Home संपादकीय विचार मंच Jharkhand defeat is linked to Haryana-Maharashtra: हरियाणा-महाराष्ट्र से जुड़ी है झारखंड की हार

Jharkhand defeat is linked to Haryana-Maharashtra: हरियाणा-महाराष्ट्र से जुड़ी है झारखंड की हार

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देश भर में असुरक्षित नारी शक्ति व नागरिकता संशोधन कानून को लेकर मचे हंगामे के बीच झारखंड चुनाव के नतीजे आए हैं। यहां भारतीय जनता पार्टी की हार सिर्फ रघुबर दास की हार नहीं है, बल्कि यह हार हरियाणा व महाराष्ट्र में भाजपा के चुनावी प्रदर्शन से जुड़ी हुई है। जिस तरह हरियाणा में भाजपा हारते-हारते बची, महाराष्ट्र में जीत कर भी हार गयी उससे सबक नहीं सीखा गया, जिसके परिणामस्वरूप झारखंड में स्पष्ट पराजय सामने आयी है। दरअसल राष्ट्रीय मुद्दों के साथ क्षेत्रीय क्षत्रपों पर अतिविश्वास इन तीनों राज्यों में भाजपा को महंगा पड़ा है। इन राज्यों में भाजपा ने अपनों को दूर किया और परिणाम नकारात्मक रहे।
झारखंड व छत्तीसगढ़ राज्यों का सृजन बिहार व मध्यप्रदेश से अलग कर भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने किया था। इन राज्यों के गठन के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए यह अवसर भी था। इस बार के विधानसभा चुनावों में झारखंड में हेमंत सोरेन के हाथ यह अवसर बहुमत के साथ लगा है। झारखंड विधानसभा चुनावों में हेमंत सोरेन की जीत से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी की हार की चर्चा हो रही है। दरअसल भाजपा की यह हार हर स्तर पर समीक्षा का कारक बन रही है। जिस तरह पिछले दो वर्षों में देश में भाजपानीत राज्यों की संख्या घट रही है, उससे स्पष्ट है कि भाजपा के राज्य स्तरीय क्षत्रपों पर जनता भरोसा नहीं कर पा रही है। साथ ही उनके क्रियाकलाप भी भाजपा की सत्ता के कारकों व उनके मूल तौर-तरीकों से मेल नहीं खाते हैं।
वर्ष 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद जिस तरह तेजी से पूरे देश में भाजपा का विस्तार हुआ था, उससे लगने लगा था कि देश महज भगवा बयार के साथ बह रहा है। 2017 में उत्तर प्रदेश जीतने के साथ भाजपा के पक्ष में बना माहौल उस समय और मजबूत हुआ, जब 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने मजबूती के साथ देश की सत्ता संभाली। इसके बाद की स्थितियां भाजपा के लिए चिंताजनक बनी हुई है। झारखंड विभानसभा चुनाव के नतीजे तो भाजपा के खिलाफ गए ही हैं, उससे पहले मध्य प्रदेश, झत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा व महाराष्ट्र में भी भाजपा को झटका लग चुका है। हरियाणा व महाराष्ट्र के चुनाव अभियान ही नहीं, परिणाम आने तक भाजपा नेतृत्व सब कुछ अपने पक्ष में मान रहा था, किन्तु वास्तविक धरातल में ऐसा संभव नहीं दिखा। हरियाणा में जनता ने भाजपा को सबक सिखाते हुए बहुमत से दूर रखा, किन्तु भाजपा ने भी सत्ता में आने के लिए भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद चौटाला के परिवार से हाथ मिलाने में देरी नहीं की। यह गठजोड़ भले ही देश के नक्शे में भाजपा का एक राज्य बढ़ा रहा हो, किन्तु शुचितापूर्ण राजनीति की छवि सहेजे भाजपा की साख पर बट्टा तो लगा ही रहा है। महाराष्ट्र में तो भाजपा सत्ता में आकर भी बाहर हो गयी। चुनाव पूर्व गठबंधन में साथ-साथ रहे भाजपा व शिवसेना चुनाव बाद मुख्यमंत्री बनने की होड़ में अलग-अलग हो गए। यहां भी भाजपा की जिद उस पर भारी पड़ी। अब झारखंड में तो भाजपा सीधे तौर पर सत्ता की लड़ाई से बाहर हो गयी है। हालात ये हैं कि मौजूदा मुख्यमंत्री चुनाव हार गए और पार्टी करो विपक्ष का नेता भी नया चुनना होगा।
इन तीनों राज्यों के राजनीतिक हालात और भाजपा के पिछड़ने के कारणों के पीछे राज्य स्तरीय क्षत्रपों के साथ जनता का अविश्वास बड़ा कारण है। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को पूरी आजादी देने के बावजूद भाजपा वहां सरकार नहीं बचा सकी। एक बार फिर वहां खट्टर की सरकार है किन्तु दुष्यंत का साथ लेकर बनी सरकार वहां विपक्ष को ताने मारने का खूब मौका दे रही है। महाराष्ट्र में तो अपने ही साथ में नहीं रहे। शिवसेना ने अपने लिए मुख्यमंत्री का पद मानकर भाजपा से बड़प्पन दिखाने की मांग की, किन्तु ऐसा नहीं हो सका। हिन्दुत्व की एकता के पैरोकारों से बात करने पर वे खुलकर कहते हैं कि भाजपा को वहां व्यापक वैचारिक हित में शिवसेना को ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद दे देना चाहिए था। यहां भी भाजपा का फड़नवीस मोह सत्ता से दूर रहने का कारण बना। झारखंड में तो घर-घर मोदी की तर्ज पर घर-घर रघुबर का नारा भी लगा किन्तु यह नारा बेअसर हो गया। यहां भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के मुखर योद्धा माने जाने वाले सरयू राय अपनी ही पार्टी के खिलाफ खड़े हो गए। रघुबर खुद हारे और अपनों को साथ न ले पाने के कारण भाजपा को भी हरा बैठे। अकाली दल से लेकर शिवसेना, जनता दल (यूनाइटेड), आजसू व लोकजनशक्ति पार्टी जैसे पुराने साथियों के साथ बड़ा दिल न दिखा पाना भी भाजपा को महंगा पड़ रहा है। झारखंड में भाजपा ने अपने बिहार के सहयोगी दलों को भी सीटें नहीं दीं और वे सब विरोध में थे। अपनों को नाराज कर रही भाजपा ने दूसरे दलों से आने वालों के लिए दरवाजे खोल दिये। इससे वर्षों तक दरी बिछाने वाला कार्यकर्ता निराश व हताश ही नहीं, नाराज भी हुआ। अब भाजपा को इन सब कारणों पर भी विस्तार से सोचना होगा।

डॉ.संजीव मिश्र

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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