Home संपादकीय विचार मंच Congress will be back in Haryana: हरियाणा में होगी कांग्रेस की पुनर्वापसी?

Congress will be back in Haryana: हरियाणा में होगी कांग्रेस की पुनर्वापसी?

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हरियाणा में चुनावी नतीजों की घोषणा आज यानी 24 अक्तूबर गुरुवार को होगी। जब यह आलेख आपके हाथ में होगा वोटिंग की गिनती शुरू हो गई होगी। राज्य में भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला है। एग्जिट पोल के नजीजे चौकाने वाले हैं। एग्जिट पोल जमींनी सच साबित हुए तो राज्य से भाजपा यानी खट्टर सरकार की विदाई तय भी लगती हैं। हालांकि चुनाव नतीजों से त्रिशंकु विधानसभा की उम्मीद लगायी गयी है। लेकिन बहुमत से भी इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा या फिर कांग्रेस की सरकार बन सकती है। क्योंकि दोनों दलों के बीच कांटे का मुकाबला है। एग्जिट पोल से साफ हो रहा है कि राज्य में भाजपा की जमींन कमजोर हुई है। मोदी का जादू कम हुआ। खट्टर सरकार की नीतियों का भी राज्य में असर दिखता है। कांग्रेस नई उम्मीद के साथ राज्य की जनता का भरोसा जीतने में कामयाब रही है। जाटलैंड के हिस्सों में भाजपा कमजोर पड़ती दिखती है। वहां जेजेपी कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की पगबांधा बन सकती है। लेकिन वोट फीसदी के आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस का हुआ है। क्योंकि जाटलैंड यानी जाटों के बाहुल्य इलाकों में दुष्यंत चैटाला की पार्टी जेजेपी ने कांग्रेस को अच्छी टक्कर दी है।
राज्य में अगर इतने कड़े मुकाबले के बाद भी भाजपा की दोबारा सरकार बन जाती है तो इसके लिए सारा गुनाह कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का होगा। राज्य में कांग्रेस अपने पतन के लिए खुद जिम्मेदार होगी। 2014 के मुकाबले कांग्रेस की स्थिति बेहद मजबूत हुई है। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व इस चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया। अभी तक कांग्रेस खुद के लिए एक पार्टी अध्यक्ष नहीं चुन पायी है। फिर वह चुनाव की रणनीति कैसे बनाएगी। राज्य में कांग्रेस पुनर्वापस करती है तो इसका सारा श्रेय राहुल और सोनिया गांधी के बजाय पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को दिया जाना चाहिए। राहुल और सोनिया गांधी की राज्य में कोई भूमिका नहीं रही है। हुड्डा अपने रणनीतिक कौशल से आम लोगों के बीच कांग्रेस का विश्वास लौटाने में कामयाब रहे हैं। जाटलैंड में हुड्डा की अच्छी पकड़ देखी गयी है। वहां भाजपा कमजोर पड़ी है। राज्य विधानसभा में जातिय समीकरण का अच्छा-खासा असर दिख रहा है। एग्जिट के नतीजे अगर सच हुए तो राज्य में किसकी सरकार बनेगी यह कहना मुश्किल होगा। भाजपा या कांग्रेस में किसी को भी बहुमत मिल सकता है। लेकिन अगर कांग्रेस जाटलैंड में अपनी पकड़ बनाने में कामयाब रही तो भाजपा के लिए मुश्किल भरा सफर होगा।
हालांकि एग्जिट पोल में त्रिशंकु विधानसभा की आशंका जतायी गयी है। लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के रुप में भाजपा आ रही है। जबकि कांग्रेस और भाजपा के मतों के अंतराल को देखा जाय तो एक फीसदी का मामूली अंतराल है। इसमें उलट-पलट भी हो सकती है। क्योंकि एग्जिट पोल जमींनी पड़ताल पर एकदम खरें नहीं उतरते हैं। आज तक और एक्सिस माई इंडिया के एग्जिट पोल में भाजपा को 32 से 44 जबकि कांग्रेस को 30 से 42 सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं भाजपा को 31 तो कांग्रेस को एक फीसदी अधिक यानी 32 फीसदी वोट मिल रहे हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री देवीलाल के पोते दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी जाट बाहुल्य इलाकों में कांग्रेस और भाजपा को बड़ी टक्कर दे रही है। भाजपा जाटलैंट में कामयाब नहीं हो पायी है। क्योंकि उसने जाट उम्मीदवारों को अधिक टिकट नहीं दिया है। अगर उसकी पराजय होती है तो यह उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी। जेजेपी कांग्रेस के लिए सबसे घातक साबित हो रही हैं। क्योंकि जाटलैंड में वह जातिय समीकरण साधने में कामयाब रही है। एग्जिट पोल में उसे 6 से 10 सीटों के मिलने का अनुमान है।
