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If there is no water then how will life survive! जल न बचा तो जीवन कैसे बचेगा!

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यह एक अभिशाप है या वरदान कि भारतवर्ष में शहरी अर्थ व्यवस्था का तेजी से विस्तार हुआ है और साल 1990 से अब तक कुल 29 साल में हमारी सकल घरेलू आमदनी का 55 प्रतिशत हिस्सा शहरी क्षेत्रों से है। यानी कृषि आधारित भारतीय अर्थ व्यवस्था अब कृषि उपजों पर अपनी निर्भरता से दूर होती जा रही है। भले हमारी यह तरक्की चीन से कम हो मगर है संतोषप्रद ही। लेकिन इसके जो नुकसान हैं उन पर भी नजर डालनी जरूरी है। हम वायु प्रदूषण और मौसम में आती उष्मता से तो वाकिफ हो ही चुके हैं पर जल पर जिस तरह से प्रदूषण ने अपना कब्जा जमाया है वह और भी भयभीत कर देने वाला है। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि विश्व में कुल 1400 आदमी रोजाना जल प्रदूषण से मरते हैं और इनमें से 600 भारत में। लगभग हर बड़ी नदी इतनी अधिक प्रदूषित हो चुकी है कि उस नदी का पानी किसी भी काम के लायक नहीं रहा है। पंजाब को छोड़ दें तो बाकी राज्य जल प्रदूषण की भारी मार झेल रहे हैं। यूपी जहां गंगा-जमना के चलते पूरा क्षेत्र हरा-भरा हुआ करता था आज वहां जमीन के नीचे से पानी गायब है और उसकी वजह है वहां की नदियों का पानी बुरी तरह प्रदूषित होना और सिल्ट की वजह से उनके बहाव में रुकावट आ जाना। गंगा व यमुना ही नहीं उनकी सहायक नदियां भी भारी प्रदूषण की वजह से गायब होती जा रही हैं। और यह संकट अकेले यूपी का ही नहीं है। इन नदियों से आया पानी आगे जहां-जहां जाता है वहां भी यह संकट या तो बाढ़ के रूप में अथवा सूखे के रूप में अपनी बरबादी लेकर ही जाता है।
नदियों में औद्योगिक कचरा ही नहीं डाला जा रहा है बल्कि नदियों को डूब क्षेत्र भी सिकोड़ा जा रहा है और इसकी वजह है शहरों के विस्तार के लिए निकाली जा रही जमीन। चूंकि दुनिया की परंपरा रही है कि शहर नदियों के किनारे ही बसे इसलिए उनके विस्तार की एक सीमा भी निर्धारित ही थी मगर जब से शहरी आबादी का घनत्व बढ़े? लगा पहला दबाव नदियों पर ही पड़ा कि बसावट के लिए जमीन नदी से ली जाए और इसका खामियाजा यह भुगतना पड़ता है कि कभी भी वह नदी उबल पड़ती है और सब कुछ तहस-नहस कर डालती है। यह नदियों के डूब क्षेत्र में ही बसावट का खामियाजा था कि अलकनंदा रुष्ट होकर केदारनाथ हादसा करती है तो कभी झेलम पूरे श्रीनगर को डुबो देती है और सबसे ताजा उदाहरण चेन्नई का है। यह अनियोजित बसावट और नदियों में कचरा डालने की आदत ने प्रकृति को कुपित कर दिया है। प्रकृति फिर दया नहीं करती और वह जितना देती है उससे कहीं अधिक ले लेती है। जान भी और माल भी। अभी भी समय है कि हम चेत जाएं और नदियों को सिल्ट से बचाएं। उनकी धार को अवरुद्घ न करें।
