Home टॉप न्यूज़ Hot seat Varanasi analysis by Ajay Shukla: हॉट सीट वाराणसी का विश्लेषण- अजय शुक्ल: फिलहाल मोदी के मुकाबले नहीं है कोई कद्दावर

Hot seat Varanasi analysis by Ajay Shukla: हॉट सीट वाराणसी का विश्लेषण- अजय शुक्ल: फिलहाल मोदी के मुकाबले नहीं है कोई कद्दावर

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विश्व का प्राचीनतम शहर काशी, बाबा विश्वनाथ की जयकार के साथ आंखें खोलता और उन्हें शयनासन देकर ही सोता है। बदलाव की बयार के साथ चलने वाले वाराणसी संसदीय क्षेत्र ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही तवज्जो दी है। 1991 में पहली बार भाजपा को यहां से जीत क्या मिली फिर सात चुनाव उसके ही खाते में आये। पिछले 22 साल से यहां के नगर निगम से लेकर शहरी विधायक तक भाजपा को ही मिले हैं। गुजरातियों के साथ रोटी-रोजगार का रिश्ता इतना मजबूत रहा कि नरेंद्र मोदी जब यहां पहुंचे तो सब ने उन्हें हाथों हाथ लिया। झूठी सच्ची कहानियों के बीच यहां मस्ती की बयार बहती है। चर्चा काशी के मोहल्ले से लेकर विश्व के तमाम शहरों तक होती है। देश की 16वीं लोकसभा में प्रधानमंत्री देकर यहां के लोग खुशियां मना रहे हैं। नरेंद्र मोदी के लिए यही सोच मुफीद साबित होती है। वह गुरुवार को यहां दोबारा नामांकन करने पहुंच रहे हैं। माना जाता है कि काल भैरव ने जिसके लिए हां कर दी वही यहां का नुमाइंदा होता है।
2014 में सबकी नजरें काशी पर थी, क्योंकि भाजपा के पीएम इन वेटिंग गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से यहां आकर चुनाव लड़ रहे थे। उनका मुकाबला करने हरियाणा के लाल दिल्ली के तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल आये थे। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मैदान में हैं और उनका मुकाबला करने को फिलहाल कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया है। मोदी के मुकाबले सैन्य जवानों को जानवरों जैसा खाने देने का खुलासा करने के आरोप में बर्खास्त तेजबहादुर यादव ताल ठोक रहे हैं। गठबंधन ने कांग्रेस से सपा में आई शालिनी यादव को प्रत्याशी बनाया है। चर्चा में है कि कांग्रेस की धीर-गंभीर इंदिरा की छवि रखने वाली प्रियंका गांधी वाराणसी में मोदी की सांसें फुलवा सकती हैं। नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और मतदान 19 मई को होना है। बहराल चाहे जो आये, यहां के चुनाव पर पूरे विश्व की निगाह होना लाजिमी है।
केजरीवाल ने भी किया था गजब
पिछले आम चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अरविंद केजरीवाल ने बगैर किसी आधार के चुनाव लड़ा था। उन्होंने 2 लाख 9 हजार 238 वोट लेकर यह साबित किया था कि अगर जमीनी आधार वाला कोई नेता आए तो वह गजब ढा सकता है। हालांकि भाजपा के मोदी ने उन्हें 3 लाख 71 हजार 784 वोटों के अंतर से हराया था। मोदी को 5 लाख 81 हजार 22 वोट मिले थे। भूमिहार और मुस्लिम वोटों के सहारे कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय सिर्फ 75 हजार 614 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे थे। दलित-मुस्लिम के सहारे बसपा के प्रत्याशी विजय प्रकाश जायसवाल को 60 हजार 579 और यादव-मुस्लिम वोटों के साथ पनवाड़ियों के वोट के सहारे सपा के कैलाश चौरसिया को 45 हजार 291 वोट मिले थे। इस लोकसभा सीट क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र रोहनियां, सेवापुरी, वाराणसी उत्तर, दक्षिण और छावनी आते हैं। यह पांचों विधायक भाजपा के ही हैं। मेयर भी दो दशक से भाजपा का ही है।
कम नहीं हैं चुनौतियां
वैसे 2019 के चुनाव में मोदी को खास चुनौती नहीं है मगर उनसे शिकायतें भी लोगों की कम नहीं है। जिन गांवों को उन्होंने गोद लिया वे बदहाल हैं। काशी को क्वेटा बनाने का दावा लोगों को टीस देता है। श्रीकाशी विश्वनाथ कारीडोर के नाम पर तोड़े गये मंदिर भी चुनौती हैं। एयरपोर्ट तक बेहतरीन सड़क बाहर से आने वालों को सुखद अनुभूति कराती है मगर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की दुर्दशा चर्चा में रहती है। नगर प्रशासन से लेकर केंद्र की सरकार के बावजूद बनारस की बदहाली लोगों को टीस देती है। न रोजगार, न व्यापार और न सुविधायें लोगों को दुखी करती हैं। सड़कों और गलियों की बदतर हालत के साथ ही बेरोजगारी भी यहां के लोगों की समस्या है। लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र जो हिंदुत्व का सिरमौर है फिर भी हालत खराब है।
