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Police credibility in the era of free communication: मुक्त संचार के युग मे पुलिस की साख

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हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून 2019 और प्रस्तावित एनआरसी के विरोध में देशव्यापी आंदोलन के दौरान राजधानी दिल्ली की पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने खड़े हो गए हैं। पुलिस को मूलतः कानून को कानूनी तरह से लागू करना चाहिए, पर अपने गठन के काल से ही पुलिस सरकार या सत्ता के उद्देश्य और एजेंडे को प्रचलित कानूनों के ऊपर प्राथमिकता देती रही है। इस लेख में एक उदाहरण कानून व्यवस्था और दूसरा अपराध की विवेचना से जुड़ा है जिसके संदर्भ में दिल्ली पुलिस की साख पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

1858 ई में, जब ब्रिटेन की महारानी की घोषणा के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी को हटा कर ब्रिटेन ने भारत को सीधे अपने आधीन कर लिया तब जाकर एक व्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र का जन्म हुआ। धीरे धीरे दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम बने और फिर इस प्रकार न्याय तंत्र का विकास हुआ। पुलिस सरकार के अधीन थी और ब्रिटिश राज को बनाये रखने की जिम्मेदारी भी पुलिस पर थी। इसीलिए जब 1905 ई के बंग भंग आंदोलन के बाद जन आंदोलन  विकसित होने लगे तो पुलिस की क्षवि एक दमनकारी और जनविरोधी बनने लगी। यही क्षवि कमोबेश रू आज तक बनी हुयी है।

ऐसा नहीं कि इस क्षवि को बदलने की कोई कोशिश सरकार द्वारा नहीं की गयी, पर तमाम प्रयासों के बाद भी यह दाग इतना गहरा है कि वह अब भी कभी कभी साफ दिख जाता है। प्रशिक्षण और प्रशासन की कमियों को दूर करने के लिये गोरे कमीशन ( 1971 – 73 ), धर्मवीर की अध्यक्षता में गठित नेशनल पुलिस कमीशन ( 1977 – 80 ) और रिबेरो कमीशन फ़ॉर पुलिस रिफॉर्म ( 1998 ) सहित कई कमिशन और समितियां समय समय पर गठित की गयी जो पुलिस को बदलते परिवेश के अनुसार ढाल कर उसे जनहितकारी स्वरूप प्रदान कर सकें। प्रशिक्षण में आवश्यक बदलाव किये गये, विवेचना में थर्ड डिग्री से दूर रह कर वैज्ञानिक तरीक़ों के अपनाने पर जोर दिया गया, जवानों को रहने, और ड्यूटी पर आने जाने के लिये सुगम साधन और सरकार ने इन सबके लिये पुलिस आधुनिकीकरण योजना चलाई ताकि पुलिस बदलते समय के अनुसार न केवल साधनों से बल्कि अपनी मानसिकता से भी आधुनिक बने। इन सभी प्रयासों का असर भी हुआ और पुलिस के संसाधन, जवानों की सेवा सुविधा, आदि में अंतर भी आया।

लेकिन पुलिस की सार्वजनिक क्षवि और क्रियाकलापों में बहुत अंतर नहीं आया। इसका एक कारण यह भी है कि सरकार ने उक्त कमीशनों की कई संस्तुतियों को, जो उनके राजनीतिक हितों के विपरीत थे, ठंडे बस्ते में डाल दिया, विशेषकर उन संस्तुतियों को जो पुलिसजन के स्थानांतरण और नियुक्ति से सम्बंधित हैं। जब राजनीतिक आधार पर पुलिस में तबादलों और मुकदमों में हस्तक्षेप की प्रवित्ति बहुत बढ़ने लगी तो, यूपी के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने नेशनल पुलिस कमीशन की उन संस्तुतियों को लागू करने और  पुलिस सुधार हेतु एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की। लंबी और बरसों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अफसरों की पोस्टिंग और स्थानांतरण के लिये कुछ दिशा निर्देश जारी किये पर कहीं पर वह लागू किये गए और कहीं कहीं कुछ राज्यों में वह अब भी लंबित है ।अक्सर यह सवाल उठता है कि पुलिस सेवा के स्थानांतरण और नियुक्ति में राजनीतिक दखलंदाजी कितनी हो, तो उसका एक सीधा उत्तर होगा, लोकशाही में यह दखलंदाजी रहेगी ही। अब यह पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को तय करना है कि वे कितनी स्पष्टता और मजबूती से विधि विरुद्ध होने वाली दखलंदाजी को दृढ़ता से ‘ नहीं ‘ कह देते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब अफसरों ने कानून व्यवस्था और अपराधों की विवेचना में दृढ़ता से गलत और विधिविरुद्ध हस्तक्षेप को नकार दिया है। अब भी ऐसे अफसर कम नहीं है। न तो पुलिस सेवा में और न ही प्रशासनिक सेवा में।