राज्य विधानसभा में कुल 65 फीसदी से अधिक वोटिंग हुई है। जिसमें भाजपा को 31 और कांग्रेस को सबसे अधिक 32 फीसदी वोट का अनुमान है। जातिय समीकरण की बात करें तो भाजपा दलितों की 30 पिछड़ा वर्ग की 42 और जाटों की 18 के साथ सैनी की 40 फीसदी वोट हासिल कर रही है। कांग्रेस को दलितों में 37 ओबीसी में 27 और जाटों में सबसे अधिक 36 जबकि सैनी की 22 फीसदी वोट हासिल करती दिखती है। राज्य की क्षेत्रिय दल जेजेपी दलितों की 9 ओबीसी की 10 जाटों की 31 के साथ सैनी की 09 फीसदी वोट में सेंध लगा रही है। यह भाजपा-कांग्रेस जैसे दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए नुकसान देह है। अगर कांग्रेस वहां जेजेपी से तालमेल बिठाने में कामयाब होती तो निश्चित तौर पर एग्जिट पोल के आंकड़ों के मुताबित उसकी सरकार बन सकती थी। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायी है। क्योंकि पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने को सबसे ताकतवर जाट नेता साबित करना चाहते हैं। दुष्यंत चैटाला खुद को जाटों का असली नेता साबित करने की होड़ में लगे थे। इसी वजह से जाट बाहुल्य इलाकों में एग्जिट पोल के अनुमान के अनुसार उनकी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन कर कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। राज्य विधानसभा के नजीते आज यानी 24 अक्तूबर को आ रहे हैं। लेकिन अगर हम एग्जिट पोल के अनुमान को सच मान लें तो हरियाणा में कांग्रेस की पुनर्वापसी संभव हो सकती है। ऐसा न भी हो तो कांग्रेस 2014 के आम चुनाव से दोगुने से भी अधिक बेहतर प्रदर्शन करती दिखती है। 2014 में राज्य की कुल 90 सीटों पर मोदी लहर में भाजपा को जहां 47 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं कांग्रेस को 15 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। भाजपा का वोट शेयर 33 फीसदी था जबकि जबकि कांग्रेस का 21 फीसदी। इस लिहाज से पांच साल में कांग्रेस की सीट और वोट शेयर दो से डेढ़ गुने पर पहुंचे हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि राज्य में कांग्रेस की वापासी हो सकती है। जबकि अन्य दलों को कुल 46 फीसदी वोट मिले थे। राज्य की कुल 90 सीटें पर भाजपा 87 और इनेलो 81 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या 434 हैं। इसके अलावां भाकपा चार और माकपा सात सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। चुनाव मैदान में कुल 1169 उम्मीदवार हैं। राज्य में मतदाताओं की संख्या कुल 1,82,82,570 है।
कांग्रेस के लिए सबसे अहम प्रश्न हैं कि अगर हरियाणा में कांग्रेस की वापसी होती है तो इसका श्रेय किसको जाएगा। मां-बेटे सोनिया गांधी और राहुल गांधी की क्या भूमिका होगी या फिर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इसके असली नायक होंगे। क्योंकि चुनाव पूर्व भूपेंद्र सिंह बगावत के मूड में थे। उन्होंने एक महारैली कर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अपनी तागत का एहसास भी कराया था। तकरीबन यह फाइनल हो गया था कि भूपेंद्र सिंह कांग्रेस को बाय कर अपनी नयी पार्टी बना सकते हैं। लेकिन हुड्डा ने समय की नजाकत को समझा और पार्टी में भारी आंतरिक कलह और विवाद के बाद भी कांग्रेस को मजबूत करने में कामयाब रहे हैं। अगर हरियाणा से खट्टर सरकार की बिदाई होती है तो उसका सारा श्रेय भूपेंद्र सिंह हुड्डा को जाना चाहिए। क्योंकि राज्य में कांग्रेस को मुकाबले लायक किसी ने बनाया है तो उसका सारा कमाल हुड्डा का है। जनादेश कांग्रेस के पक्ष में आता है तो केंद्रीय नेतृत्व को बगैर बिलंब किए पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सारी जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। क्योंकि कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने में हुड्डा की अहम भूमिका रही है। शीर्ष नेतृत्व को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
यह लेखक के निजी विचार हैं।

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