Home संपादकीय विचार मंच Utterkatha-Yogiraj’s bureaucracy: Extreme questions of uncertainty: उत्तरकथा-योगीराज की नौकरशाही : अनिश्चय के अत्यंत प्रश्न 

Utterkatha-Yogiraj’s bureaucracy: Extreme questions of uncertainty: उत्तरकथा-योगीराज की नौकरशाही : अनिश्चय के अत्यंत प्रश्न 

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दशकों से देश की  सशक्ततम सिद्ध  उत्तर प्रदेश की नौकरशाही इन दिनों अनिश्चय वाद के सवालों की जद में है।सामान्य तौर पर माना जाने लगा है कि इतिहास के प्रचंडतम बहुमत वाली सरकार की अफसरशाही फिलहाल एढाकिज्म   मतलब तदर्थवाद की शिकार हो गयी है। सरकार महामुक़म्मल लेकिन शासन की रीढ़ यानी अधिकारी संवर्ग के शीर्ष प्रतिनिधि कामचलाऊं।
यूपी में आईएएस ही नही अब आईपीएस कैडर को भी इस बीमारी ने अपना शिकार बना लिया है।  नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से लेकर अभी कुछ महीने पहले तक देश मे ब्यूरोक्रेसी के सर्वोच्च पद यानी कैबिनेट सचिव यूपी के आईएएस अफसर रहे हों , केंद्र में आईपीएस के शीर्ष पदों पर तैनात अफसर इसी सूबे के हों , अगर उसी राज्य में प्रशासनिक और पुलिस सेवा के उच्चस्थ पदों पर नियमित तैनाती की लंबी प्रतीक्षा रहे तो इससे ज्यादा आश्चर्य और  क्या हो सकता है ।
 फिलहाल हालात यह हैं कि सूबे में ब्यूरोक्रेसी के दो सबसे महत्वपूर्ण पद मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक  तदर्थ नियुक्तियों के सहारे चल रहे हैं। बीते पांच महीनों से भी ज्यादा समय से उत्तर प्रदेश में कोई पूर्णकालिक मुख्यसचिव नहीं है और कार्यवाहक नियुक्ति के तहत इस पद पर काम चलाया जा रहा है।  इस अवधि में इस  पद के अधिकारी हेतु चिह्नित आधिकारिक आवास रिक्त चल रहा है । गुजरे हफ्ते ही खाली होने वाले उत्तर प्रदेश के डीजीपी  पद पर भी किसी को न बैठा कर कामचलाऊं तौर पर उपलब्ध वरिष्ठतम आईपीएस अफसर हितेश अवस्थी को  जिम्मेदारी दे दी गई है।तदर्थवाद का असर अब उत्तर प्रदेश में अफसरशाही के कामकाज पर भी साफ नजर आने लगा है। प्रदेश में इन हालात में न केवल सीनियर बल्कि जूनियर अफसर भी परेशानी का अनुभव करने लगे हैं।
योगी आदित्यनाथ सरकार में अनिश्चयवाद की यह कहानी वैसे तो काफी पुरानी है लेकिन इसका अद्यतन अध्याय 31 अगस्त, 2019 से  शुरू होता  है जब तत्कालीन मुख्यसचिव अनूपचंद्र पांडे के रिटायर होने के बाद किसी वरिष्ठ अधिकारी की पूर्णकालिक नियुक्ति के बजाए योगी सरकार ने पदभार वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी आर.के.तिवारी को सौंप दिया। अपने सेवाकाल में बेदाग व ईमानदार रहे तिवारी तब से अब तक कार्यवाहक मुख्यसचिव के तौर पर ही काम कर रहे हैं। यह भी उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में एक रिकार्ड ही होगा कि मुख्यसचिव जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी पर इतने लंबे समय से कार्यवाहक अफसर तैनात रहा हो।
उत्तर प्रदेश में इतने महत्वपूर्ण ओहदे पर तैनाती और कामकाज को लेकर प्रदेश सरकार के तदर्थवाद ने न केवल सूबे में 600 अधिकारियों के मजबूत आई.ए.एस कैडर को बेचैन किया है बल्कि तमाम अहम मामलों व काम को भी प्रभावित किया है। गौरतलब है कि अब से पहले प्रदेश में सेवानिवृत्ति के सप्ताह भर के भीतर पूर्णकालिक मुख्यसचिव की नियुक्ति कर दी जाती थी।
सूबे में अहम पदों पर तैनात रहे एक आईएएस अपशर का कहना है कि मुख्यसचिव न केवल प्रदेश सरकार का प्रशासनिक मुखिया होता है बल्कि वह गवर्नेंस के मसले पर मुख्यमंत्री का प्रमुख सलाहकार भी होता है। मुख्यसचिव मुख्यमंत्री और प्रदेश सरकार के विभिन्न सचिवों के बीच सेतु का काम भी करता है। इससे भी ज्याजा महत्वपूर्ण यह है कि मुख्यमंत्री को अपना मुख्यसचिव चुनने के सारे अधिकार होते हैं।
एक अन्य वरिष्ठ अधिकार के मुताबिक किसी भी आईएएस अफसर की छुट्टी को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार मुख्यसचिव को होता है। अब यह काम सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय कर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों मे न केवल सूबे में विकास के कामकाज पर असर पड़ रहा है बल्कि देश भर में सबसे चुनौती से भरे प्रदेश में काम करने की ललक के साथ आए सर्वोच्च सेवा के अधिकारियों में भी हताशा भरती जा रही है।
