Home संपादकीय It is not okay to play politics with your players:अपने खिलाड़ियों के साथ राजनीति खेलना ठीक नहीं

It is not okay to play politics with your players:अपने खिलाड़ियों के साथ राजनीति खेलना ठीक नहीं

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युवा शूटर और हरियाणा की गोल्डन गर्ल मनु भाकर ने अपनी इनाम की राशि के लिए जो ट्वीट किया है उसने खिलाड़ियों के साथ हो रहे खेल की पोल खोल दी है। मनु भाकर एक प्रतीक के तौर पर सामने है। पर हमारे राजनीतिक कर्णधारों को जरूर मंथन करना चाहिए कि आखिर क्यों और किन परिस्थितियों में किसी खिलाड़ी को इस तरह के कदम उठाने की जरूरत पड़ जाती है। यह कोई पहला मौका नहीं है कि हमारे देश के किसी खिलाड़ी ने इस तरह की आवाज उठाई है। सिर्फ आवाज उठाने का तरीका मॉडर्न है, पर कहानी वही पुरानी है। अपनी ही इनाम की राशि पाने के लिए खिलाड़ियों को लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अपनी प्रैक्टिस से समय निकालकर सरकारी दफ्तरों के धक्के खाने पड़ते हैं। वह भी तय नहीं होता है कि इतने धक्के खाने के बाद भी इनाम की राशि पूरी मिलेगी या नहीं। यह स्थिति तब है जबकि केंद्र सरकार देश में खेलों को प्रोत्साहन देने की नई नीति के प्रति प्रतिबद्ध है।
यह पहली बार है कि केंद्र में किसी सीनियर खिलाड़ी के पास मंत्रालय की कमान है। नहीं तो अमूमन जिस व्यक्ति को खेल का ककहरा मालूम नहीं होता उसे कमान मिली हुई होती है। देश का सौभाग्य है कि राज्यवर्द्धन सिंह राठौर जैसा ओलंपिक पदक विजेता पहले राजनेता बनता है फिर उसे ही देश के खेल के विकास की कमान मिलती है। हाल के वर्षों में देश ने खेल की दुनिया में तरक्की की मिसाल पेश की है। पर एक अंतरराष्टÑीय शूटर के ट्वीट ने पूरे सिस्टम पर एक ऐसा करारा चांटा मारा है जिसकी गूंज दूर तक सुनाई दे रही है।
बेहद कम उम्र में मनु भाकर ने अपनी शानदार उपलब्धियों की बदौलत भारतीयों को गौरवांवित होने का मौका दिया है। हरियाणा की इस बेटी की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। मनु के साथ वाली तस्वीर को ट्वीट कर प्रधानमंत्री ने इस गोल्डन गर्ल की जमकर तारीफ की थी। हरियाणा सरकार ने भी अक्टूबर माह में मनु को दो करोड़ की इनाम राशि देने की घोषणा की थी, पर अफसोस अब तक उन्हें इस राशि का एक रुपया भी नसीब नहीं हुआ। मनु ने ट्वीटर के जरिए हरियाणा सरकार के साथ केंद्र सरकार पर भी तंज कसा है। हालांकि इसे तंज कहने से अच्छा है कि इसे मनु का दर्द कहा जाए। क्योंकि इस दर्द से देश के न जाने कितने खिलाड़ी कराह रहे हैं।
एक तरफ केंद्र सरकार स्कूल स्तर पर खेलो इंडिया को प्रमोट करते हुए यह तर्क देती है कि हमें स्कूल स्तर से ही प्रतिभाओं को खोजना है। फिर उन्हें बेहतर ट्रेनिंग देकर अंतरार्ष्टीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करना होगा। पर यह बेहद अफसोसजनक है कि उन्हीं प्रतिभाओं को पाई-पाई के लिए भटकना पड़ता है। यह किसी विडंबना से कम नहीं है कि देश का कोई भी राज्य अपनी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को स्पांसर करने के लिए तैयार नहीं है। किसी भी राज्य ने अपनी खेल पॉलिसी में इसे शामिल नहीं किया है। किसी भी राज्य की खेल पॉलिसी यह नहीं कहती है कि हम अपनी किसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी के खेल को निखारने के लिए उसे पूर्ण रुप से आर्थिक मदद देंगे। हां सभी राज्यों की खेल पॉलिसी यह जरूर