पर इधर दिल्ली पुलिस से जुड़ी कुछ घटनाएं ऐसी हुयी हैं जिनके कारण पुलिस के राजनीतिक डिक्टेशन पर साफ साफ चलने की बात सामने आ रही है, जिससे पुलिस की साख विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह समस्या केवल दिल्ली की है बल्कि यह पूरे भारतीय पुलिस से जुड़ी है। यह संकट, दिल्ली में जामिया यूनिवर्सिटी, और जेएनयू की कुछ घटनाओं को लेकर चर्चा में है

पहला यूनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस के प्रवेश को लेकर उठे विवाद पर चर्चा करते हैं।
हर कहीं यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या पुलिस को किसी विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने से पहले अनुमति लेने की आवश्यकता है ?1974 75 के छात्र आंदोलन के दिनों में भी हम यही सवाल उठाते थे कि क्या हमारी यूनिवर्सिटी में पुलिस बिना वीसी की अनुमति के घुस सकती है ? हम यह तब भी मान कर चलते थे कि, विश्वविद्यालयों में पुलिस बिना कुलपति की अनुमति के नहीं घुस सकती है।

जामिया यूनिवर्सिटी में पुलिस द्वारा कुलपति की अनुमति के बिना प्रवेश करने और जेएनयू में हिंसक हमले होते रहने बाद भी कुलपति के अनुमति की प्रतीक्षा के तर्क के बाद यह सवाल सोशल मीडिया से लेकर आम जन में छाया हुआ है। जामिया यूनिवर्सिटी में प्रवेश करने को लेकर पुलिस ने यह कहा है कि वे स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ही विश्वविद्यालय परिसर में घुसे थे। जेएनयू में जब स्थिति अनियंत्रित हो गयी तब पुलिस क्यों वीसी के अनुमति के इंतज़ार में थी ? अब इस कानूनी विंदु की पड़ताल करते हैं कि, क्या पुलिस को किसी यूनिवर्सिटी कैम्पस में प्रवेश करने के लिए किसी की अनुमति लेने की आवश्यकता है अथवा नहीं और इससे सबंधित पुलिस के अन्य अधिकार क्या हैं।

एक वाक्य में, इस सवाल का जवाब होगा, कि,’ पुलिस को किसी यूनिवर्सिटी कैम्पस में प्रवेश करने हेतु,किसीअनुमति की आवश्यकता नहीं है।’ देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो पुलिस को आवश्यकता पड़ने पर किसी भी स्थान में प्रवेश करने से उसे रोकता हो, जिसमें विश्वविद्यालय  परिसर भी शामिल हैं। विधिक रूप से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 41 के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी, किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए, किसी भी स्थान में प्रवेश कर सकता है। कानून में यूनिवर्सिटी या कोई भी स्थल निषिद्ध क्षेत्र नहीं है। कानून, उक्त स्थान में रहने वालों से पुलिस की वैधानिक सहायता, पुलिस द्वारा मांगे जाने पर, करने की बात भी कहता है।

साल 2016 के प्रारंभ में विश्वविद्यालय परिसरों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी किये गए एक सुरक्षा सर्कुलर के अनुसार,  रात में विश्वविद्यालय कैंपस में गश्त आदि के लिए पुलिस से अनुरोध भी किया जा सकता है। यूजीसी के इस सर्कुलर में दिये गये दिशा-निर्देश में भी कैंपस में प्रवेश करने को लेकर पुलिस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। पुलिस की वर्तमान एसओपी (स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर ) के अंतर्गत भी, कैंपस में प्रवेश करने से पूर्व अनुमति लेना, केवल स्थानीय पुलिस और विश्वविद्यालय के बीच एक समझ भर है और इसको लेकर पुलिस पर कोई बाध्यता नहीं है।

उल्लेखनीय है कि अगर कोई विश्वविद्यालय प्रशासन पुलिस को कैम्पस में प्रवेश करने से पूर्व अनुमति लेने जैैसा कोई नियम बनाता है तो वह संसद द्वारा पारित सीआरपीसी के प्राविधानों का उल्लंघन ही माना जायेगा। ऐसा नियम निरर्थक साबित होगा क्योंकि दंड प्रक्रिया सहित, 1973 के अंतर्गत पुलिस को किसी भी स्थान में प्रवेश करने का अधिकार है।