गौतरतलब है कि कार्यवाहक मुख्यसचिव बनने से पहले आरके तिवारी कृषि उत्पादन आयुक्त के पद पर काम कर रहे थे जो प्रदेश में नबंर दो का पद होता है। यह पहली बार नही है जबकि तिवारी को सभी योग्यता रखने के बाद भी अपने लिये उपयुक्त पद पर नजरअंदाज किया गया। एक प्रमुख अधिकारी के मुताबिक श्री तिवारी के बैच 1985 के प्रभात कुमार के बीते साल  कृषि उत्पादन आयुक्त पद से रिटायर होने के बाद तीन महीने तक उन्हें यह पद नहीं दिया गया था और तत्कालीन मुख्यसचिव अनूपचंद्र पांडे इस काम को अतिरिक्त जिम्मेदारी के तौर पर देखते रहे थे।
गौरतलब है कि जिस समय़ योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने थे, उस समय राहुल भटनागर के पास मुख्य सचिव के रूप में सूबे के प्रशासनिक अमले की कमान थी तो डीजीपी जावीद अहमद पुलिस को संभाल रहे थे। शुरुआती दिनों में डीजीपी व मुख्य सचिव को न बदलकर मुख्यमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार अफसरों के प्रति सकारात्मक नजरिये से आगे बढ़ेगी। यह अधिक दिन न चल सका। 21 अप्रैल को सरकार ने डीजीपी जावीद अहमद को विदा कर सुलखान सिंह को प्रदेश पुलिस की कमान सौंप दी। इसके बाद भी राहुल भटनागर मुख्य सचिव बने हुए थे। सरकार के सौ दिन पूरे होने के जश्न के बीच ही मुख्य सचिव की विदाई का भी फैसला हो गया और दिल्ली से वापस बुलाकर राजीव कुमार को मुख्य सचिव बना दिया गया।
अफसरशाही पर प्रदेश सरकार के दांव का हाल यह है कि सूबे में पहले से तैनात अफसरों पर भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया गया। मुख्यमंत्री बनते ही प्रदेश सरकार ने केंद्र से यूपी कॉडर के एक दर्जन अफसर वापस मांगे। सबसे पहले आए अवनीश अवस्थी को पहले मुख्यमंत्री का प्रमुख सचिव बनाने की चर्चा थी, किन्तु उन्हें सूचना विभाग का प्रमुख सचिव बनाया गया। राजीव कुमार तो दिल्ली से बुलाकर मुख्य सचिव बनाए ही गए हैं, संजय भूसरेड्डी, आलोक कुमार, शशिप्रकाश गोयल, प्रशांत त्रिवेदी व अनुराग श्रीवास्तव को भी अहम जिम्मेदारियां मिल चुकी हैं।
अब तो हालात कुछ यों हो गए हैं कि तमाम काबिल अफसरों की भरमार के बीच भी प्रदेश को न तो प्रशासनिक मुखिया और न ही पुलिस विभाग का मुखिया मिल पा रहा है।
तदर्थवाद की यह बीमारी उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे तक पहुंच गयी है। प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह बीते सप्ताह 31 जनवरी को रिटायर हो गए हैं। कार्यवाहक डीजीपी के तौर पर 1985 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अफसर हितेशचंद्र अवस्थी को कार्यभार सौंप दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक इस पद पर नियुक्ति का पेंच संघ लोक सेवा आयोग के दफ्तर में फंसा हुआ है। नियमों के मुताबिक राज्य को सर्वोत्तम कुछ अफसरों जिनका सेवाकाल अभी दो साल बचा हो उन्हें छांटकर नाम संघ लोक सेवा आयोग के पास भेजना होता है। आयोग इनमें से तीन नामों को मंजूरी देता है जिनमें से किसी एक को प्रदेश सरकार डीजीपी के तैर पर नियुक्त करती है। पूर्व में डीजीपी के पद पर काम कर रहे ओपी सिंह के सेवा विस्तार की अटकलों के बीच प्रदेश सरकार ने यह प्रक्रिया काफी देरी से बीते महीने जनवरी के मध्य में शुरु की।
इस प्रक्रिया के शुरु होने के कुछ ही दिन के भीतर प्रदेश के महानिदेशक नागरिक सुरक्षा जेएल त्रिपाठी जिनका नाम इस छंटनी की सूची में कथित तौर पर नही था, ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया। उच्च न्यायालय से खिंचाई के बाद प्रदेश सरकार ने कुछ अन्य नामों के साथ जेएल त्रिपाठी का नाम संघ लोक सेवा आयोग के पास बीते रविवार को ही भेजा है।
एक अधिकारी के मुताबिक अब इस समूची प्रक्रिया में और देर लगेगी औरइससे आईपीएस कैडर में बेचैनी बढ़ेगी। एक प्रमुख राजनैतिक विश्लेषक का मानना है कि इस समय यूपी कैडर के कई शानदार पुलिस अधिकारी केंद्र सरकार की सुरक्षा एजेंसियों में प्रमुख के तैर पर सेवाएं दे रहे हैं। इनमें रेलवे सुरक्षा बल प्रमुख अरुण कुमार, केंद्रीय रिजर्व सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) महानिदेशक एपी महेश्वरी शामिल हैं। इसी तरह यूपी कैडर के आईएएस अफसर डीएस मिश्रा केंद्र में नगर विकास एवं आवास सचिव व संजय अग्रवाल कृषि सचिव के पद पर आसीन हैं। खुद प्रदेश में अपनी सेवाएं देने के लिए केंद्र से कई काबिल अफसर समय समय पर इसी सरकार में बुलाए गए हैं। डीजीपी ओपी सिंह के रिटायर होने के चंद दिन पहले ही प्रदेश सरकार के अनुरोध पर वरिष्ठ आईपीएस अफसर डीएस चौहान को केंद्र से वापस यूपी कैडर में भेजा गया है। इतने काबिल अफसरों के रहते यूपी की नौकरशाही तदर्थवाद का शिकार हो जाए तो  हैरत ही होती है।
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