Home संपादकीय विचार मंच Ravan hai har chorahe per..रावण है हर चौराहे पर, इतने राम कहां से लाऊं

Ravan hai har chorahe per..रावण है हर चौराहे पर, इतने राम कहां से लाऊं

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हैदराबाद में महिला डॉक्टर दिशा के साथ बलात्कार फिर जलाकर मार डालने की घटना से पूरा हिंदुस्तान उबल रहा है। संसद से सड़क तक माहौल गरम है, लेकिन यह गुस्सा और ऊबाल कब तक रहेगा। टेलीविजन पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एंकर कब तक आंसू बहाती रहेंगी, ऐसी डिबेट कब तक जारी रहेगी। ससंद में महिला सांसदों के आंसू कब तक टपकते रहेंगे। दिल्ली का जंतर-मंतर कब तक आमरण स्थल बनता रहेगा। कानूनी किताबों में महिला सुरक्षा को लेकर किए गए दावें जमींन पर कब उतरेंगे। बलात्कार के आरोपियों को फांसी की सजा कब मिलेगी। निर्भया, कठुवा और मुम्बई के शक्तिमिल जैसे अनगिनत घटनाओं के दोषियों को सजा कब मिलेगी। त्वरितगति न्यायलय यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट से दोषियों को सजा मिलने के बाद भी फांसी क्यों नहीं दी गई। निर्भया के चार दोषियों को फांसी सजा मिल चुकी है, लेकिन अभी तक उन्हें फांसी पर नहीं लटकाया गया। कुछ ऐसा ही हाल मुंबई के शक्तिमिल का भी है। कठुवा गैंग रेप मामले में भी अभी पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल सका है। एसपीजी सुरक्षा बिल पर संसद से वाक आउट करने वाले राजनेता क्या हैदराबाद की घटना पर अपनी चुप्पी कब तोड़ेंगे।  जिस हैदराबाद में यह घटना हुई वहां के सांसद अससुद्दीन ओवैसी की तरफ से अभी तक अफसोस के एक शब्द नहीं जाहिर किए गए। जबकि बाबरी मस्जिद के सवाल पर उन्होंने कहा है कि अयोध्या में कुछ भी बने वहां बाबरी मजिस्जद थी, है और रहेगी। देश बांटने वाले ऐसे बेशर्म नेताओं से समाज क्या उम्मीद कर सकता है। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ का नारा देने वाली सरकार आखिर बेटियों को सुरक्षा कौन सी बेहतर पहल की। हैदराबाद के मुख्यमंत्री नीरों बने हैं। पूरे देश में बेटियां न्याय के लिए गुहार लगा रही हैं और केसीआर दिल्ली में शादी समारोह के मजे लुट रहे हैं। पीड़ित परिवार के पास संवेदना के दो शब्द जताने भी नहीं पहुंचे। राजनेताओं को इसका जबाब भी देना होगा।
बलात्कार की घटनाओं पर राजनीति की जाती है। चर्चित होने का मौका ढूढ़ा जाता है। संसद में सामाजिक हस्ती जय बच्चन को अपनी बात रखते हुए आंसू टपक पड़े। उन्होंने बलात्कार के आरोपियों को खुले आम लिंचिंग करने की बात कहा। जिस पर कई  लोगों ने ट्वीट के जरिए विरोध भी किया। कानून-व्यवस्था का सवाल उठाने लगे हैं। मेरा सवाल उन लोगों से है कि कानूनी प्रक्रियाओं के तहत अब तक निर्भया, शक्तिमिल और कठुवा जैसी हजारों घटनाओं के मामले में पीड़ित परिवार को न्याय क्यों नहीं मिल सका। जया बच्चन ने जो सवाल उठाया है उस पर राजनीति के बजाय अमल होना चाहिए। बलात्कार की घटना देश के लिए एक सामाजिक कलंक हैं। इस पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इस पर राजनीति हो रही है। राजनेता प्याज की बढ़ी कीमतों को लेकर स्टाल लगा रहे हैं। नामांकन करने प्याज की माला पहन कर जा रहे हैं। गरीब परिवारों की शादी में कम दाम पर प्याज देने की घोषणा कर रहे हैं। लेकिन  शायद महिलाओं की सुरक्षा प्याज के मूल्य से भी कम की है। दुष्कर्म के बाद बढ़ती हत्या की घटनाओं पर भी राजनैतिक दल गंभीर बातें नहीं की है। गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा को लेकर कांग्रेस संसद से वाक आउट करती है। प्रियंका गांधी की सुरक्षा पर संसद में हंगामा खड़ा किया जाता है। लेकिन प्रियंका रेड्डी की बलात्कार के बाद हत्या पर कांग्रेस ससंद से वाक आउट नहीं करती। हमें आम और खास के बीच की खाई को पाटना होगा। राजनेताओं की यही सोच आम लोगों में घृणा पैदा करती है।
