Harassment of Kashmiri citizens is not right: कश्मीरी नागरिकों का उत्पीड़न ठीक नहीं

पुलवामा में 14 फरवरी को हुई आतंकवादी घटना के बाद देश बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। देश के अधिकांश प्रदेशों में कश्मीर विरोधी माहौल बना हुआ है। कश्मीरी छात्रों और नौकरशुदा लोगों पर हमले हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डाली गंज पर सूखा मेवा बेच रहे एक कश्मीरी युवक को कुछ लोगों ने मारपीट कर घायल कर दिया। हालांकि पुलिस ने बेहद तत्परता के साथ चार लोगों को धर दबोचा। कश्मीरी युवकों के साथ उत्पीड़न तो पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के थोड़े समय बाद ही आरंभ हो गए थे।
देहरादून के बाबा फरीद इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी के प्रिसिंपल ने भी यहां तक कह दिया कि अगले सत्र से उनके संस्थान में किसी भी छात्र को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। कुछ इसी तरह की राय देहरादून के अप्लाइन कॉलेज आॅफ मैनेजमेंट के स्तर पर भी जाहिर की गई है। वैसे भी देहरादून में इन दोनों इंस्टीट्यूट के छात्रों के कमरे पर उत्तेजित लोगों ने प्रदर्शन किया। उन्हें देश का दुश्मन और गद्दार कहा। यह सब इसलिए हो रहा है कि आदिल अहमद डार कश्मीरी था। जैश ए मोहम्मद से जुड़ा था और उसने कार में आत्मघाती विस्फोट कर आरपीएफ के काफिले पर हमला किया था जिसमें आरपीएफ के 40 जवानों की मौत हो गई थी। इसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब समेत कई राज्यों के जवान शामिल थे। इसके बाद देवबंद से जैश ए मोहम्मद से जुड़े कुछ कश्मीरी युवकों को एटीएस ने उठाया था। इसमें संदेह नहीं कि कश्मीर घाटी के कुछ गुमराह युवक सेना और आरपीएफ जवानों पर आतंकियों के बचाव में पत्थरबाजी भी कर रहे हैं लेकिन इस आधार पर सभी कश्मीरियों को संदिग्ध मान लेना तो उचित नहीं है। तालाब में जब सिधरी चाल करती है तो उस तालाब का निर्जलीकरण हो जाता है। बड़ी मछलियों को अपनी रक्षा के लिए कीचड़ में धंसना पड़ता है लेकिन इसके बाद भी वे आखटकों के हाथ पड़ ही जाती हैं। दुष्ट पड़ोसी हो तो इसका खामियाजा सज्जनों को भी भुगतना पड़ता है। महिमा घटी समुद्र की रावन बस्यो परोस। आतंकवादियों को समर्थन देने की कीमत पाकिस्तान को भी कम नहीं चुकानी पड़ रही है। अमेरिका तो पाकिस्तानी नागरिकों के लिए अपनी वीजा पॉलिसी तक में बदलाव कर रहा है। डार ने बेहद अमानवीय काम किया था। इसके प्रतिरोध स्वरूप कश्मीरी नागरिकों पर केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में ही उत्पीड़नात्मक कार्रवाई हो रही है, ऐसा भी नहीं है। पटना में कश्मीरी दुकानदारों पर हमले किए गए। उनकी दुकानों पर तोड़-फोड़ की गई। पंजाब में तो एक ग्राम पंचायत ने तो वहां रह रहे कश्मीरी नागरिकों से खुलकर कह दिया कि वे अतिशीघ्र गांव छोड़ दें वर्ना उनके साथ अगर कोई उत्तेनात्मक अप्रिय वारदात होती है तो इसकी जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की नहीं होगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुलवामा हमले के बाद कश्मीरियों के उत्पीड़न की घटनाओं पर खूब शोर मचाया लेकिन उन्हीं के राज्य के नादिया जिले के तहरपुर में कश्मीरी युवक जावेद अहमद खान के साथ मारपीट की गई। हरियाणा और राजस्थान में भी कश्मीरी युवकों के साथ मारपीट की घटनाएं हुई है। कुछ मकान मालिकों ने तो कश्मीरी छात्रों और नौकरी करने वाले कश्मीरियों को मकान छोड़ने के लिए कह दिया है। सवाल यह उठता है कि भारत इतना सहिष्णु तो कभी नहीं था। कश्मीरी नागरिकों के उत्पीड़न पर सर्वोच्च न्यायालय भी चिंता जाहिर कर चुका है। वह तो केंद्र और राज्य सरकारों को इस बावत निर्देश भी दे चुका है। खुद प्रधानमंत्री भी कई राज्यों में कश्मीरी छात्रों, व्यवसाइयों के खिलाफ हुई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई पर चिंता जता चुके हैं। उन्होंने तो कश्मीरियों से कहा है कि उनका विरोध आतंकवादियों से है, न कि कश्मीरियों से। उनके इस अभिकथन की एक वजह यह भी रही