Home संपादकीय पल्स Election of politics of hatred, lies and split: नफरत, झूठ और बंटवारे की सियासत का चुनाव

Election of politics of hatred, lies and split: नफरत, झूठ और बंटवारे की सियासत का चुनाव

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पत्नी से किसी बात को लेकर हमारी बहस हो गई। हमने गुस्से में कुछ ऐसे शब्द बोले जो मर्यादा के विपरीत थे। हमारी बेटियां यह वाकया देख रही थीं। दोनों सहमी सी अपने मां-बाप के बीच होती नोक झोंक पर स्तब्ध थीं। बड़ी बेटी ने हमसे कहा कि पापा आप बड़े हो चुप हो जाओ। हमने गुस्से में उसको थप्पड़ जड़ दिया। छोटी बेटी की ओर देखा तो वह सहमी सी खड़ी थी, उसके मुंह से बोल नहीं निकले मगर चेहरा उसकी मनोदशा बयां कर रहा था। बड़ी बेटी बेचारी सी बनकर दूसरे कमरे में चली गई। उसने एक कागज के टुकड़े पर कुछ लिखा और आंखों में आंसू लेकर बैठ गई। हमने अपना लैपटाप उठाया और दफ्तर के लिए निकलने लगे। बेटी ने वह कागज का टुकड़ा हमें पकड़ा दिया, बोली आफिस जाकर पढ़ियेगा। हम उसे डांटते हुए चले गये और कागज का टुकड़ा नीचे गिर गया। रात जब हम घर आये तो कागज का वह टुकड़ा वहीं पड़ा था। हमने उसे पढ़ा तो शर्मसार हो गया। आत्मग्लानि हुई। उसने लिखा था, पापा हम दोनों आपके बच्चे हैं। आपसे सीखते हैं क्योंकि हमारे आदर्श आप हो। अगर आप ही ऐसा बोलेंगे-करेंगे तो हम क्या बनेंगे? हमने सोचा कि गलती हुई है। गलती चाहे जिसकी हो हमें सुधार करना चाहिए। बेटी को जगाया और उससे कान पकड़कर माफी मांगी। बोली आप सॉरी न बोलिये, आपका प्यार ही काफी है। हम दोनों गले लगे तो आंखें भर आईं।
देश में 17वीं लोकसभा के गठन के लिए निर्वाचन प्रक्रिया चल रही है। यह चुनाव देश के इतिहास में कई कारणों से अहम हो गया है। इस चुनाव में चर्चा कभी किसी के प्रति नफरत फैलाने की होती है, तो कभी कोरा झूठ बोला जाता है। समाज को बांटने वाले उत्तेजक भाषण दिये जाते हैं, जैसे चुनाव के बाद देश में किसी को रहना ही नहीं है। देश के हर नागरिक में एक दूसरे के प्रति प्रेम हो और विश्वास हो, इस पर कोई बात नहीं कर रहा। जनता के बीच जा रहे सियासी नेताओं के भाषणों से मुद्दे गायब हैं। लोग रामराज की अपेक्षा करते हैं मगर उसका व्यवहार किसी राक्षसी युग के प्राणी जैसा होता है। सत्ता पाने की चाहत में गिरने की हालत यह है कि निचले से निचले स्तर पर उतरने की होड़ सी मची है। वे लोग जिनसे उम्मीद की जाती है कि आदर्श स्थापित करेंगे, चाहे शब्दों में हो या फिर व्यवहार में, वही लोग सबसे ज्यादा मर्यादायें तोड़ रहे हैं। नतीजतन उनके समर्थक और अनुयायी तो मर्यादा शब्द ही भूल गये हैं। यह चुनाव देश का भविष्य तय करने वाला है मगर ऐसा भविष्य जो नफरत, झूठ और बंटवारे को लोगों के दिलों में भरने वाला है। इस दुखद स्थिति पर खुलकर बोलने की हिम्मत भी देश के जिम्मेदार लोग नहीं कर पा रहे। वेद में वर्णित है.. ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय।’ अर्थात आप मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलें। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलें। यह श्लोक ईश्वर, गुरु और शासक से प्रार्थना के लिए बना है। हम धार्मिक रूप से समाज को बांटने की बात करते हैं मगर उन धर्मों में दिये गये संदेश को स्वयं नहीं अपनाते। हमारा धर्म शासक के व्यवहार को भी परिभाषित करता है। शासक राजकीय कार्य संचालन के बीच जीवन में कटुता न आने दें। दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें। प्रिय भाषण करे। शूरवीर हो मगर बढ़ चढ़कर बातें न करे। जब हमारा धर्म इतने बेहतर तरीके से सत्ता शासक को उसके व्यवहार के बारे में बताता है, तब भी वह