हैदराबाद की घटना को लेकर पूरे देश में उबाल और गुस्सा है। लेकिन बलात्कार की समस्या से फिलहाल निजात की कोई उम्मीद दिखती नहीं मिलती। महिलाओं को लेकर पुरुषों के दिमाग में मनोवृत्ति समाई  है, वह मिटने वाली नहीं है। हैदराबाद की डॉक्टर के साथ जो कुछ हुआ वह बेहद गलत हुआ। भला हो सोशलमीडिया का जिसने इस घटना को राष्ट्रीय मीडिया में खड़ा कर दिया। संसद में महिला सांसदों में काफी उबाल है। जया बच्चन, रुपा गांगुली, जया प्रदा, हेमा मालिनी सभी ने कड़ी सजा की मांग की है। महिला सांसदों ने खुले आम फांसी की सजा वकालत किया है। लेकिन हमारी सरकारें और व्यवस्था इसे कब अमली जामा पहनाती हैं यह देखने की बात है। लेकिन इस बीच पंजाब सरकार ने एक उम्मीद की किरण जगायी है। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने एक आदेश जारी किया हैं जिसमें महिलाओं की सुरक्षा के लिए पीसीआर वैन सुविधा उपलब्ध करायी है। जिसमें कोई भी महिला अकेले होने पर इस सुविधा का लाभ उठा सकती है। इस वैन में एक महिला सिपाही की भी नियुक्ति होगी। यह सेवा रात नौ बजे से सुबह छह बजे तक रहेगी। जिसे कॉल कर मदद के लिए बुलाया जा सकता है। पंजाब सरकार की यह अच्छी पहल है। बलात्कार के मामले बेहद भयावह हैं।  भारत में औसतन एक घंटे में बलात्कार की पांच जबकि तीन घंटे में 15 घटनाएं होती हैं। 24 घंटे में 109 बलात्कार की घटनाएं होती हैं। आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार की हर चार घटनाओं में सिर्फ एक में आरोपियों को सजा मिल पाती है। हर साल 40 हजार बलात्कार के मामले पुलिस रिकार्ड में दर्ज होते हैं। बलात्कार के 30.9 फीसदी मामलों के निपटान में एक से तीन साल का समय लग जाता है। जबकि 30.2 फीसदी मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई । वहीं 8.9 फीसदी मामलों के फैसले में 9-10 साल लग गए। देश में सिर्फ 25 फीसदी घटनाओं में ही बलात्कारियों को सजा मिल पाती है। देश में केवल 10 साल में बलात्कार के 2.79 लाख मामले रिकार्ड किए गए। एक नाबालिक छात्रा से बलात्कार के मामलों में कोलकाता के धनंजय चटर्जी को फांसी पर लटकाया गया था। लेकिन इसके बाद भारत में कोई  फांसी नहीं दी गई। भारत में बढ़ती बलात्कार की घटनाओं से महिलाओं, बेटियों और कामकाजी महिलाओं को क्या निजात मिल पाएगी। क्या कड़े कानून बनाकर हम बलात्कार को रोक सकते हैं। बलात्कार की घटना हमारे सामाजिक सोच और नैतिकता से जुड़ी है। घर में हम जिस ईमानदारी से रहते हैं जब तक वह नैतिकता खुली सड़क पर नहीं अपनाएंगे तब तक बलात्कार की घटनाओं पर विराम लगने से रहा। सिर्फ कड़ा कानून इसका समाधान नहीं हो सकता है। एक लड़की जब खुली सड़क पर गुजरती हैं तो उस पर हजारों आंखें टूट पड़ती हैं। लेकिन जब एक लड़का आवारगी में जिंदगी के बिंदास खयालों में बेखौफ गुजरता है तो हजारों लड़कियों की निगाहें उसकी तरफ क्यों नहीं घूरती। लड़कियां लड़कों के लिए गिद्ध क्यों नहीें बनती। क्यों लड़के लड़कियों के लिए हैवान बन जाते हैं। लड़कियों में ऐसी क्या बात होती है। इस सवाल का जबाब हमें खुद खोजना होगा। क्योंकि हमने घर और समाज में लड़कियों की प्रति गलत सोच पैदा किया है।  लड़कियों को हमने संस्कार, मान और सम्मान की गठरी में बांध रखा है। हमने जो संस्कार बेटों को दिया अगर वहीं बेटियों को देते तो आज इस बेशर्मी से सिर न झुकाने पड़ते। श्रीराम, बौद्ध, कृष्ण, विवेकानंद के देश में सीता, गीता, गायत्री का खुले आम रावण और दुशासन चीरहरण कर रहे हैं। ऐसे पिचास घर की चाहारदीवारी से लेकर सड़क, चौराहे और गली तक में अड्डा जमाए रखा है। जबकि राम नदारत हैं, फिर ऐसे हालात से हम कैसे निपटेंगे। हालात बेहद बुरे हो चुके हैं। समाज के दरिंदों ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दिया है। मासूम बच्चियों से लेकर बूढ़ी औरतों तक का चीरहरण किया जा रहा है। जबकि मोटी-मोटी किताबों में कानून का दमघूंट रहा है। फिर ऐसी स्थिति से कैसे निपटना जाय। हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। सिस्टम सड़ सा गया है। महिला सुरक्षा के लिए जाने कितने ऐप, हेल्पलाइन और मोबाइल नम्बर उपलब्ध हैं बावजूद दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है। ऐसे अपराधियों के प्रति किसी प्रकार की सहूलियत नहीं दी जानी चाहिए। पीड़ित परिवारों में न्याय की उम्मीद खत्म न हो इसका पूरा खयाल किया जाना चाहिए। समय रहते इस पर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति बेहद बुरी होने वाली है।

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