Home संपादकीय विचार मंच Why is there no judicial inquiry into the Delhi riots?: दिल्ली दंगों की न्यायिक जांच क्यो नहीं ?

Why is there no judicial inquiry into the Delhi riots?: दिल्ली दंगों की न्यायिक जांच क्यो नहीं ?

0 second read
0
0
224
23 फरवरी को दिल्ली में हो रहे सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान कुछ आंदोलनकारियों ने उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाके की एक सड़क पर धरना देना शुरू कर दिया और उससे यातायात बाधित हो गया। इस पर सरकार समर्थित सीएए के पक्ष में कुछ लोग भाजपा नेता कपिल मिश्र के साथ वहां पहुंचे और इसका विरोध किया। कपिल मिश्र ने वहीं दिल्ली के डीसीपी की उपस्थिति में धमकी देते हुए कहा कि आज तो हम वापस जा रहे हैं, पर केवल ट्रम्प के वापस लौटने तक इंतज़ार करेंगे। उसके बाद हम खुद ही निपटेंगे। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति उस दिन दिल्ली में ही थे और राष्ट्रपति भवन में उनका स्वागत भोज चल रहा था। 26 फरवरी को अचानक हिंसा बढ़ गयी और दंगे भड़क उठे। दंगे अधिकतर मुस्लिम इलाक़ो में हुए और फिर धीरे धीरे उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाके में फैल गए। अब तक 53 लोगों के मारे जाने और 200 लोगों के घायल होने की खबर है। पुलिस के दो अधिकारी मारे गए हैं और कुछ घायल भी हुए हैं।  आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद संसद में दिल्ली हिंसा  पर चर्चा होली के तुरंत बाद शुरू हुयी और चर्चा लंबी चली। सारा विपक्ष इस हिंसा के लिये केंद्रीय सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा था और सरकार विपक्ष के आरोपों से इनकार कर रही थी। यह एक सामान्य संसदीय प्रक्रिया है। लोकसभा और राज्यसभा में गृहमंत्री ने दिल्ली पुलिस का पक्ष रखा, 36 घँटे में दंगे रोक देने के लिये पुलिस की सराहना की, और दंगों के बारे में कुछ खुलासा किया। गृहमंत्री ने जो संसद में कहा, उसे संक्षेप में इस प्रकार पढ़ सकते हैं।
गृहमंत्री के अनुसार,
● यह दंगे एक सोची समझी साजिश के परिणाम थे।
● दंगो में हिंसा भड़काने के लिये उत्तर प्रदेश से 300 लोगों के आने की सूचना थी।
● खुफिया सूचनाओं ने ऐसी साज़िश की सूचना और सम्भावना बता दी थी।
● दिल्ली पुलिस की दंगो को रोकने में सराहनीय भूमिका थी।
● दिल्ली पुलिस द्वारा दंगो को रोकने में कोई विलंब नहीं किया गया था।
● दंगाग्रस्त क्षेत्रो में गृहमंत्री इस लिये नही गए कि उनके जाने से पुलिस का ध्यान बंटता और पुलिस अपने मुख्य काम दंगा नियंत्रण से विचलित हो सकती थी।
● राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एनएसए अजित डोवाल को गृहमंत्री के निर्देश पर ही भेजा गया था।
● फेस आइडेंटिफिकेशन सॉफ्टवेयर तकनीक से 1100 लोगो की गिरफ्तारी के बाद जांच की जा रही है।
● फेस रिकग्निशन तकनीक से ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर आईडी कार्ड के डेटाबेस से मिलान कर के सुबूत जुटाए जाएंगे।
● दोषी बख्शे नहीं जाएंगे और अदालत में उन्हें सजा दिलाई जाएगी।
● पुलिस की आलोचना से उनका मनोबल गिरता है।
