Home संपादकीय पल्स Elections are not to make country and society poisonous: चुनाव देश और समाज को विषाक्त बनाने के लिए नहीं

Elections are not to make country and society poisonous: चुनाव देश और समाज को विषाक्त बनाने के लिए नहीं

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विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व ‘17वीं लोकसभा के लिए निर्वाचन’ हो रहा है। यह एक संवैधानिक सृजन और आमजन के हाथों को मजबूत करने का पर्व है। निश्चित रूप से इस पर्व में वह जनता ‘जो वास्तव में अधिकारविहीन है’, अपने एक मत के जरिए भाग्य विधाता बनती है। उसे तय करना है कि उसके हितों को साधने के लिए उस पर कौन शासन करेगा? सच तो यह है कि जनता भले ही किसी दल या व्यक्ति की भाग्य विधाता समझे मगर सच तो यह है कि वह अपना भाग्यविधाता चुनती है। जनता का एक गलत फैसला उसे और उसके आगे आने वाली पीढ़ी को गर्त में डाल देता है। जब हमें यह शक्ति मिलती है कि हम अपना शासक खुद चुनें तो हमें सावधानी के साथ उसको चुनना चाहिए, जो देश और समाज को जोड़ने का काम करे, न कि उसको तोड़ने का। सत्ता हासिल करने के लिए कुछ लोग और राजनीतिक दल समाज-देश को बांटने की सियासत करके माहौल विषक्त बना रहे हैं। रचनात्मकता और सृजन के अवसर पर यह करना देश के साथ गद्दारी है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 75(1) के तहत राष्टÑपति अपने कार्यपालिका के दायित्वों का निर्वाहन करने के लिए एक मंत्रीपरिषद का गठन करता है, जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री राष्टÑ के उन सभी दायित्वों के निभाने की शपथ लेता है जो संविधान में उसके लिए वर्णित हैं। वह बगैर किसी राग लेष के जिम्मेदारियों को निभाने के लिए बाध्य है। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन सभी संवैधानिक शपथों का उल्लंघन किया है, जो उन्होंने ईश्वर के नाम पर ली थीं। वह बात तो राष्टÑवाद की करते हैं मगर हर तरह के भेदभाव में यकीन रखते हैं। वह कभी धार्मिक आधार पर माहौल विषक्त बनाते हैं तो कभी जातिगत आधार पर। यही नहीं वह क्षेत्रवाद से लेकर तमाम तरह के वाद की बात करते हैं। देश में सबसे अधिक सुरक्षा में रहने के बावजूद वह यह तक कहने से गुरेज नहीं करते कि उनकी जान को खतरा है। यही नहीं, वह सियासी फायदे के लिए विपक्षी दलों को पाकिस्तान पोषित बता देते हैं। सत्ता हासिल करने के लिए वह सैन्य बलों के साहस और कर्तव्यों का श्रेय खुद लेते नजर आते हैं। भारत में ही नहीं विश्व में ऐसा पहली बार हो रहा है। पहली बार कोई शासनाध्यक्ष इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर रहा है जो उसके पद की गरिमा को धूल में मिलाने वाले हैं।
किसी भी सियासी दल या उसके नेता का ध्येय चुनाव जीतना होता है। इसमें कोई बुराई नहीं है मगर उच्च पदों पर बैठे लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे नैतिक और संवैधानिक रूप से ऐसा कोई काम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से नहीं करेंगे, जिससे उनके पद की गरिमा गिरती हो। वह जनहित को ध्यान में रखेंगे और देश के हर नागरिक के हित में काम करेंगे। पिछले पांच सालों में जो हुआ है, उससे तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री सिर्फ किसी एक समुदाय का ही है। वह सियासी फायदे से ऊपर कुछ सोच नहीं पाता। उसके शब्दों में मूल्यों का अभाव है। उसके मंत्रिमंडल के सदस्य और भी छोटेपन को दर्शाते हैं। इस तरह के आरोप लगना ही दुखद होता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो विश्व का भूगोल भारत के मुफीद बना दिया था मगर उन्होंने कभी सियासी फायदे के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया। अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता के बाद उन्होंने उसका श्रेय नहीं लिया था। उन्होंने देश की शांति के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया मगर कभी यह डर नहीं दिखाया कि कोई उन्हें मार देगा या मरवा देगा, जबकि इंदिरा गांधी की सुरक्षा नरेंद्र मोदी की सुरक्षा व्यवस्था का 10 फीसदी भी नहीं थी।
