Home संपादकीय पल्स He asked for a bias, you started licking the soles! उन्होंने झुकाव मांगा, आप तलवे चाटने लगे!

He asked for a bias, you started licking the soles! उन्होंने झुकाव मांगा, आप तलवे चाटने लगे!

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हमें तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की वह बात याद आती है, जब उन्होंने पत्रकारों से कहा था आपको (मीडिया) को झुकने के लिए कहा गया था, आप तो रेंगने लग गए। आज आडवाणी इतिहास हो गए हैं, जो कि मीडिया को आजादी के साथ जनता की आवाज बनने की प्रेरणा देते थे। इस वक्त हालात यह हैं कि सत्ता झुकाव का इशारा करे, उसके पहले ही मीडिया उनके आगे दुम हिलाने लगता है। वो जनता की आवाज बनने के बजाय सत्ता और उसके दल का भोंपू बन जाता है। लोकतंत्र का स्तंभ बनने के बजाय वो सरकारी डंडा भांजने को तैयार है। सत्ता और सत्तारूढ़ दल निश्चित रूप से मीडिया से उनकी तरफ झुकाव की उम्मीद करते हैं, उन्हें करनी भी चाहिए मगर मीडिया को तो लोकतंत्र के प्रहरी की तरह अड़ना चाहिए। सियासी दल मीडिया को जिस तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं, वह निश्चित रूप से लोकतंत्र को तोड़ने वाला है। रीढ़विहीन मीडिया सत्ता का भोंपू बन उसके तलवे चाटकर लोकतंत्र के मूल को तोड़ रहा है। इससे लोकतंत्र की दूसरी अहम संस्थाएं भी डिग रही हैं, उनकी आवाज बनने वाला भी कोई नहीं रहा।
भारतीय संविधान में मीडिया की आजादी का कोई अलग प्रावधान नहीं है। अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति और भारत में निर्बाध भ्रमण सहित तमाम तरह की स्वतंत्रता की व्यवस्था की गई है। इस मौलिक अधिकार के जरिए ही मीडिया वह सच कहने, लिखने और व्यक्त करने का अधिकार पाती है। अमेरिका सहित तमाम विकसित देशों में मीडिया को सरकार पर सवाल उठाने से लेकर उसकी नीतियों पर कटाक्ष करने का चलन है। लोकतंत्र में मीडिया सत्ता प्रतिष्ठानों से सवाल करता है, न कि विपक्ष से। वह उनकी जिम्मेदारियों, नीतियों और कार्यकलापों की समीक्षा करता है। सरकार के बेहतर कार्यों से आमजन को कितना फायदा हो रहा है, इस आधार पर अगर वह उसकी पीठ थपथपाता है तो जहां कमियां रह गई हैं, उन पर खिंचाई भी करता है। दुख तब होता है, जब मीडिया अपनी भूमिका बदल लेता है। वह सवाल सरकार के बजाय विपक्ष से पूछने लगता है। सत्ता और सत्तारूढ़ दल की प्रशंसा में कसीदे पढ़ने लगता है। नतीजा, जब भी कोई पत्रकार किसी दल या नेता की आलोचना अथवा व्यंग करता है, तो सरकारी तंत्र उसको सूली पर चढ़ाने की तैयारी कर लेता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मीडिया सिर्फ मीडिया नहीं रह गया है, वह खांचों में बंट गया है। कोई वामपंथ समर्थक है, तो कोई दक्षिणपंथी, कोई फांसीवादी है, तो कोई किसी अन्य विचारधारा का। यहीं तक होता तो समस्या न होती। अब तो मीडियाकर्मी पार्टियों, धर्मवाद के समर्थक-कार्यकर्ता नजर आते हैं।
मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ता की गुलामी करके गर्व महसूस करता है। वो लोकतंत्र का स्तंभ बनकर सम्मानित होने के बजाय चाटुकारिता के जरिए अधिक लाभ पाने के फेर में दिखता है। वो कभी जाति के आधार पर तो कभी धर्म के आधार पर खुद को किसी सियासी दल से जोड़ लेता है। मीडिया हाउस चलाने वाले कारपोरेट घराने तो पहले से ही धंधेबाज हैं। उनको अपने धंधे से अधिक कुछ नहीं दिखता मगर जिन पत्रकारों से उम्मीद की जाती है कि वो अलख जगाएंगे, वे न सिर्फ चुप्पी साध लेते हैं बल्कि घुटनों के बल परिक्रमा करने लगते हैं। हालांकि सभी पत्रकार और मीडिया हाउस ऐसे नहीं हैं। कुछ निष्पक्ष लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुकूल प्रहरी का काम करने की कोशिश कर रहे हैं मगर बहुतायत के दबाव में वे थोड़ी दिक्कत में हैं। रीढ़विहीन मीडिया के सहारे सत्ता का दुरुपयोग होता है। सत्ता के मुताबिक न चलने वाले पत्रकारों पर कानूनी दांव पेंच गिरफ्तारी-मुकदमों का खेल शुरू हो जाता है। यह डराने-धमकाने का एक बेहतरीन जरिया है। सत्ता सेवक मीडिया और मीडियाकर्मी सत्तारूढ़ दल के आगे घिघियाते नजर आते हैं, जो लोकतंत्र की हत्या के समान है। इसके चलते मीडिया 24 घंटे उनको कटघरे में खड़ा करने लगता है, जो सत्ता की निरंकुशता और साजिश का विरोध करते हैं। यह मीडिया सत्ता के इर्दगिर्द रहकर उन्हें अपराधी बनाता है, जो सत्ता को आइना दिखाते हैं।
