Home संपादकीय Have Kejriwal become synonymous of dirty politics?क्या ओछी राजनीति के पर्याय बन गए हैं केजरीवाल?

Have Kejriwal become synonymous of dirty politics?क्या ओछी राजनीति के पर्याय बन गए हैं केजरीवाल?

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अन्ना आंदोलन के बाद भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक शुन्यता नजर आ रही थी। इसी राजनीतिक शुन्यता को भरने के लिए आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई। लोगों ने भी इस पार्टी को भरपूर समर्थन दिया। दिल्ली में पार्टी ने गठन के बाद हुए पहले चुनाव में ही जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई। पर जिस तरह से इस पार्टी और सबसे अधिक पार्टी प्रमुख की राजनीतिक महत्वाकांक्षों के पर लगे उसने पार्टी का तो बेड़ा गर्ग किया ही। साथ ही उन करोड़ों लोगों के दिल पर ठेस पहुंचाई जिन्होंने इस पार्टी के जरिए लोकतंत्र को बचाने के बड़े-बड़े सपने देखे थे। आए दिन अपनी अनोखी हरकतों से चर्चा बटोरने वाली इस पार्टी ने अब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ अपना विवाद जोड़ लिया है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दिया गया भारत रत्न सम्मान वापस लेने के संकल्प को शुक्रवार दिन में दिल्ली विधानसभा में पारित किया गया। हालांकि रात होते-होते तक केजरीवाल सरकार पूरी तरह पलट गई। पर इस घटना ने मंथन करने पर विवश कर दिया है कि क्या आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल ओछी राजनीति के पर्याय बन गए हैं?
1984 में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो हिंसा हुई उसका दर्द आज तक सालता रहता है। इन सिख दंगों ने इस कौम को एक ऐसा दर्द दिया जिसे वक्त के साथ भरने के लिए छोड़ देना चाहिए। दोषियों को सजा मिल रही है। भले ही उसमें लंबा वक्त क्यूं न लग गया। पर क्या यह जरूरी है कि इन सिख दंगों पर ओछी राजनीति कर हम दंगों की टीस को और अधिक बढ़ाएं। जो घटित हुआ, जिनके अपने बिछड़ गए, जिन्हें दर्द मिला उसे वो ही समझ सकते हैं जिनके साथ यह हुआ। पर अफसोस उस भारतीय राजनीति पर है, जिसे दर्द कम करने की बजाय इसे सुलगाने में अधिक फायदा नजर आता है। 34 साल बाद कांग्रेस के कद्दावर नेता सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा हुई है। इस सजा ने दंगा पीड़ितों को सुकून दिया है। सुकून इस बात का कि न्याय जरूर मिला, भले इसमें थोड़ी देर हुई। पर सज्जन कुमार की सजा के बाद जिस तरह की ओछी राजनीति शुरू हुई है वह कहीं से भी भारतीय लोकतंत्र के लिए न्यायोचित नहीं है।
अरविंद केजरीवाल सरकार को इस मुद्दे में भविष्य का वोट नजर आता है। क्योंकि उनकी ही पार्टी के नेता जरनैल सिंह ने सिख दंगों में न्याय न मिलने पर पूर्व गृहमंत्री पर जूता फेंक कर अपना विरोध जताया था। जरनैल सिंह उस वक्त मीडिया इंडस्ट्री में थे। इस घटना के बाद उन्हें दिल्ली में सिखों का जबर्दस्त समर्थन मिला। समर्थन इतना प्रचंड था कि जब आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की राजनीति में कदम रखा तो जरनैल सिंह एक झटके में एक आदमी और एक आम पत्रकार से आगे बढ़ते हुए विधायक बन गए। इसमें दो राय नहीं कि जरनैल सिंह द्वारा गृहमंत्री पर फेंका गया जूता विरोध का एक ऐसा प्रतीक बना कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार को बैकफुट पर आना पड़ गया। सिखों के विरोध का प्रतीक बने उस जूता प्रकरण ने सज्जन कुमार सहित तमाम दोषियों की मुश्किलें बढ़ा दी। इसी का परिणाम है कि आज सज्जन कुमार भागता फिर रहा है। उसे 31 दिसंबर तक हर हाल में सरेंडर करना है। सरेंडर करते हुए उसे जेल भेज दिया जाएगा।
