Home संपादकीय विचार मंच If there is Science it’s is possible: साइंस है तो मुमकिन है

If there is Science it’s is possible: साइंस है तो मुमकिन है

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कोविड19 का ख़तरा जीना खुली आँखों से कोई जादुई सपना देखने जैसा है। लोगों के लिए सब-कुछ ठहर-सा गया है। ना कहीं जाना-आना। ना किसी से मिलना-जुलना। घर बैठो। हाथ धोते-धुलाते रहो। ठाले समय कैसे बिताएँ इसके नुस्ख़े सीखो-सिखाओ। सारे उम्मीद लगाए बैठे हैं कि ये एक तिलिस्म है जो जल्दी ही टूट जाएगा। एक आँधी-तूफ़ान है, जो गुजर जाएगा। लॉकडाउन, इलाज, गर्म मौसम, नम वातावरण, युवा आबादी, मलेरिया की इम्यूनिटी हमें बचा ले जाएगी। हम चीन-ईरान-युरोप-अमेरिका की तरह रगड़े नहीं जाएँगे। जल्दी ही सबकुछ ठीक हो जाएगा।

वैसे, इस बारे में तीन बातें गाँठ बांध लेनी चाहिए। एक, ये कोई पहला मौक़ा नहीं है कि बैक्टीरीया-वाइरस ने हल्ला बोल रखा है। दो, ये लड़ाई लम्बी चलेगी। डाक्टर जब तक कोई वैक्सीन नहीं ढूँढ लेते, कोविड19 हमारे रोग-प्रतिरोधी क्षमता की परीक्षा लेता रहेगा। तीसरा, सब-कुछ पहले जैसा नहीं हो जाएगा। हमारा रहन-सहन, मेल-जोल, सरकार-व्यापार एक बार अपनी जगह से हिल गया है। संतुलन की स्थिति कोई और ही होगी, जिसके बारे में अभी ठीक से अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।

क़रीब दस हज़ार साल पहले खेती-बाड़ी शुरू करने के साथ   लोगों ने एक जगह टिक कर रहने की रवायत डाली थी। मानव सभ्यता की नींव पड़ी। कालांतर में शहर बसे। जल-थल, वायु मार्ग से सम्पर्क बना। आदमी को पेट भरने के अलावा आराम फ़रमाने और घर सजाने का शौक़ था। सो व्यापार शुरू हुआ। हम-बड़े-कि-तुम की सनक भी थी सो जत्था बना-बना लड़ने-भिड़ने भी लगे। इस काम में जानवरों को भी साथ लगा लिया। चीजों की तलाश में पाताल भी खोदने लगे। घुमंतू चरवाहे से बदल कर धरती-पकड़ भीड़ों वाली जीवनशैली अलग क़िस्म की चुनौतियाँ भी लेकर आई। जानवरों की सोहबत से समय-समय पर अलग-अलग क़िस्म के बैक्टीरीया-वाइरस आदमी से उलझने लगे। व्यापारी सिर्फ़ ख़रीद-फ़रोख़्त और फ़ौजें सिर्फ़ मार-काट ही नहीं करते थे। संक्रमण वाले बैक्टीरीया-वाइरस भी साथ लाते थे। वांछित रोग-प्रतिरोधी क्षमता के अभाव में मूल आबादी साफ़ हो ज़ाया करती थी। चूँकि इतिहास राजाओं और लड़ाइयों में उनके वीरता-बर्बरता की कहानी है, इस बात का ज़्यादा ज़िक्र नहीं होता है कि महामारी ने उनसे कई गुना ज़्यादा लोगों को मारा है, उनसे कहीं अधिक निर्णायक ढंग से इतिहास की धारा बदली है।

अगर दुनिया-भर में अब तक के बड़े महामारियों की बात करें तो सबसे पहले सन 541 की ‘प्लेग ओफ़ जस्टिनीयन’ का ज़िक्र आएगा। मिस्त्र द्वारा विजेता बिज़िंटीन साम्राज्य को चौथ में दिए गए अनाज के ज़रिए प्लेग इसकी राजधानी कोंस्टिनोपल पहुँचा। वहाँ से जल्दी ही ये यूरोप, एशिया, उत्तर अफ़्रीका और अरब में फैल गया। अनुमान है कि तीन से पाँच करोड़ लोग मरे। ये तब की दुनिया की आधी आबादी थी।

