Home संपादकीय How long hateret will work? कब तक गरम रहेगा नफरतों का बाजार?

How long hateret will work? कब तक गरम रहेगा नफरतों का बाजार?

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नफरतों का बाजार इतना गरम है कि कौमी एकता की बात करने में लोग सकुचाने लगे हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर नफरतों का यह दौर कब खत्म होगा? इसे खत्म करने के लिए क्या किया जाए? दरअसल, ताजा घटनाक्रम असम का है, जहां एक मुस्लिम युवक की बेरहमी से पिटाई की गई है और उससे जबरन जय श्रीराम के नारे लगवाए गए हैं। यह दुखद ही नहीं, दुर्भाग्यपूर्ण भी है। आज के दौर में ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ की जगह ‘उनका (मुस्लिमों का) मन बहुत बढ़ गया है’ जैसी लाइन ने ले ली है। कुछ राजनीतिक दलों के लिए कथित तौर पर मुसलमानों का हितैषी होने पर ‘तुष्टिकरण’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। पहले यह समुदाय उपेक्षा का शिकार था। उसे आर्थिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता था। अब इसकी जगह नफरत ने ले ली है। गोरक्षा के नाम पर कई लोगों की जान ली जा चुकी है, जिससे मुसलमानों के प्रति बदली हुई इस सोच का पता चलता है। धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर भरोसा रखने वालों का कहना है कि भगवा ब्रिगेड घृणा की राजनीति कर रहा है, जिससे ऐसी स्थिति बनी है।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि अल्पसंख्यक वर्ग के एक छोटे हिस्से पर समाज को बांटने का भी आरोप लगाया जा रहा है। इससे नफरत की इस आग को और हवा मिल रही है। जानकार मानते हैं कि हमारी संस्कृति असल में ‘सह-अस्तित्व’ वाली है, जिसे कुछ लोग तोड़ने में लगे हैं। इसके उलट, एंटी सेक्युलरिस्ट का मानना है जो भी हो रहा है, वो क्रिया के जवाब में प्रतिक्रिया है। ऐसा मानने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि अगर वे (मुसलमान) कुछ करते हैं, तो उसे सूद समेत लौटाया जाना चाहिए। ये वो लोग हैं, जो हर समस्या के लिए ‘दूसरों’ को कसूरवार ठहराते हैं। इनमें से कुछ-एक तो जायज होती हैं, लेकिन कई एक बस मन की उपज। अगर इन दलीलों को छोड़ दें, तो लोग नेताओं को समुदायों को बांटने क्यों देते हैं, जबकि इससे दशकों से चला आ रहा आपसी भाईचारा खत्म होता है? साल 2000 के बाद मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव के आंकड़ों में इस सवाल का जवाब छिपा है।
नेशनल सैंपल सर्वे आॅर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) के आंकड़ों के आधार पर की गई एक पड़ताल में कुछ बातें सामने आई हैं। मुसलमानों और सवर्ण हिंदुओं के नए मध्य वर्ग की ग्रोथ के साइज में अंतर चौंकाती है। 1999-2000 से 2011-12 के बीच मुस्लिम नव मध्यवर्ग में 86 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई, जबकि हिंदुओं के मामले में यह ग्रोथ 76 पर्सेंट रही। हालांकि, अन्य जाति (गैर-ओबीसी, गैर-अनुसूचित जाति, गैर-अनुसूचित जनजाति हिंदुओं) में नए मध्य वर्ग का साइज इस बीच सिर्फ 45 पर्सेंट बढ़ा। इस बदलाव की वजह क्या है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से कुछ जवाब मिलते हैं, जो भारतीय मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में सबसे भरोसेमंद और व्यापक सोर्स है। रिपोर्ट में लिखा गया है कि दूसरों की तुलना में कृषि क्षेत्र से बहुत कम मुसलमान जुड़े हुए हैं। मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड (खासतौर पर पुरुषों के मामले में) में उनकी नुमाइंदगी दूसरे सामाजिक-धार्मिक वर्गों से काफी अधिक है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर से भी वे बड़ी संख्या में जुड़े हुए हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि मुसलमान वर्कर्स रिटेल और होलसेल ट्रेड, लैंड ट्रांसपोर्ट, आॅटोमोबाइल रिपेयर, टोबैको प्रॉडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग, टेक्सटाइल, अपैरल और फैब्रिकेटेड मेटल प्रॉडक्ट्स से भी बड़े पैमाने पर जुड़े हैं। उदारीकरण के बाद जहां कृषि क्षेत्र की ग्रोथ औसत रही है, वहीं मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज (खासतौर पर ट्रेड) में तेज ग्रोथ हुई है। गैर-कृषि क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले मुसलमान समुदाय को 1991 में हुए आर्थिक सुधारों