Home संपादकीय How long will it be a fearless crowd?: आखिर कबतक निडर रहेगी यह उन्मादी भीड़?

How long will it be a fearless crowd?: आखिर कबतक निडर रहेगी यह उन्मादी भीड़?

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कहते हैं कि भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती। उनका कोई दीन-धर्म नहीं होता और इसी बात का फायदा हमेशा मॉब लिंचिंग करने वाली भीड़ उठाती है। पर सवाल ये है कि इस भीड़ को इकट्ठा कौन करता है? उन्हें उकसाता-भड़काता कौन है? जवाब हम सब जानते हैं। फिर भी सब खामोश हैं। डर इस बात का है कि अगर कानून हर हाथ का खिलौना हो जाएगा तो फिर पुलिस, अदालत और इंसाफ सिर्फ शब्द बन कर रह जाएंगे। कैसे एक इंसान के लिए दूसरे को मार डालना इतना आसान हो जाता है? कौन सी चीज इन गुटों को इतनी जल्दबाजी और नफरत के लिए उकसाती है? क्या इनमें से किसी शख्स ने ये सब कभी अकेले करने के बारे में सोचा होगा? शायद नहीं। यही है मॉब लिंचिंग। जो अब डराने लगी है। मॉब लिंचिंग का नाम सुनते ही मन भयाक्रांत हो जाता है। इस डर को खत्म करने के लिए सरकारी स्तर पर क्या कदम उठाया जा रहा है, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है।

इसी क्रम में यह बताना जरूरी है कि कर्नाटक के प्रख्यात रंगकर्मी एस रघुनंदन ने भगवान और धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग के विरोध में साल 2018 का संगीत नाटक अकादमी सम्मान लेने से मना कर दिया है। उन्होंने इस संबंध में एक पत्र लिखकर सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने साझा किया। यह सम्मान लेने से मना करते हुए एस रघुनंदन ने कहा कि वर्तमान में ईश्वर और धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग (पीट-पीटकर हत्या) और लोगों के साथ हिंसा जारी है। कोई व्यक्ति क्या खा रहा है इस बात को लेकर भी हिंसा की जा रही है। हत्या और हिंसा की इन घटनाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर सत्ता जिम्मेदार है। पत्र में रघुनंदन ने कहा कि इसके लिए सभी माध्यमों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें इंटरनेट भी शामिल है।

उन्होंने दावा किया कि एक व्यवस्था बनाने की कोशिश की जा रही है, जो स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के छात्रों को घृणा और कुतर्क का पाठ पढ़ाएगा। दबी जुबान यह भी कहा जाने लगा है कि देश के सत्ताधीशों ने कर्तव्यनिष्ठ बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं की आवाज को दरकिनार कर गरीबों और शक्तिहीनों को चुप कराने का फैसला किया है।
देश में बनते जा रहे इस तरह के डरावने माहौल यानी मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं पर सरकार ने संसद में जवाब दिया कि देश में होने वाली लिंचिंग की घटनाओं को लेकर अलग से कोई आंकड़े जमा नहीं किया जाता है।

पिछले दो महीनों में मॉब लिंचिंग की कई घटनाएं सामने आई हैं। जिनमें भीड़ ने बिना किसी पूछताछ के कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया। दलित और अल्पसंख्यक इसके सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं। संसद में इस मुद्दे पर चर्चा जरूर होती है, लेकिन सरकार की तरफ से सिर्फ गुस्सा और खेद जताया जाता है। ताजा मामला बिहार के सारण जिले का है। जहां भीड़ ने तीन लोगों को पीट-पीटकर मार डाला। मवेशी चोरी के आरोप में स्थानीय लोगों ने इन तीनों को पकड़ा और तब तक पीटते रहे जब तक उनकी जान नहीं चली गई। पुलिस के मौके पर पहुंचने के बाद परिवार उनके पैर पकड़कर इंसाफ की मांग करता नजर आया। देश में पिछले कुछ वर्षों से मॉब लिंचिंग की घटनाओं में काफी इजाफा हुआ है। चोरी, गो तस्करी और ऐसे ही कुछ अपराधों के शक में अभी तक सैकड़ों लोग जान गंवा चुके हैं। लेकिन अगर पिछले दो महीनों की ही बात करें तो लिंचिंग की कई बड़ी घटनाएं सामने आई हैं।

