Home संपादकीय पल्स Factual logical knowledge is required for general public benefit: सर्वजनहिताय के लिए तथ्यपूर्ण तार्किक ज्ञान आवश्यक

Factual logical knowledge is required for general public benefit: सर्वजनहिताय के लिए तथ्यपूर्ण तार्किक ज्ञान आवश्यक

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रात हमारे एक व्यवसायी मित्र का घर आना हुआ। हम कुछ लिख रहे थे, सामने न्यूज चैनल चल रहा था। शिष्टाचारवश हमने चाय-पानी प्रस्तुत किया। हमारे एक अन्य मित्र इलाहाबाद से आए हुए थे। न्यूज चैनल्स देखकर अनायास सियासी चर्चाएं होने लगीं। हमारे व्यवसायी मित्र ने भी दूसरे अन्य मूर्खों की तरह कहना शुरू किया कि आखिर पिछले 70 सालों में देश में क्या हुआ है? नेहरू ने देश के लिए क्या किया, देश का बंटवारा करा दिया? चरित्र से लेकर न जाने कौन-कौन सी कहानियां सुना दीं। हम अचंभित थे, कि क्या भारत की युवा पीढ़ी इतनी ज्ञानहीन है, कि बगैर इतिहास-भूगोल, अर्थशास्त्र जाने-समझे चर्चा करती है। यही नहीं वे अपनी सोच दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। तकलीफ हुई कि किस तरह का ज्ञान बांटा जा रहा है। हमने आग्रह किया कि रट लगाने के बजाय तथ्यों पर गौर करें। कुछ पढ़ लिया करें, तो शायद इस तरह के सवाल न उपजेंगे। कोई भी मूर्ख नहीं बना पाएगा। बहराल, यह उन व्यवसायी मित्र की ही नहीं बल्कि देश के बड़े युवा वर्ग की समस्या है। यह वर्ग सोशल मीडिया और गूगल से मिले ज्ञान पर चर्चा करता है तो उससे उम्मीद भी और क्या की जा सकती है।
हमने मित्र से आग्रह किया कि देश के बंटवारे को लेकर चर्चा से पहले 22-23 मार्च 1940 को लाहौर में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन के अलग मुस्लिम रियासत के प्रस्ताव को पढ़ लेते। प्रस्ताव में भारत के मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान की नींव रखी गई। तभी हर साल पाकिस्तान में 23 मार्च को ‘यौमे पाकिस्तान’ के रूप में मनाया जाता है। प्रतिक्रिया स्वरूप विनायक दामोदर सावरकर की अध्यक्षता में पाकिस्तान का विरोध करते हुए हिंदुस्तान बनाने का प्रस्ताव पढ़ा गया। 15 अगस्त, 1943 को नागपुर में सावरकर ने कहा था, ‘मिस्टर जिन्ना की टू नेशन थ्योरी से मेरा कोई विवाद नहीं है। हम, हिंदू, स्वयं में एक राष्ट्र हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं।’ जब महत्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो पूरे देश में उसे समर्थन मिला मगर सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा ने अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया था। अगर आपने यह सब पढ़ लिया होता तो शायद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपिता के रूप में विभूषित महात्मा गांधी को दोषी न ठहराते। ब्रिटिश संसद में पास हुए इंडियन इंडिपेंडेंट एक्ट 1947 को पढ़ लेते तो शायद कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को न कोसते। ब्रिटेन के विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ ने माना था कि कश्मीर विवाद ब्रिटेन के औपनिवेशिक अतीत के कारण पैदा हुआ था। भारत की स्वतंत्रता के समय ब्रिटेन सरकार ने ढुलमुल रवैया अपनाया था। राजा हरि सिंह ने तब भारत में विलय के प्रस्ताव ‘इंस्ट्रूमेंट आॅफ एक्सेशन’ पर 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर किए जब पाकिस्तान पोषित कबीलाई हमला हुआ। जिसे तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटेन ने देर रात मंजूरी भी दे दी थी। भारतीय सेनाओं ने कश्मीर पर कब्जा ले लिया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इस पर विस्तृत साक्ष्यों के साथ तमाम सवालों के जवाब दिए हैं। हमने अपने मित्र से उन फोटो पर भी चर्चा की जिन्हें दिखाकर पंडित नेहरू का चरित्रहनन किया जाता है। उनमें एक फोटो उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित और दूसरी उनकी भांजी नयनतारा सहगल के साथ की है।