इन दिनों मीडिया पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को टारगेट किए है। लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में जंगलराज है। वहां एक तानाशाह और भ्रष्ट शासन है। अचानक ऐसा क्या हो गया पश्चिम बंगाल में? चर्चा डाक्टरों की हड़ताल से शुरू करते हैं। पिछले सोमवार को कोलकाता के एसएसकेएमईआर अस्पताल में इलाज को आए एक मरीज की मृत्यु होने पर उसके तीमारदारों ने लापरवाही का आरोप लगाते हुए दो जूनियर डॉक्टरों से मारपीट की। घटना के विरोध में जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। सरकारी अस्पतालों में इसके चलते कई जगह तीमारदारों और डॉक्टरों में झड़पें हुर्इं। पूरे प्रदेश में सरकारी डॉक्टर हड़ताल पर आ गए। गुरुवार को ममता बनर्जी ने अस्पताल का दौरा किया। हालात का जायजा लेने के बाद उन्होंने डॉक्टरों से वापस लौटने को कहा। उन्होंने चेताया भी कि हर एक जूनियर डॉॅक्टर पर सरकार 25 लाख रुपए खर्च करती है, जिससे उन्हें सेवा करनी चाहिए न कि मरीजों को मर जाने के लिए छोड़ देना चाहिए। उन्होंने डॉक्टरों की मांग पर कार्यवाही के लिए विभागीय मंत्री एवं अधिकारियों को आदेश दिया। बावजूद इसके डॉक्टर काम पर नहीं लौटे। एक पार्टी के सोशल मीडिया सेल की मदद से डॉक्टरों में जहर बोया गया। राज्य और देश भर में डॉक्टरों को हड़ताल के लिए उकसाया गया। हड़ताल के चलते दो दर्जन मरीज अस्पतालों में दम तोड़ चुके हैं। कोलकाता के इस अस्पताल में जो हुआ, वह देश के किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अक्सर होता रहता है। आश्वासन और दोषियों पर कार्यवाही के बाद मामला शांत भी हो जाता है।
बंगाल में दोषियों की गिरफ्तारी के बाद भी हड़ताल और देशभर में नफरत क्यों पनप रही है? मीडिया घटना का सच बताने के बजाय सिर्फ टीएमसी सरकार और ममता बनर्जी को घेरने में लगी है। डॉक्टर इस घटना को नजीर बनाकर केंद्र सरकार से डॉक्टरों के लिए सुरक्षित चिकित्सा माहौल के लिए व्यवस्थाएं करने की मांग करने के बजाय हड़ताल को देश स्तर पर क्यों फैला रहे हैं? कौन लोग हैं, जो इस हड़ताल की साजिश को रचकर बंगाल में नफरत-डर का माहौल बना रहे हैं? इसे सियासी रूप देकर दुगार्पूजा वाले बंगाल में जय श्रीराम के नारे लगा माहौल बिगाड़ रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम और सियासी हमलों का नाम देकर बंगाल में जंगलराज बनाने की कोशिश करने वालों पर मीडिया मौन क्यों है? स्टिंग आॅपरेशनों के जरिए तमाम सच सामने लाने वाला मीडिया खत्म हो गया है क्या? वजह साफ है कि 2021 में बंगाल में भगवा झंडा फहराने के लिए यह सब सियासी साजिशें रची जा रही हैं, जिनके चलते यह सब घट रहा है? ममता बनर्जी, नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा के कार्यकर्ता तक के निशाने पर हैं। बंगाल के भ्रष्ट नेता और काडर उनको बर्दास्त नहीं कर रहा। मीडिया एक पार्टी के कार्यकर्ता की तरह एक ईमानदार सीएम ममता के खिलाफ माहौल बनाने में लगा है। जो अपने ऊपर एक रुपए भी सरकारी खर्च नहीं करती।
अमेरिकी मीडिया जहां विश्व के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति को तीखे सवालों से घेरता है, वहीं भारतीय मीडिया नेताओं के साथ सेल्फी के लिए मारामारी करता है। मीडिया की सत्ता चरणचुंबन वाली भूमिका बीते कुछ सालों में बढ़ी है। इससे एक खास सियासी दल को फायदा भी हुआ है। मीडिया के बनाए नेरेटिव के कारण सत्ता बदली। अब वही सत्तानशीन लोग मीडिया को गुलाम बनाना चाहते हैं। रीढ़विहीन मीडिया, उनके तलवे चाटकर गर्व महसूस कर रहा है। यही कारण है कि अगर कोई उनकी नापसंदगी की बात करता है, तो उसे पुलिस उठा ले जाती है। मुकदमें दर्ज कर दिए जाते हैं। अभी भी वक्त है, अगर मीडिया तुक्ष्य लाभ को त्यागकर अपने चरित्र का निर्माण लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल करे तो उसका सम्मान और लाभ दोनों मिलेंगे।
जय हिंद!

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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