Home संपादकीय विचार मंच On celebrations, encounters or failure of law? जश्न, मुठभेड़ों या कानून की विफलता पर ?

On celebrations, encounters or failure of law? जश्न, मुठभेड़ों या कानून की विफलता पर ?

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हैदराबाद में एक पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना होती है । देश भर में आक्रोश उपजता है। पुलिस सक्रिय होती है। वे चार लड़के पकड़े गए, जिनपर उक्त महिला पशु चिकित्सक का बलात्कार करने का आरोप था। उन्हें जेल भेज दिया जाता है। फिर एक दिन सुबह ही सुबह यह खबर मिलती है कि वे घटनास्थल पर जब विवेचना के संबंध में क्राइम सीन के रिक्रिएशन के लिये ले जाये गये थे तो उन्होंने वहीं से भागने की कोशिश की और मुठभेड़ में मारे गए। यह न तो तुरंता न्याय है, न प्रतिशोध, न कानून के अनुसार किसी अपराध की विवेचना, न अदालत में कोई सुनवाई, और न ही गवाही साखी। लेकन जनता खुश है। वह पुष्प वर्षा कर रही है। अधिकतर संजीदा लोग भी पुलिस के पक्ष में खड़े हैं। पुलिस ने यह कार्य विधि विरुद्ध भी किया हो तो भी उनकी सराहना पुलिस को मिल रही है। क्या यह सारी सराहनाएं तब भी मिलेंगी जब पुलिस कोई अन्य गैरकानूनी कार्य करेगी ?
विवादों से घिरी हैदराबाद मुठभेड़, न तो पहली मुठभेड़ है और न तो अंतिम जिसके बारे में, यह कहा जाने लगा है कि हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था अपंग हो गयी है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में केवल पुलिस ही नहीं आती, बल्कि पुलिस, न्यायपालिका और अभियोजन इन तीनों को मिलाकर ही यह तंत्र बनता है। जिसमे पुलिस का कार्य अपराध की विवेचना करना, अभियुक्त को पकड़ना, सुबूत एकत्र करना, अभियोजन का कार्य, अदालत में उन सुबूतों के आधार पर मुकदमा प्रस्तुत करना और न्यायपालिका का कार्य उन सुबूतों का परीक्षण कर के दोषी पाए जाने पर अभियुक्त को जो सज़ा कानून में निर्दिष्ट है उसे देना। इस तंत्र के तीनों अंग क्या क्या कार्य और किस किस तरह से करेंगे, यह भी कानून की किताबों में लिखा है।
भारत मे त्रिस्तरीय अदालतों का विचान है। पहले सत्र या जिला न्यायालय, फिर अपीलली न्यायालय के रूप में हाईकोर्ट और अंतिम अपीली न्यायालय के रूप में सुप्रीम कोर्ट। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कोई गवाही आदि नहीं होती है बल्कि कानूनी विन्दुओं पर बहस होती है। अपराधों के विवेचना, सुबूत जुटाने और ट्रायल में समय लगता है। अगर सबकुछ नियमित सुनवाई हो तो भी समय लगता है। क्योंकि कानून इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर व्यक्ति तब तक दोषों नहीं है जब तक कि उसका दोष विधिनुरूप सिद्ध न हो जाय। अदालत जनता की लोकप्रिय धारणा, उसकी इच्छा और उसके इरादे के अनुसार नहीं चलती है, वह जो सुबूत और गवाह उसके सामने प्रस्तुत किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार अपने निष्कर्ष पर पहुंचती है।
जिस प्रकार की मुठभेड़ हैदराबाद में हुयी है भले ही वह जनता के व्यापक इच्छा के अनुरूप लगती हो पर कानून की नज़र में वह न्याय करने या सच कहा जाय तो प्रतिशोध लेने का ही एक उपाय है। तुरंता न्याय जैसी कोई चीज न्यायशास्त्र में नहीं होतो है वह प्रतिशोध तो हो सकता है पर न्याय नहीं। सुप्रीम कोर्ट को पुलिस मुठभेड़ों के बारे में बराबर शिकायतें मिलती रहती है। लगभग हर मुठभेड़ के विवादित होने के बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकायें दायर होती रहती है। और उन सबमे जांच होती है और दोषी वाये जाने पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या के अपराध की सजाएं मिलती हैं।
