Home संपादकीय विचार मंच Democracy or mobocracy? प्रजातंत्र या भीड़तंत्र?

Democracy or mobocracy? प्रजातंत्र या भीड़तंत्र?

19 second read
0
0
328

बचपन में हिंदी के टेक्स्ट बुक में मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ते थे। शीर्षक था पंच परमेश्वर। अलगू चौधरी की जुम्मन मियां से गाढ़ी दोस्ती थे। बखेड़ा तब खड़ा हो गया जब जुम्मन की खाला ने उसके खिलाफ अलगू चौधरी को ही अपना पंच चुन लिया। उसके ना-नुकर करने पर खाला बोली – क्या दोस्ती के लिए ईमान की बात नहीं करोगे?
पिछले दिनों जो कुछ दिल्ली में हुआ उससे एक बात तो साफ हो ही गई – पाकिस्तान से हम एक बार फिर एक और खेल में जीत गए। कुछ दिनों पहले तक वहां के टीवी-अखबार की चीख-पुकार, मौलाना डीजल का पता-नहीं-किससे आजादी मार्च और हैरान-परेशान हुक्मरान के ऊपर मंद-मंद मुस्कुरा हम एक सभ्य देश वाली फील ले रहे थे। आईएसआई इसे कहां बर्दाश्त करने वाली थी। सो बीबी बुशरा उर्फ पिंकी पीरनी को काम पर लगा दिया। देखते-देखते दिल्ली और इससे लगते इलाके पर धुएं-गुबार की काली चादर चढ़ गई। माहौल नूक्लीयर विंटर जैसा हो गया। पड़ोसी के इस ना-पाक हरकत से बेखबर शहरी मोटर और मिल मालिकों ने गरीब देहाती किसानों को जी भर कर कोसा। उनका कहना था कि धान का फसल तुम्हें एक बार मशीन और दूसरी बार हाथ से काटना चाहिए था। आग क्यों लगाई? मौका ताड़ सारे मदारी अपना बंदर-ड़ुगड़ुगी-सोंटा लेकर मैदान में आ गए। मास्क बंटने लगे। सड़क के धूल पर इत्र की तरह पानी का छिड़काव होने लगा। मिस्त्री-मजदूर का चूल्हा बंद कर दिया गया। बच्चे घर बैठ गए। ओड-ईवेन की जादुई छड़ी चलने लगी। टीवी-अखबार खुश हो गए कि घर बैठे खबर मिल रही है। ढूंढने-गढ़ने से बच गए। लेकिन असली बात कब तक छुपती? जैसे ही इधर के शहरियों को पिंकी पीरनी वाले ऐंगल का पता चला इन्होंने ठान लिया कि दुश्मन देश की साजिÞश को किसी कीमत पर कामयाब नहीं होने देंगे। फौरन दो गरममिजाजों की बहस को सामूहिक बेइज्जती करार दिया। ठाले बैठे वीर-बांकुंडे बलवा रोकने वालों पर टूट पड़े। उनकी गाड़ियां फूंक दी। इस क्रांतिकारी कदम का जादुई असर हुआ।
जहरीली हवा की बात तत्काल हवा हो गई। पिंकी पीरनी के टोटके का असर काफूर हो गया। टीवी-अखबार वालों की बाछें खिल गई। जो मिला उसी का इंटरव्यू लेने लगे। जिनके बारे में कल तक पड़ोसी को भी नहीं पता था, वे टीवी पैनलिस्ट बन मुुंह से झाग निकालने लगे। उनके जोश को देखकर एक बार तो ऐसा लगा कि ये दुश्मन को मिटाकर ही दम लेंगे। ओछेपन में देश पाकिस्तान से देखते-देखते मीलों आगे निकल गया। यही एक क्षेत्र था जिसमें उसे कुछ गुमान था। ये ताज भी उसके सिर से जाता रहा। कानून लागू करने वाले के प्रति मुंहजोरों की घृणा सिर्फ़ हमारे देश तक सीमित नहीं है। आस्ट्रेलिया में कुछ साल पहले सबसे अलोकप्रिय व्यक्ति के लिए एक मजाकिया वोट हुआ। लोगों ने ये इज्जत एक महिला ट्रैफिक पुलिसकर्मी को बख्शा। उसका कसूर बस इतना था कि वो मोटर चलाने वालों को सड़क पर मनमर्जऱ्ी नहीं करने देती थी। हमारे यहां लोग वोट तक सीमित नहीं रहते। मोहम्मद अली जिन्ना की तरह डायरेक्ट ऐक्शन लेते हैं।