का इसी वजह से अधिक फायदा हुआ है। इसी वजह से मुस्लिम मध्य वर्ग में दूसरे समुदाय के मुकाबले तेज ग्रोथ हुई है। कुल मिलाकर मुसलमानों को पारंपरिक तौर पर गैर-कृषि क्षेत्रों से जुड़े होने का फायदा मिला है। इसी वजह से हाल के वर्षों में इस मामले में मुसलमानों का प्रदर्शन दूसरों के मुकाबले कुछ बेहतर रहा है। अब सवाल यह उठता है कि यदि मुसलमानों ने मेहनत-मजदूरी करके यदि खुद को समृद्ध किया है तो इसमें उनकी गलती क्या है? यदि इस वजह से उनके प्रति नफरत बढ़ रही है तो यह चिंता की बात है। देश के कई हिस्सों में ऐसी बातें आसानी से सुनने को मिल जाएंगी कि तरक्की की दौड़ में पीछे छूटने के चलते ऐसी भावना बढ़ रही है। यह तुलनात्मक तौर पर कम समृद्धि का नतीजा है, जिसे दोनों समुदाय के कट्टरपंथी भुनाने को बेचैन हैं।
अब ताजे मामले को समझिए। असम के बारपेटा में मुस्लिम समुदाय के लोगों को कथित तौर पर पीटने और जबरन जय श्रीराम और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में एक दक्षिणपंथी संगठन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि असम के अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के एक समूह पर कथित रूप से हमला किया गया और उन्हें जय श्रीराम और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया। आॅल असम माइनोरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (एएएमएसयू) और नॉर्थ ईस्ट माइनोरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (एनईएमएसयू) के संस्थापक ने इस दक्षिणपंथी संगठन के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज कराई है। पुलिस के अनुसार, यह घटना पिछले दिनों तब सामने आई, जब कथित तौर पर हमले और नारे लगवाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। शिकायत में कहा गया कि दक्षिणपंथी संगठन के सदस्य होने का दावा करने वाले लोगों के एक समूह ने बारपेटा में एक आॅटोरिक्शा को रोककर उसमें बैठे युवकों की पिटाई की। अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पीड़ितों से जबरन जय श्रीराम, भारत माता की जय और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाए गए। जरा सोचिए कि यह सब कौन लोग और क्यों कर रहे हैं? उनका मकसद क्या है?
इससे पहले मई माह के आखिर में हरियाणा के गुरुग्राम में एक मुस्लिम युवक की पिटाई की गई। गुरुग्राम के सदर बाजार इलाके में धार्मिक टोपी पहनने पर मुस्लिम युवक की कुछ लोगों ने पिटाई कर दी। आलम नाम का युवक मस्जिद से नमाज पढ़कर घर जा रहा था। इसी दौरान कुछ युवकों ने उसे रोक लिया। आरोपियों ने मुस्लिम युवक से टोपी उतारने के साथ जय श्रीराम का नारा लगाने के लिए कहा। आलम ने पुलिस में दाखिल एक शिकायत में कहा कि चार युवक सदर बाजार लेन में उससे मिले और उन्होंने उससे पारंपरिक टोपी हटाने के लिए कहा। आलम बिहार का रहने वाला है और यहां जैकब पुरा इलाके में रहता था। आलम ने कहा कि आरोपियों ने मुझे धमकी दी और कहा कि इलाके में टोपी पहनने की इजाजत नहीं है। उन्होंने टोपी उतार ली और मुझे थप्पड़ मारा। उन्होंने भारत माता की जय का नारा लगाने के लिए कहा। उनके कहने पर मैंने नारा लगाया। उसके बाद उन्होंने मुझे जय श्रीराम बोलने के लिए भी मजबूर किया, जिसे मैंने इनकार कर दिया। उसके बाद आरोपियों ने लाठी से मेरी बुरी तरह से पिटाई की। पीड़ित युवक ने सदर बाजार इलाके में लोगों से मदद की गुहार लगाई। इसके बाद मौके पर कुछ लोग वहां पहुंच गए। लोगों को आता देख हमलावर फरार हो गए।
इससे पहले अगस्त 2018 में गुरुग्राम में खांडसा के एक सैलून में जफरुद्दीन नाम के युवक से दो युवकों ने दाढ़ी कटवाने के लिए दबाव बनाया था। जब जफरुद्दीन ने ऐसा करने से मना कर दिया तो युवकों ने उन्हें और नाई को पकड़ लिया और दोनों की पिटाई कर दी। पिटाई करने के बाद जफरुद्दीन की दाढ़ी कटवा दी थी। इस तरह की घटनाएं तो सिर्फ बानगी भर हैं। कहा जा रहा है कि नफरतों का दौर इतना तेज चल पड़ा है कि समाज एक वर्ग हर वक्त मुस्लिम समुदाय के लोगों को गलत निगाह से देख रहा है। इस पर रोक लगाने की जरूरत है। वरना, ‘हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, सब हैं भाई-भाई’ वाली बात पुरानी हो जाएगी। बहरहाल, देखना यह है कि होता क्या है?
(लेखक आज समाज के समाचार संपादक हैं)
trajeevranjan@gmail.com
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