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Hunter-cumulative world order: शिकारी-संचयी विश्व-व्यवस्था

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भगवान के होने-न-होने के बारे में बहस अभी जारी ही है। ये आदमी के सवाल-जवाब के शौक की बात है। कहां से आएं हैं, कहां जाना है और दुनियां में क्या करना है, इस तरह के प्रश्न इसके दिमाग में चलते ही रहते हैं। शुरुआती दिनों में प्रकृति पूरी तरह से हावी थी। आदमी इसक खुश करने और रखने के तरीके और बहाने ढूंढता रहता था। फिर कहानियों का दौर शुरू हो गया। भगवान की खोज हो गई। उनको नाम दे दिया गया। धर्म उठ खड़े हुए। इसे मानने वालों का जत्था बन गया।
समय और परिस्थिति के हिसाब से अलग-अलग कहानियां बनीं। भगवान को अलग-अलग नाम मिला। जब अलग-अलग धर्म मानने वाले मिले तो झगड़ा तो होना ही था। अपने को ताकतवर समझने वाले अल्टिमेटम देने लगे अपने भगवान को कहो कि मेरे वाले के सामने सरेंडर करे। असली मकसद माल-पानी हथियाना होता था। दक्षिण अफ्रीका के डेसमंड टूटू ने बड़े नाटकीय अंदाज से इस बात को रखा है-जब मिशनरी आए तो हमारे पास जमीनें थी और उनके पास बाइबल। फिर उन्होंने कहा कि चलो प्रार्थना करते हैं। हमने आंखें मूंद ली। जब आंख खोली तो पाया कि जमीनें उनके नाम थी और बाइबल हमारे हाथ। बुद्ध जैसे भले लोग भी परमज्ञान के बाद घर नहीं बैठे। खुद को भगवान बना डाला और अपने बच्चों तक को बौद्ध धर्म के विस्तार के लिए जहां-जहां भेज सकते थे, भेज दिया। काफी दिनों तक धर्म और राज्य का गठजोड़ चला। जब दो महत्वाकांक्षी लोग इकट्ठे हों तो देर-सवेर जूत बज ही जाता है। इधर भी ऐसा ही हुआ। शासकों ने धर्माधिकारियों से कहा कि लड़ाई हम लड़ते हैं, जान जोखिम में हम डालते हैं, दादागिरी तुम्हारी क्यों चले? तब से इनकी नूरा-कुश्ती चल रही है। समय और परिस्थिति के अनुसार ये एक-दूसरे के ऊपर-नीचे होते रहते हैं। लेकिन धर्म को सबसे गम्भीर चुनौती विज्ञान से मिली है। इसने कहा कि तुम्हारी हवा-हवाई बातें हम नहीं मानते। जो कहते हो, साबित करो।
चार्ल्ज डारविन ने हड्डियां को आधार बना कर ये दावा ठोक दिया कि आदमी बंदर से निकला है, इसे किसी भगवान-वगवान ने नहीं बनाया है। खगोलशास्त्रियों ने साफ कर दिया कि पृथ्वी अस्तित्व का केंद्र नहीं है। ये तो एक बड़े ब्रह्मांड का छोटा सा उल्का-पिंड है जो एक अपेक्षाकृत छोटे से तारे के चक्कर काटता रहता है और उसी का दिया खाता है। शुरू में धर्म के ठेकेदार विज्ञान-साधकों को विधर्मी और ईश्वर-शत्रु बता ठिकाने लगाते रहे। लेकिन जब विज्ञान ने अपने पिटारे से आदमी की समस्याओं का समाधान निकालना शुरू किया तो लोग इसके साथ लग लिए।
शासक भी इसके पीछे हो लिए। उनको भी इससे बम गोला और बारूद चाहिए था। धर्म एक पल के लिए ठिठका। लेकिन इसे पता था कि एक अनिश्चित जीवन से हैरान और आकस्मिक मृत्यु से भयभीत आदमी उसके बिना ज्यादा दिन रह नहीं सकता। अस्तित्व अभी भी शासन, विज्ञान और धर्म की एक खिचड़ी है, जिसे खाने को हम बाध्य हैं। स्वतंत्रता तो कहने की बात है। हम अक्सर अखबारों में पढ़ते हैं कि शादी में घोड़ी चढ़ने की हिमाकत दिखाने के लिए किसी दूल्हे को उसी के पड़ोस में रहने वाले लोगों ने पीट दिया। उनका मानना था कि ये उनका विशेषाधिकार है, दूसरों की हिम्मत कैसे हुई? दुनियां भी कुछ ऐसे ही चल रही है। विज्ञान और वाणिज्य में समृद्ध पांच-छह देशों का एक क्लब है जिसे कभी विकसित, कभी पश्चिमी देश कहा जाता है।
पांच-दस और देश जो उनसे मोटी खरीदारी करते हैं, विकासशील के नाम से पुचकारे जाते हैं। बाकी देश अविकसित हैं। तथाकथित विकसित देशों ने अपने फायदे के हिसाब से अन्तरराष्ट्रीय कानून बना रखें हैं, संस्थाएं चला रखी है। जो कुछ या कोई उनकी श्रेष्ठता और अग्रता को चुनौती देता दिखता है वो उसका भूत बना देते हैं। परमाणु बम को ही लीजिए। खुद ही बनाया। जापान पर गिरा आए। दो-चार चेले-चपाटों को भी पकड़ा दिया। बाकी को कहने लगे, खतरनाक है, इससे दूर रहो। जब साम्यवाद से शीत-युद्ध लड़ रहे थे आबादी के एक बड़े तबके को धर्म के नाम पर जिहाद के लिए उकसाया। उन्हें ट्रेनिंग और हथियार मुहैय्या कराया। भस्मासुर अब इन्हीं के सिर पर हाथ रख रहा है। अब ये सारी दुनिया को डराने में लगे हैं कि ये तो आतंकवादी है। विश्व शांति के लिए गम्भीर खतरा।
कहीं इसके हाथ परमाणु बम न लग जाए। तेल के निर्यात के लिए मशहूर एक धर्म-आधारित देश इस फेर में है कि परमाणु तकनीक हाथ लग जाए। उत्तर कोरिया के तानाशाह की तरह गुरार्ने में काम आएगा। विकसित भाइयों ने इस बात के लिए उसका हुक्का-पानी बंद कर रखा है। बाकी को भी धमका रहे हैं कि आप भी इससे न बोलो। ये अलग बात है कि इन्हीं की कम्पनियां जार-जार रो रही है कि दूसरे देश उनका बिजनेस ले जा रहे हैं, भारी नुकसान हो रहा है। दो-तीन दिन पहले माहौल एक दम से बिगड़ गया।
परमाणु बम की जिद पाले देश ने ना-ना करने वाले का जासूसी ड्रोन मार गिराया। फिर क्या था? बंदूकें तन गई। लगा कि एक और आतिशबाजी होने ही वाली है जिसमें हजारों मरेंगे। लेकिन ऐन वक्त पर किसी ने कह दिया कि ये उस देश का नहीं बल्कि उधर के किसी बेलगाम फौजी का काम है। आका का दिल इस बात से भी बड़ा पसीजा कि बमबारी में 150 आदमी भी मरेंगे। फिलहाल खतरा टल गया है। लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। बातें कितनी बड़ी कर लें, विश्व-व्यवस्था अभी भी शिकारी-संचयी वृति का ही है। बड़ी मछली छोटी मछली को अभी भी बेखौफ खाती है।

ओम प्रकाश सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

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