Home संपादकीय Do talk On this ‘Planned Murder’: इस ‘प्लांड मर्डर’ पर भी करें मन की बात

Do talk On this ‘Planned Murder’: इस ‘प्लांड मर्डर’ पर भी करें मन की बात

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एक बार फिर मजदूरों और सफाईकर्मियों को सीवरेज टैंक में भेज कर उनका प्लांड मर्डर हुआ है। वह भी उस राज्य में जहां से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आते हैं। सफाई का बड़े अभियान का अगुआ बने गुजरात में हर साल सैकड़ों सफाईकर्मी और मजदूर सीवरेज की जहरीली गैस से मारे जाते हैं। एक बार फिर शुक्रवार की रात सात लोगों की मौत सीवरेज सफाई के दौरान हुई है। पिछले माह 7 मई को उत्तर पश्चिम दिल्ली में एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई थी और तीन अन्य घायल हो गए थे। 15 अप्रैल को दिल्ली से सटे गुरुग्राम के नरसिंहपुर में एक आॅटोमोबाइल कंपनी में सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई थी। यह आंकड़े सिर्फ इसलिए हैं कि गुजरात में हुआ हादसा कोई पहला हादसा नहीं है। हर दूसरे दिन देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे हादसे पेश आ रहे हैं। फिर भी केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, सभी आंखें मूंद बैठे हैं। मंथन करने की जरूरत है कि कैसे इस प्लांड मर्डर को रोका जा सकता है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) के आंकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष दो से ढाई हजार लोग इससे प्रभावित होते हैं। अधिकतर की मौत हो जाती है। ऐसा तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक अमानवीय कृत बताते हुए इसे पूरी तरह बैन कर रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सीवरेज के अंदर जाकर सफाई करने पर न केवल पूरी तरह से रोक लगा दी थी, बल्कि इस कार्य के दौरान मारे गए लोगों के परिजनों को दस लाख रुपए का मुआवजा भी घोषित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीवरेज में उतरने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि वहां आॅक्सीजन न के बराबर होगा। वहां अत्यंत घातक हाईड्रोजन सल्फाइड, मेथेन, कार्बन डाइआॅक्साइड और कार्बन मोनोआॅक्साइड की मौजूदगी किसी की जान लेने के लिए काफी है। फिर ऐसे में कोई भी एजेंसी किसी सफाईकर्मी को बिना सुरक्षा उपकरणों के कैसे वहां भेज सकती है। इससे होने वाली मौत को मर्डर की श्रेणी में माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अगर विभिन्न राज्य सरकारों की नाकामी के कारण लोग मारे जा रहे हैं तो इसे मर्डर नहीं प्लांड मर्डर कहा जाना ही बेहतर है।
इन सीवर कर्मचारियों और मजदूरों की जान की कीमत कितनी सस्ती है इस बात का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि सरकार के पास भी स्पष्ट आंकड़ा नहीं है कि सीवर सफाई के दौरान कितने कर्मचारियों या मजदूरों की जान गई है। हर दूसरे दिन किसी न किसी राज्य से ऐसी खबरें सामने आती हैं। पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की वेबसाइट पर मिले आंकड़ें हैरान करते हैं। इसके मुताबिक 1993 से लेकर 2018 तक कुल 676 सफाईकर्मियों की सीवर में उतरने से मौत हुई है। इसमें सबसे ज्यादा 194 मौतें तमिलनाडु में हुई हैं। वहीं, गुजरात में 122, दिल्ली में 33, हरियाणा में 56 और उत्तर प्रदेश में 64 मौतें हुई हैं। वहीं, तीन जनवरी 2019 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने राज्यसभा में बताया कि उच्चतम न्यायालय के 1993 के फैसले के मद्देनजर सफाईकर्मियों को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है। अब तक 331 लोगों की मौत हुई है और उनमें से 210 लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जा चुका है। अब आप राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की वेबसाइट और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री के राज्यसभा में बताए गए आंकड़ों में आए अंतर से समझ सकते हैं कि सफाईकर्मियों की जान की कीमत क्या है।