विपक्ष का मुख्य आरोप था दिल्ली पुलिस ने दंगो के नियंत्रण और दंगो के पहले दिए गए राजनीतिक नेताओ द्वारा भड़काऊ बयानों पर कोई कार्यवाही नहीं की, इससे दंगाइयों का मनोबल बढ़ा औऱ उन्होंने पुलिस की लापरवाही का लाभ उठाया। अब कुछ उन घटनाओं का उल्लेख आवश्यक है जिनसे यह साफ झलकता है कि दिल्ली पुलिस का रवैया न केवल अनप्रोफेशनल रहा है बल्कि वह कहीं न कहीं किसी बाहरी दबाव से असहाय सी दिखी है।
दिल्ली दंगो की जड़ सीएए विरोधी आंदोलन से जोड़ कर देखी जा रही है। 19 दिसंबर से सीएए के विरोध में दिल्ली के शाहीनबाग इलाके में उस क्षेत्र की महिलाओं का धरना शुरू हुआ और वह धीरे लोकप्रिय और संगठित होता गया। जेएनयू में फीस वृद्धि के खिलाफ छात्रों का आंदोलन चल ही रहा था जिसमे 4 और 5 जनवरी को जेएनयू कैम्पस में हिंसा हुयी। 4 जनवरी को आरोप है कि जेएनयू के फीस वृद्धि आंदोलन के समर्थकों ने सर्वर रूप में घुस कर तोड़फोड़ की और 5 जनवरी को जेएनयू कैम्पस में कुछ नकाबपोश बाहरी लोगों ने हॉस्टल में घुस कर छात्रों को मारा पीटा। पुलिस बाहर खामोश रही। देर से पहुंची। मुक़दमे लिखे गए। स्पष्ट पहचान के बाद भी जेएनयू के नकाबपोश हमलावर नहीं पकड़े गए। यही हाल जामिया में भी हुआ। सीएए के विरोध में हुए आंदोलन मे पुलिस ने यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में घुसकर सरकारी संपत्ति की तोड़फोड़ की और लड़कों को मारा पीटा।
यह सब दिल्ली में चल ही रहा था कि वहां चुनाव घोषित हो गये। चुनाव प्रचार के दौरान तीन स्पष्ट रूप से आपत्तिजनक भाषण दिए गए जिनपर आज तक दिल्ली पुलिस द्वारा एफआईआर तक दर्ज नहीं की गयीं। वे हैं,  गोली मारो का नारा देने वाले केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, घरों में घुस कर रेप की संभावना देखने वाले भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा और दिल्ली विधानसभा के चुनाव को भारत पाकिस्तान का युद्ध का नैरेटिव बनाने वाले भाजपा नेता कपिल मिश्र। इन बयानों पर न चुनाव आयोग ने और न ही पुलिस ने कोई मुक़दमा दर्ज किया। फिर बयान आया एआईएमआईएम के वारिस पठान का कि 15 करोड़ हैं देख लेंगे और कपिल मिश्र का कि ट्रम्प के जाने तक इंतज़ार करेंगे फिर खुद ही निपटेंगे। इन सब बयानों पर दिल्ली पुलिस की चुप्पी ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पद पर रह चुके पुलिस अधिकारियों सहित देश के अत्यंत समानित पुलिस अफसरों में से प्रकाश सिंह, रिबेरो सहित अन्य को भी हैरान किया।
1947 के भयंकर दंगो को छोड़ दें तो भी देश मे सत्तर सालों में कई बड़े दंगे हुए हैं। 1961 में एमपी, 1967 में बिहार, 1969 में अहमदाबाद, 1972 में फिरोजबाद, 1974 में दिल्ली, 1980 में मुरादाबाद, 1981 में अलीगढ़, 1984 में सिख विरोधी दिल्ली के इकतरफा दंगे, 1985 में गुजरात, 1986 में महाराष्ट्र, 1987 में मेरठ, 1988 में पश्चिम बंगाल, 1989 में भागलपुर, 1990 में, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और कानपुर, 1992 में लगभग देश भर में फैले दंगे, 1998 में तमिलनाडु, 1999 में महाराष्ट्र, 2003 में केरल, 2002 में गुजरात, 2013 में मुज़फ्फरनगर, और अब 2020 में दिल्ली में दंगे हुए। यह सूची उन दंगो की है जो जानमाल के नुकसान के लिहाज से बड़े थे।
