन्नाव के सांसद सच्चिदानंद साक्षी के शपथ पर मंदिर वहीं बनाएंगे, आदि नारे लगे। टीएमसी के सांसद कल्याण बनर्जी ने जय मां काली का मंत्रोचार किया और जय बंगला का उद्घोष किया। खलीरूल रहमान ने बिस्मिल्ला रहमाने रहीम से शपथ शुरू की। भोपाल की सांसद आतंकवाद की आरोपी प्रज्ञा सिंह ने तो पहले ही दिन झूठ बोलकर संसदीय परंपराओं, नियमों का मखौल बनाने की कोशिश। यह सब घटनाएं सदन के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने हुर्इं मगर उन्होंने किसी को रोकना भी उचित नहीं समझा।
किसी भी देश की संसद में जो घटता है, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज होता है। उसका विश्लेषण वैश्विक मंच पर भी होता है। सदन शुरू होने के एक दिन पहले नरेंद्र मोदी ने सदस्यों को संवैधानिक परंपराओं का पालन करने का पाठ पढ़ाया था मगर उसका ही मखौल उड़ता रहा। प्रोटेम स्पीकर भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा सके। वंदे मातरम हमारे देश के स्वाभिमान का प्रतीक है मगर यह भी किसी पर थोपा नहीं जा सकता। हर व्यक्ति अथवा सदन का सदस्य अपने तरीके से भारतीय गणराज्य के प्रति सम्मान प्रकट कर सकता है। जय श्रीराम का उद्घोष राम के प्रति श्रद्धा के लिए नहीं बल्कि चिढ़ाने के लिए विद्वेष में प्रयोग किया जा रहा था। यह भी हर व्यक्ति के निजी श्रद्धा विश्वास का विषय है न कि थोपने का। सदन में इस तरह के उद्घोषों से यही प्रतीत हो रहा था कि लोकसभा शायद युद्ध का मैदान या अखाड़ा बन गया है। यहां बुद्धिजीवी जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि भाड़े के सैनिक बैठा दिए गए हैं। सदन में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने बेहतरीन बात कही कि ‘जय श्रीराम और अल्ला हू अकबर’ के नारे लगना सदन के लिए कदाचित उचित नहीं है। यह सदन की मर्यादा के विपरीत है। उन्होंने उदाहरण दिया कि लोकतंत्र कैसा होना चाहिए, ‘जब मुल्ला को मस्जिद में राम नजर आएं, पंडित को मंदिर में रहमान नजर आएं, दुनिया की सूरत बदल जाएगी, जब इंसान को इंसान में इंसान नजर आएं।’
लोकसभा में शपथ ग्रहण के दौरान जो घटा, वह निश्चित रूप से एक स्वस्थ लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के लिए शर्मनाक है। विश्व ने सराहा था जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हिंदुस्तान को आगे ले जाना है। पंथ या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। दुख तब हुआ जब उनके आगे यह शर्मनाक घटना घट रही थी और वह मुस्कुरा रहे थे। सुखद है कि लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद ओम बिड़ला ने कहा कि उन्होंने सभी दलों से अपील की है कि सभी सदन की मर्यादा बनाकर रखें। हमारे सदन की कार्यवाही दुनिया के लिए मिसाल बने। हम सदन में धार्मिक नारों की इजाजत नहीं दे सकते।
सबको इस बात का ज्ञान है कि इस बार अधिकतर वो लोग सदन के सदस्य बने हैं, जो अपने बूते पार्षद का चुनाव भी नहीं जीत सकते थे, उनका बेड़ा मोदी के नाम ने पार लगाया है। यही कारण है कि उनमें जय श्रीराम के नारों से लेकर मोदी-मोदी करने की होड़ मची थी। एक सच यह भी है कि इनमें से अधिकतर को न सनातन धर्म का ज्ञान है और न उसके मूल का। उन्होंने तो वंदेमातरम और जय श्रीराम के उद्घोष को अपराधियों का नारा बनाने का काम किया है। आपको ‘माननीय’ कहा जाता है तो जरूरी है कि आप माननीय जैसा व्यवहार करें। आपने ईश्वर की शपथ लेकर संविधान और विधि के अनुसार काम करने का संकल्प लिया है तो फिर संविधान की मूल भावना और नियमों के विपरीत व्यवहार करने का अधिकार किसने दे दिया? ऐसा करते आपको लज्जा नहीं आई! राष्ट्रवादी होने का दम भरने वाले इन सदस्यों को सोचना चाहिए कि उनके इस अमर्यादित व्यवहार से विश्व में राष्ट्र की खिल्ली उड़ी है। जनता ने आपको अपना प्रतिनिधि चुन लिया है तो जनहित में काम कीजिए, ड्रामे नहीं। नरेंद्र मोदी ने सकारात्मक बात कही कि अब चुनाव खत्म हो गया है। हमें नम्रता के साथ सबको साथ लेकर चलना है। विपक्ष की हर भावना और उनका हर शब्द मूल्यवान है। भाजपा के सांसदों को अपने नेता की बात के साथ ही संवैधानिक दायित्वों और मर्यादाओं का पूरा ध्यान रखना चाहिए। अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो वे सिर्फ लिखने के माननीय रहेंगे और वास्तव में धूर्त कहलाएंगे।

जय हिंद!

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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