कि कुछ लोग कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ हो रही सुरक्षा बलों की कार्रवाई को कश्मीरियों के खिलाफ बताकर अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मोदी ने अपने अभियान को आतंकियों के खिलाफ बताकर उनका खेल बिगाड़ दिया है। पंजाब में सिख समाज भी कश्मीरियों से ज्यादा नाराज है। जब कभी भी किसी सिख जवान का पार्थिव शरीर उसके गांव पहुंचता है, गांव में एक उबाल सा आ जाता है। हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। कश्मीरी इसके अपवाद नहीं हो सकते। कश्मीरी युवकों को विकास की मुख्य धारा से जुड़ने की बजाय आतंकियों से जुड़ना आसान लग रहा है लेकिन जिस तरह से भारत सरकार ने अलगाववादी कश्मीरी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था हटाई है। उन पर अंकुश लगाना शुरू किया है तो इसकी अकुलाहट, खिसियाहट कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती में सहज ही देखा जा सकता है। जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब सिखों के खिलाफ देश भर में माहौल बना था। किसी के किए की सजा किसी को देना वैसे भी उचित नहीं है। भारत कभी अहिष्णु देश नहीं रहा लेकिन उसकी सहिष्णुता का अर्थ उसकी कमजोरी से लिया गया। तर्क यह दिया जा रहा है कि एक ओर तो हम कश्मीर को भारत का अंग मानते हैं जबकि वहां रहने वालों के प्रति मनोमालिन्य रखते हैं, यह तो उचित नहीं है लेकिन हमें सोचना होगा कि भारत में अनेक मजहबों, अनेक जातियों और अनेक संस्कृतियों के लोग रहते हैं। वाराणसी में तो हर प्रदेश के लोगों के अलग-अलग मोहल्ले ही बसे हैं। भारत सबको सहेजकर चलने वाला देश है। कुछ अपवाद भी है। कुछ अतिवादी लोग भी हैं , लेकिन बहुतायत में लोग एकोहम बहुस्याम: की संस्कृति में यकीन रखते हैं। वैसे भी आज की देश में प्रांतवाद और भाषावाद की जड़ें जिस तरह मजबूत हो रही हैं, उसे बहुत उचित नहीं ठहराया जा सकता। देश की एकता, अखंडता और अक्षुण्णता को बनाए रखना है तो क्षेत्रीयता की दीवारें ढहानी ही पड़ेगी। जम्मू-कश्मीर में जब तक सभी प्रांत के लोगों की बसाहट नहीं होगी, सभी जाति धर्म के लोग वहां बसेंगे नहीं तब तक अलगाववादी ताकतों की राजनीतिक किमियागिरी चलती रहेगी। देश के हितों के साथ खेलने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। आरपीएफ और सेना के जवान इस देश के ही हैं। उनमें कुछ कश्मीरी भी हैं । वे कश्मीर के दुख-दर्द में कश्मीरियों का साथ भी देते हैं। बाढ़ और आपदा के दौर में सेना ने कश्मीरी नागरिकों का दिल जीता भी है लेकिन उन पर जिस तरह पत्थरबाजियां हो रही हैं, उसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। वैसे भी पुलवामा हमले के बाद जनता के आक्रोश से कश्मीरी नागरिकों को बचाने के लिए सीआरपीएऊ ने ऐप का निर्माण किया और 250 छात्रों को सुरक्षित उनके घर तक पहुंचाने में मदद भी की है। यह तो वही बात हुई कि जा तोको कांटा बये ताहि बओ तुम फूल। उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को इस बात पर तो विचार करना ही होगा कि कश्मीर के अलगाववादियों और पत्थरबाजों का समर्थन कर वे अंतत: किसका भला कर रहे हैं? उनका प्रयास तो कश्मीरी पंडितों की घाटी में पुनर्वापसी कराने की होनी चाहिए थी लेकिन उनकी भाषा तो भारत को ही अंगुली दिखाने वाली होती है। आंखों पर क्षेत्रीयता की गांधारी पट्टी बांधने से बात नहीं बनने वाली। इस प्रवृत्ति पर भी रोक लगनी चाहिए। कश्मीरी लोगों का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए लेकिन दोनों हाथ से ताली बजने वाले सिद्धांत को भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कश्मीर हमारा था, हमारा है, हमारा ही रहेगा। कश्मीर हमारा है तो कश्मीरी भी हमारे हैं, वे पराये नहीं हो सकते लेकिन जिस शिद्दत के साथ भारत के अन्य प्रातों में ऐसा सोचा जाता है, कुछ वैसा ही भाव कश्मीरियों में भी आए कि भारत हमारा है तभी बात बनेगी।

शिव कुमार शर्मा

(लेखक इंडिया न्यूज के डिप्टी एडिटर हैं)

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