Home दुनिया India could win World Cup 2003: 2003 में भारत जीत सकता था विश्व कप

India could win World Cup 2003: 2003 में भारत जीत सकता था विश्व कप

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नई दिल्ली। कपिल देव की कप्तानी में 1983 में जब भारत पहली बार वर्ल्डकप जीता तो लोग खुशी से झूम उठे। लेकिन उसके बाद हमारी टीम खिताब से महरूम रहती चली गई। यही नहीं विश्व कप में टीम इंडिया की हालत धीरे-धीरे बिगड़ती ही चली गई। 1983 से लेकर 2000 तक, अजहरुद्दीन के कार्यकाल को छोड़ दें तो, कोई भी कप्तान टीम में जीतने की ललक नहीं पैदा कर सका। सचिन तेंदुलकर भी नहीं। ऐसे में सौरभ गांगुली की कप्तानी में 2003 वर्ल्डकप के फाइनल में भारतीय टीम का पहुंचना बड़ी बात थी। भारत इस खिताब का प्रबल दावेदार भी था लेकिन मजबूत मानी जा रही टीम इंडिया चूक गई।
साल 2003 के विश्वकप फाइनल में भारतीय फैन्स के दिल उस वक्त टूट गये थे, जब टीम इंडिया 20 साल बाद विश्वकप खिताब से मात्र एक कदम दूर रहकर भी चूकी। किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि टीम को जीतना सिखाने वाले दादा यानी सौरभ गांगुली की टीम हार गई है। वह भी वह मुकाबला जिस पर भारतीय क्रिकेट का सुनहरा भविष्य लिखा जाना था। सभी क्रिकेट फैन अपने चहेते दादा के हाथ में विश्वकप की ट्राफी देखना चाहते थे।
सौरभ गांगुली ने भी इस टूर्नामेंट के लिए खुद को पूरी तरह सौंप दिया था। विश्व कप से पहले ही उन्होंने अपनी कप्तानी में टीम को पहले 2001 व 2002 में हुई ऐतिहासिक सीरीज में जिताकर बता दिया था कि इस बार वह विश्वकप जीतकर ले जाएंगे। 2003 के विश्वकप में भी उनका प्रदर्शन बेहद शानदार रहा। कुशल कप्तानी के साथ वह न सिर्फ फाइनल तक पहुंचने में कामयाब हुए बल्कि, बतौर खिलाड़ी उनका योगदान शानदार रहा। उन्होंने टूर्नामेंट में 58.12 की औसत से 465 रन बनाए थे। पर दुर्भाग्य से अंतिम मुकाबला उनके हाथ से निकल गया। इस मुकाबले को जीतने के बाद गांगुली भारत के सफलतम कप्तान बन जाते।
फाइनल में गांगुली को भरोसा था कि अगर सही जगह पर गेंदबाजी की जाएगी, तो वह जल्द ही आॅस्ट्रेलिया की ओपनिंग जोड़ी को आउट करने में कामयाब रहेंगे। हालाँकि, उनका यह दांव उल्टा पड़ गया। भारतीय गेंदबाज बेअसर साबित हुए। परिणामस्वरुप आॅस्ट्रेलिया 359 का बड़ा स्कोर बनाने में सफल रहा। गांगुली का पहले गेंदबाजी का फैसला टीम की हार प्रमुख कारण था। आशीष नेहरा को छोड़कर जहीर खान और श्रीनाथ की गेंदबाजी में वह धार देखने को नहीं मिली, जिसकी टीम को जरूरत थी। मजबूरन गांगुली को जल्द ही स्पिनर गेंदबाजों की तरफ रुख करना पड़ा। आॅस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने इसका जमकर फायदा उठाया। आॅस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने भारतीय गेंदबाजों की जमकर धुनाई करते हुए 50 ओवर में मात्र दो विकेट खोकर 359 रन का विशाल लक्ष्य खड़ा किया। आॅस्ट्रेलिया की तरफ से रिकी पोंटिंग 140 और डेमियन मार्टिन 88 रन बनाकर नाबाद रहे।
सचिन तेंदुलकर 2003 के विश्वकप के टूर्नामेंट के मैन आॅफ द टूर्नामेंट जरूर रहे थे लेकिन वो अपनी टीम को खिताब नहीं जिता पाए थे। उन्होंने लगभग हर मैच में बल्ले के साथ अच्छा प्रदर्शन किया। कई मौकों पर तो भारत को जीत भी दिलाई भी। टूर्नामेंट में वह शीर्ष रन बनाने वाले बल्लेबाज थे। उन्होंने 11 पारियों में 61.18 की औसत से 673 रन बनाए, जिसमें छह अर्धशतक और एक शतक भी शामिल था। बावजूद इसके आॅस्ट्रेलिया के खिलाफ फाइनल में उन्होंने सभी को बहुत निराश किया। मैच शुरू हुआ तो सभी की नजरें क्रिकेट के इस लिटिल मास्टर पर टिकी हुई थी. वह मैच 4 के स्कोर पर थे, तभी ग्लेन मैग्रा ने उन्हें अपना शिकार बना लिया। सचिन के आउट होने से बाद लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय बुरी तरह लखड़खड़ा गई। सहवाग को छोड़कर कोई भी बल्लेबाज पिच पर नहीं टिक सका। एक-एक करके सभी बल्लेबाज वापस लौटते रहे। आखिर में भारतीय टीम 39.2 ओवर में सिर्फ 234 रन तक ही पहुंच सकी। भारत को इस फाइनल मुकाबले में 125 रन की करारी हार का सामना करना पड़ा।

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