Home संपादकीय विचार मंच Utterkatha—Exodus of governments, not workers: मजदूरों का नहीं यह सरकारों का पलायन

Utterkatha—Exodus of governments, not workers: मजदूरों का नहीं यह सरकारों का पलायन

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दुनिया सम्भवत: सृष्टि की सबसे बड़ी महामारी से जूझ रही है। कोरोना संक्रमण की वजह से अब तक लाखों लोग अपना बहुमूल्य जीवन खो चुके हैं। लेकिन हम इस विपदा में भी राजनीति का अवसर खोज रहें हैं। उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूरों पर काँग्रेस और राज्य की योगी सरकार के बीच किस तरह की राजनीति की जा रहीं है यह छुपी नहीं है। एक तरफ मजदूर भूख- प्यास से मर रहें हैं दूसरी तरफ राजनीति का अवसर खोजा जा रहा है। यह बेहद शर्मशार करने वाली स्थिति है। मजदूरों के साथ इससे भद्दा मजाक भला और क्या हो सकता है। संक्रमण को लेकर हालात इतने बुरे हैं कि महाशक्तियों ने भी घुटने टेक दिए हैं। संक्रमण से निपटने के लिए कोई कारगर वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पाई है।
विश्व स्वस्थ्य संगठन ने साफ कर दिया है कि फिलहाल इस महामारी का अंत नहीं दिखता हैं। इसका मतलब हुआ कि हमें अपनी सुरक्षा के साथ जीना होगा। यह लड़ाई इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। भारत में यह महामारी तेजी से पांव पसार रही है। चौथा लॉकडाउन भी घोषित कर दिया गया है लेकिन उसका कोई प्रभाव फिलहाल नहीं दिख रहा है। भारत में एक लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं। तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों की संख्या में कोरोना वारियर भी संक्रमण के शिकार हो चले हैं। कई डाक्टरों और पुलिसवालों की मौत हो गई है। प्रवासी मजदूरों की हालत किसी से छुपी नहीं है। लेकिन अब उस पर राजनीति हो रही है। मजदूरों को घर भेजने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें किस हद तक जा सकती हैं उसका उदाहरण हम पश्चिम बंगाल, बिहार और यूपी में सरकार और प्रतिपक्ष के बीच बढ़े टकराव से पैदा हुई स्थिति को हम समझ सकते हैं।
भारत में प्रवासी मजदूरों का पलायन थमने का नाम नहीँ ले रहा है। कोरोना काल में रोजगार छिन जाने से इस वक्त सबसे अधिक मजदूरों के सामने भूख का संकट खड़ा हो गया है। जिसकी वजह से मजदूर शहरों से पलायन कर रहें हैं।  उनके पास कोई रोजगार नहीं रह गया है। धंधे बंद हो गए हैं। कमरे का किराया देने के लिए पैसा भी नहीं है। लोगों में इतना भय और डर समा गया है कि अब जीवन बचना मुश्किल है। जिसकी वजह से लोग शहरों से अपने गांव की तरफ लौट रहें हैं। गांव सबसे सुरक्षित ठिकाना लगने लगा है। क्योंकि इस वक्त हर व्यक्ति के सामने जीवन बचाने की चुनौती है। सरकारों के वादों से उनका भरोसा उठ गया है।
आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र मुम्बई, सूरत, दिल्ली, पंजाब, तेलंगाना, समेत दूसरे राज्यों से आखिर मजदूर पलायन क्यों कर रहें हैं। अगर राज्य और केंद्र सरकार प्रवासी मजदूरों को सुविधाएं देती तो मजदूर क्यों पलायित होते। सरकारें मजदूरों से अपील कर रहीं हैं कि वह शहर न छोड़े उन्हें लाने का प्रयास किया जा रहा है। यह बताने में करोड़ों का विज्ञापन खर्च कर दिया गया लेकिन मजदूर अपने घर नहीं पहुंचे। सरकार अपील में ही डेढ़ माह का वक्त निकाल दिया। काम- धंधा बंद होने से उनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। सरकारी सहायता का कोई मतलब नहीं है। फिर लोग पलायित नहीं होंगे तो क्या करेंगे। सरकारी आदेश के बाद उन्हें किराया देना पड़ रहा है। जीवन की स्वछंदता छिन गई है। हालांकि सरकारी दुकानों से राशन की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिन क्या सिर्फ राशन से जिंदगी चल जाएगी। जीवन की दूसरी जरूरतें कैसे पूरी होंगी। रोजी- रोजगार को शहरों में लोग किस तरह का जीवन गुजारते हैं वहीं जानते हैं। एक- एक कमरे में 15 से 20 लोग जीवन यापन करते हैं। उस