कहती है कि अगर वह खिलाड़ी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में मेडल जीतता है तब उसे इनाम के तौर पर मोटी रकम दी जाएगी। कोई भी खेल आज सस्ता नहीं रह गया है। इसमें बेहतर करने के लिए किसी खिलाड़ी को साजो समान सहित अच्छी ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है। बेहतर डाइट और ट्रेनर का खर्चा वहन करना आसान नहीं होता है। खासकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता की तैयारी करने के लिए स्पेशल अरेजमेंट की जरूरत होती है। ऐसे में हमारे देश के खिलाड़ियों के लिए सबसे अधिक टेंशन इस बात की होती है कि इन सबके लिए पैसे कहां से आएंगे। जिनका परिवार समृद्ध होता है वह तो किसी तरह पैसों का जुगाड़ कर लेते हैं। पर जिनके पास सपोर्ट नहीं वो या तो सरकारी सिस्टम के भरोसे होते हैं या फिर विभिन्न प्रतियोगिता में मिलने वाली इनामी राशि के भरोसे। ऐसे में मनु भाकर ने अपनी इनाम की राशि मांग ली तो इसमें उसने क्या बुरा किया?
देश के खेल मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर खुद एक अंतरार्ष्टीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। उन्हें इस बात का अहसास है कि एक खिलाड़ी को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें यह भी पता होगा कि सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक होती है। फिर क्यों नहीं वो कुछ ऐसी पॉलिसी डिजाइन करवाते हैं जिसमें मनु भाकर जैसी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को अपनी बेहतर ट्रेनिंग के लिए इनाम की राशि पर डिपेंड न रहना पड़े। क्यों नहीं राज्य सरकारों के खेल मंत्रालय को यह निर्देश दिया जाता है कि वे कुछ ऐसी पॉलिसी ड्राफ्ट करें जिसमें युवा खिलाड़ियों को स्पांसर करने का प्रावधान हो।
जिससे वे बिना किसी आर्थिक चिंता के अपने गेम पर फोकस कर सकें। क्यों नहीं इस बात पर मंथन किया जाता है कि खिलाड़ियों को बेहतर ट्रेनिंग के लिए सरकार की तरफ से आर्थिक मदद दी जाए। यह सभी को पता है कि क्रिकेट को छोड़कर जितने भी खेल भारत में मौजूद हैं उनकी ट्रेनिंग का बेसिक सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर कितना कमजोर है। ऐसे में प्राइवेट इंफ्रास्ट्रक्चर पर डिपेंड होना मजबूरी है। इसमें खर्च बहुत आता है। पर खिलाड़ियों को यह कहा जाता है कि ट्रेनिंग खुद करें, पैसों की व्यवस्था खुद करें। अगर किसी तरह वो मेडल जीत लेंगे तब सरकार उन्हें इनाम के तौर पर आर्थिक मदद देगी।
इस सोच को बदलने के लिए गहन मंथन की जरूरत है। दूसरे देशों की खेल पॉलिसी को बेहतर तरीके से अध्ययन करने की जरूरत है। सोचने समझने और मंथन करने की जरूरत है कि एशियाई देश देश चीन, जापान और कोरिया की खेल पॉलिसी में आखिर ऐसा क्या है कि वहां के खिलाड़ी किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हमेशा अपना झंडा ऊंचा रखते हैं। जबकि प्रतिभा संपन्न भारत के युवा एक एक मेडल के लिए लंबा संघर्ष करते दिखते हैं। मनु भाकर का मार्मिक ट्वीट एक प्रतीक के रूप में पूरे देश के सामने है। इसे यूं ही जायज नहीं होने दिया जाए। मनु अभी सिर्फ 16 साल की हैं। उनके पास लंबा कॅरियर है। अगर उनके ट्वीट से हमारे कर्णधारों को थोड़ी सी भी शर्म आएगी तो वो जरूर मंथन करेंगे और युवा खिलाड़ियों के लिए कुछ अच्छा करेंगे।
कुणाल वर्मा

kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं)

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