Home संपादकीय विचार मंच Subculture of violence: हिंसा की उपसंस्कृति

Subculture of violence: हिंसा की उपसंस्कृति

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25 दिसम्बर को भारत के दसवें प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का जन्मदिन है। 2014 से इसे सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है। अंग्रेजी में इसे गुड गवर्नेन्स डे कहते हैं। संक्षेप में ये सरकारों पर एक तरह से मांग है कि वे अपने को प्रभावी, दूरदर्शी, जवाबदेह, पारदर्शी, समदर्शी और विश्वसनीय बनाएँ। लोगों को उनकी स्थिति, आवश्यकता एवं क्षमता के अनुसार सेवा और सुविधा उपलब्ध कराएं।
गुड गवर्नेन्स की परिभाषा के बारे में सारे एकमत नहीं है। पश्चिमी देश नियंत्रित संस्थाएँ गरीब देशों की सरकारों को वित्तीय सहायता के एवज में उनके काम करने के तरीके और प्राथमिकता में बदलाव की शर्त रखती है जिसे वे गुड गवर्नेन्स का नाम देती है। तर्क होता है सरकार के कामकाज के तरीके में बदलाव और बाजार-व्यवस्था के लिए जरूरी संस्थाओं को स्वतंत्र और मजबूत बनाने से कार्यकुशलता बढ़ेगी, आर्थिक विकास रफ़्तार पकड़ेगा और लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठेगा। आलोचकों का कहना है कि ये विकसित देशों की गरीब देशों के बाजार पर कब्जा जमाने की चाल है।
अन्य देशों की तरह भारत में भी गुड गवर्नेन्स का बड़ा शोर है। इसे सारी समस्याओं के हल के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। सरकारें ई-गवर्नेन्स के जरिए सरकारी सेवाओं के त्वरित डिलिवरी में लगी है। दावा करती है कि ह्यूमन इंटर्फ़ेस खत्म हो जाएगा तो सरकारी कर्मचारियों द्वारा गबन और नाजायज वसूली की समस्या खुद ब खुद खत्म हो जाएगी। लाभार्थियों को उनका पूरा का पूरा हक समय पर सीधे मिल जाएगा। कम्प्यूटर और वेबसाइट आदमी की तरह अपनी कट नहीं माँगेगा। काम को लटकाएगा नहीं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ई-गवर्नेन्स गुड गवर्नेन्स का एक जरिया मात्र है। आदमी की भूमिका सरकार के काम-काज में हमेशा अहम रहेगी। निजी स्वार्थ में अंधे हो चले लालची कोई ना कोई रास्ता ढूंढ ही लेंगे। दोषियों के धर-पकड़ के साथ-साथ सरकारी कर्मियों को भी सकारात्मक व्यवहार-परिवर्तन के लिए प्रेरित-प्रशिक्षित किये जाते रहना चाहिए।
जानकारों का कहना है कि गुड गवर्नेन्स के रास्ते में तीन अड़चनें हैं: आबादी, भ्रष्टाचार एवं हिंसा की संस्कृति। अगर आबादी बढ़ती रही, उसमें महिलाओं की संख्या घटती रही और उनके स्वरूप के अनुरूप नीतियाँ या योजना नहीं बने तो सुशासन से भी कुछ खास हासिल नहीं होने वाला। आबादी अगर युवा-बहुल हो तो गुड गवर्नेन्स के जरिए ही काम-रोजगार सृजित किया जा सकता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश गुड गवर्नेन्स का उद्देश्य भी है और लक्ष्य भी। सबको पता है कि घूस सरकारी कर्मियों द्वारा आम लोगों से जबरन वसूली है। सरकारी धन का गबन लोगों को उनके अधिकार से वंचित रखने का अपराध है।
