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Economic challenges before the new government: नई सरकार के समक्ष आर्थिक चुनौतियां

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2019 के लोकसभा चुनाव में भले ही भाजपा ने जनसरोकार के मुद्दों से पिंड छुड़ा कर पुलवामा, बालाकोट और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जनादेश प्राप्त कर लिया हो पर जब भी, बात सरकार और गवर्नेंस पर उठेगी तो वे सारे मुद्दे जिससे सभी सत्तारूढ़ दल मुंह चुराते हैं उभर कर सामने आ जाएंगे। अक्सर सरकारें अपनी अकर्मण्यता के कारण ऐसे मुद्दे उठाती हैं जो प्रासंगिक नहीं रहते हैं बल्कि उन्हें जानबूझकर कर प्रासंगिक रखा जाता है। आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद मुद्दे हैं पर देश की समृद्धि, जनता को बेहतर जीवनोपयोगी सुख सुविधा, बेहतर कानून व्यवस्था और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी रोटी के बेहतर अवसर अगर उपलब्ध नहीं हैं तो राष्ट्रवाद अंतत: राष्ट्रभंजक ही बन जाता है।
यह सरकार तकनीकी रूप से भले ही नई हो, पर यह पांच साल का कार्यकाल पूरा करके छठे साल में कदम रख चुकी है। इसका मूल्यांकन 2014 से ही किया जाएगा। इस सरकार की आर्थिक नीतियां, नई नहीं होंगी, बल्कि, पुरानी नीतियों का ही विस्तार होगा। अभी हाल ही में नीति आयोग के सीईओ का बयान आया है कि सभी सरकारी कम्पनियों का निजीकरण कर दिया जाय। अगर 2014 से 2019 के बीच की आर्थिक नीतियों की चर्चा करें तो, उक्त अवधि में सरकार ने आर्थिक रूप से जो कदम उठाए हैं वह एक प्रकार से अर्थ व्यवस्था के लिए हानिकारक ही साबित हुए। नोटबंदी क्यों की गई, सरकार का इसके पीछे क्या उद्देश्य था, क्या सरकार को उक्त उद्देश्यों की पूर्ति हुई या नहीं हुई, इन सब मुद्दा पर सरकार अब तक चुप्पी साधे हुए है। नोटबंदी से चाहे जो भी लाभ सरकार गिनाए पर आज जिस आर्थिक मंदी जैसे हालात से देश गुजर रहा है उसका दारोमदार उस व्यक्ति पर है जिसने यह आर्थिक कदम उठाने की सलाह दी थी।
इसी प्रकार जीएसटी के लागू किए जाने में जो प्रक्रियागत जटिलताएं हैं, उनके कारण व्यापारियों का एक वर्ग नाराज हुआ, कर संग्रह घटा, और बाजारों में मंदी आई। बाजार के गिरने का असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पड़ा और उससे लोगों की नौकरियां गर्इं। आर्थिक क्षेत्र में किसान से लेकर बड़े औद्योगिक घरानों तक तालमेल की एक लंबी श्रृंखला है। एक भी स्थान पर अगर मंदी आती है तो उसका प्रभाव पूरे अर्थतंत्र पर पड़ता है।
2014 से 2019 तक बैंकों के एनपीए बेतहाशा बढ़ गए हैं। यह बैंकों को बड़े पूंजीपतियों द्वारा कर्ज लेकर उसे न चुकाने का परिणाम है। लगभग सभी सरकारी बैंक इस बीमारी से ग्रस्त हैं। हालांकि बैंकों की इस हालत के लिए सारा दोष भाजपा सरकार का ही नहीं है, बल्कि ‘ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत’ की आदत 2014 के पहले की सरकारों द्वारा उदारतापूर्वक, लोन देने का परिणाम है। पर 2014 के बाद भाजपा सरकार ने न तो बैंकों के उन अधिकारियों जिन्होंने, उदारतापूर्वक, सरकार के कहने पर लोन दिया था, के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही की और न ही उस परंपरा को रोका। कारण यही था कि पूंजीपति कोई भी हो, लगभग हर सरकार उसे प्रश्रय देती है। अब हालत यह हैं कि कुछ बैंकों की शाखाएं बंद हो रही हैं तो कुछ बैंकों को आपस मे मिला कर इस संकट से पार पाने का जुगाड़ ढूंढा जा रहा है। इस बैंकिंग संकुचन का सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा।अभी हाल ही में आई दो खबरों ने देश की अर्थनीति के समक्ष कठिन चुनौतियों को खड़ा कर दिया है।
