Home संपादकीय विचार मंच Acceptable culmination of the ideological RSS: संघ के वैचारिक अधिष्ठान की स्वीकार्य परिणति

Acceptable culmination of the ideological RSS: संघ के वैचारिक अधिष्ठान की स्वीकार्य परिणति

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सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण का पथ प्रशस्त होने के साथ देश में परिपक्व लोकतंत्र का संदेश तो गया ही है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व समग्र संघ परिवार के लिए यह निर्णय वैशिष्ट्य लिए हुए है। दरअसल जिस विवाद के कारण संघ को तीसरी बार प्रतिबंध तक का सामना करना पड़ा, उसी विवाद में संघ की मंशा के अनुरूप सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आना एक तरह से संघ के वैचारिक अधिष्ठान की स्वीकार्यता जैसी परिणति है।
अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं का आंदोलन भले ही सैकड़ों वर्ष पुराना हो किन्तु इस आंदोलन ने देशव्यापी रूप तब ही लिया, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व संघ परिवार से जुड़े सदस्यों ने इस आंदोलन की कमान हाथ में ली। संघ परिवार के महत्वपूर्ण संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने खुलकर राम मंदिर आंदोलन की कमान संभाली और इस पूरे अभियान का नेतृत्व के संघ के प्रचारकों के हाथ में ही रहा। संघ के प्रचारक रहे अशोक सिंहल, आचार्य गिरिराज किशोर, ओंकार भावे व मोरोपंत पिंगले जैसे स्वयंसेवकों ने राम मंदिर आंदोलन को मजबूती प्रदान करने का काम किया। इन लोगों ने संत समाज को भी अपने साथ जोड़ा। यही कारण था कि 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वंस के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित भाजपा नीत सरकारों को बर्खास्त करने के साथ सबसे कड़ी कार्रवाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर ही की थी।
ढांचा ध्वंस के बाद संघ को तीसरी बार प्रतिबंध का सामना करना पड़ा था। इससे पहले संघ 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद 18 महीने के लिए और 1975 में आपातकाल के समय दो वर्ष के लिए प्रतिबंध का सामना कर चुका था। संघ ने तीनों बार प्रतिबंध को गलत साबित किया और इससे मुक्ति पाने में सफलता पाई। हर प्रतिबंध के बाद संघ और मजबूत होकर उभरा। 1992 में लगा प्रतिबंध महज छह माह चल सका और प्रतिबंध हटने के बाद भी संघ के स्वयंसेवकों ने भव्य राम मंदिर निर्माण का स्वप्न नहीं टूटने दिया।
वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वंयंसेवक संघ की स्थापना के बाद से आज तक देश का एक हिस्सा संघ के वैचारिक अधिष्ठान का विरोधी रहा है। संघ के राष्ट्रवाद की आलोचना के साथ अल्पसंख्यकों के एक बड़े वर्ग को संघ से डराने की कोशिश भी होती रही है। संघ की विचार प्रक्रिया में जब राष्ट्र की बात होती है, तो देश का एक वर्ग उस राष्ट्रवाद से ही कन्नी काटने लगता है। ऐसे में संघ के सामने हमेशा से ही देश में सर्वस्वीकार्यता की चुनौती रही है। संघ ने इसे हर स्तर पर स्वीकार किया। जनांदोलन के साथ राजनीतिक चेतना को भी इसके लिए माध्यम बनाया गया। यही कारण है कि आज देश के प्रथम नागरिक से लेकर प्रधानमंत्री, मंत्रियों सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्री संघ के स्वयंसेवक ही नहीं, प्रचारक भी रह चुके हैं। मंदिर आंदोलन के समय संतों के साथ वैचारिक चेतना को संयोजन करना संघ के लिए चुनौती हो सकता था, किन्तु इसे सकारात्मक सफलता दिलाने के काम अशोक संहल व आचार्य गिरिराज किशोर जैसे प्रचारकों ने किया। संत राम चंद्र परमहंस व महंत अवैद्यनाथ जैसे संतों ने तो संघ के प्रचारकों के साथ मंच साझा किया ही, कई शंकराचार्य व विविध मतावलंबी संत-महात्मा एक मंच पर जुट गए। यह संघ के वैचारिक अधिष्ठान का विस्तार ही था, कि पिछले कुछ वर्षों में सिर्फ तुष्टीकरण भारतीय राजनीति का चेहरा नहीं रहा है।
इस बार सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के साथ ही देश ने परिपक्व लोकतंत्र का एक चेहरा देखा है। यह संयोग ही है कि इस परिपक्वता में 94 वर्ष का संघ भी अग्रणी भूमिका में दिखा है। संघ परिवार के प्रमुख नेताओं ने इस बार फैसले से पहले न सिर्फ मुस्लिम पक्ष व नेताओं के साथ विमर्श की शुरूआत की, बल्कि एक सकारात्मक वातावरण निर्माण की पहल भी की। संघ के स्वयंसेवकों को शाखाओं से लेकर विभिन्न आयोजनों तक सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को हार या जीत के स्थान शांति से स्वीकार कर लेने के संदेश दिये गए। संयम बरतने के संदेशों के साथ किसी भी तरह की प्रतिक्रिया से बचने का जो वातावरण बनाया गया, उसका प्रभाव पूरे देश में देखने को भी मिला है।
सर्वोच्च न्यायालय से संघ की मंशा के अनुरूप फैसला आने के बाद संघ के स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी वैसे भी बढ़ गयी है। उन्हें देश व समाज के हर वर्ग का भरोसा और मजबूती से जीतना होगा। इसके पश्चात ही वे ‘परमवैभवं नेतुमेतत्स्वराष्ट्रम’ अर्थात राष्ट्र को वैभव के शिखर तक पहुंचाने में सफल हो सकेंगे।

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