दिल्ली दंगो के बारे में विपक्ष की इस मांग पर कि इन दंगों की न्यायिक जांच होनी चाहिए, पर यह तथ्य जानना ज़रूरी है कि देश मे हुए उपरोक्त सभी बडे दंगो की न्यायिक जांच समय समय पर तत्कालीन सरकारों ने करायी है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 2006 में सांप्रदायिक दंगों की जांच करने के लिए नियुक्त विभिन्न न्यायिक और जांच आयोगों की रिपोर्टों का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रीय एकता परिषद का एक कार्य समूह गठित किया था, जिसमे 29 ऐसे मामलों की जांच की गयी थी। लगभग सभी बडे दंगो में सरकार ने न्यायिक जांच का गठन किया था जिनमे 13 जांच आयोगों की रपटें गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर नहीं है। इन 13 दंगों की न्यायिक जांच रपटों को अध्ययन के लिये अंजली भारद्वाज, आरटीआई एक्टिविस्ट, ने आरटीआई डाली थी।उन्हें गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर 1961 से 2003 के बीच हुए दंगों की,13 न्यायिक जांच आयोगों की रिपोर्टें नहीं मिलीं. लिहाज़ा अंजली  ने उनकी कॉपी के लिए आवेदन दायर किया। इन आंकड़ो से यह पता चलता है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों के कार्यकाल में दंगे हुए हैं और लगभग सभी बड़े दंगो में सरकार ने न्यायिक जांच आयोगों का गठन किया है लेकिन दिल्ली दंगो के बारे में ऐसा कोई आश्वासन सरकार ने न तो सदन में दिया है और न ही सदन के बाहर।
गृहमंत्री द्वारा वर्णित फेस आइडेंटिफिकेशन तकनीक पर भी कुछ चर्चा ज़रूरी है। 1964 और 1965 में ब्लेडसो, हेलेन चान और चार्ल्स बीसन  ने आदमी के चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक पर काम करना शुरू किया था।  इस तकनीक के लिये चेहरे के कुछ महत्वपूर्ण स्थानों को अलग से मार्क कर के इसका अध्य्यन किया गया। कम्प्यूटर पर इन चेहरों को घुमा कर इन्ही स्थानों को विशेष रूप से देखा गया और अध्ययन किया गया। लेकिन 1966 में जब इस सॉफ्टवेयर का परीक्षण किया गया तो जो कठिनाइयां सामने आईं उनका उल्लेख करते हुए ब्लेडसो ने कहा कि
” सबसे बड़ी समस्या यह है कि चेहरे के घूम जाने, किसी तरफ मुड़ जाने और उसे लगातार हरकत में होने के कारण यह सॉफ्टवेयर अक्सर पहचानने में गलती कर देता है। सामने से चेहरा पहचान कर यह सॉफ्टवेयर परिणाम देता है उसी चेहरे के तिरछे होने या झुक जाने या भाव भंगिमा के बदल जाने पर यह सॉफ्टवेयर दूसरा परिणाम देने लगता है। जितना ही अधिक चेहरे के हावभाव और उसकी भंगिमा में अंतर आएगा उतनी ही यह सॉफ्टवेयर गलतियां करेगा। “
बाद में भी इस तकनीक पर बहुत शोध हुआ और अब भी हो रहा है। लेकिन जब किसी का चेहरा स्थिर कर के इस सॉफ्टवेयर के द्वारा पहचानने की कोशिश की जाती है तो परिणाम कुछ हद तक सही निकलता है। पर अस्थिर चेहरे, भंगिमा, असामान्य परिस्थितियों में इस सॉफ्टवेयर से पहचान होने पर गलतियों की सम्भावना बहुत रहती है।