एक तो देश का सकल घरेलू उत्पाद घटकर 6.8 हो गया है और दूसरे बेरोजगारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे अधिक हो गई है। नोटबंदी ने उद्योग धंधों की कमर तोड़ दी है, पर सरकार इसे नहीं मानेंगी। एक आर्थिक रिपोर्ट जो जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच जुटाए गए डेटा पर आधारित है और नोटबंदी के बाद पहला आधिकारिक सर्वेक्षण है, से पता चलता है कि उद्योग धंधों में कामगारों की जरूरत कम होने से ज्यादा लोग काम से हटाए गए। सेंटर फॉर इंडियन इकॉनोमी ने भी उस वक्त कहा था कि 2017 के शुरूआती चार महीनों में 15 लाख नौकरियां खत्म हो गर्इं। एनएसएसओ की जो रिपोर्ट दिसंबर 2018 में जारी की जानी थी उस रिपोर्ट को आसन्न चुनाव के कारण दबा दिया गया। सरकार पर यही आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष सहित दो सदस्यों ने जनवरी में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने उस वक्त कहा था कि हम 70 से 78 लाख नौकरियों के अवसर पैदा कर रहे हैं, जो देश के कार्यबल में शामिल होने वाले नए लोगों के लिए पर्याप्त है। तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली का मासूम तर्क था, कि पिछले तीन वर्षों में नौकरियों के लिए कोई आंदोलन तो हुआ ही नहीं इसलिए कैसे कहा जाय कि बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है! एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों में 5.3% और शहरी क्षेत्र में सबसे ज्यादा 7.8% रही। पुरुषों की बेरोजगारी दर 6.2% जबकि महिलाओं की 5.7% रही। इनमें नौजवान बेरोजगार सबसे ज्यादा थे, जिनकी संख्या 13% से 27% थी।घटती जीडीपी, बढ़ती बेरोजगारी, घटता औद्योगिक उत्पादन, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आती हुई मंदी की खबरें तो थी हीं, ऊपर से अमेरिका ने भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा खत्म कर एक और समस्या खड़ी कर दी। अमेरिका ने भारत को दी जाने वाली जेनरलाइज्ड सिस्टम आॅफ प्रेफरेंस, जीएसपी की सुविधा को छीन लिया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि 5 जून, 2019 से वह भारतीय निर्यात को जीएसपी के तहत मिलने वाले लाभ को वापस ले लेगा।
सरकार का कहना है, कि अमेरिका के इस फैसले से भारत के निर्यात पर खास असर नहीं होगा, लेकिन आंकड़े कुछ अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। आर्थिक मामलों पर लिखने वाले, गिरीश मालवीय के एक लेख के अनुसार, 2018 के दौरान भारत ने अमेरिका को 51.4 अरब डॉलर का निर्यात किया है उसमें से जीएसपी योजना के तहत भारत ने अमेरिका में 6.35 अरब डॉलर का निर्यात किया यानी लगभग 12 से 15 प्रतिशत निर्यात में हमे जीएसपी योजना के तहत छूट मिली हुई थी। पिछले दो तीन वर्षों के आंकड़े उठाकर देखे तो हमें लगभग 40 से 50 हजार करोड़ के निर्यात पर यह छूट मिलती आई है। भारत के केमिकल्स और इंजिनियरिंग जैसे सेक्टरों के करीब 1900 छोटे-बड़े प्रोडक्ट पर इस राहत का लाभ मिलता है। नकली आभूषण निर्यात को औसतन 6.9 फीसदी का जीएसपी लाभ मिल रहा है तो चमड़ा उत्पाद (जूते के अलावा अन्य) को औसतन 6.1 फीसदी, फार्मास्यूटिकल्स और सर्जिकल को 5.9 फीसदी, रासायनिक और प्लास्टिक को 4.8 फीसदी तो कृषि के ओरिजिनल और प्रोसेस्ड को 4.8 फीसदी का लाभ मिल रहा है अब यह सब छूट खत्म हो जाएगी।