यह सही है कि पूर्व काल में भी नदियों में प्रदूषण आता था और नदी में सिल्ट जमने लगती थी मगर तब किसी भी बड़ी नदी की सहायक नदी उसकी इस सिल्ट को खत्म करती थी। तब भी शहर नदी किनारे थे और वे रोज उसमें प्रदूषण फैलाते ही थे। मगर आप देखें कि हर नदी जैसे ही शहर पार करती उसमें कोई न कोई सहायक नदी आ कर मिल जाती और इस वेग तथा इतनी तेज जल धारा के साथ कि उसकी सारी सिल्ट स्वत ही खत्म हो जाती। यमुना के दिल्ली से निकलते ही हिण्डन (हरिनंदी) नदी उसमें आकर मिल जाती थी और एक जमाने में यमुना की इस सहायक नदी में पानी इतना ज्यादा और वेग इतना तीव्र होता कि दिल्ली से निकली यमुना की सारी सिल्ट खुद ब खुद समाप्त हो जाती। मगर आज वह हिण्डन नदी की जलधारा समाप्त हो चुकी है। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण तथा नोएडा व ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों की कृपा से वहां अब ऊंची-ऊची इमारतें खड़ी हैं। अब हिंडन नदी के नाम पर एक पतली-सी जलधारा है जो स्वयं इतनी प्रदूषित है कि उसके नाला होने का भ्रम होता है। यही हाल अन्य नदियों का भी है। इस यमुना की सारी सिल्ट दिल्ली से बाहर निकलते ही हिण्डन के पानी से धुल जाया करती और नदी फिर वेग से बहने लगती। एक जमाने में जो नजफगढ़ नाला यमुना में गिरा करता था वह इसमें गंदगी नहीं शहर का पानी बहाकर लाता था। मगर आबादी बढेÞ? और शहरीकरण की बढ़ती रफ्तार ने इसे नाला और सिल्ट लाने का जरिया बना दिया। अब जब दिल्ली से यमुना में जो सिल्ट आता है उसके बहने का कोई उपाय नहीं नतीजा यह है कि यही यमुना वृन्दावन और मथुरा तक एक पतली धारा वाली मरियल सी नदी बनकर बहती है। आगरा में यमुना का सबसे रोमांचक और आकर्षक रूप दिखा करता था। एक जमाने में ताज के पीछे यमुना बहती तो ऐसा लगता मानों गहरे हरे रंग वाली यमुना के आंचल में पसरा हो ताज महल। इसके बाद यमुना का बीहड़ इलाका शुरू होता क्योंकि नदी यहां से तेज ढाल की तरफ गिरती। बटेसर, इटावा और कालपी होती हुई यमुना जब औरय्या जिले में माधोगढ़ के करीब पचनदा पहुंचती है तो वहां पर तेज बहती चार और नदियां यमुना में आकर गिरतीं हैं। ये नदियां हैं चंबल, क्वारी, पहुज और सिंध। इनका अथाह पानी यमुना को लबालब कर देता है और फिर हमीरपुर में यमुना में बेतवा मिलती है और इसके बाद इलाहाबाद में यमुना गंगा में गिरकर गंगा की सिल्ट साफ करती। नदी का बहाव वैसा ही है पर गोमुख से निकली गंगा गंगोत्री, उत्तरकाशी से ऋषिकेश, हरिलार, गढ़ से होती हुई फरुखाबाद तक इतनी मटमैली व काली हो जाती है कि कानपुर में पता नहीं चलता कि गंगा का पानी काला क्यों है। इसके बाद कानपुर में टेनरीज का जो पानी इसमें मिलता है वह इसे काला और पीला आदि सतरंगी बना देता है। हकीकत यह है कि कानपुर में गंगा पानी से आचमन तक की इच्छा नहीं होती।
जब इलाहाबाद के संगम में गंगा और यमुना का संगम होता है तब कहीं गंगा का पानी किसी नदी के पानी जैसा प्रवाहमान लगता है। सवाल यह उठता है कि इलाहाबाद के तक के सफर में गंगा और यमुना में करीब-करीब क्रमश 50 और 35 छोटी-बड़ी नदियां मिल चुकी होती हैं पर वे बेचारी नदियां इन नदियों की सिल्ट हटाने की बजाय स्वयं इनमें सिल्ट लाकर गिराती हैं। और इसकी वजह है कि इन नदियों का खुद नाला बनती जाना। नतीजा यह है कि गंगा और यमुना में पीएच वेल्यू और टीसी इतनी बढ़ चुकी होती है कि इन दोनों ही नदियों का खुला पानी नहीं पिया जा इसके सकता। तब ये नदियां अमृतवाहिनी नहीं बल्कि मानवीय सभ्यता का उच्छिष्ट बहाते-बहाते स्वयं जहरीली बन चुकी होती हैं।
शंभूनाथ शुक्ल
(लेखक वरिष्ठ संपादक रहे हैं)

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