बदलाव की सियासत का हिस्सा रही है यह सीट
काशी का इतिहास बदलाव के करीब रहा है। ब्राह्मणों, यादवों, भूमिहारों, वैश्य, दलित, पिछड़ों और मुस्लिम वोटरों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संसदीय क्षेत्र में देश के विभिन्न राज्यों की आबादी भी है। बंगाली और गुजराती भी यहां दम दिखाते हैं। बम बम भोले के नाम से शुरू और उसी पर खत्म जैसी बातें आम हैं। आजाद भारत के इतिहास में 1952 से पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु तक हुए सभी तीनों चुनावों में कांग्रेस के रघुनाथ सिंह जीते। 1967 में इंदिरा विरोधी लहर और वामपंथी विचारधारा जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय से निकली तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रघुनाथ सिंह ने 1967 में जीत दर्ज कराई। 1971 में इंदिरा गांधी के आने मात्र से कांग्रेस के राजाराम शास्त्री की नैय्या पार लग गई मगर 1977 में जनता पार्टी के युवा तुर्क नेता चंद्रशेखर ने परचम लहराया। 1980 में इंदिरा गांधी के सिपहसालार पंडित कमलापति त्रिपाठी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली में हराने वाले राजनारायण को चित कर दिया। 1984 में राजीव गांधी का आशीर्वाद लेकर कांग्रेस के सिपाही श्यामलाल यादव ने जीत दर्ज कराई। 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर में कांग्रेस छोड़ जनतादल पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री ने सीट कब्जा ली। 1991 में भाजपा की टिकट पर पूर्व डीजीपी श्रीषचंद्र दीक्षित ने इस सीट पर जीत दर्ज कराई। इसके बाद यह सीट भाजपाई हो गई और 1996, 1998 और 1999 में शराब माफिया शंकर प्रसाद जायसवाल जीतते रहे। 2004 में काशी विश्वविद्यालय के छात्रनेता डा. राजेश कुमार मिश्र ने एक बार फिर से यहां कांग्रेस को जीत दिलाई। 2009 में डा. मुरली मनोहर जोशी ने फिर से यह सीट भाजपा को दिला दी और 2014 में वह नरेंद्र मोदी के लिए यह सीट छोड़कर कानपुर चले
अनेकता में एकता का प्रतीक है वाराणसी
वाराणसी विश्व शहर माना जाता है। बनारस और काशी के नाम से पुकारे जाने वाले वाराणसी में विश्व बसता है। सनातनधर्मियों के प्रमुख भगवान शिव की नगरी के तौर पर इसे पहचान मिलती है। यहां सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के भी पवित्र स्थान हैं। गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के सारनाथ में ही दिया था। हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र मानी जाने वाली काशी को अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है। यहां की संस्कृति में गंगा माई और श्रीकाशी विश्वनाथ का अटूट रिश्ता है। बनारस को मंदिरों का शहर, भारत की सांस्कृतिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी जैसे विशेषणों से भी नवाजा जाता है। यहां औघड़ संतों, कबीरपंथियों और रैदास मतावलंबियों के तीर्थ भी हैं। यहां बंग्ला भाषियों से लेकर गुजरातियों और पंजाबियों से लेकर दक्षिण भारतियों के मोहल्ले मौजूद हैं। हर धर्म और संप्रदाय को यहां पूरा सम्मान मिलता है। काशीवासी मुंह में पान और ठंडाई के साथ मस्त मिलते हैं। यहां की संस्कृति में प्रेम और मित्रता आम है। भारतीय शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना विश्वविख्यात है। यहां से कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ निकले हैं। कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि ऐसे ही कुछ नाम हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण की हिंदी रचना रामचरितमानस यहीं लिखी थी।

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