सरकार के समक्ष जो आर्थिक चुनौतियां हैं उनमें से सरकार द्वारा किए गए कुछ ऐसे वादे हैं जिनको 2022 तक सरकार को पूरा करना है। ये वादे किसानों से जुड़े हैं। सरकार ने वादा किया है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। किस मानक के अनुसार दोगुनी होगी, यह सरकार अभी नहीं बता रही है पर यह बात 2018 में कही गई है, तो 2018 में जो किसानों की आय थी वह 2022 में दोगुनी हो जाएगी। एक और वादा है, 2022 में सभी के सिर पर छत देने का। 2022 में हमारी आजादी के 75 साल पूरे हो जाएंगे। अगर सरकार सच मे अपने इन वादों को 2022 तक पूरा कर देती है तो यह सरकार की बड़ी उपलब्धि होगी। सरकार की आर्थिक नीति क्या है? सच तो यह है कि एनडीए की आर्थिक नीति की प्राथमिकता के केंद्र में पूंजीपति रहते हैं। सारी नीतियों के निर्माण में सबसे पहले कॉरपोरेट सेक्टर का ध्यान रखा जाता है। किसान, मजदूर, और निम्न मध्यम वर्ग को इस प्राथमिकता में बहुत अधिक तरजीह नहीं मिलती है।
पर कारपोरेट सेक्टर भी अगर बेरोजगारी, विधिविहिनिता, कृषि क्षेत्र में मंदी आदि का प्रकोप आता है तो समृद्धि के द्वीप जैसे कारपोरेट सेक्टर उस असंतोष की सुनामी से बच नहीं पाएंगे। नीति आयोग सभी सरकारी उपक्रमों को निजी क्षेत्रों में देने की बात करता है। 2014 से 2019 तक सरकार ने जिस गिरोहबंद पूंजीवाद, क्रोनी कैपिटलिज्म को प्रश्रय दिया है उसमें ओएनजीसी, गैल, एचएएल, बीएसएनएल, डाक तार विभाग और अन्य सरकारी उपक्रम सरकार के ही सौतेले व्यवहार और कुप्रबंधन के कारण, घाटे में आ गए हैं।
यह एक शातिर चाल है कि पहले सरकारी उपक्रमों को जानबूझकर बरबाद किया जाय फिर उसे एक बोझ प्रचारित कर के चहेते पूंजीपति घरानों को नीलाम कर दिया जाए। सरकार के समक्ष जनता का हित सर्वोपरि है ही नहीं, बल्कि उसका सारा फोकस अहर्निश रूप से, अपने चहेते पूंजीपति घरानों पर है। लफ्फाजी के रूप में भले ही यह कहा जाय कि, समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए सरकार सोचती है। अगर सरकार ने सच मे यह सोचा होता तो बेशर्मी भरी सुरक्षा चूक के शिकार पुलवामा के 40 शहीद जवान चुनाव में मुद्दा न बनते। सरकार को उपरोक्त आर्थिक संकटों के हल और 2014 और 2019 के अधूरे वादों को पूरा करने के लिए एक रणनीति बना कर काम करना होगा। अन्यथा यह संकट एक असंतोष की आहट भी है। यह संकट अभी और गहरा होगा। राष्ट्रवाद के उन्मादी धुएं में आर्थिक चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
2014 के बाद से सरकार के मास्टरस्ट्रोक कहे जाने वाले आर्थिक कदम ऐसे नहीं रहे है जिससे यह लगे कि सरकार, जनता की रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य की समस्याओं के समाधान के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण के प्रति प्रतिबद्ध है। हो सकता है, लोग उज्ज्वला योजना और 2000 रुपए किसानों को देने का उल्लेख करें, पर क्या इन कदमों से रोजगार का सृजन हुआ है या किसानों में स्वावलंबन आया है? सरकार का उद्देश्य केवल जीवन योग्य साधन उपलब्ध कराना ही नहीं है बल्कि बेरोजगारों, किसानों, मजदूरों, निम्न मध्यवर्ग और जनता के वंचितों को स्वावलंबन के मार्ग पर ले जाना है जिससे उनका जीवन स्तर सुधरे और वे स्वावलंबी बनें।
विजय शंकर सिंह
(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं)

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