ऐसे ही एक मुठभेड़ का किस्सा पढ़ लीजिए जो यूपी के पीलीभीत जिले से संबंधित है। वर्ष 1991 में पीलीभीत में सिख आतंकवाद अपने चरम पर था । आतंकियों लारा हत्या, लूट, फिरौती हेतु अपहरण की घटनाएं लगातार होती रहती थीं। इसी प्रकार पीलीभीत में एक पुलिस मुठभेड़ की घटना हुयी जिसमे 10  आतंकी मारे गये। इस मुठभेड़ का जनता, सरकार और ,मीडिया ने जम कर स्वागत किया और खूब वाहवाही की।  बाद में इस मुठभेड़ की न्यायिक जांच के लिये लोगो ने मांग की। दसरकार ने उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश से न्यायिक जांच करायी जिन्होनें इसे सही माना। लेकिन बाद में इस मुठभेड़ की जांच के लिये एक जनहित याचिका में सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुयी, जिसमे, सीबीआई जांच की मांग की गयी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच हुयी।  जांच में सभी 57 पुलिस कमिर्यों, जो उस मुठभेड़ में शामिल थे, को, मारे गये आतंकियों का अपहरण कर हत्या करने का दोषी पाया गया । न्यायालय ने सभी को अप्रैल 2016 में आजीवन कारावास की सजा दी जो लखनऊ जेल में आज भी अपनी अपनी सजा भुगत रहे हैं। लेकिन आज कोई भी व्यक्ति, संस्था सरकार और विभाग उनके बारे में सोच भी नहीं रहे हैं। यह सभी कनिष्ठ श्रेणी के पुलिसजन हैं ।
पुलिस मुठभेड़ है क्या ? पुलिस मुठभेड़ आत्मरक्षा के सिद्धांत पर आधारित होती हैं। और हर व्यक्ति जो अपनी जीवन रक्षा के लिये आवश्यक बल प्रयोग का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अपनी जीवन रक्षा के लिये हमलावर की जान ले ली जाय। जैसे ही जीवन भय समाप्त हो जाता है आत्मरक्षा के अधिकार का सिद्धांत भी समाप्त हो जाता है। जब अपराधी या अपराधियों का गिरोह, पुलिस बल को बलपूर्वक रोकता है और उस पर हमला करता है तो, पुलिस भी आत्मरक्षार्थ उस हमलक का जवाब देती है और उस समय जो स्थिति होती है वह मुठभेड़ कहलाती है। लेकन दुर्भाग्य से मुठभेड़ों या इनकाउंटर के बारे में जनधारणा इतनी रूढ़ हो चुकी है कि बेहद बहादुरी से की गयी पुलिस मुठभेड़ पर भी प्रथम दृष्टया यही संदेह उपजता है कि पुलिस ने अमुक को  फर्जी मुठभेड़ में मार दिया है या पकड़ कर मार दिया है। यह क्षवि एक हत्यारी पुलिस की तो बनती है पर उस पुलिस की नहीं जो कानून को कानूनी तरीके से लागू करने के लिये, कानून लारा गठित और कानून लारा ही शक्तिसम्पन्न की गयी है।
कहा जा रहा है न्याय का यह एक शॉर्टकट है।  लेकिन न्याय का कोई शॉर्टकट नहीं होता है। न्याय का रास्ता तो न्यायपूर्ण तरीके से ही पाया जा सकता है। आज हैदराबाद मुठभेड़ न्याय के एक नए मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। यह शॉर्टकट थोड़े समय के लिये जनता को राहत और जनपेक्षाओं को ज़रूर तुष्ट कर दे, लेकिन वह आपराधिक न्याय प्रणाली पर बेहद गम्भीर सवाल भी खड़े करता है। ऐसी ही एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले ओम प्रकाश बनाम झारखंड राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था था। ” अदालत ने सदैव ट्रिगर हैप्पी, (बन्दूक चलाने के शौकीन) पुलिसकमिर्यों को यह चेतावनी दी है, जो मुठभेड़ों के नाम पर अपराधियों को जान से मार कर खत्म कर देते हैं। ऐसी हत्याओं को रोका जाना चाहिये। यह कृत्य हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के अनुसार विधिसम्मत नहीं है। यह एक प्रकार से राज्य प्रायोजित आतंकवाद है।’ हालांकि अदालतों लारा इस प्रकार की अन्यायिक हत्याओं के बारे में निरंतर ही राज्य को चेताया जाता रहा है फिर भी यह क्रम रुक नहीं रहा।
-विजय शंकर सिंह
(लेखक सेवा निवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं।)
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