जरनैल सिंह द्वारा उठाई गई आवाज ने जिस तरह आम आदमी पार्टी को फायदा पहुंचाया। शायद उसी से प्रेरणा लेकर एक बार फिर पार्टी ने अब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ विवाद में खुद को जोड़ लिया है। यह एक सोची समझी राणनीति के तहत किया गया कि शुक्रवार को दिल्ली विधानसभा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दिया गया भारत रत्न सम्मान वापस लेने के संकल्प पारित किया गया। इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी के अलावा कांग्रेस में भी बवाल मच गया। भारतीय जनता पार्टी ने भी इसकी कड़ी निंदा की है। आम आदमी पार्टी भले ही रातों रात बैकफुट पर आ गई। इनके बड़े नेता प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी सफाई पेश कर रहे हैं। पर पार्टी का संकल्प पत्र सोशल मीडिया में मौजूद है जो बहुत कुछ बयां कर रहा है। हैरानी इस बात पर भी है कि पार्टी की ही फायर ब्रांड नेता अलका लांबा ने अपने ट्विटर हैंडल पर इसे डाला है।
राजीव गांधी ने भारत को आधुनिक भारत बनाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। अपने संकल्पों के जरिए उन्होंने भारत को एक मुकाम तक पहुंचाने की हर संभव कोशिश की। यह उनकी ही देन है कि आज हम कई मामलों में हम आत्मनिर्भर हैं। उन्होंने भारत और भारतीयों को सुरक्षित करने के लिए ही लिट्टे से अदावत मोल ली। अपने संकल्पों के जरिए राजीव गांधी ने एक प्रधानमंत्री के तौर अपनी अमिट छाप छोड़ी। पर यह बेहद अफसोसजनक है कि उसी प्रधानमंत्री से भारत रत्न वापस लेने के लिए अरविंद केजरीवाल की पार्टी विधानसभा के अंदर संकल्प पत्र पारित करवाती है। राजीव गांधी की हत्या ने पूरे विश्व को स्तब्ध कर दिया था, क्योंकि यह पहली बार था कि किसी प्रधानमंत्री की हत्या दूसरे देश के आतंकी संगठन ने की थी। उनकी शहादत को अरविंद केजरीवाल कैसे तिलांजली दे सकते हैं, यह समझ से परे है।
मंथन करने की जरूरत है कि क्या राजनीति इतनी ओछी भी हो सकती है कि जिस प्रधानमंत्री ने अपने देश के लिए शहादत दे दी उसी का भारत रत्न वापस लेने की बात सोची जा सकती है। अरविंद केजरीवाल का जो राजनीतिक कद था वह तो धीरे-धीरे कम होता ही गया है, पर अब ऐसा लगने लगा है कि वह राजनीति के इतने नीचले पायदान पर आ गए हैं जहां से हर कोई उन्हें जूतों के नीचे ही देखना चाहता है। दंगों पर राजनीति करके वे एक बार फिर दिल्ली में अपनी सत्ता को मजबूत करना चाहते हैं। इसकी झलक तो उसी वक्त मिल गई थी जब पंजाब में पार्टी विधानसभा चुनाव लड़ रही थी। पर अब दिल्ली विधानसभा में ऐसी हरकत करवाकर उन्होंने अपनी रही सही इज्जत भी खो दी है।
राजीव गांधी के भारत रत्न वापसी वाले प्रस्ताव पर हुए विवाद के बाद शनिवार को डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज ने मीडिया के सामने आए और सफाई दी। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर यह साफ किया कि जो प्रस्ताव सदन में पेश किया गया था उसमें राजीव गांधी वाली बात नहीं थी। यह प्रस्ताव जरनैल सिंह ने अपनी तरफ से रखा था। आम आदमी पार्टी का ऐसा कोई विचार नहीं है कि उनसे भारत रत्न वापस लिया जाए। तकनीकि रूप से यह मान भी लिया जाए कि सदन में जो मूल प्रस्ताव पेश किया गया उसमें राजीव गांधी का नाम नहीं था। लेकिन क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि जब राजीव गांधी का नाम पढ़ दिया गया तो उसे संशोधित करवाने के लिए या फिर तुरंत उस पर टोकने के लिए क्या आम आदमी पार्टी का कोई नेता सदन में खड़ा हुआ? आम आदमी पार्टी और खासकर पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल को गहन मंथन की जरूरत है कि वो लोगों के बीच एकता का सिर्फ गाना ही गाते रहेंगे या फिर अपने कर्मों के जरिए वैमनस्य फैलाने पर ही जोर देंगे।

कुणाल वर्मा

Kunal@aajsamaaj.com

(लेखक आज समाज के संपादक हैं )

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