Home संपादकीय In Haryana’s election battle Neither party nor heart are together: हरियाणा के चुनावी रण में न दिल मिल रहे न दल

In Haryana’s election battle Neither party nor heart are together: हरियाणा के चुनावी रण में न दिल मिल रहे न दल

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हरियाणा विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा हो चुकी है। पर इस चुनाव के लिए राजनीतिक बिसात काफी दिन पहले ही बिछ चुकी थी। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री मनोहर लाल के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 75 प्लस के नारे के साथ पूरे राज्य का भ्रमण कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ अन्य दल अभी अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं। सबसे मजेदार यह है कि इस हरियाणा के चुनाव के इतिहास को देखते हुए उम्मीद लगाई जा रही थी कि कुछ दल आपसी तालमेल के साथ मैदान में उतरेंगे, पर हाल यह है कि यहां न दिल मिले हैं और न दल। चौटाला परिवार में दिल मिलने की बात भी अधूरी है, जबकि भाजपा के खिलाफ महागठबंधन की संभावना भी धुमिल हो चुकी है। सभी दलों ने अकेले दम पर ही चुनाव लड़ने का संकल्प दोहराया है। आज मंथन में हरियाणा के सियासी दलों का चुनावी मंथन।
भाजपा : मुख्यमंत्री मनोहर लाल ही भाजपा के चुनावी चेहरे होंगे। पीएम मोदी ने भी रोहतक रैली में मनोहर लाल की जी भर तारीफ करके उन्हें और शक्तिशाली बना दिया है। भाजपा 75 प्लस के नारे के साथ चुनावी मैदान में है। भाजपा की मजबूत स्थिति को भांपते हुए दूसरे दलों के बड़े राजनीतिक चेहरों का भाजपा में शामिल होने का सिलसिला लगातार जारी है। कांग्रेस, इनेलो, जजपा के कई बड़े चेहरे इस वक्त भाजपा के खेमे में हैं। शनिवार को भी इनेलो के बड़े चेहरे रामपाल माजरा और कांग्रेस के बड़े नेता दूड़ा राम ने सीएम मनोहर लाल की उपस्थिति में भाजपा का दामन थाम लिया। ऐसे में इस वक्त भाजपा के पास सबसे बड़ी चुनौती टिकट बंटवारे को लेकर है। पार्टी के कई बड़े नेताओं ने खुलेआम घोषणा कर रखी है कि दूसरे दलों से पार्टी में शामिल होने वाले टिकट की आस न लगाएं। पार्टी हाईकमान ने भी स्पष्ट कर रखा है कि वर्तमान विधायकों को उनके परफॉर्मेंस के आधार पर ही टिकट दिया जाएगा। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी में फिलहाल ऊपर से दिख रही एकजुटता टिकट बंटवारे के साथ बिखर जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस : हरियाणा में हाशिए पर चली गई कांग्रेस पार्टी के सामने फिलहाल कोई तारनहार नजर नहीं आ रहा है। कई खेमों में बंटी पार्टी का बंटाधार करने में यहां के बड़े नेताओं ने कोई कसर बांकि नहीं रखी। जिस कांग्रेस ने हरियाणा में सालों राज किया उसका अचानक से इस तरह बिखर जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अशोक तंवर के खाते में कोई खास उपलब्धि नहीं रही। राज्य स्तर पर तो छोड़िए, ग्रामीण स्तर पर भी पार्टी का संगठन नहीं बन सका। भाजपा ने कांग्रेस के नक्शे कदम पर चलते हुए जहां एक तरफ पन्ना प्रमुखों का मजबूत संगठन खड़ा कर लिया, वहीं हरियाणा कांग्रेस ने अपने सेवा दल के महत्व तक को भुला दिया। फिलहाल पार्टी के पास ग्रामीण स्तर पर कोई संगठन एक्टिव रोल में नहीं है। पार्टी स्तर पर गुटबाजी को कम करने के लिए फिलहाल भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के हाथों में कमान है, लेकिन अशोक तंवर के साथ-साथ अन्य गुट अब भी संतुष्ट नहीं हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने बगावती तेवर की बदौलत भले ही चुनाव की कमान अपने हाथ में ले ली है, पर कांग्रेस में भी टिकट बंटवारे के वक्त सिर फुटौव्वल हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इनेलो : इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो)निश्चित तौर पर एक वक्त हरियाणा की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखता था। क्षेत्रिय पार्टी के तौर पर हरियाणा में इनेलो की जड़ें इतनी मजबूत थी कि बड़ी-बड़ी पार्टी भी इनसे पनाह मांगती थी। 