Home संपादकीय विचार मंच We know the reality of paradise but …हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन…

We know the reality of paradise but …हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन…

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हर किसी को ये बखूबी मालूम है और खुद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी कि अयोध्या मामले में पुनर्विचार याचिका का नतीजा क्या होना है, फिर भी वे सियासत से लाचार हैं। ओर अरसे से मुप्रीम कोर्ट का फैसला मानने की बात कहने वाला आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब अपने रुख से पलट गया है। अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जहां हिन्दू और मुस्लिम दोनो पक्षों में मानने को लेकर एक राय है वहीं उलेमा व नेताओं की मौजूदगी वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपनी अलग राह चुनी है। पूरे मामले के अहम मुस्लिम पक्षकार हाजी इकबाल अंसारी और बाबरी मस्जिद के प्रबंधन का दावा करने वाले सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के तमाम मेंमबरान तक बोर्ड के राय से इत्तेफाक नही रखते हैं।
मुसलमानों का बड़ा तबका दुनिया के सबसे चर्चित और लंबे चले मुकदमे के फैसले के बाद इस मसले को दफन कर तरक्की की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है। दूसरी ओर सियासी धड़ों से ताल्लुक और विदेशों से इसी मसले पर लाखों करोड़ों का चंदा वसूलने वाले लोग हैं, जिन्हें यह धंधा मंदा होने का डर है। इस पूरे मसले पर जो फैसला आया है उससे सबसे ज्यादा खुश अयोध्या के मुसलमान हैं जिन्होंने नासूर की तरह पल रहे इस विवाद को हल हो जाने पर राहत की सांस ली है। अयोध्या ही नहीं पूरे उत्तर प्रदेश के मुसलमानों पर्सनल लॉ बोर्ड का यह रवैया गले के नीचे नहीं उतर रहा है। तमाम कौमी तंजीमों (संगठन) से लेकर आम मुसलमान तक सोशल मीडिया से लेकर खुले मंच से पर्सनल लॉ बोर्ड के इस फैसले के खिलाफ अपनी राय रख रहा है। इसके सबके बावजूद अब यह तय हो गया है कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन दिए जाने की पेशकश को भी नामंजूर कर दिया है। बोर्ड की बैठक में तीन मुस्लिम पक्षकारों ने रिव्यू याचिका डालने को लेकर अपनी सहमति दे दी है।
अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद देश में मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड की अहम बैठक बीते हफ्ते लखनऊ में बुलायी गयी। बैठक में अयोध्या फैसले के बाद उठाए जाने वाले कदम पर विचार हुआ तो सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या में मुसलमानों को मस्जिद के लिए दी गयी पांच एकड़ जमीन लेने या न लेने पर भी फैसला लिया गया। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, आल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सहित जमीयत उलेमा ए हिंद व कई अन्य मुस्लिम संगठनों ने अयोध्या में मस्जिद के लिए पांच एकड़ भूमि न लिए जाने को लेकर राय जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने को लेकर मुस्लिम संगठनों में विरोधाभास है। बाबरी मस्जिद मामले के पक्षकार हाजी इकबाल अंसारी व जफरयाब जिलानी बीच बैठक में बाहर निकल गए। वहीं मुकदमे के पक्षकार सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जुफर फारुकी ने अब किसी तरह का मुकदमा न दाखिल किए जाने की बात कही है। फारुकी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले सभी ने इसे मानने की बात कही थी। इन हालात में जब फैसला या गया है तो पुनर्विचार की बात करना बेमानी है। उनका कहना है कि अयोध्या में सभी लोगों से बात कर पांच एकड़ जमीन लेने की बात स्वीकार की जाएगी। पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में कहा गया कि उन लोगों को मालूम है कि पुनर्विचार याचिका का क्या हश्र होने जा रहा है। बैठक के बाद जमीयत नेताओं ने कहा कि याचिका खारिज हो जाएगी पर हम अपने हक से पीछे नही हटेंगे और फैसले पर विरोध जरुर दर्ज कराएंगे। बोर्ड ने फैसले को न्यायसंगत न मानते हुए सुप्रीम कोर्ट के गुंबद के नीचे मूर्तियां रखे जाने व मस्जिद को ढहाने को गलत ठहराने का हवाला देते हुए कहा कि इसके बाद भी हमारे हक में फैसला नही हुआ। बोर्ड ने कहा कि अदालत ने माना है कि 1949 को मूर्तियां रखे जाने तक मस्जिद में नमाज पढ़ी गयी थी। इन्ही बातों को लेकर बोर्ड ने अब पुनर्विचार याचिका दाखिला करने का फैसला किया है।
आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि उसे मस्जिद के बदले में दूसरी जगह पर दी जाने वाली पांच एकड़ जमीन मंजूर नही हैं। बोर्ड ने कहा कि वो हक की लड़ाई लड़ने गए थे न कि दूसरी जमीन पाने के लिए। कार्यकारिणी की बैठक में कहा गया कि उन्हें वही जमीन चाहिए जहां पर बाबरी मस्जिद बनी थी। गौरतलब है कि बड़ी तादाद में मुस्लिम संगठनों ने पांच एकड़ जमीन न लिए जाने की बात कही है। राम जन्मभूमि न्यास ने भी अयोध्या धर्मनगरी में पांच एकड़ नही बल्कि कहीं बाहर दिए जाने की बात कही है। बोर्ड में जहां सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कई बातों को लेकर बहिष्कार किया वहीं जफरयाब जिलानी और बाबरी मामले के पक्षकार हाजी इकबाल अंसारी भी बीच बैठक से उठकर बाहर निकल आए। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक बीते रविवार सुबह 11 बजे से लखनऊ के नदवा कॉलेज में प्रस्तावित थी। आखिरी मौके पर बैठक का स्थान बदल कर नदवा की जगह मुमताज डिग्री कॉलेज कर दिया गया। बैठक का स्थान बदलने को लेकर सूचना न होने के कारण बोर्ड के तमाम सदस्य नदवा पहुंच गए थे। बाद में उन्हें इस बात की जानकारी दी गयी। बोर्ड के एक सदस्य के मुताबिक कार्यकारिणी सदस्य सलमान नदवी के अलग रुख रखने और नदवा कॉलेज में हंगामे की आशंका के चलते बैठक का स्थान बदला गया। सलमान नदवी न केवल मुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे को लेकर पहले से सुलह समझौते की बात करते रहे हैं बल्कि समझौते के लिए कोर्ट के आदेश पर बनी कमेटी के सदस्य श्री श्री रविशंकर से भी बातचीत करते रहे हैं। सलमान नदवी और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी में भी मतभेद जगजाहिर है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में शामिल होने देश भर के मुस्लिम नेता, उलेमा लखनऊ पहुंचे थे। सांसद असदुद्दीन ओवैसी जो पिछली कई बैठकों से गैर हाजिर रहे थे, इस बार भाग लेने मुमताज कॉलेज पहुंचे। मौलाना महमूद मदनी, अरशद मदनी, मौलाना जलालुद्दीन उमरी, सांसद ईटी बशीर, खालिद सैफउल्लाह रहमानी, वली रहमानी, जफरयाब जिलानी और खालिद रशीद फिरंगीमहली फिलहाल बैठक मौजूद रहे। शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक बीमारी के चलते मीटिंग में नही पहुंच पाए हैं। अयोध्या फैसले पर जहां बाबरी मस्जिद एकश्न कमेटी संयोजक जफरयाब जिलानी का मत पुनर्विचार याचिका दायर करने का था वहीं पर्सनल लॉ बोर्ड के ज्यादातर सदस्यों का मानना है कि पूरे प्रकरण में अहम किरदार निभाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन की सलाह के मुताबिक चलना चाहिए। फैसला आने के बाद से अयोध्या मामले में सभी पक्षों ने राजीव धवन की मेहनत और कोशिशों का पुरजोर समर्थन करते हुए उनकी तारीफ की है। यहां काबिलेगैर यह भी है जिन राजीव धवन की तारीफ करते हुए सभी पक्षकार उनसे मशविरा कर ही आगे का कदम उठाकर चलने की बात कर रहे हैं, उन्होंने भी पुनर्विचार याचिका दायर न किए जाने की बात कही है। दरअसल मुसलमानों की अधिसंख्या आबादी का मानना है कि पर्सनल लॉ बोर्ड ने आज तक मुसलमानों के भले के लिए कुछ किया हो या न पर उसने तमाम मौकों पर उसे मुल्क में अलग-थलग कर देने की कोशिश जरुर की। मुस्लिम मामलों के जानकार इसके पीछे शाह बानों, बाबरी मस्जिद, तीन तलाक से लेकर तमाम उदाहरण भी देते हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड दरअसल अब उनकी नही बल्कि उनके नाम पर सियासत करने की इच्छा दिल में रखने वालों की नुमांइंदगी कर रहा है। बोर्ड का आम मुसलमानों की बेहतरी, उनकी राय और उनके भविष्य से कुछ भी लेना देना नही है।

हेमंत तिवारी
(लेखक उत्तर प्रदेश प्रेस मान्यता समिति के अघ्यक्ष हैं।

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