हालांकि सरकार कुछ सुरक्षा उपायों के साथ इस सॉफ्टवेयर का सीमित उपयोग आजकल  हवाई अड्डों पर बोर्डिंग पास देने के लिये कर भी रही है। लेकिन यह काम निजी कम्पनियों के द्वारा किया जा रहा है, जो फेस रिकग्निशन तकनीक से पासपोर्ट या आधार या डीएल से फ़ोटो मिलान करके बोर्डिंग पास देते हैं। गृहमंत्री इसी तकनीक और उपलब्ध डेटा बेस की बात कर रहे हैं। भारत मे इस तकनीक के उपयोग में सबसे पहली बाधा है, डेटाबेस का अभाव और पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून का न होना। दूसरे, यह तकनीक दुनिया के कई देशों में विफल हो गयी है। इस तकनीक को अमेरिका में उसके प्रयोग को लेकर अनेक शंकाएं उठी हैं और उसे बेहद असफल माना गया है। जो समस्या 1966 में, सॉफ्टवेयर के शुरुआती परीक्षण के समय ब्लेडसो ने महसूस किया था, उक्त समस्या का समाधान अभी तक ढूंढा नही जा सका है। ससेक्स विश्वविद्यालय द्वारा एक अध्ययन में यह पाया गया कि यूनाइटेड किंगडम मेट्रोपोलिटन पुलिस द्वारा इन तकनीक से पहचाने गए पांच चेहरों में से चार के परिणाम गलत पाए गए, यानी अस्सी प्रतिशत परिणाम अशुद्ध निकले। यह एक बड़ी तकनीकी चूक थी। तब से उन्होंने इस सॉफ्टवेयर का प्रयोग करना बंद कर दिया। इसके अतिरिक्त इस सॉफ्टवेयर  ने काले रंग के लोगों को अधिक लक्षित किया जबकि गोरे या अति गोरे लोगों की पहचाना करने में यह असफल रही। सॉफ्टवेयर की इस बड़ी चूक को लेकर खूब विवाद हुआ। इन तकनीकी कमियों के कारण अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को और कैलिफोर्निया के ऑकलैंड में इसका प्रयोग बंद कर दिया गया है।
वैज्ञानिक तकनीक से मिले परिणामों और अपराध के अन्वेषण से मिले सुबूतों को लेकर जनता और अदालतों में एक धारणा यह बन जाती है कि वैज्ञानिक आधारों पर एकत्र किए गए सुबूत बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। जब कि मानवीय गवाहियां पक्षपातपूर्ण हो सकती हैं। भारत मे पुलिस अन्वेषण की सबसे बड़ी समस्या है पुलिस की क्षवि का गैरपेशेवर होना। सबसे अधिक शिकायतें मुकदमों की तफ्तीशों में पक्षपात से जुड़ी होती है। साख और क्षवि का यह संकट पुराना है। ऐसी दशा में यह सॉफ्टवेयर जो अभी भी त्रुटिपूर्ण है के प्रयोग से न केवल शिकायतें बढ़ेंगी बल्कि पुलिस विवादित भी अनावश्यक रूप से होती रहेगी। अतः जबतक, पुलिस के विवेचकों को पर्याप्त तकनीकी प्रशिक्षण न मिल जाय जाय, अदालतों मे सुबूतों के स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता के संदर्भ में इंडियन एविडेंस एक्ट और सीआरपीसी में अवश्यक संशोधन न हो जांय तब तक इस तकनीक से किसी संदिग्ध व्यक्ति या अपराधी या वांछित व्यक्ति का, किसी घटना में उसकी संलिप्तता साबित करना त्रुटिरहित नहीं होगा।
सदन में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिल्ली हिंसा पर संज्ञान लेकर जस्टिस मुरलीधर के संदर्भ में भी कहा गया। मीनाक्षी लेखी ने कहा कि
“मैं यह कहना चाहती हूं कि कुछ लोगों के बारे में आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। हर कोई समझ जाएगा कि किसका तबादला हुआ और किस कारण से हुआ।”
ज्ञातव्य है कि जस्टिस मुरलीधर का तबादला 26 फरवरी की रात को ही सरकार ने आनन फानन में नोटिफाई कर दिया था और 27 फरवरी को होने वाली सुनवाई दूसरे बेंच को दे दी गयीं। आज तक दिल्ली पुलिस ने उन हेट स्पीच पर कोई कार्यवाही नहीं की है, जब कि उन पर मुकदमा कायम करना, पुलिस का पहला कर्तव्य था। आईबी की सारी रपटें गोपनीय होती हैं, तो क्या यह मान लिया जाय कि आइबी के माध्यम से सरकार जजों की नियमित निगरानी कराती हैं ?