हमें इस बात से कोई आपत्ति नहीं कि कोई किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से संबंधित रहे। यह चयन हर व्यक्ति का अधिकार है। हमारे परिवार में मां-पिता एक विचारधारा से संबंधित हैं, और भाई दूसरी से। यहां तक कि कई बार हमारे विचार से पत्नी भी असहमत होती है। हमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि यही लोकतंत्र के गुलदस्ते की खूबी है। हर किसी को अपने विचार स्वतंत्रता से रखने चाहिए। किसी को भी किसी दूसरे के ऊपर अपने विचार नहीं थोपने चाहिए। दुख तब होता है, जब खुद को पढ़ा लिखा और योग्य बताने वाले अपनी विचारधारा को सही सिद्ध करने के लिए मनगढ़ंत कहानियां सुनाते हैं। किसी का भी चरित्रहनन करते हैं। महान चरित्र या नेता को अयोग्य और समस्याओं का कारक मानते हैं। यदि हम किसी की समीक्षा करें तो हर पहलू, तथ्य, इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र का तर्कपूर्ण विवरण होना चाहिए। इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञान के लिए पढ़ना पड़ेगा, जो हमारी युवा पीढ़ी नहीं कर रही है। यह पीढ़ी अपने उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है मगर उसके लिए उतने यत्न नहीं करना चाहती है। हर कोई तुरंत सबकुछ पा लेना चाहता है। यही समस्या है। इसी क्रम में युवाओं ने ज्ञान के लिए पढ़ने के बजाय सिर्फ अच्छे नतीजे के लिए स्ट्रेटिजिकल पढ़ाई पर जोर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि उनके पास डिग्री हो सकती है मगर ज्ञान का अभाव है।
इस वक्त देश का सबसे बड़ा मतदाता युवा वर्ग का है। करीब 84 करोड़ मतदाताओं में 53 फीसदी 40 वर्ष से कम उम्र के हैं। इससे तय है कि देश के भविष्य का फैसला उनके हाथ है। सवाल यह उठता है कि अगर यही वर्ग अज्ञानता का शिकार होकर भ्रमित रहेगा तो सही फैसले कैसे कर सकेगा। ऐसी स्थिति में वो सोशल मीडिया और स्वार्थ ग्रसित सियासी दलों के भ्रमजाल में फंस जाएगा। यह पीढ़ी गलत प्रचार का हिस्सा बन जाएगी। हमें अपने इन युवाओं को पढ़ने और तथ्यों पर तर्कपूर्ण चर्चा के लिए तैयार करना होगा। हमारे धर्म में ज्ञान के महत्व को बताया गया है। वेदांग के ब्रह्मसूत्र में लिखा है ‘अथातो ब्रम्ह जिज्ञासा’ अर्थात ज्ञानार्जन की जिज्ञासा ही ब्रह्म है। हमें बगैर पूर्ण ज्ञान के किसी का चरित्र हनन करने या लांछन लगाने का हक नहीं है। अगर कोई किसी को लांछित करता है, तो उसे साबित करने का भार भी उसी पर होता है। हालांकि इन दिनों इन मर्यादाओं पर अधिकतर लोग गौर नहीं करना चाहते हैं। उनके लिए सिर्फ अपना सियासी या वैचारिक मत ही महत्व रखता है। यह सोच भविष्य के लिए घातक है।
देश का युवा बेरोजगारी की भीड़ का हिस्सा है। बेरोजगारी कम होने के बजाय पिछले सालों में बहुत अधिक बढ़ी है। इसके लिए मौजूदा सरकार की अर्थनीति के साथ ही सरकार में रोजगार परक नीति न होना और नोटबंदी जैसी वजहें हैं। बेरोजगारों की यह बढ़ती फौज निश्चित रूप से देश को गर्त में ले जाने वाली है। ज्ञान का अभाव और काम न होने पर युवा गलत राह अख्तियार कर रहा है। जो देश, समाज और परिवार के साथ ही खुद उसके लिए भी घातक है। हमें निष्पक्ष और ज्ञान के आधार पर तर्कपूर्ण समाज का हिस्सा बनना होगा। समाज में फैल रही बुराइयों को खत्म करने के और सरकारों को अपने नागरिकों के हित में फैसले लेने के लिए हम तभी बाध्य कर सकेंगे जब हम जागरूक और ज्ञानवान होंगे।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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