इस संबंध में अदालतों तक मे यह मामला जा चुका है। विजयकुमार बनाम केरल राज्य 2004 (2) के मामले में केरल उच्च न्यायालय ने यह माना था कि
“यदि परिस्थितियां ऐसी बनती हैं तो पुलिस, बिना किसी के अनुरोध या अनुमति के कॉलेज परिसर में प्रवेश कर सकती है, ताकि किसी भी प्रकार की आपराधिक गतिविधियों को रोका जा सके या अपराध करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।”
केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की विभिन्न धाराओं के साथ दिखाई पड़ता है।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 41, पुलिस को गिरफ्तारी करने के लिए अधिकृत करती है। सीआरपीसी, मजिस्ट्रेट से प्राप्त वारंट के साथ या उसके बिना भी, पुलिस को गिरफ्तारी की विस्तृत शक्तियां प्रदान करती है। सीआरपीसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के सम्बन्ध में पुलिस को किसी भी स्थान पर प्रवेश करने से प्रतिबंधित करता हो। इसके विपरीत, सीआरपीसी की धारा 48, स्पष्ट रूप से यह कहती है कि
“एक पुलिस अधिकारी ऐसे किसी व्यक्ति को, जिसे गिरफ्तार करने के लिए वह प्राधिकृत है, वारंट के बिना गिरफ्तार करने के प्रयोजन से भारत के किसी स्थान में उस व्यक्ति का पीछा कर सकता है।”
इस प्रकार, यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए अधिकृत है, तो वह ऐसे व्यक्ति का, भारत में किसी भी स्थान तक पीछा कर सकता है, भले ही वह स्थान उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो।

यही नहीं, यदि ऐसे किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाना है और पुलिस अधिकारी के लिए यह विश्वास करने का कारण मौजूद है कि ऐसा व्यक्ति, किसी स्थान (कॉलेज/यूनिवर्सिटी कैंपस सहित) में प्रवेश कर चुका है तो वह पुलिस अधिकारी उस स्थान में प्रवेश कर सकता है [धारा 47 (1)]। यही नहीं, उस स्थान का कण्ट्रोल रखने वाले व्यक्ति को, पुलिस को उस स्थान में प्रवेश करने देना होगा और पुलिस द्वारा तलाशी के लिए उचित सुविधाएँ देनी होंगी। इसके अलावा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 47 (2) भी, पुलिस को उस स्थान के द्वार या खिड़की को तोड़कर प्रवेश करने की इजाजत देती है (जहाँ धारा 47 (1) के अंतर्गत प्रवेश प्राप्त करना संभव नहीं हो सका है)

सीआरपीसी की धारा 47 (1) यह कहती है कि,
“यदि गिरफ्तारी के वारंट के अधीन कार्य करने वाले व्यक्ति को, या गिरफ्तारी करने के लिए प्राधिकृत किसी पुलिस अधिकारी को, यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया जाना है, किसी स्थान में प्रविष्ट हुआ है, या उसके अन्दर है तो ऐसे स्थान में निवास करने वाला, उस स्थान का भारसाधक कोई भी व्यक्ति, पूर्वोक्त रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति द्वारा या ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा मांग किये जाने पर उसमे उसे अबाध प्रवेश करने देगा और उसके अन्दर तलाशी लेने के लिए सब उचित सुविधाएँ देगा।”

इसके अलावा, सीआरपीसी की धारा 165 और 166, पुलिस को, बिना किसी तलाशी वारंट के, किसी संज्ञेय अपराध में अन्वेषण के लिए, किसी भी स्थान पर तलाशी के लिए अनुमति देती हैं। इस तरह की तलाशी के संचालन की प्रक्रिया, सीआरपीसी की धारा 100 में अधिनियमित है, और इस धारा की उपधारा (2) में यह प्रावधान है कि धारा 47 (2) के प्रावधान के अनुसार ही, तलाशी के प्रयोजन के लिए उस स्थान के द्वार या खिड़की को तोड़कर प्रवेश किया जा सकता है।

हालांकि, पुलिस, आम तौर पर विश्वविद्यालय परिसरों में प्रवेश नहीं करती है, क्योंकि छात्रों के खिलाफ कार्रवाई से कई अन्य समस्याएं उत्पन्न हो जाती है इसलिए वह इसे नजरअंदाज करती है। ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी ही यह निर्णय लेने में सक्षम हैं कि आखिर कब वे, कैम्पस में प्रवेश करें। हालाँकि पुलिस द्वारा इस सम्बन्ध में निर्णय बहुत सोच समझ कर ही लिया जाना चाहिए। पुलिस का कर्तव्य, कानून-व्यवस्था को बनाये रखना है, लेकिन पुलिस के लिए इस कर्तव्य के साथ उचित सावधानी बरतनी भी आवश्यक है, और इसलिए कॉलेज/यूनिवर्सिटी परिसर में प्रवेश करने का कोई भी कदम, कभी भी मनमाना नहीं होना चाहिए|