सिनेमा वाले पुलिस को जोकर, काहिल, बेईमान, नकारा दिखाते हैं और गुंडे-बदमाशों को उसी अनुपात में स्टाइलिश। मास मीडिया का तो क्राइम रिपोर्टिंग कमाऊ पूत है। ये इसे टॉम एंड जेरी कार्टून शो की तरह परोसते हैं। पन्ने दर पन्ने छापते और घंटे-दर-घंटे दिखाते हैं कि कैसे बदमाशों ने पुलिस का जीना हराम कर रखा है। जनहित के स्वघोषित ठेकेदार पुलिस को तमंचे पर डिस्को कराते हैं। पहले तो जी-भर कर कोसते हैं कि पुलिस के रहते अपराध हुआ कैसे? फिर अल्टिमेटम पर अल्टीमेटम देने लगते हैं कि जल्दी करो नहीं तो आग लगा देंगे। जैसे कि सबकुछ पुलिस का ही किया धरा हो और इसने अपराधी को घर में बिठा रखा हो। रसूखदारों और उनके चेले-चपाटों की तो बात ही मत करिए। उनके लिए तरक़्की का मतलब ही ये है कि वे कितने शौक से पुलिस की बेइज्जती कर सकते हैं। पुलिस, गरीब, कमजोर, दलित, शोषित उनके हिसाब से एक ही चीज है।
विगत दिन आईएएस अधिकारी बनने की इच्छा रखने वाली पांचवीं की एक छात्रा अपने पिता के साथ मिलने आयी। बोली देखने आयी है कि ऐसा होना कैसा होता है। टीवी पर न्यूज चल रहा था। पूछ बैठी कि दिल्ली की पुलिसवाली दीदी से लोग क्यों लड़ कर रहे हैं। मुश्किल से समझाया कि कुछ लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त होते हैं। भीड़ दिखी नहीं कि तोड़-फोड़, खून-खराबे और आगजनी पर उतर आते हैं। सोचते हैं कि इतने लोग हैं, इन्हें कौन पहचानेगा। बच निकलेंगे। बाकी जाने-अनजाने इनके साथ लग लेते हैं। पुलिस इन्हीं को रोकने के लिए होती है। इस तरह का मुठभेड़ चलता रहता है। दिल्ली पुलिस वाली दीदी बहादुर और समझदार थी। फटाफट मौके पर पहुंची। बगैर खून बहाए स्थिति सम्भालने की कोशिश की। बात बच्चे के भी गले नहीं उतरी। कानून के रक्षक का मनोबल तोड़ना और देश को गृह युद्ध में झोंकना एक ही बात है।
7 अगस्त 2011 को इंगलैंड के एन्फील्ड में पुलिस पर हमले की घटना हुई। इसमें चेलसी इव्स नाम की एक अट्ठारह साल की लड़की भी शामिल थी। वो एक प्रतिभाशाली एथलीट थी लेकिन उसकी मां एंड्रीन ने स्वयं उसे पुलिस के हवाले किया और उसे जेल भिजवाया। सवाल है कि क्या इधर भी ऐसा नैतिक साहस देखने को मिलेगा। सिर्फ़ अंग्रेजों की प्रजातांत्रिक व्यवस्था लागू कर देना ही पर्याप्त नहीं है। जिÞम्मेवार नागरिक भी चाहिए। देश में 36 करोड़ से भी अधिक लोग 10-24 साल के आयु वर्ग में हैं। ज्यादातर देहाती हैं लेकिन दिमाग रखते हैं। मोबाइल फोन से जुड़े भी हैं। शहरियों को चाहिए कि संयम रखें। युवाओं के सामने एक अच्छी नजीर पेश करें। संस्थाओं में इनका विश्वास बना रहे इसके लिए जरूरी है कि सारे अपना-पराया छोड़ पंच परमेश्वर के अलगू चौधरी की तरह सही का साथ दें। कुछ और करना बर्रे के छत्ते में हाथ डालने
जैसा होगा।
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

Load More Related Articles
  • Kuch karo na…कुछ करो ना 

    संस्कृत बड़ी पुरानी भाषा है। कहते हैं कि ये भारत में पनपी लगभग सारी भाषाओं के मूल  में है।…
  • * Next fifteen days *: *अग़ले पंद्रह दिन *

    अगर आप गूगल सर्च इंजिन में COVID 19 शब्द टाइप करेंगे तो आपको 914 करोड़ लिंक मिलेंगे। 31 दि…
  • Khel khel main: खेल खेल में

    हरियाणा खेल विभाग से मेरा तीन बार वास्ता पड़ा।पहली बार सन 2000 में। उस समय मेरे विभागीय प्…
Load More By OmPrakash Singh
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Kuch karo na…कुछ करो ना 

संस्कृत बड़ी पुरानी भाषा है। कहते हैं कि ये भारत में पनपी लगभग सारी भाषाओं के मूल  में है।…