दिल्ली दंगों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन दंगों के बारे में विश्व जनमत में सरकार और दिल्ली पुलिस के बारे में बहुत सी प्रतिकूल खबरें छपी और यूरोप, अमेरिका सहित यूएनओ तक ने इस हिंसा को रायट कहने के बजाय प्रोग्राम कहा। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोलैण्ड ट्रम्प दिल्ली में प्रेसवार्ता कर रहे थे तो, उसी समय दिल्ली हिंसा के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार, दिल्ली के दंगों से भरे पड़े थे। दिल्ली मे भड़की हिंसा की एक अमेरिकी कांग्रेस अध्यक्ष प्रमिला जयपाल ने कहा कि “भारत में धार्मिक असहिष्णुता का घातक उछाल भयानक है। “
” लोकतंत्र में विभाजन और भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए और न ही धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले कानूनों को बढ़ावा देना चाहिए,”
अमेरिकी कांग्रेस के एक अन्य सदस्य, एलन लोवेन्टल ने भी दिल्ली हिंसा को सरकार के “नैतिक नेतृत्व की दुखद विफलता” करार दिया। उन्होंने कहा, ‘हमें भारत में मानवाधिकारों के लिए खतरों के सामने बोलना चाहिए।’
शाहीनबाग का धरना खत्म कराने के लिये सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी पड़े, और चार थाने में साम्प्रदायिक हिंसा पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को डीसीपी के दफ्तर में आकर मीटिंग करनी पड़े, यह तो स्थानीय पुलिस की विफलता ही है। जब जब पुलिस, किसी भी दल के राजनैतिक एजेंडा को लागू करने का माध्यम बनती है तो न केवल पुलिस के पेशेवराना स्वरूप पर आघात पहुंचता है बल्कि कानून व्यवस्था पर भी विपरीत असर पड़ता है। पुलिस को कानून को कानूनी तरीक़े से ही लागू करने की अनुमति दी जानी चाहिए। पर अफसोस ऐसा दिल्ली में नहीं हो सका। क्या इस विफलता की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय को नहीं लेना चाहिए ? जबकि गृहमंत्री खुद यह स्वीकार कर रहे हैं कि यह दंगा पूर्व नियोजित था और 300 दंगाई उत्तरप्रदेश से दंगा फैलाने दिल्ली में आये थे। उनका यह कथन कि दिल्ली पुलिस की आलोचना से मनोबल गिरेगा यह एक बहुत पुराना और हास्यास्पद तर्क हैं। मनोबल और मनबढई में फ़र्क़ होता है। मनोबल तो बढ़ना चाहिए पर मनबढई पर तो अंकुश लगना ही चाहिए। आज ज़रूरत है एक न्यायिक जांच आयोग का गठन कर के दिल्ली दंगो को भड़काने, उन्हें रोकने में सुस्ती बरतने, स्पष्ट खुफिया सूचनाओं पर कोई कार्यवाही न करने, जानबूझकर कर पुलिस के कुछ अधिकारियों द्वारा ज्यादती करने की घटनाओं की जांच करायी जाय और इन गलतियों के लिये अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाय। आज के सूचना संचार के युग मे कोई भी खबर दरी के नीचे नहीं छुपायी जा सकती है। कोई न कोई सच निकाल ही लाएगा।
क्या इस विश्व व्यापी बदनामी से बचा नही  जा सकता था ? हम दिल को बहलाने को यह भी कह सकते हैं विदेशी अखबार भारत विरोधी अभियान चला रहे हैं। यह मान भी लिया जाय कि वे भारत विरोधी अभियान चला रहे हैं तो जो तथ्य दिल्ली दंगो के बारे में वे दे रहे हैं वे क्या झूठे हैं ? अगर वे झूठ हैं तो उनका प्रतिवाद करने के लिये सरकार को किसने रोका है ? भारतीय मीडिया, सरकार के कुछ चहेते टीवी चैनलों और अखबारों को छोड़ कर और सोशल मीडिया में जो खबरें और वीडियो दुनियाभर में अबाध गति से फैल रही हैं के प्रतिवाद और सत्य के अन्वेषण के लिये क्या किसी निष्पक्ष न्यायिक जांच की घोषणा सरकार द्वारा नहीं किया जाना चाहिए ? दिल्ली पुलिस की सुस्ती, अकर्मण्यता और इस घोर प्रोफेशनल लापरवाही की जांच के लिये गठित एसआईटी से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं किया जाना चाहिए।
( विजय शंकर सिंह )
Load More Related Articles
Load More By VijayShanker Singh
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Sarkar, Ab aapka Iqbal buland nahi reha! सरकार, अब आप का इकबाल बुलंद नहीं रहा ! 

उत्तर प्रदेश के कानपुर के गाँव बिकरू मे, एक अभियुक्त विकास दुबे को पकड़ने गयी पुलिस पार्टी …