वंदे मातरम न बोलने पर भाजपा के जो नेता देशवासियों को पीटने और राष्टÑद्रोही साबित करने लगते हैं, वही बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार जब प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच शेयर करते हुए भी वंदे मातरम नहीं बोलते, तो कोई दिक्कत नहीं होती। राष्टÑवाद की बात करने वाले इस राष्टÑ शब्द की न उत्पत्ति के बारे में जानते हैं न विस्तार के बारे में। ऋग्वेद में राष्टÑ और राष्टÑवासियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसका पालन करने का सबसे बड़ा उदाहरण भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पांच ऐसे लोगों को मंत्री बनाकर प्रस्तुत किया था, जो चुनाव हारे थे और उनके विरोधी भी थे। इंदिरा गांधी ने अटल बिहारी वाजपेई को देश का प्रतिनिधित्व करने संयुक्त राष्टÑ भेजा था। यह राष्टÑवाद होता है। राष्टÑवाद यह नहीं होता कि सत्ता हासिल करने के लिए उनके साथ मिलकर सरकार बना ली जाये, जो राष्टÑविरोधी गतिविधियों के सूत्रधार हों। नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री वह सब किया जो अनुचित कहा जाता है। उन्होंने विदेश में भी पहुंचकर अपने देश के नेताओं के लिए वे शब्द इस्तेमाल किये जो दुखद थे।
प्रधानमंत्री का पद सहकार का होता है। वह देशवासियों के बीच के वैमनस्य को खत्म करके एक सुखद वातावरण के निर्माण के लिए काम करता है मगर हो उलट रहा है। मोदी ने जिस तरह से विषाक्त माहौल देश में बनाया है वह चिंताजनक है। हम डिजिटल एरा में जी रहे हैं। छोटी-छोटी बातें वैश्विक समाज में पहुंचती है, जो हमारे देश का सम्मान खत्म करने के लिए पर्याप्त होती हैं। विषाक्त माहौल बनाने वालों को दंडित करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जा रही है। प्रज्ञा सिंह जैसी औरतों   का महिमामंडन किया जा रहा है। देश के लिए अपना सबकुछ कुर्बान करने वालों को लांक्षित किया जाता है। यह सब प्रधानमंत्री के संरक्षण में होता है और उनके तमाम मंत्री समर्थन में उतर पड़ते हैं। प्रधानमंत्री चुनावी फायदे के लिए पश्चिम बंगाल में विधायकों की खरीद फरोख्त वाली बात डंके की चोट पर बोलते हैं, नैतिकता की दुहाई देने वाले तमाम नेता इस पर निंदा प्रस्ताव के बजाय समर्थन करते दिखते हैं। हालात तो यह हो गयें कि प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को कहा कि आतंकी अजहर मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित किये जाने से विरोधी दलों में मातम मन रहा है। प्रधानमंत्री यह भूल जाते हैं कि संयुक्त राष्टÑ संघ की कार्यवाही में जिक्र है कि अजहर मसूद को यूरोपीय क्षेत्रों में हमलों के कारण वैश्विक आतंकी घोषित किया गया है, न कि भारत में हुई घटनाओं के कारण।
किसी भी शासनाध्यक्ष का पद गरिमापूर्ण होता है। उसकी जिम्मेदारी समग्र राष्टÑ और राष्टÑवासियों के लिए होती है। शहीदों को उच्च सम्मान देने की होती है। राष्टÑवासियों के बीच वैमनस्य न पनपे इसके लिए अपनी पूरी क्षमताओं को लगा देने की होती है। चुनाव इसी प्रक्रिया में सबको जोड़कर शासन सत्ता स्थापित करने की होती है, जो सबके हित में काम करे। बीते कुछ सालों के दौरान प्रधानमंत्री से लेकर उनके मंत्रियों ने जो व्यवहार किया है, वह राष्टÑ को जोड़ने वाला नहीं  बल्कि तोड़ने वाला है। संस्थाओं को खत्म करने वाला है। अभी वक्त है, अपनी गलतियों को सुधारने के लिये। वह राष्टÑ से माफी मांगे। देश को एकसूत्र में जोड़ने और नागरिकों में सम सद्भाव उत्पन्न करने की दिशा में काम करें, तभी देश और देशवासियों का भला होगा। हम सर्वत्र आगे बढ़ेंगे।
जय हिंद।
अजय शुक्ल
ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
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