Home संपादकीय It is a matter of Muslim women right not Religious :यह धार्मिक नहीं मुस्लिम महिलाओं के हक की बात है

It is a matter of Muslim women right not Religious :यह धार्मिक नहीं मुस्लिम महिलाओं के हक की बात है

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तीन तलाक का मुद्दा एक बार फिर गरम है। लोकसभा में बिल पास हो चुका है। अब सोमवार को राज्यसभा में इसे पेश किया जाएगा। केंद्र सरकार को उम्मीद है कि राज्यसभा से इस बार इसे पार कर दिया जाएगा। पर सरकार की सबसे बड़ी मजबूरी यहां अल्पमत में होना है। कांग्रेस ने खुला एलान कर रखा है कि किसी भी कीमत पर इसे राज्यसभा से पास नहीं होने देंगे। बीजेपी इसे पास करने को लेकर अपने तर्क दे रही है, जबकि कांग्रेस के पास पास न होने देने के अपने तर्क हैं। दोनों दल निश्चित तौर पर इसमें अपना राजनीतिक फायदा देख रहे होंगे। पर मंथन करने की जरूरत है कि मुस्लिम महिलाओं के सम्मान की बात करना क्या सिर्फ राजनीतिक या धार्मिक मुद्दा ही हो सकता है। समझना जरूरी है कि यह मुस्लिम महिलाओं के हक की लड़ाई है। उनके सम्मान की लड़ाई है।
वैसे तो तीन तलाक पर बहस काफी पहले से हो रही है। पर पहली बार इसकी कानूनी चर्चा 2016 में शुरू हुई। तीन तलाक की शुरुआत फरवरी 2016 में उत्तराखंड की शायरा बानो से हुई थी। शायरा बानो पहली महिला हैं जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। शायरा को भी उनके पति ने तीन तलाक दिया था। शायरा बानो की याचिका ने नेशनल मीडिया में बहस का मुद्दा दिया। धीरे-धीरे इस मामले ने बुद्धिजीवियों को मंथन करने का मौका दिया। मामले ने तब और तुल पकड़ा जब अक्टूबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से इसकी चर्चा की। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी उत्तरप्रदेश के महोबा में रैली करने पहुंचे थे। चुनावी साल में उत्तरप्रदेश जैसे मुस्लिम बहुल राज्य में प्रधानमंत्री द्वारा ट्रिपल तलाक के मुद्दे ने राजनीतिक बवंडर पैदा कर दिया।
सार्वजनिक चुनावी मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘‘क्या एक व्यक्ति का फोन पर तीन बार तलाक कहना और एक मुस्लिम महिला का जीवन बर्बाद हो जाना सही है? इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। मेरी मुसलमान बहनों का क्या गुनाह है। कोई ऐसे ही फोन पर तीन तलाक दे दे और उसकी जिंदगी तबाह हो जाए। क्या मुसलमान बहनों को समानता का अधिकार मिलना चाहिये या नहीं। कुछ मुस्लिम बहनों ने अदालत में अपने हक की लड़ाई लड़ी। उच्चतम न्यायालय ने हमारा रुख पूछा। हमने कहा कि माताओं और बहनों पर अन्याय नहीं होना चाहिए। सम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। चुनाव और राजनीति अपनी जगह पर होती है, लेकिन हिन्दुस्तान की मुसलमान औरतों को उनका हक दिलाना संविधान के तहत हमारी जिम्मेदारी होती है। तो अब पंचों की अदालत तो अपना फैसला देर सबेर दे ही देगी, इसके बाद राजनीति किस ओर करवट बदलती है कोई नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर है कि इस पर राजनीति जरूर होगी। रोटी सेकने के मौका कौन छोड़ना चाहेगा, खासकर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड। आशा है देश के सभी वर्गों के लोग पांच जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के फैसले को अन्यथा नहीं लेंगे।’’प्रधानमंत्री मोदी का यह ऐतिहासिक भाषण कई मायनों में मील का पत्थर साबित हुआ। उत्तरप्रदेश में चंद महीनों बाद विधानसभा के चुनाव हुए। बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। कहा गया कि मुस्लिम महिलाओं ने एकतरफा वोट बीजेपी को दिया। बीजेपी ने अपनी जीत का श्रेय सभी वर्गों को दिया ही साथ ही मुस्लिम समुदाय का विशेष आभार व्यक्त किया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद केंद्र सरकार भी ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाने में जुट गई। पर विपक्षी दलों को केंद्र सरकार की यह कवायद कहीं से भी जायज नहीं लगी। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की आड़ में राजनीति शुरू हुई। वही राजनीति आज तक चल रही है। संसद के पिछले सत्र में भी लोकसभा में बिल पास हुआ। भारी हंगामे के बीच पास हुआ बिल राज्यसभा से पास करवाने में केंद्र सरकार नाकाम हुई।