हिंसा की उपसंस्कृति के बीच तो गुड गवर्नेन्स की बात ही नहीं हो सकती । जंगलराज में जिसके पास लाठी हो, उसी की भैंस होती है। इसके विपरीत, प्रजातंत्र में बल प्रयोग सिर्फ़ सरकार कर सकती है। ऐसा ये पुलिस के माध्यम से करती है। वैसे, अपने या किसी और के जान-माल की हिफाजत के लिए कोई भी बल-प्रयोग कर सकता है लेकिन उसे ये कोर्ट में साबित करना पड़ेगा कि उसके या उसके सामने किसी और के जानमाल को वाकई गम्भीर खतरा था।
हिंसा को रोकने के लिए पुलिस अक्सर प्रतिक्रियात्मक तौर-तरीके का ही इस्तेमाल करती है। इसे फूहड़ हिंदी सिनेमा का प्रभाव कहें कि अंग्रेजी हुकूमत की विरासत, पुलिस का लोगों से छत्तीस का आंकड़ा है। अपराधियों को डराने के नाम पर गालियां निकालते और डंडे बरसाते ये जल्दी ही अच्छे-बुरे में भेद भूल जाते हैं और सबको एक ही लाठी से हांकने में लग जाते हैं। अग्रसक्रिय होकर सही सोच के लोगों के साथ गठजोड़ करने के बजाय ये पीसीआर में बैठे किसी बवाल के खबर की इंतजार करते हैं। अपराधियों को पकड़ भी लेते हैं लेकिन तब तक नुकसान हो गया होता है। लोगों को लगता है कि इन्हें पहले ही कुछ करना चाहिए था। रही-सही कसर लम्बी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर देती है। फैसला आने में दशकों लग जाते हैं। बहुतेरे छूट जाते हैं। किसी को सजा हो भी जाती है तो याद करना मुश्किल हो जाता है कि इसने किया क्या था? इस रूप में पुलिस बहुत कुछ उस फौज की तरह है जो खड़का होने पर गोले दाग देती है और फिर दूसरे खड़के का इंतजार करने लगती है।
त्वरित प्रतिक्रिया जरूरी है लेकिन पुलिस को अपनी इंफेंट्री क्षमता भी बढ़ानी चाहिए जैसे कि लोगों को स्वेक्षा से कानून मानने के लिए प्रेरित करना। ये छोटे-मोटे अपराध कर ताजे-ताजे अपराध की दुनियां में घुस आए कम उम्र के लड़कों को जेल भेजने के बजाय उनको सही राह पर लाने की योजना पर काम करे। एक बार ये जेल पहुंच गए तो वहां पहले से जमे बदमाशों के शागिर्द बन जाएंगे और बाहर और भी संगीन अपराध करने का हौसला और क्षमता दोनों लेकर निकलेंगे। तब उनको सम्भालना और भी मुश्किल और खचीर्ला होगा। अपराध से ग्रसित इलाके को गोद ले। वहाँ की गैंग-उपसंस्कृति को खत्म करे। लम्बी चली आ रही दुशमनियों को मध्यस्तता और बीच-बिचाव से निबटाकर हिंसा-प्रतिहिंसा के कुचक्र को तोड़े। बच्चों और युवाओं पर प्रभाव रखने वाले अन्य विभागों और संस्थाओं से तालमेल स्थापित कर उनमें कानून-पाबंद और अमन पसंद नागरिक बनने का जज्बा पैदा करे। उनसे खेलों के माध्यम से सम्पर्क स्थापित करे, गलत लोगों के हत्थे चढ़ने से बचाए। महिला विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिए परिवार, अड़ोस-पड़ोस एवं स्कूल-कालेज से मिलकर जागरुकता एवं सशक्तिकरण अभियान चलाए जिससे कि बचाव हो सके।
सिर्फ चमकीले दफ़्तर, तेज-रफ़्तार गाड़ियों और भड़कीले गैजेट से पुलिस के काम में चमत्कारी परिवर्तन नहीं आने वाला। समय रहते सही सोच के लोगों से गठजोड़ एवं बदमाशों पर नकेल कसकर ही स्थायी शांति की स्थापना की जा सकती है।
ओपी सिंह
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

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