Home संपादकीय विचार मंच Is China’s economic boycott so easy? क्या चीन का आर्थिक बहिष्कार इतना आसान है?

Is China’s economic boycott so easy? क्या चीन का आर्थिक बहिष्कार इतना आसान है?

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भारत-चीन सीमा विवाद के शुरू से ही देश के अंदर चीनी समान के बहिष्कार का नारा बुलंदियां पकड़ रहा है। यह नारा भारत की फिजाओं में पहले भी गूंजा है। ज्यादातर स्थितियों में ह्ललड़ियों-झाड़ियोंह्व का विरोध कर और हाथों में ह्लबायकॉटह्व की दफ्ती ले, सोशल मीडिया पर तस्वीर डालने के बाद यह आन्दोलन खत्म हो जाता है। हालांकि, अगर हम भारतीय बाजार में चीन की दखल पर नजर डालें, तो आंकड़े चौकाने वाले सामने आएंगे।
रेफिनिटिव रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक साल में भारतीय स्टार्टअप कंपनियों में चीन ने 1.4 अरब डॉलर का निवेश किया है। फरवरी तक इनमें 54 बार चीनी निवेश हो चुका था। कॉर्पोरेट मंत्रालय, स्टॉक एक्सचेंज (भारत व हांगकांग) में दिए गए ब्योरे, कॉर्पोरेट घोषणाओं और विदेशी निवेश के आंकड़ों पर आधारित, गेटवेहाउस की रिपोर्ट बताती है कि भारत अब चीन के वर्चुअल बेल्ट ऐंड रोड प्रोजेक्ट का हिस्सा बन चुका है। चीन के तकनीकी निवेशकों ने मार्च 2020 तक पांच वर्षों में भारतीय स्टार्टअप कंपनियों में करीब 4 अरब डॉलर का निवेश किया। भारत के 30 यूनीकॉर्न स्टार्टअप में 18 में चीन का निवेश है। चीन की दो दर्जन कंपनियां भारत के 92 बड़े स्टार्टअप में पूंजी डाल चुकी हैं। दरअसल स्टार्टअप शुरुआत में नुक्सान उठाते हैं और भारत में ऐसे निवेश की पूंजी नहीं है। तभी चीनी कंपनियां जैसे अलीबाबा, टेनसेंट, बाइटडांस इनमें अपने कदम मजबूती से जमा चुकी हैं।

चीन की कंपनियों का अगला लक्ष्य इलेक्ट्रिक वाहन हैं। गेटवेहाउस के मुताबिक वोल्वो और एमजी हेक्टर के जरिए चीन भारत के ऑटोमोबाइल बाजार में दखल बढ़ाएगा। चीन विरोधी भावनाएं भारतीय बाजार के लिए कोई नई बात नही हैं। लेकिन इसके बावजूद चीनी स्मार्टफोन निर्माताओं का दबदबा कायम है। शियोमी लंबे समय से स्मार्टफोन मार्केट लीडर है, जबकि वीवो, ओप्पो और रियलमी 70 प्रतिशत से अधिक की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी रखते हैं। भारत में कच्चे माल (एपीआई, बुनियादी रसायन, कृषि) और महत्वपूर्ण घटकों (ऑटो, कैपिटल गुड्स) का एक बड़ा हिस्सा चीन पर आश्रित है। इसी तरह, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का 45 प्रतिशत, एपीआई का 70 प्रतिशत और आयातित चमड़े का 40 प्रतिशत हिस्सा चीन से आता है।
आईडीसी (इंटरनेशनल डेटा कॉरपोरेशन) के अनुसार, 2019 के जनवरी-मार्च तिमाही में भारत में आने वाले सभी स्मार्टफोनों का 70 प्रतिशत चीनी कंपनियों से आया था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में चीन के साथ भारत के व्यापार का कुल आकार 87 अरब डॉलर था, और इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स का कुल आयात 20.6 बिलियन डॉलर था। सरकारी घोषणाओं व दस्तावेजों पर आधारित ब्रुकिंग्स का अध्ययन बताता है कि 2017 तक भारत में 800 चीनी कंपनियां सक्रिय थीं जिनमें एक-तिहाई 2014 में पंजीकृत हुईं। अधिकांश नई कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर में आईं और चीन के सरकारी आंकड़े के अनुसार, यह निवेश करीब 8 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
चंगाशा की सैन्यी के 2010 में पुणे में फैक्ट्री लगाने से लेकर चाइना रोलिंग स्टॉक कॉर्पोरेशन का हरियाणा में नया प्लांट और शिनशिंग समूह के कर्नाटक में 8,735 करोड़ का स्टील प्लांट लगाना सब उस निवेश का हिस्सा है जो हम नकारना चाहते हैं। भारत के चार में तीन बिजली प्लांट चीन के उपकरणों से चलते हैं। इसके अलावा वांडा और चाइना फॉर्च्यून लैंड जैसे रियल एस्टेट दिग्गज हरियाणा से लेकर कर्नाटक और महाराष्ट्र तक पैर जमा चुके हैं। समझने वाली पहली बात यह है कि सीमा विवाद को ऐसे कमजोर आर्थिक समय पर ह्लट्रेड वॉरह्व में बदलना उचित नहीं है।
यह जानना हमारे लिए जरूरी है कि भारत के निर्यात और आयात का क्रमशः 5% और 14% हिस्सा चीन पर आश्रित है जबकि भारत का चीन से आयात और निर्यात मात्र 3% और 1% है। ऐसे में यदि भारत और चीन व्यापार करना बंद कर देते हैं, तो उस स्थिति में चीन अपने निर्यात और अपने आयात का केवल 3% और 1% से कम हिस्सा खोएगा, जबकि भारत अपने निर्यात का 5% और अपने आयात का तकरीबन 14% हिस्सा खो देगा। भारत चीन के उन शीर्ष दस मुल्कों की सूची में भी नहीं है जिनसे चीन सबसे ज्यादा व्यापार करता है। लेकिन भारत के लिए चीन उसका दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से तो यह भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है।
ऐसे हालातों में हम किसका नुक्सान कर रहे हैं? निश्चित ही स्वयं का। ऐसे अप्रत्याशित समय पर ट्रेड वॉर से हमारे छोटे व्यापारी अपनी जमीन खो देंगे, भारत का बाजार प्रतिस्पर्था खो देगा, अर्थव्यवस्था अपनी तेजी खो देगी, लोग बेरोजगार होंगे, हमारे हाथों में रह जाएंगी ह्लबायकॉट चाइनाह्व की दफ्तियां और सोशल मीडिया पर पड़ी उन दफ्तियों के साथ हमारी तस्वीरें। और यह भी कुछ समय बाद ठंडा पड़ जाएगा। बायकॉट चाइना से अच्छा हम भारतीय सेना को हालातों से निपटने दें, जिनकी निगरानी में हमारी सीमाएं सदैव सुरक्षित हैं।

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