विपक्षी दलों ने जिन संसोधनों की मांग की थी, उसमें कई परिवर्तन करके इस बार भी लोकसभा से बिल पास हो गया है, पर विपक्षी दलों ने एलान कर रखा है कि इसे किसी भी कीमत पर राज्यसभा में पास नहीं होने दिया जाएगा। राजनीतिक दलों की यह एक ऐसी जिद है जिसमें नुकसान मुस्लिम महिलाओं का ही है। इसे नुकसान को समझने की जरूरत है। बिल के पास होने और न होने के राजनीतिक नफा नुकसान की अलग से चर्चा होगी। पर समझने की जरूरत है कि जब किसी धर्म या संप्रदाय के लोगों के भविष्य की बात हो तो इसमें राजनीति अच्छी नहीं होती है। गौरतलब है कि मुस्लिमों में तीन बार बोल कर तलाक देने की प्रथा (तलाक-ए-बिदत) भारत में बहुत पहले से चली आ रही है। आए दिन इस तरह मामले सामने आते हैं जिसमें पति तीन बार तलाक बोलकर पत्नी को उसके सारे अधिकारों से अचानक मुक्त कर देता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और संस्कृति बताता रहा है। पर इससे कोई इत्तेफाक नहीं रखता है कि इसके कारण कई मुस्लिम महिलाओं के घर टूट रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं को भयानक मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।
उत्तराखंड की शायरा बानो हो या फिर जयपुर की आफरीन। या फिर पश्चिम बंगाल के हावड़ा की इशरत जहां। सभी मुस्लिम महिलाओं की कहानी एक जैसी ही है। सुप्रीम कोर्ट में अपने लिए न्याय की गुहार लगाते हुए इशरत ने अपनी याचिका में कहा है कि उसके पति ने दुबई से ही फोन पर उसे तलाक दे दिया और चारों बच्चों को जबरन छीन लिया। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संगठन ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (बीएमएमए) ने जब देश भर की महिलाओं की राय ली तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। पचास हजार से अधिक मुस्लिम महिलाओं के हस्ताक्षर लिए गए और राष्ट्रीय महिला आयोग से इस मामले में मदद मांगी गई। सभी महिलाओं की एक ही राय थी कि ट्रिपल तलाक के खिलाफ ठोस कानून बनाया जाए, ताकि मुस्लिम महिलाओं को उनके सम्मान का हक मिल सके।
ट्रिपल तलाक का विरोध करने वालों को मंथन करना चाहिए कि देश धर्म से नहीं चलता। संविधान प्रदत्त अधिकारों के अनुसार ही देश चलता है और इसी भारतीय संविधान ने भारत की मुस्लिम महिलाओं को उनके सम्मान और जीने का हक दिया है। मुस्लिम महिलाओं को भी संविधान में अधिकार मिले हुए हैं और अगर कोई व्यवस्था समानता और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है तो उसमें बदलाव होना चाहिए। मुस्लिम लॉ बोर्ड के साथ-साथ जो लोग तीन तलाक कानून का विरोध कर रहे हैं वे सिर्फ और सिर्फ पुरुष प्रधान मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। जब पाकिस्तान, सूडान, जॉर्डन, बांग्लादेश जैसे इस्लामिक देशों में तीन बार बोल कर तुरंत तलाक देने की प्रथा खत्म कर दी गई है तो भारत जैसे देश में इस पर विवाद क्यों किया जा रहा है यह समझ से परे है। उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्यसभा में बिल पेश होने से पहले तमाम राजनीतिक दल एक बार मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में सोचेंगे और राज्यसभा से बिल पास होगा। अगर यह बिल पास हो जाता है तो नए साल में मुस्लिम महिलाओं के लिए इससे बड़ा तोहफा नहीं हो सकता है।
कुणाल वर्मा

kuna@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं )

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