स्थिति में हम कोरोना संक्रमण से भला कैसे बच सकते हैं। जिसकी वजह से उनके सामने पलायन के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं बचता है। इस वक्त प्रवासी मजदूर सबसे अधिक मुश्किल में है। जितनी बड़ी चुनौती मजदूरों के सामने है उतनी समाज के दूसरे तबके के साथ नहीं है। इस समय उन्हें सीधे आर्थिक सहायता की जरूरत है। लेकिन सरकार ऐसा कुछ नहीं कर सकी है। प्रवासी मजदूर एक से डेढ़ हजार किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करने को बाध्य है। दुनिया में में इस तरह की त्रासदी केवल भारत में देखने को मिल रही है। प्रवासी मजदूरों के हौंसले की वजह से सड़कें छोटी पड़ गई हैं। लोग मां- बाप, पत्नी और बच्चों को कंधे पर ढो रहें हैं। गर्भवती महिलाएं अपने बच्चों को ढोने के लिए बैलगाड़ी खींच रहीं हैं। पिता अपने बच्चों को कांवरी में लेकर लम्बी यात्रा तय कर रहा है। मजदूर खुद हाथ गाड़ी बनाकर सैकडों किमी की यात्राएं तय कर रहें हैं। मासूम बच्चे सड़क पर दौड़ती सूटकेस पर गहरी नींद पर सो जा रहें हैं। लोग- भूख और प्यास ने तड़प-तड़प कर दमतोड़ दे रहें हैं। घर आने की जल्दबाजी में अब तक अनगिनत मजदूर सड़क हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं। औरंगाबाद और औरैया जैसे हादसे हमारे सामने इसका उदाहरण हैं। देश भर में इस तरह के हादसे नहीं थम रहें हैं। सरकारें सिर्फ गहरी संवेदना व्यक्त कर और मुवावजा की घोषणा के जरिए अपने दायित्व की इतिश्री कर लेती हैं। प्रवासी मजदूरों के लिए बनाए गए क्वारंटीन सेंटर बदहाल हैं। वहां  उन्हें भोजन- पानी की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। मीडिया में जिस तरह की रिपोर्ट आ रहीं है उसके अनुसार भोजन में कीड़े मिल रहें हैं। सड़ा भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। भीषण गर्मी में बिजली और पंखे की सुविधा नहीं है। अवस्था के चलते लोग इस तरह के केन्द्रों से पलायन कर रहें हैं। सर्प डंस और बिजली करंट से मौत की भी खबरें हैं।  प्रवासी मजदूरों पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सरकार के बीच खूब राजनीति हो रहीं है। मजदूर नोएडा बॉर्डर पर पंजीयन कराने के लिए पुलिस की लाठियां खा रहें हैं, लेकिन राजनीति अपने चरम पर है। कांग्रेस कार्यकर्ता 200 बसों के साथ बॉर्डर पर खड़े हैं लेकिन पुलिस उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दे रहीं है। यह सब क्या है। इतनी निचले स्तर की राजनीति क्यों की जा रहीं हैं। बसों को लेकर एक तरह की नई राजनीति शुरू हो गई है। यूपी सरकार का दावा है कि प्रियंका वाड्रा की तरफ से उपलब्ध कराई गई बसों की सूची सही नहीं है उसमें आटो और दूसरे बहानों के नंबर दिए गए हैं।  सवाल उठता है कि इस तरह के कुछ बातें हो सकतीं हैं लेकिन पूरी एक हजार बसों के साथ ऐसा नहीं हो सकता है।  राज्य सरकार सिर्फ सियासी अड़ंगेबाजी खड़ा कर प्रवासी मजदूरों की निगाह में कांग्रेस को बदनाम करना चाहती है। उधर काँग्रेस ने बसों की परेड करा एवं वीडियो जारी कर सरकार की मुशिकलें बढ़ा दिया है। यह वक्त राजनीति का नहीं है। मजदूरों को सुरक्षित पहुंचा हमारी प्रथमिकता होनी चाहिए। सरकार के पास तमाम संसाधन हैं। वह बसों की गिनती करा सकतीं थी कि हजार बसें हैं कि नहीं लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यह बेहद शर्मनाक स्थिति है। निश्चित रुप से अब प्रवासी मजदूरों पर राजनीति की जा रहीं है। जमीनी सच्चाई यह है कि पलायन मजदूर नहीं सरकारें और उसकी व्यवस्था कर रहीं है। क्योंकि देश के लिए राजनीति अहम है मजदूर नहीं। क्योंकि यहां हर मसलों को राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत पड़ गई है। जिसकी वजह से हमारी चुनौतियां बढ़ती जा रहीं हैं। वक्त रहते अगर हमने सही कदम नहीं उठाए तो प्रवासी मजदूरों के हालात और बदतर होंगे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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