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India has chosen its prime minister: भारत ने अपने प्रधानमंत्री को चुना है

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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद यह दूसरी बार होगा जब देश ने सीधे अपने प्रधानमंत्री को चुना है। पहली बार तब था जब 1984 में राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट किया गया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लोगों को पता नहीं था कि उनका जनप्रतिनिधि कौन है, सांसद के रूप में उनके सामने कौन है। लोगों को सिर्फ यही पता था कि राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है और हाथ छाप पर मुहर लगानी है। उस वक्त भी लोगों का प्रधानमंत्री के प्रति एक जबर्दस्त सेंटिमेंट था और कुछ ऐसी ही स्थिति 2019 के लोकसभा चुनाव में बन गई थी। भारत के सिर्फ कुछ राज्यों को छोड़ दें तो पूरे देश में सिर्फ मोदी ही सामने थे। लोग सिर्फ प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को देखना चाहते थे। चाहे वह गठबंधन की सीट हो या फिर सीधे बीजेपी की सीट। सभी जगह सिर्फ मोदी ही थे और मोदी ही दिखे।
पूरा देश इस वक्त जश्न के माहौल में रमा है। क्योंकि उन्होंने देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री दिया है जिसमें राजनीतिक इच्छा शक्ति काफी बलवती है। लोगों को विश्वास है कि मोदी है तो मुमकिन है। मोदी है तो देश सुरक्षित हाथों में है। पड़ोसी देश में मातम पसरा है। क्योंकि मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर पूरे विश्व को यह बता दिया है कि भारत अब सॉफ्ट नेशन से ऊपर उठ चुका है। जो हमें छेड़ेगा उसे छोड़ा नहीं जाएगा, वाला फॉर्मुले को पूरे विश्व ने बेहद नजदीक से देखा है। यही कारण है कि आज मोदी की जीत पर पूरे विश्व से बधाई देने वालों का तांता लगा है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, इजराइल, अरब, नेपाल सहित तमाम देशों ने भारतीय लोकतंत्र में इस ऐतिहासिक जीत के लिए नरेंद्र मोदी का दिल खोलकर स्वागत किया है। इस लोकसभा चुनाव में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो इतिहास बन चुका है। प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को गाली देने में बिल्कुल भी हिचक महसूस नहीं करने वाले लोग भी इस बात के लिए छाती पीटते नजर आए कि उनकी जुबां पर ताला लगा दिया गया है। हर बात में पानी पी पीकर मोदी को खुलेआम कोसने वाले लोग इस बात पर नाराज नजर आए कि उनके बोलने की आजादी खत्म कर दी गई है। उन्हें देश में अघोषित आपातकाल नजर आया। पर वे शायद यह भूल गए कि यह सोशल मीडिया का जमाना है। हर एक व्यक्ति पत्रकार है, हर एक व्यक्ति समीक्षक है। वो खुलकर अपनी राय भी रख सकता है और खुलकर दूसरों की कायदे से क्लास भी ले सकता है।
अब वो समय नहीं रह गया है कि लोग अखबार और टीवी की खबरें और समीक्षा देखकर अपनी राय बनाएं। भारत का हर एक व्यक्ति समीक्षक बन गया है। वो हर बात को नाप-तौल रहा है। अपनी राय खुद बना रहा है और उसी के अनुसार रिएक्ट भी कर रहा है। ऐसे में देश के प्रधानमंत्री को आप खुलेआम चोर और मदारी बोलकर उन्हें दिग्भ्रमित नहीं कर सकते। सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध करने वालों को समझने की जरूरत है कि जिस व्यक्ति को पूरे देश ने पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी थी उसे खुलेआम चोर कहना कहीं से न्यायोचित नहीं है। मुद्दों पर बात करनी चाहिए। पर राजनीति में मुुद्दे गौण हो गए हैं और व्यक्तिगत हमले ज्यादा होने लगे हैं। शायद यही राजनीति देश के लोगों को पसंद नहीं आई।
कोई भी हार नई सीख देती है। भारतीय जनता पार्टी ने भी कई हार देखी है। एक वोट से सरकार का गिरना देखा है। हर हार से इस पार्टी ने नई शिक्षा ली है। यही कारण है कि 2014 और 2019 का चुनाव राजनीति की एक नई परिपाटी लिख गया है। कांग्रेस को अपनी गलतियों से सीखने की जरूरत है। पार्टी को हार के कारणों पर गहन मंथन करने की जरूरत है। उसे यह जानने और समझने की जरूरत है कि मुद्दों की राजनीति करे, व्यक्ति की राजनीति न करे। भारतीय जनता पार्टी को भी इस जीत से बहुत इतराने की जरूरत नहीं है। हां यह सही है कि पूरे देश ने पार्टी पर और खासकर प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया है। इस भरोसे के भी बहुत कारण हैं। पर पार्टी नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी अखिल भारतीय पार्टी बनने के लिए उन्हें और अधिक मेहनत करने की जरूरत है।
पार्टी को यह समझने की जरूरत है कि क्यों आंध्रप्रदेश की जनता ने उन्हें एकतरफा नकार दिया है। ऐसी कौन सी कमी रह गई कि आंध्रप्रदेश की जनता को नरेंद्र मोदी या उनकी पार्टी अपनी नीतियों और बातों को समझाने में नाकामयाब रही। क्या कारण रहे कि पंजाब जैसे राज्य की जनता ने मोदी से किनारा कर लिया। ठीक इसी तरह तमिलनाडु के लोगों ने भी क्यों मोदी के जादू से खुद को दूर रखा। भाजपा ने यहां अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। लेकिन ये फैसला सही साबित नहीं हुआ। विपक्षी द्रमुक ने कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा-अन्नाद्रमुक को पटखनी दे दी। केरल की जनता में भी मोदी सरकार ने अपना विश्वास कायम करने में सफलता हासिल नहीं की है। 2014 में मिले वोट और 2019 में मिले वोट प्रतिशत का अंतर कुछ खास नहीं रहा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी को दक्षिण भारत के लोगों में अपना विश्वास कायम करना एक बड़ी चुनौती होगी।
जीत का जश्न चंद दिनों का होता है। इस जीत का जश्न खूब जोर शोर से होना चाहिए, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता में बैठी सरकार को उन्हें नकारने वालों का भी ध्यान रखना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने अगले पांच सालों में दक्षिण भारत के लोगों में अपने प्रति विश्वास पैदा करने में कामयाब होगी। पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में अपनी नीतियों को बताने में सफल होगी। फिलहाल नरेंद्र मोदी निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अपने दम पर पार्टी को ऐसी ऊंचाई दी है जो अविश्वनिय और अकल्पनिय है। पूरे देश ने प्रधानमंत्री के तौर पर जो विश्वास नरेंद्र मोदी में दिखाया है उस विश्वास को अब कायम रखना उनकी जिम्मेदारी है।
कुणाल वर्मा
(लेखक आज समाज के संपादक हैं।)

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