Home संपादकीय विचार मंच Atmanirbharta via Jawahar Lal Nehru: आत्मा निर्भरता वाया जवाहरलाल नेहरु

Atmanirbharta via Jawahar Lal Nehru: आत्मा निर्भरता वाया जवाहरलाल नेहरु

4 second read
0
0
223

राजनीतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं है। इसे आर्थिक लोकतंत्र में भी विकसित करना होगा। – पहली  लोकसभा में 1952  के वर्ष में यह कथन है कभी विश्व भर में महान नेता, भविष्यदृष्टा, महान राजनीतिज्ञ जाने जाने वाले स्वतन्त्रता सेनानी एवं हरदिल अजीज नेता श्री जवाहरलाल नेहरु  जिन्हें आज क्षुद्र राजनैतिक फायदे के लिए पल-पल झूठी अफवाहों से बदनाम किया जा रहा है | उन्हें देश की हर समस्या के लिए कटघरे में खड़ा करने में छुटभैये नेताओं उनके समर्थको सोशल मिडिया व् आकाओं के इशारे  मिडिया  रात दिन लगा हुआ है |

1947 में आजादी  के बाद, भारत दुनिया के सबसे गरीब देशों में से था। अंग्रेजों द्वारा दो शताब्दियों की लूट, उपेक्षा और शोषण ने 32 करोड़ से अधिक जनता  को बेसहारा छोड़ दिया था । भारत का बुनियादी ढांचा,  अर्थव्यवस्था, यह नौकरशाही है, यह सब पूरी तरह से ब्रिटिश उद्योग की जरूरतों और  ब्रिटेन के हितों  के लिए बनाया गया था। भारत अपने संसाधनों और श्रमशक्ति का उपयोग ब्रिटेन यूरोपीय महाद्वीप पर युद्ध जीत  हेतु लूट ले गया था  युद्ध के दौरान बंगाल के  में 30 लाख भारतीयों  को भूख से मरने की खबर पर , क चर्चिल ने कहा था कि जो अनाज अंग्रेज  को खिलाने के लिए उसे भारतीयों के लिए  बर्बाद करने की मेरी कतई इच्छा नहीं है  । अंतिम बिदाई उपहार के रूप में, ब्रिटिश ने 1947 में विभाजन को  कुत्सितनाटक जिंह के साथ मिलकर रचा  था , जिससमें  पूरे उपमहाद्वीप में लगभग  डेढ़ करोड़  शरणार्थी व लाखों लोग मरे थे  भारत की आधी आबादी अब गरीबी रेखा से नीचे रहती थी, और 80 प्रतिशत से अधिक लोग निरक्षर थे। देश अकाल ग्रस्त था और जीवन प्रत्याशा लगभग 30 वर्ष थी। प्रति व्यक्ति आय, कृषि उत्पादन और खाद्यान्न उत्पादन पिछले तीन दशकों से लगातार घट रहा था।

ब्रिटेन व  दुनिया ने भारत  की बदहाली की भविष्यवाणी कर रहे थे  लेकिन भारत ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया .जब 1950 के दशक में खत्म होते होते दुनिय ने देखा कि, लगातार 5-वर्षीय योजनाओं को तैयार किया गया और  लागू किया गया, तो यह देखकर  कि भारत उल्लेखनीय रूप से अच्छा कर रहा था दुनिया की आँखे  खुली रह गईं, भारत की क्षमता पर सन्देह करने वाले  पूर्व औपनिवेशिक प्रशासक, पर्किवल ग्रिफि़थ  ने 1957 में लिखा था कि आजादी  के बाद का खाद्यान्न उत्पादन, शानदार था,और वह भारत वह करने में सफल रहा जो उसने स्वयं असंभव माना था। देश ने एक नए, गतिशील चरण में प्रवेश किया है, और यह कि ‘जीवन स्तर में वृद्धि के संकेत अकल्पनीय हैं।’ (1) ब्रिटिश अर्थशास्त्री। बारबरा वार्ड ने 1961 में कहा था कि कैसे भारत में ‘सतत विकास की प्रक्रिया’  जारी है ‘वार्ड ने आगे लिखा है कि’ कृषि सहित सभी क्षेत्रों में निवेश, पहली और दूसरी योजनाओं के बीच लगभग दोगुना है, ‘और’ बुनियादी ढाँचे और उद्योग दोनों में भारतीय रिकॉर्ड व्यापक मोर्चे पर पर्याप्त उन्नति में से एक है,  निरंतर विकास को प्राप्त करने के लिए बड़े धक्के  की आवश्यकता है। Ó(2) 1 9 00-19 4, के बीच शून्य-प्रतिशत वृद्धि के 40 वर्षों से, भारत ने अर्थव्यवस्था को 1 9 62 तक सालाना 4 प्रतिशत तक बढ़ाते हुए चीन, जापान और ब्रिटेन से पहुँच गया है ।