उपरोक्त उदाहरण कानून व्यवस्था से जुड़ा है और अब एक उदाहरण और जो जेएनयू और  विवेचना से संबंधित है पर चर्चा करते है । 4 और 5 जनवरी को जेएनयू में दो घटनाएं होती हैं। 4 तारीख को जेएनयू कैम्पस के सर्वर रूम को कुछ लड़के क्षतिग्रस्त कर देते हैं, और 5 जनवरी को सायंकाल कुछ नकाबपोश गुंडे जेएनयू कैंपस में घुस कर  व्यापक हिंसा फैला देते हैं।

घटना के चार दिन बाद पुलिस विवेचना की प्रगति के लिये प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है। एक तरफ पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एबीवीपी जिस पर शक है कि वह हिंसा में सक्रिय रूप से शामिल है का कोई अफसर नाम भी नहीं लेता वही दूसरी तरफ टीवी चैनल, इंडिया टुडे के स्टिंग के वीडियो में जिसमें बीजेपी के छात्र विंग एबीवीपी से जुड़े एक जेएनयू के छात्र अक्षत अवस्थी कह रहे है कि, वह खुद हिंसा में शामिल थे । वह इस बात का भी खुलासा कर रहे है कि 20 लोग जेएनयू के थे और 20 लोग बाहर से बुलाए गए थे। स्टिंग में है कि उसने झंडे वाला डंडा अपने हाथ में लिया था और उससे उसने कई लोगों को पीटा। उसका कहना है कि उसने एक दाढ़ी वाले शख्स को पीटा। अवस्थी का कहना है कि लेफ्ट के छात्रों को अंदाजा भी नहीं था कि एबीवीपी उनका पलटवार करेंगे, इस स्टिंग में एबीवीपी का रोहित भी जेएनयू में हमले को स्वीकार रहा है जिसमें वह खुद भी शामिल था। हमलावर छात्रों ने यह भी स्वीकार किया कि पुलिस ने उनकी मदद की, पुलिस ने बिजली बन्द की । क्या उन पुलिस वालों के खिलाफ भी करवाई होगी अब ? क्या पुलिस को अब भी सबूतों की जरूरत है ?

अब पुलिस द्वारा कहा जा रहा है कि सीसीटीवी फूटेज नहीं मिले, जबकि तमाम वीडियो फूटेज घटना के दिन से ही लाइव हो कर सोशल मीडिया में तैर रहे हैं। इस न्यूज़ चैनलों को देखने के बाद पुलिस की थियरी पर केवल तरस ही खायी जा सकती  है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में कुछ नही  कहा गया कि देर से पुलिस पहुंचने की जिम्मेदारी किस अफसर पर है ? चीफ प्रॉक्टर का कहना है कि वे लगातार पुलिस के संपर्क में थे। और पुलिस का कहना है कि वह वीसी की अनुमति की प्रतीक्षा में थी। जो व्हाट्सएप्प संदेशों के स्क्रीन शॉट सब टीवी और मीडिया वालों के पास हैं, उनकी क्या सच्चाई है ? यह सारे सवाल दबेंगे नहीं और उभरेंगे। अगर दबाव में ही कुछ करना था तो कम से कम, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के किरकिरी तो न कराते।

जेएनयू में किसने हिंसा की है, आज के संचार क्रांति युग मे जब एक ही घटना के पचासों वीडियो पल पल की खबर अनेक एंगल से दे रहे हों तो, लोग वास्तविकता जानने के लिये पुलिस की कहानी पर कम विश्वास करते हैं। जैसे पुलिस को हर बात पर सन्देह से देखने का प्रशिक्षण प्राप्त है वैसे ही जनता को तो पुलिस पर सतत और सनातन अविश्वास है।   जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, या हो चुका है या होगा, उस पर भारत की ही नहीं बल्कि दुनियाभर की नज़र है और आज, सबके हांथो में पड़े स्मार्टफोन ने हर आदमी को जांचकर्ता बना दिया है। आजतक, एनडीटीवी, इंडिया टुडे की तो बात ही छोड़ दीजिए।

 हम ऐसे खुले युग मे हैं कि अगर कोई पता लगाना चाहे कि यह लेख कहां लिखा जा रहा है, तो वह पता लगा सकता है। जागरूक नागरिकता के युग मे जब लोग बेधक और तफतीशी निगाहों से पुलिस की हर हरकत को अपनी आँखो और अपने मोबाइल में कैद कर रहे हों तो पुलिस को राजनीतिक दबावों से मुक्त होकर अपने दायित्व का निर्वाह करना होगा, अन्यथा उसकी साख पर सवाल उठते रहेंगे और इस साख को बेहतर बनाये रखने का दायित्व विभाग का है।

(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं।यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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