भारतीय संसद ने भी मैन्युअल स्कैवन्जर्स रीहैबिलिटेशन एक्ट के जरिए इस प्रथा को रोकने का भरपूर प्रयास किया है। 2013 में यह एक्ट पास हुआ, लेकिन आज तक किसी भी राज्य सरकार ने इस एक्ट को सीरियसली नहीं लिया है। हाल यहां तक खराब हैं कि हर साल सबसे अधिक मौत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उसके आसपास ही होते हैं। परिणामस्वरूप सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों का आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। भारत में 1993 से ही सीवरेज की मैन्यूअल सफाई पर रोक है। बाद में 2013 में इस संबंध में एक्ट भी पारित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट तौर पर सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को कहा कि वर्ष 1993 के बाद जितनी भी मौतें सीवरेज में मैन्यूअल सफाई के दौरान हुई उन सभी के परिजनों को दस-दस लाख मुआवजा दिया जाए।
मंथन का वक्त है कि इतने सारे कदम उठाए जाने के बावजूद आखिर ये प्लांड मर्डर क्यों नहीं रोके जा रहे हैं। इसके लिए हम किसे जिम्मेदार ठहराएं। राज्य सरकार या उसकी एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर सीधे तौर पर केंद्र सरकार। कटघरे में सभी हैं क्योंकि यह एक राष्ट्रीय समस्या के तौर पर मौजूद है और इसका हल भी राष्ट्रीय स्तर पर ही निकालने की जरूरत है। याद करिए। आज से 30-40 साल पहले का वक्त । जब सिर पर मैला ढोते हम किसी व्यक्ति को देखते तो कैसा महसूस होता था। यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होती थी। आज अगर कोई दिख जाए तो हमारा रिएक्शन कैसा होगा जरा इसकी कल्पना करें। आज सिर पर मैला ढोने की प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है। पर दूसरी तरफ सीवरेज में जाकर सफाई करने की मजबूरी ने हमें मंथन करने पर मजबूर कर दिया है। भारत विकास के एक बेहतर मुकाम पर है। सीवरेज सफाई के लिए विदेशों में अत्याधुनिक तकनीक का बेहतर इस्तेमाल भी हो रहा है। फिर क्यों हम प्लांड मर्डर होने दे रहे हैं। क्या राज्य सरकारें और उनकी नोडल एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं कर सकती हैं। क्यों नहीं मैन्युअल सफाई को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में हम सार्थक प्रयास करें। बिना सुरक्षा उपकरण, गैस मास्क के कोई भी कर्मचारी सीवरेज में नहीं उतारा जाए। किसी भी तरह की दुर्घटना के लिए संबंधित सफाई एजेंसी ही जिम्मेदार होगी। अगर सीवरेज में सफाई के दौरान किसी की मौत होती है तो संबंधित एजेंसी को ही एक हफ्ते के अंदर परिजनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित दस लाख रुपए का मुआवजा देना होगा। इसमें दो राय नहीं है कि सीवरेज एक ऐसा जाल है जिसे ठीक करने में हम सौ फीसदी मशीनों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। मजबूरी है कि हम मैन्यूअली काम करवाएं। पर क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि प्रत्येक राज्य सरकार मैन्यूअली वर्क करवाने के लिए एक अलग विंग स्थापित करे। इसके अंदर मजदूरों को बेहतर ट्रेनिंग दे। सुरक्षा उपकरणों का एक बेहतर संसाधन उपलब्ध करवाएं। क्यों नहीं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और अर्बन डेवलपमेंट में ही हम सीवरेज ट्रीटमेंट के आधुनिकीकरण को भी जोड़ दें। इसके लिए किसी अतिरिक्त बजट की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तमाम ऐसे उपाय हैं जिसे स्थापित कर हम इस प्लांड मर्डर को रोक सकते हैं।
आज एक बार फिर प्रधानमंत्री अपने मन की बात करेंगे। आज नहीं तो फिर कभी प्रधानमंत्री अपने मन की बात में इस कुप्रथा को रोकने का आह्वान करें। लोग उनकी बातों का सुन रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातें यहां भी सुनी जाएंगी और देर सबेर इस प्लांड मर्डर को रोका जा सकेगा।
कुणाल वर्मा

kunal@aajsamaaj.com
(लेखक आज समाज के संपादक हैं )

 

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