अमेरिकी राजनीतिक विचारक ने 1960 न्युयोर्क टाइम्स में  लिखा था भारत की  इस उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए बधाई के पात्र  प्रधान मंत्री नेहरु हैं जिन  के प्रयासों के कारण  प्रगति हुई है  वास्तव में वह अपने 39 करोड़  लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए भारत के इस  वीर का  संघर्ष  वे भारत के  दिल और आत्मा है

वे आगे लिखते हैं

भारत के आधुनिक राष्ट्रवाद के नेहरू के विचार में चार प्रमुख आयाम शामिल थे: लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और गुटनिरपेक्षता। ये आयाम नेहरू और गांधी के बीच लंबी चर्चा के माध्यम से आए, स्वतंत्रता आंदोलन में नेहरू के अपने अनुभव, और उनकी टिप्पणियों के रूप में उन्होंने दुनिया को बदलते और नए, अज्ञात क्षेत्र में जाते देखा। अंग्रेजों ने उनके  लिए सुशासन की कोई परंपरा नहीं छोड़ी, नेहरू को एक नए विश्व व्यवस्था में भारतीय राज्यों की कला को फिर से स्थापित करना पड़ा। रातों रात, भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया था; इसकी जनसंख्या के विशाल आकार ने इसे अधिकांश अन्य लोकतांत्रिक देशों की आबादी से बड़ा मतदाता-आधार दिया।; भारत ब्रिटेन की तरह एक संसदीय प्रणाली के साथ। अमेरिका जैसे मजबूत स्थानीय सरकार के साथ राज्यों का एक संघ बन गया, लेकिन नेहरू के लिए, लोकतंत्र केवल वोट देने के अधिकार के बारे में नहीं था, बल्कि आपके लोकतांत्रिक अधिकारों का लाभ उठाने के लिए आर्थिक साधन भी था। आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र निरर्थक होगा। नेहरू पंचायती राज के लिए एक मजबूत समर्थक  थे,  गांधी की तरह, नेहरू का मानना था कि विकास को ऊपर से तय नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि नीचे से ऊपर उठना चाहिए। 1957 में, नेहरू पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की शुरुआत की थी , सात वर्षों के लिए, लोकतंत्र पूरी भूमि पर और नीचे की ओर स्थापित हो गया था ।  वे लिखते हैं दुर्भाग्य से, 1964 में नेहरू की मृत्यु के साथ, पंचायती राज धीमी मौत मरने लग गया था जिसे  केवल 1993 में नेहरू के पोते, राजीव गांधी द्वारा पुनर्जीवित किया गया |

