Home संपादकीय विचार मंच Utterkatha: Chakravyuh broken but the challenges of the police also increased!: उत्तरकथा : चक्रव्यूह तो टूटा लेकिन पुलिस की चुनौतियां भी बढ़ीं !

Utterkatha: Chakravyuh broken but the challenges of the police also increased!: उत्तरकथा : चक्रव्यूह तो टूटा लेकिन पुलिस की चुनौतियां भी बढ़ीं !

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चाहे जिन हालातों में सही , उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सूबे के दो प्रमुख शहरों में पुलिस कमिश्नर व्यवस्था लागू करके न सिर्फ दुनिया के सबसे बड़े पुलिस बल को उत्साह से भर दिया है बल्कि महानगरीय पुलिसिंग में आमूलचूल बदलाव का आगाज करते हुए आम शहरी का भी दिल जीता है।
परिस्थितिजन्य कारणों से ही सही , इस फैसले से सरकार ने सूबे में उस सख्त जरूरत को पूरा किया है जिसकी मांग पिछले साढ़े चार दशकों से चल रही थी । सूबे के पुलिस प्रमुख रहे अधिकांश सेवा निवृत्त आईपीएस अफसरों के मुताबिक सशक्त आईएएस अफसरों की लॉबी के चक्रव्यूह को तोड़ते और उनके इरादों को दरकिनार करके  भाजपा सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम साहस भरे इतिहास के तौर पर दर्ज हो गया है ।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुयी मंत्रिपरिषद की बैठक में लखनऊ और गौतमबुद्धनगर (नोयडा) में पुलिस कमिश्नर तैनात किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी और इस फैसले के तुरंत बाद इन दोनो शहरों में पुलिस कमिश्नर की तैनाती भी कर दी गयी है।  दोनों शहरों में दक्ष और शानदार ट्रैक रिकॉर्ड वाले एडिशनल डीजी स्तर के आईपीएस अफसर तैनात किए गए हैं।आलोक सिंह नोएडा के नये पुलिस कमिश्नर बनाए गए हैं जबकि सुजीत पांडेय लखनऊ के पुलिस कमिश्नर नियुक्त किए गए हैं और दोनों ने बुधवार को ही चार्ज लेकर कामकाज शुरू भी कर दिया है। सुजीत पांडेय खासे वक़्त तक सीबीआई में रहने के साथ ही लखनऊ में एसपी से आईजी रेंज के पद पर काम कर चुके हैं जिन्हें महानगर का भूगोल बखूबी पता है। इसी तरह मेरठ रेंज का आईजी रहते पिछले कुछ समय से आलोक सिंह को भी नोएडा का सूरते हाल पता है।
 मुख्यमंत्री योगी का कहना है कि उत्तर प्रदेश में पहली बार पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू किया गया है जबकि 50 सालों से इस तरह की व्यवस्था की मांग की जा रही थी लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में इस पर फैसला नही लिया जा सका था।
 दरअसल पुलिस एक्ट में  10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का प्रावधान है जबकि इस वक्त राजधानी लखनऊ की वर्तमान  जनसंख्या करीब 40 लाख और  नोयडा यानि गौतम बुद्ध नगर की 25 लाख है। इन शहरों में लखनऊ में पहले 38 थाने थे जिन्हें बढ़ाकर 40 किया जा रहा है। नोयडा में भी दो नए थाने खोले जा रहे हैं।
लखनऊ व नोयडा में पुलिस कमिश्नर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) स्तर के अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। लखनऊ में पुलिस कमिश्नर के नीचे पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) स्तर के दो ज्वाइंट कमिश्नर नवीन अरोरा और नीलाब्जा चौधरी के साथ ही डीसीपी के पद पर 10 आईपीएस अधिकारी तैनात किए गए हैं ।  लखनऊ पुलिस कमिश्नरी का काम कुल 56 अफसर देखेंगे । नोयडा में दो उप महानिरीक्षक (डीआईजी) स्तर के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर और डीसीपी के पद पर सात आईपीएस अफसर नियुक्त किए गए हैं।  लखनऊ व नोयडा दोनो शहरों में महिलाओं पर होने वाले अपराधों की रोकथाम के लिए एक-एक महिला  पुलिस उपायुक्त की नियुक्ति की जा चुकी है। यातायात व्यवस्था को देखने के लिए दोनो शहरों में  अलग से डीसीपी तैनात होंगे।
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशकों , केएल गुप्ता, विक्रम सिंह, बृजलाल और अरविंद जैन ने इसे मुख्यमंत्री का निर्भीक कदम बताते हुए अभूतपूर्व कहा है। फैसले से आईपीएस अफसरों सहित पूरे पुलिस महकमे में उमंग का वातावरण है तो बर्षों से शक्तिमान की भूमिका में रही आईएएस असफरों की लॉबी हताश लेकिन लंबी सांस खींचकर चुप है । प्रादेशिक सिविल सेवा के अफसर भी इस फैसले से खुश नही हैं लेकिन वे भी सन्नाटा खींचकर चुप ही हैं।