1987 के विधानसभा चुनाव में 90 में से 85 सीट लेकर पार्टी ने जो तहलका मचाया था, उसे आज तक याद किया जाता है। पर ताऊ देवीलाल की विरासत ओमप्रकाश चौटाला और अभय चौटाला के रास्ते आज उस स्थिति में पहुंच चुकी है कि इसके 2014 के विधानसभा में जीते 19 में 16 विधायक आज दूसरे दलों में हैं। परिवार में विवाद ऐसा हुआ कि अजय चौटाला और उनके पुत्रों ने अपनी अलग राह चुन ली। चौटाला परिवार का इतिहास ही बिखराव का रहा है। कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है। हुआ भी ठीक वैसा ही। जिस तरह ताऊ देवीलाल ने अपनी राजनीतिक विरासत ओम प्रकाश चौटाला को सौंपते हुए अपने दूसरे बेटे को दरकिनार कर दिया था, ठीक उसी तरह ओमप्रकाश चौटाला ने अपनी राजनीतिक विरासत अभय चौटाला को सौंपने के चक्कर में अपने बड़े बेटे अजय चौटाला को खुद से दूर कर लिया। अब स्थिति ऐसी है कि ओम प्रकाश चौटाला के जिंदा रहते ही उनके दोनों बेटे एक दूसरे के आमने-सामने होने से कतराते हैं। पोतों के बीच जुबानी जंग सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर अक्सर नुमायां हो रही है। पार्टी के तौर पर हरियाणा में संगठन इतना कमजोर हो चुका है कि 90 विधानसभा सीट पर सही प्रत्याशियों का मिलना भी मुश्किल टास्क होगा।
जजपा : चौटाला परिवार का अंदरुनी विवाद जब सार्वजनिक मंच पर आया तो परिणाम यह हुआ कि इनेलो दो भाग में बंट गया। दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व में वर्ष 2018 में जननायक जनता पार्टी (जेजेपी या जजपा) ने जन्म लिया। काफी दिनों तक इनेलो के नेता और कार्यकर्ता असमंजस में रहे कि वो किसके साथ रहें किसके साथ नहीं। पर जैसे-जैसे परिवार में सुलह की संभावना धुमिल होती गई, नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी अपने अपने दल का चुनाव कर लिया। लोकसभा चुनाव में बड़े ही ताम झाम के साथ पार्टी ने अपने प्रत्याशी उतारे, पर हश्र ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। हाल के दिनों में जाट पंचायतों ने चौटाला परिवार में सुलह की कोशिश की। एक समय ऐसा लग रहा था कि अजय और अभय चौटाला के दिल मिल जाएंगे और दोनों के दिल मिलने से इनेलो और जजपा भी दल के रूप में मिल जाएंगे, पर यह संभव नहीं हो सका। हालांकि जाट प्रतिनिधियों ने अभी भी हार नहीं मानी है। ताऊ देवीलाल की जयंती पर इनेलो और जजपा दोनों ही दलों ने भव्य कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर रखी है। ताऊ देवीलाल को अपनी पार्टी की विरासत बताने वाले दोनों दल विधानसभा चुनाव में क्या बड़ा कर पाएंगे इस पर सभी की नजरें रहेंगी। जजपा के पास खोने को कुछ नहीं है, पर पाने को बहुत कुछ होगा जिसके कारण निश्चित तौर पर पार्टी इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकेगी।
बसपा, आप, शिरोमणी अकाली दल, स्वराज इंडिया : बसपा प्रमुख ने पहले इनेलो और फिर जजपा से गठबंधन किया, लेकिन चंद दिनों में ही दोनों पार्टियों से उनका मोहभंग हो गया। मोहभंग होने के वैसे तो तमाम कारण रहे, लेकिन पार्टी प्रमुख मायावती अपने हाथी पर सवार होकर सभी को छोटा ही समझती रही हैं। फिलहाल हरियाणा में हाथी पर किसी भी दल को सवार होने की अनुमति नहीं है। मायावती ने अपने ही दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर रखा है। उधर आम आदमी पार्टी भी अपने बचे खुचे चेहरों के साथ हरियाणा चुनाव में दम भर रही है। नवीन जयहिंद के अलावा पार्टी के पास फिलहाल कोई दूसरा चेहरा नहीं है। योगेंद्र यादव के रूप में पार्टी के पास बड़ा चेहरा जरूर था, लेकिन अरविंद केजरीवाल की तानाशाही से खुद को अलग कर उन्होंने स्वराज इंडिया के नाम से पार्टी का गठन कर लिया था। इसी स्वराज इंडिया के बैनर तले इस बार उन्होंने हरियाणा की राजनीति में कदम रखा है। सबसे मजेदार शिरोमणी अकाली दल का समीकरण है। पंजाब में भारतीय जनता पार्टी के साथ दस साल तक राज करने वाली पार्टी पड़ोसी राज्य हरियाणा में नितांत अकेली है। मन मुताबिक सीट नहीं मिलने के कारण अकाली दल भी हरियाणा में अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी।

देखना मजेदार होगा कि हरियाणा में न दिल और न दल मिलने वाली राजनीति में बाजी किसके हाथ में रहती है। भाजपा को अपने विकास के दावों पर भरोसा है। कांग्रेस अपनी खोई हैसियत पाने को बेताब है। इनेलो अपनी राजनीतिक विरासत बचाने की जद्दोजहत कर रही है। जजपा के पास खोने को कुछ नहीं, पर पाने को बहुत कुछ है। बसपा, आप, अकाली और स्वराज इंडिया हरियाणा में अपनी राजनीतिक भूमि तलाशने में जुटी है।

(लेखक आज समाज के संपादक हैं।)

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