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Khelo Haryana: खेलो हरियाणा

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ज्ञानी दिखने के चक्कर में हम अक्सर दिमाग़ में कूड़ा-करकट भरते रहते हैं। किताबें पढ़ना अच्छी बात है। लुट-पीटकर अक़्ल आए इससे लाख अच्छा है कि दूसरों की फ़ज़ीहत से नसीहत ली जाय।

किताब जानी हुई चीज़ की दास्तान है। आदम जात अपने से सैकड़ों गुना ताक़तवर जानवरों पर इसी कारण भारी पड़ा। ज्ञान का संग्रह भाषा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा। उसको आधार बना लोग प्रकृति के नए रहस्य खोलते रहे। जीवन आसान बनाते रहे। ये क्रम सतत जारी है। ये अलग बात है कि डराने वाले बोलने से नहीं चूकते कि प्रकृति से इतना छेड़छाड़ ठीक नहीं है। इसका प्रतिशोध भयानक हो सकता है। स्टीफ़न हॉकिंग और एलान मस्क जैसे लोगों का कहना है कि मानव प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है। अगर इसने किसी अन्य ग्रह पर जल्दी से ठिकाना नहीं बनाया तो इसकी इतिश्री तय है।

लेकिन पढ़ने के नाम पर कुछ भी पढ़ने लगना ख़तरे का खेल है। खासकर कामयाब बनाने का दावा करने वाली सेल्फ़-हेल्प किताबों से तो दूर ही रहना चाहिए। लेखक अपने अनुभवों के आधार पर किसी एक दृष्टिकोण का महिमा-मंडन करता है। कमअक़्ल इसे सफलता की कुंजी मान चल पड़ते हैं। भूल जाते हैं कि लिखने वाले ने अपनी पूरी बातें ईमानदारी से नहीं कही है। काट-छाँट कर वही लिखा है जो किताब के मूल तर्क को सही ठहराता है। फिर किताब छापने वाले कौन से सत्यवादी राजा हरीशचंद्र हैं? संपादकों की भीड़ पीछे लगा देते हैं। वे बाज़ार की माँग, लिखाई की विधा और किताब के वर्ग के हिसाब से उसकी बेदर्दी से कटाई-छँटाई करते हैं। पाठकों के हाथ में आते-आते गेहूं आटे से मैदा हो जाता है। अगर इसे आँख मूँद खाते रहे तो बीमारी होनी ही होनी है।

प्रेरणा लेना ठीक है। जो बात आपकी गाँठ खोलती है, उसे मानने में अहं आड़े नहीं आना चाहिए। लेकिन छपे को सत्य जान उसपर आँख मुँदकर चल पड़ना अपने को पानी की आस में अंधे सूखे कुएँ में डालने जैसा है। दिमाग़ पैटर्न की पहचान करने के लिए है। जिससे कि आप हालात समझ सकें, भविष्य का सही-सही अनुमान लगा सकें और कारगर बने रहें। इससे यही काम लेना चाहिए।

2008-12 के बीच क़रीब पौने पाँच साल मैं हरियाणा का स्पोर्ट्स डाईरेक्टर रहा। इसे दुरुस्त करने में सालों लगे। वही खेल के मैदान थे, लेकिन खेलने वालों से खचाखच भरे थे। वही कोच थे, लेकिन वे स्कूल-स्कूल, गाँव-गाँव बच्चों को खेलों को लगाने में जुटे थे। वही विभाग था लेकिन अब लोगों की ज़ुबान पर था, सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता था। ऐसा नहीं कि मेरे हाथ कोई जादू की छड़ी थी और उसे मैंने सबपर फेर दिया था। बस तय कर लिया कि बच्चों को खेल के मैदान तक लाना है, सो वो आ गए। कोई सरकार से अतिरिक्त बजट नहीं लिया। बस पिट रही खेल नर्सरियों को स्पोर्ट्स और फ़िज़िकल फ़िट्नेस स्कालर्शिप कार्यक्रम में तब्दील कर दिया। बड़े खिलाड़ियों की सफलता के एवज में उन्हें मोटा इनाम और सरकारी नौकरी दे, उन्हें प्रेरणा-श्रोत बनाया। कोचों को डंडे से हांकने के बजाए उन्हें प्रेरित किया। जब उनको काम की वजह से सामाजिक प्रतिष्ठा मिलने लगी तो वे खुद ही चल पड़े।