1347 में प्लेग यूरोप दोबारा लौटा। इस बार के इसके मौत के तांडव को ‘ब्लैक डेथ’ के नाम से जाना जाता है। इससे मात्र चार साल में 20 करोड़ लोग मरे। ये पता तो नहीं था कि ये  होता क्यों है, लेकिन संदिग्ध बीमारों को अलग रखने की प्रथा ज़रूर शुरू हो गई थी। संक्रमण से बचने के लिए वेनिस में बाहर से आ रहे नाविकों को चालीस दिन तक जहाज़ में ही रखा जाता था जिसे ‘क्वॉरंटीन’ कहते थे। लंदन तो कभी ‘ब्लैक डेथ’ की मार से उबरा ही नहीं। 1348-1665 के बीच इसे चालीस बार प्लेग की महामारी का सामना करना पड़ा। हर बार इसमें इसकी बीस प्रतिशत आबादी साफ़ हो जाती थी। संदेह था कि ये कुत्ते-बिल्ली से फैलता है। बेचारे लाखों-लाख कटे। 1665 के ग्रेट प्लेग में तो मात्र सात महीनों में एक लाख से ऊपर लोग मरे। इसी समय, स्मॉलपॉक्स ने भी यूरोप, एशिया और अरब में भारी तबाही मचा रखी थी। जब पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप के खोजी-यात्री अमेरिका पहुँचे तो इस बीमारी को भी साथ ले गए। उधर के मूल निवासी में इसकी कोई प्रतिरोधी क्षमता तो थी नहीं। सो, नब्बे-पंचानवे प्रतिशत मारे गए। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में कोलरा की महामारी ने इंग्लैंड, इसके उपनिवेशों और अन्य जगहों में करोड़ो लोग मारे।

भारत की बात करें तो प्लेग की वजह से 1896-1939 के बीच 1.2 करोड़ लोग मरे। इतने ही लोग 1918 में मात्र तीन महीने में स्पैनिश फ़्लू से मरे। प्लेग चीन में शुरू हुआ था। अंग्रेजों को डर था कहीं ये यूरोप ना पहुँच जाए सो एपिडेमिक डिज़ीज़ ऐक्ट, 1897 लेकर आए और इसे यहीं  रोकने की कोशिश की। लेकिन 1918 के स्पैनिश फ़्लू के मामले में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे क्योंकि ये यूरोप से ही आया था। COVID19 शुरू तो चीन में हुआ है। यूरोप, अमेरिका होते हुए भारत का रुख़ कर रहा है। लेकिन सरकार इस बार सक्रिय है। सोशल डिसटेंसिंग, हैंडवाश, ट्रेस-टेस्ट-आयसोलेट-ट्रीट की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही है। आबादी का युवा होने में भी तसल्ली ले सकते हैं – उनकी रोग-प्रतिरोधी क्षमता के आगे इस वाइरस की मार ढीली पड़ जाती है। कहते हैं कि गर्मी का मौसम और नमी भी इसके संक्रमण को रोकता है। मलेरीयल इम्यूनिटी का भी सहारा है।

वैसे, ये मूलत: विज्ञान की लड़ाई है। अट्ठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश डाक्टर एड्वर्ड जेनर ने स्मॉलपॉक्स का वैक्सीन विकसित किया। उन्नीसवीं सदी के मध्य में दूसरे ब्रिटिश डाक्टर जान स्नो ने कोलरा का कारण पीने के पानी को बताया। वैक्सीन और पब्लिक हेल्थ सिस्टम विकसित कर ही इन भयावह बीमारियाँ पर क़ाबू पाया जा सका। अभी बिग डाटा, आर्टिफ़िशयल इंटेलिजेन्स, वर्ल्डवाइड वेब और बायोइन्फ़र्मैटिक्स का दौर है। कोविड19 का वैक्सीन भी जल्दी ही बन जाएगा, हमें ये आशा करनी चाहिए। तब तक सोशल डिसटेंसिंग और रेसपीरेटरी हाइजीन के ज़रिए अपने से दूसरों को और दूसरों से स्वयं को बचाए रखें, इसी में बुद्धिमानी है।

डराने वाले डराने में लगे हैं कि कोविड19 की मार से अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी, सरकारें निरंकुश हो जाएगी, नागरिकों की आज़ादी जाती रहेगी, भूख और बेरोज़गारी बढ़ेगी, सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा, सीमाओं पर झगड़े  बढ़ेंगे इत्यादि-इत्यादि। लेकिन ये सारे क़यास है। इस विश्वास को क़ायम रखिए कि आदमी में हर संकट से उबरने की क्षमता है।  इस सोच को ज़िंदा रखिए कि विज्ञान में इसका हल है।
(लेखक हरियाणा सरकार में प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं।)

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