उसी धर्म की दुहाई देकर नफरत का माहौल बनाते हैं। वह ऐसे शब्दों और संज्ञाओं का प्रयोग करते हैं, जैसे वह क्रूरतम और घृणित हों। यह कौन सा भारत बनाने के संस्कार निर्मित किये जा रहे हैं। बड़प्पन दिखाने के बजाय छोटापन दिखाने की होड़ में हम देश को कहां ले जा रहे हैं। यह दुखद स्थिति इस वक्त देश में मौजूद है। अपने प्रतिद्वंदी को निकृष्ट साबित करने के लिए स्वांग रचे जा रहे हैं। इनको देखकर तो नहीं लगता कि हम विश्व गुरु बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए उस शब्दावली का प्रयोग किया जो किसी भी काल दशा में निंदनीय है, जबकि मोदी जानते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत तक उनको पाक साफ मान चुकी है। जहां मोदी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे, वहीं प्रतिलंदी राहुल गांधी ने उम्र में छोटे होते हुए भी मोदी को प्यार और झप्पी के साथ कुछ भी कहने की छूट देकर अपना कद बड़ा कर लिया। यह सकारात्मक राजनीति थी। इसके बाद हद तब हो गई जब मोदी ने एक सभा में कहा कि उन्हें विरोधी दल के नेता गंदी नाली का कीड़ा, गंगू तेली, पागल कुत्ता, रेबीज ग्रस्त बंदर, चूहा, सांप, बिच्छू सहित न जाने क्या क्या कहते हैं। वैसे हमने तो किसी जिम्मेदार नेता के मुंह से प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस तरह के शब्द नहीं सुने मगर फिर भी कहते हैं कि अगर किसी ने ऐसे शब्द प्रयोग किये तो यह न केवल दुखद है बल्कि निंदनीय भी। हमने पीएम मोदी के एक भाषण में यह जरूर सुना कि 50 लाख की गर्ल फ्रैंड। हमने उनके मुंह से नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक जो अब इस दुनिया में नहीं हैं के लिए गंदे शब्दों और उपमाओं का प्रयोग जरूर सुना है। यही नहीं मोदी के मुंह से स्वर्गीय राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस की विधवा पेंशन खा गई जैसे शब्दों को सुना है। हमने उनके भाषण में समाज को तोड़ने वाली भाषा भी सुनी है। चुनाव आयोग ने ऐसे शब्दों पर लगाम लगाने का कोई प्रयास नहीं किया। जो खुद को बड़ा और जिम्मेदार महसूस करते हैं, उनके लिए यह बेहद जरूरी है कि वे शब्दों का मोल समझें। ऐसे लोगों का व्यवहार और शब्दावली आदर्शपूर्ण होनी चाहिए। समाज को जोड़ने की उनकी जिम्मेदारी ऐसे ही बड़े लोगों की होती है। अगर प्रधानमंत्री जैसे सबसे बड़े पद पर बैठा व्यक्ति अपनी मर्यादा नहीं समझेगा तो फिर देश का भविष्य क्या होगा? अनुमान लगाया जा सकता है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों के नेताओं के कर्तव्य तय हैं। दोनों को अपने कर्तव्यों का निर्वाहन और राजनीति करते वक्त यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई ऐसा व्यवहार न हो, जिससे समाज में नफरत पैदा हो। किसी भी पूर्व और मौजूदा नेता की आलोचना करते वक्त मर्यादापूर्ण और तथ्यों पर बात होनी चाहिए। झूठ बोलकर समाज और देश को भ्रमित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। आज भी सच्चाई और ईमानदारी की सियासत करने वालों को भारत के नागरिक खुशी से सत्ता सौंपने को तैयार रहते हैं। 2014 में मोदी को देश के नागरिकों ने उन्हें सच्चा और ईमानदार समझकर ही पूर्ण बहुमत दिया था मगर कुर्सी मिलने के बाद उनका व्यवहार क्या रहा? उसकी समीक्षा की जाती है तब दुख होता है कि उन्होंने जनभावनाओं के विपरीत व्यवहार किया। न भाषा का स्तर रहा और न व्यवहार। हम उम्मीद करते हैं कि हमारे नेता आत्ममंथन करके खुद को बड़ा साबित करने की होड़ करेंगे न कि स्तर गिराने की।
जय हिंद।
अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )

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