पुलिस विभाग से उधार लाया गया था। एक ना एक दिन तो वापस जाना ही था। मेरे बाद आने वाले पुराने ढर्रे पर लौट गए। स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के नाम पर स्टेडियम बनाने में जुट गए। ऐसा नहीं कि वहाँ खिलाड़ी थे और इनकी ज़रूरत थी। बस ठेकेदार को ठेका चाहिए था सो इसे बस कहीं भी ठोक दिया। वहाँ अब कुत्ते भौंक रहे हैं। ना कोई कोच है, ना कोई खेलने वाला। और कुछ नहीं सूझा तो खिलाड़ियों के इनाम की राशि बढ़ाने की होड़ लगा दी। कहीं-कहीं से गोल्ड-सिल्वर और पता नहीं और क्या-क्या जीत आए ने सरकार की कनपटी पर पिस्तौल तान दिया। और बड़े इनाम, और बड़े नौकरियों की माँग करने लग़े। हाल में केंद्र सरकार ने चिट्ठी लिखी है कि जीत आए खिलाड़ियों को पैसे में डुबाने और बड़े सरकारी मचान पर चढ़ाने के बजाय उन्हें उनके खेल की स्पोर्ट्स अकादमी बना कर दे दी जाय। उनका काम चल जाएगा और खिलाड़ियों को एक ‘सेंटर ओफ़ एक्सेलेंस’ मिल जाएगा। देखना ये है कि क्या ऐसा अलोकप्रिय फ़ैसला हो सकता है? ख़ासकर ओलम्पिक खेलों के साल में जब कई माने बैठे हैं कि उनकी लॉटरी बस निकलने ही वाली है।

कहते हैं कि एक बार जहां से आप अच्छा कहलाकर निकल लें वहाँ दोबारा सिर नहीं मारना चाहिए। लेकिन सरकारी नौकरी में आप के पास ये विकल्प नहीं होता है। अब जब इधर आ ही गए हैं तो सोच रहा हूँ कि कैसे लोगों को खेलों में लगाया जाय? एक तरीक़ा ये है कि उनको रनिंग जैसे एंट्री-लेवल गेम में लगाया जाय। हर गाँव, शहर, स्कूल, कालेज, दफ़्तर में रनिंग क्लब हो। राहगिरी और मैराथन के ज़रिए इन्हें सालो-भर रनिंग कॉम्पटिशन मिले। जब तक तैयार खेल के मैदान पूरी तरह इस्तेमाल में ना आ जाए, नए पर पैसा बर्बाद नहीं किया जाय। फ़िट्नेस का स्तर बढ़ाने और बच्चों को नशे और हिंसा से दूर रखने के लिए उनकी माँओं का “मदर्स फ़ोर स्पोर्ट्स, म्यूज़िक एंड आर्ट्स” का एक राज्यव्यापी गठजोड़ बनाया जाय। आख़िर वे ही तो हैं जिन्हें बच्चों के अच्छे-बुरे की सर्वाधिक चिंता रहती है।

सबसे ऊपर कि जनसंवाद को “ड्रग्स और क्राइम” से बदलकर “स्पोर्ट्स और फ़िट्नेस” किया जाए। राज्य को निगेटिव एजेंडे से पीछा छुड़ाना चाहिए। पिछले अनुभवों के आधार पर मैं ये विश्वास से कह सकता हुँ कि ऐसा कर पाना सम्भव है।

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