डीजीपी ओपी सिंह कहते हैं कि राज्य में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू कराना मेरी नौकरी का सबसे ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने कहा कि पिछले दो साल के दौरान हमारे काम से जब पुलिस की विश्वसनीयता राज्य सरकार की नजर में हो गई, तब इस व्यवस्था की आवश्यकता पर मुख्यमंत्री  से चर्चा की गई।
वास्तव में पुलिस कमिश्नर व्यवस्था को अमल में लाने के लिए योगी सरकार ने माहौल और वक़्त देखकर फैसला किया है। असल बात तो यह है कि अब सबकी निगाह इस प्रयोग के परिणामो पर है जिसको लेकर तमाम आशंकाएं फिजा में उछाली जा रही हैं। इस व्यवस्था का छमाही मूल्यांकन किया जाएगा और शायद यही वजह है कि दिल्ली, मुम्बई और अन्य महानगरों में चल रहे पुलिस कमिश्नर सिस्टम की तरह यहां आबकारी, शस्त्र, होटल और सराय के लाइसेंस के अधिकार पुलिस को अभी नही दिए गए हैं। यूपी की नई व्यवस्था हरियाणा की गुरुग्राम पुलिस कमिश्नरी जैसी रखी गई है।
उत्तर प्रदेश के इन दो शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू होने के बाद जिलाधिकारी (डीएम) के अधिकार घट गए हैं। डीएम के 15 अधिकार अब पुलिस आयुक्त के पास होंगे। जनसामान्य से संबंधित कई प्रावधानों सहित कुल 15 अधिनियम अब पुलिस आयुक्त के हवाले कर दिए गए हैं। इनमें एनएसए, गैंगेस्टर,  गुंडा एक्ट तामील करना, फायर, इंटैलीजेंस,  कारागार अधिनियम, अनैतिक व्यापार व पुलिसद्रोह अधिनियम अब पुलिस कमिश्नर के पास होंगे।
उत्तर प्रदेश के खास शहरों में बेहतर पुलिसिंग , कानून व्यवस्था और अपराध स्थित पर काबू पाने का फिलहाल इससे बेहतर कोई उपाय नहीं समझा जा रहा था । दरअसल उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य और लाखों की आबादी वाले इसके कई शहरों में पुलिस कमिश्नर व्यवस्था शुरू करने की कई बार कोशिशें हुई लेकिन इसमें राजनीतिक से कहीं ज्यादा गैर राजनीतिक दबाव हमेशा आड़े आया । यह गैर राजनीतिक दबाव उन नौकरशाहों का बताया जाता रहा है जो वास्तव में  लम्बे समय से यूपी जैसे राज्य में सत्ता संचालकों के आंख, नाक और कान बने हुए हैं । सत्ता कानून व्यवस्था को लेकर अपनी कड़क छवि के चलते एक वक्त सूबे में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा सुप्रीमो  मायावती भी यह हिम्मत नहीं दिखा सकीं । वास्तव में यह गैर राजनीतिक दबाव उन बड़े नौकरशाहों की बड़ी लाबी का रहा है जिनको लगता रहा है कि  यह सिस्टम लागू होने से उन खास शहरों में आईएएस अफसरों की तैनाती लगभग निष्प्रभावी हो जाएगी ।
यह सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश जैसे खालिस सियासी सूबे में कुछ अपवाद छोड़ दिए जाए तो कहने को गैर सियासी लेकिन सत्ता की  आंख,  नाक और कान बनी नौकरशाही की सलाह पर ही अहम सियासी फैसले होते रहे हैं । ऐसे में इस संवर्ग ने अपने अफसरों के अधिकारों के संरक्षण के नाम पर हमेशा ऐसे उपक्रम किए  जिससे पुलिस कमिश्नर सिस्टम की जरूरत सत्ता शीर्ष को समझ में ही न आए।
आईपीएस अफसरों ने कभी खुलकर तो अक्सर दबी जुबान कहा है कि आईएएस अधिकारियों की ताकतवर लॉबी ने हमेशा इस व्यवस्था का विरोध किया है । 1978 में तो कानपुर में पुलिस कमिश्नर बनाने का फैसला हो चुका था और बाकायदा सीनियर आईपीएस अधिकारी बासुदेव पंजानी को वहां तैनात होने की खबरें आम हो गई थीं लेकिन आखिरी वक्त पर कुछ वरिष्ठ अफसरों के दबाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव द्वारा फैसला टाल दिया गया।