हाल ही में झारखंड के एक गांव में तबरेज अंसारी नाम के एक युवक को मारने की घटना सामने आई थी। इस घटना का वीडियो भी सामने आया था, जिसमें भीड़ युवक को बांधकर पीट रही है। 17 जून को बाइक चोरी के शक में तबरेज अंसारी की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस घटना के वीडियो में देखा गया कि कुछ लोग तबरेज को जय श्री राम और जय हनुमान बोलने के लिए मजबूर कर रहे थे। 5 जून को पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित मानिकतला में एक 35 वर्षीय व्यक्ति की पीट पीटकर हत्या कर दी गई। इस व्यक्ति को करीब एक दर्जन लोगों ने चोरी के शक में पीटा था। इस मामले की सूचना पाकर जब पुलिस मौके पर पहुंची तो उसे पीड़ित की लहूलुहान लाश एक बंद पड़े क्लब के अंदर फर्श पर पड़ी मिली। पुलिस को शव के पास खून से सने क्रिकेट बैट और बांस के कई डंडे मिले भी थे। गुजरात के बोताड़ जिले में 19 जून को दलित सरपंच के पति और डिप्टी सरपंच मांजीभाई सोलंकी की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। 6 लोगों ने लाठियों और पाइपों से मांजीभाई को पीटा। यह घटना उस समय हुई थी जब मांजीभाई अपनी मोटरसाइकिल से रणपुर-बरवाला सड़क से गुजर रहे थे। मांजीभाई का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें वह लगभग बेहोशी की हालत में दिख रहे थे।

दिल्ली में भी पिछले महीने मॉब लिंचिंग की एक घटना सामने आई थी। 15 जून को हुई यह घटना रोहिणी के प्रेम नगर इलाके की थी, जिसमें एक 23 वर्षीय शख्स को मोबाइल चोरी के शक में पीटा गया। पुलिस के मुताबिक, इस घटना की सूचना मिलने के बाद जब वह मौके पर पहुंची तो उसे एक शख्स जमीन पर बेहोश पड़ा मिला, जिसके शरीर पर चोट के निशान थे। इस शख्स को संजय गांधी अस्पताल ले जाया गया था, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। राजस्थान सरकार ने हाल ही में मॉब लिंचिंग पर कानून बनाने की बात कही। सीएम अशोक गहलोत ने राज्य विधानसभा में इस बात की घोषणा की थी। उन्होंने ऐसी घटनाओं पर दुख जताते हुए इसे लेकर राज्य में सख्त कानून बनाने की बात कही थी।
दरअसल, हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। इस स्थिति में यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि आखिर यह करने के लिए कौन प्रेरित कर रहा है। जानकार मानते हैं कि कानून हाथ में ले लेना एक चरम स्थिति है, लेकिन इस तरह समूह से प्रभावित व्यवहार के बहुत ही सरल उदाहरण भी हैं। भीड़ या झुंड की मानसिकता तब देखी जाती है किसी व्यक्ति पर जब एक समूह प्रभाव डालता है। ज्यादातर मामलों में, एक नारा या एक प्रोपेगेंडा इन लोगों की ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया को जगा देता है। भावनात्मक बंधन अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जो पूरे समूह को एक साथ चलाता है।

किसी चीज को लेकर किसी शख्स के मन में मामूली से यकीन, असमंजस या शक के कारण भी इस तरह की प्रवृत्ति आती है। ऐसे मामले में सोचने, पड़ताल करने या जांच करने की बजाए, वह सिर्फ दूसरों का अनुसरण करता है। नतीजतन, जब एक जैसी विचारधारा वाले लोग एक साथ आ जाते हैं तो वे एक-दूसरे की विचारधाराओं और आस्थाओं को मजबूत करते हैं। 25 जून को रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के कोल्लम से सांसद एनके प्रेमचंद्रन के सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि ऐसी कितनी वारदात हुई है, इसकी जानकारी नहीं है क्योंकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ऐसा कोई डेटा नहीं रखता। सोचने वाली बात यह है कि पिछले महीने एक सांसद और केंद्रीय मंत्री ने कबूल किया था कि उन्होंने झारखंड में मॉब लिंचिंग के आरोपियों की आर्थिक मदद की थी।
अगर किसी को ये लगता है कि डेढ़ अरब की आबादी वाले देश में ऐसी इक्की-दुक्की घटनाएं हो जाती हैं तो पूरे देश के चरित्र पर बट्टा लगाना ठीक नहीं तो ये भी समझ लीजिए कि इन घटनाओं में एक कड़ी दिखती है। साफ समझना चाहते हैं तो इन घटनाओं (वारदात) का सियासी नतीजा क्या होना है, ये सोच लीजिए। कोई ताज्जुब नहीं कि ऐसी घटनाओं पर सत्ता से प्रतिक्रिया या तो नहीं आती या बहुत बवाल मचने के बाद किंतु-परंतु के साथ आती है। लेकिन जैसे देर से मिला इंसाफ भी अन्याय है, उसी तरह इन मामलों में देर से आए आधे-अधूरे बयान भी बेअसर हो जाते हैं। बहरहाल, अब देखना यह है कि देश के हर कोने से आ रही मॉब लिंचिंग की खबरों पर सरकार किस तरह अंकुश लगाती है?

राजीव रंजन तिवारी
(लेखक आज समाज के समाचार संपादक हैं)
trajeevranjan@gmail.com

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