इंग्लॅण्ड में शिक्षा प्राप्त नेहरु पश्चिमी पूँजीवाद से परिचित थे ही आजादी के बाद अनेक बार सोविय्त्स्नघ व् चीन के यात्राओं से  उन्हें कम्युनिज्म का अनुभव भी मिला | वे  सोवियत संघ में अक्टूबर क्रांति की 10 वीं वर्षगांठ समारोह में मुख्य  अतिथि  थे। वहां वह यूएसएसआर की उल्लेखनीय उपलब्धियों से प्रभावित हो गए, और उन्होंने पहले से ही सुपर पॉवर में बड़ी क्षमता देखी। हालाँकि, वह बोल्शेविकों के तानाशाही तरीकों, उनके आक्रामक और अशिष्ट तरीकों, और वैचारिक पवित्रता के साथ उनके जुनून से चिढ़ गए। नेहरू समाजवादी माक्र्सवाद में राष्ट्रीय विकास के मॉडल के रूप में स्तालिनवादी माक्र्सवाद से परहेज करने  वाले पहले लोगों में से थे । उनका  रेजिमेंटेशन, सर्वहारा वर्ग की क्रूर तानाशाही या जबरन अधिग्रहण और सामूहिकता में विश्वास नहीं  था। इसके बजाय, नेहरू का समाजवाद लोकतंत्र और अहिंसा के आधार पर होना था, जिससे एक सहकारी, समाजवादी सामान्य राष्ट्र की स्थापना हुई। उन्होंने केंद्रीय योजना के माध्यम से सामंती भूस्वामियों की जमींदारी प्रथा के उन्मूलन और औद्योगीकरण के तेजी से प्रसार की वकालत की।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय उपनिवेशवाद के खंडहर से एक सौ से अधिक नए देश सामने आएंगे, और दो प्रतिस्पर्धी महाशक्तियाँ – यूएस और यूएसएसआर – इन दोनों प्रथम राष्ट्रों पर अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे। भारत पर भी डोरे डाले गए , लेकिन नेहरू ने अमेरिकी पूंजीवाद या रूसी साम्यवाद के झूठे द्वंदवाद  को नकार  दिया। इसके बजाय, उन्होंने गुटनिरपेक्षता का तीसरा रास्ता चुना।

नेहरु जानते थे कि भारत में औद्योगीकरण के लिए आवश्यक स्टार्ट-अप पूंजी का निजी क्षेत्र में  अभाव था, और चूंकि विदेशी निवेश ने भारत की स्वतंत्रता को खतरे में डालना  होगा, अत उन्होंने सरकारी भारी उद्योग स्थापना की नीति को अपनाया जिसके तहत अनेक उपक्रम स्थापित हुए जिम्हे भारत के इस सपूत ने  आधुनिक भारत के मंदिरों का   भाखड़ा नांगल बांध के  निर्माण शुरू करते समय दिया था  किया था, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, स्टील प्लांट्स, बिजली संयंत्रों, बांधों से वैज्ञानिक  औद्योगिक प्रगति की शुरुआत हुई| उनके द्वारा स्थापित नवरत्न भारी उद्योगों के बारे में तो दुनिया जानती ही है |

 इसका मतलब यह नहीं था कि राज्य ने निजी क्षेत्र को कंट्रोल  करना शुरू कर दिया या उनकी  संपत्ति को जब्त कर लिया। नेहरू की लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता का मतलब था कि निजी क्षेत्र काफी हद तक अपने हाल पर   लिए छोड़ दिया गया था, और केवल रेलवे, एयरलाइंस, ब्रिटिश, और इंपीरियल बैंक [भारतीय स्टेट बैंक]  जो ब्रिटश फर्मो की सम्पति थी राष्ट्रीयकरण किया गया था।

इस महान सपूत की पुन्य स्मृति में राष्ट्र नत मस्तक होना चाहिये | नेहरु के योगदान को एक लेख में लिखना संभव नहीं है |

श्याम सखा श्याम

Load More Related Articles
Load More By ShyamSakha Shyam
Load More In विचार मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Nainam chindanti shstrani: नैनं छिद्यंति शस्त्राणि बनाम देहांत

बाबू  रामभरोसे  की मृत्यु हो चुकी थी अब मृत्यु हो जाए और चौथा उठाला या तेहरवीं शोक सभा आयो…