 सिर्फ बेहतर कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की प्रत्याशा में वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश की जनता ने मुलायम सिंह यादव को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया और मायावती को पूर्ण बहुमत की सरकार दी । अपराधों पर उम्मीद के मुताबिक काबू नहीं रहा और औरैया में इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या में सत्तारूढ़ दल के विधायक शेखर तिवारी का नाम आया तो मायावती की बेचैनी बढ़ी । पुलिसिंग पैटर्न में बड़े बदलाव की तैयारी हुई तो समझा जा रहा था कि कड़े फैसले लेने के लिए चर्चित मायावती राज्य में बिना किसी दबाव के पुलिस कमिश्नर व्यवस्था लागू कर सकती हैं लेकिन होशियार नौकरशाही ने उन्हें भी ऐसा नहीं करने दिया और दूसरा तरीका लागू करा दिया। हालांकि मायावती ने मुख्यमंत्री के अपने आखिरी कार्यकाल में आईएएस अफसरों के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को ठेंगा दिखाते हुए पहली बार एक गैर आईएएस अफसर को कैबिनेट सचिव के पद पर तैनात करते हुए शासन की सबसे ताकतवर कुर्सी सौंपने का साहसिक प्रयोग किया था ।
 करीब साढ़े तीन दशक की पुलिस सेवा के बाद अवकाश पाए एक आईपीएस अधिकारी बीपी सिंह कहते हैं कि यह खुशी की बात है कि  लखनऊ व नोयडा में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का  फैसला करके  योगी आदित्यनाथ सरकार ने पुलिस की पुरानी मांग को स्वीकार कर लिया है। इस व्यवस्था के तहत पुलिस अधिकारियों को कार्यकारी मजिस्ट्रेट की भी शक्ति मिल जायेगी और थानाध्यक्षों की नियुक्ति में जिलाधिकारी की सहमति की आवश्यकता नही रहेगी।  वैसे इसी सरकार में पिछले पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह के कार्यकाल में इस विषय को लेकर काफी विवाद रहा है।  नई व्यवस्था में शान्ति व्यवस्था की  ड्युटी के समय बल प्रयोग करने में भी पुलिस स्वविवेक से निर्णय लेने में स्वतंत्र रहेगी। सामान्य तौर पर मानना है इस निर्णय से इन क्षेत्रों में पुलिस के अधिकारों में जहां वृद्धि होगी व शान्ति व्यवस्था के मामले में  त्वरित कार्यवाही करने का अवसर मिलेगा, वहीं उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ेगी।  हां, अब पुलिस वाले शान्ति व्यवस्था के मामले में जिलाधिकारी व उनकी टीम पर दोषारोपण भी नहीं कर सकेंगे , जो कई बार देखा गया है।
नई व्यवस्था को लागू करने में कुछ आशंकाएं और प्रश्न भी है जिनके सुविचारित समाधान भी ढूंढने होंगे ।कहते हैं कि  “प्रभुता  पाय काह मद नाही”।  उत्तर प्रदेश में पुलिस पर पहले से ही अपने अधिकारों के दुरुपयोग की शिकायतें होती रही है । अब अधिक अधिकार सम्पन्न पुलिस यदि संयम व अनुशासन का परिचय नहीं देगी तो यह व्यवस्था समाज के लिए घातक भी हो सकती है ।
 उत्तर प्रदेश के अतीत को देखें तो वास्तव में भ्रष्ट व जातिवादी सरकारें भ्रष्ट और पूर्वाग्रही अधिकारियों की नियुक्ति कर जनता को खून के आंसू भी रुला सकती हैं। अगर पुलिस और इसपर नियंत्रण करने वाली शक्तियां यदि अपनी खराब आदतों पर रोक नहीं लगा पाती हैं तो यह व्यवस्था अभिशाप हो सकती है ।
 सरकार की  जिम्मेदारी है कि सत्यनिष्ठा वाले  दक्ष पुलिस अधिकारियों को ही इस नई व्यवस्था में   नियुक्त करे व नियुक्त अधिकारी कानून का राज्य स्थापित करने हेतु सचेष्ट रहें ।  यह अच्छी बात है कि दोनों शहरों में काबिल अफसरों को जिम्मेदारी दी गई है।
 फिलहाल नव नियुक्त अधिकारियों  का दायित्व होगा कि वे अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर सरकार व जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरें। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस ऐतिहासिक बदलाव की बुनियाद में वे अहम इल्जाम  भी बड़े कारण है जो कुछ अफसरों की तैनाती में कथित भ्रष्टाचार को लेकर नोएडा के  निलंबित एसएसपी वैभव कृष्णा ने सरकार तक पहुंचाए थे ।
पदभार ग्रहण करने के बाद  लखनऊ के पहले पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय कहते हैं कि पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय वे धन्यवाद देना चाहता हू मुख्यमंत्री को  जिन्होंने  उनपर भरोसा दिखाया है। बेहतर और स्मार्ट पुलिसिंग की  हमारी प्राथमिकताएं के तहत 24 घंटे किसी न किसी रैंक का अधिकारी यहां मौजूद रहेगा । अपराधियों पर जितनी कठोर कार्रवाई हो सकइ है हम करेगे महिलाओ पर अत्याचार को लेकर हम और अधिक सेंसटिव होंगे । 24 घंटे सातो दिन मुख्यमंत्री डीजीपी की मंशा के अनुरूप काम करेंगे।

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