Home संपादकीय पल्स Do not become ‘God’ Mr Supreme Court, do justice: ‘भगवान’ मत बनिये मि. सुप्रीम कोर्ट, न्याय कीजिए

Do not become ‘God’ Mr Supreme Court, do justice: ‘भगवान’ मत बनिये मि. सुप्रीम कोर्ट, न्याय कीजिए

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विकास हो या नियम, दोनों के नाम पर होने वाले अन्याय और अत्याचार लोगों को व्यवस्था भंग करने के लिए मजबूर करते हैं। देश में पनपे नक्सली आंदोलन और आतंकवाद की जड़ को जब हम खंगालते हैं, तो यह बात सामने आती है। व्यवस्था और नियमों के नाम पर जब हमने आदिवासियों-गरीबों के जीवन से खिलवाड़ किया तब वे हिंसक हुए। आतंकवाद के मूल में वे घटनाएं हैं, जिनको लंबे वक्त तक पनपाया गया। उससे तंग होकर पीड़ितों ने हथियार उठाए। उनके बाद वाली पीढ़ी ने इसे ही अपनी नियति समझ लिया, क्योंकि अदालतों ने उनसे इंसाफ नहीं किया। जब तक इस रोग का समुचित उपचार नहीं होगा, कोई बड़ा नतीजा नहीं निकल सकता। हाल के दिनों में जो घटनाएं हुई हैं, वे सिर्फ चिंताजनक ही नहीं, भविष्य में खतरे के बढ़ने की ओर इशारा कर रही हैं। जरूरत अन्याय, अत्याचार और शोषण रोककर इंसाफ करने की है। दुख तब होता है, जब इस काम को न सरकारें सही तरीके से करती हैं और न हमारी अदालतें। दोनों संस्थाओं में समाज की आखिरी पंक्ति के लोगों के लिए कुछ नहीं है। साधन संपन्नों और कारपोरेट को खुश करने के लिए वह किया जा रहा है, जिसको रोकना ही इनकी जिम्मेदारी है।
आप सोचेंगे कि हम इस तरह की चर्चा क्यों कर रहे हैं, तो बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने एक एनजीओ (जो कथित रूप से जल जंगल की रक्षा करना चाहता है) ने जनहित याचिका के जरिए मांग की कि लंबे समय से जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के कब्जे से जंगल को मुक्त कराया जाए। उसने इसके लिए वन अधिनियम का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवास (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 के तहत जंगलों में रहने वाले 11 लाख आदिवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस अरुण सिन्हा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने लिखित आदेश 20 फरवरी को जारी किया, जिसमें राज्य सरकारों को उन आदिवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया है जिनके दावे खारिज कर दिए गए हैं। याचिका में एनजीओ ने मांग की थी कि उन सभी आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर दिया जाए, जिनके पारंपरिक वनभूमि पर दावे वन अधिकार कानून के तहत खारिज हो जाते हैं। मोदी सरकार को आदिवासियों के हित और अपने कानून के समर्थन में पैरवी करनी थी, जो उसने नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वत: इस पर कोई भी कदम उठाने के बजाय देश के 20 राज्यों के जंगलों में रहने वाले 11 लाख से अधिक लोगों को वहां से बेदखल करने का आदेश पारित कर दिया। पीड़ित आदिवासियों का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट लाखों जंगलवासियों को बेदखल करने का आदेश देते वक्त यह भूल गया कि वह भी संविधान के तहत मिली शक्तियों से युक्त न्याय के नाम पर अभिजात्य होने का लुत्फ उठा रहा है। कोई भी कानून, संविधान की मूल अवधारणा और मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने विधाता बनकर फैसला सुना दिया। वे यह भी भूल गए कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को जीवन का अधिकार है। नागरिकों को उनके मूल अधिकार से वंचित करने की शक्ति किसी में नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस माकंर्डेय काटजू ने कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बेहद दुखी हूं। 11 लाख आदिवासियों को जंगलों से भी भगाया जा रहा है। वे अब कहां जाएंगे? क्या उन्हें समुद्र में फेंक दिया जाएगा या गैस चैंबर में डाल दिया जाएगा? क्या वन अधिनियम, संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार के अनुच्छेद 21 के ऊपर है? काटजू कहते हैं कि जज साहबान आर्टिकल 21 क्यों भूल गए, जिसमें संविधान हम सभी को जीने का अधिकार देता है? जस्टिस काटजू के सवाल और गुस्सा बेवजह नहीं है। देशवासी जानते हैं कि कारपोरेट अपने फायदे के लिए कुछ भी करता है। तमाम एनजीओ उसके इशारे पर काम करते हैं। माना जाता है कि इस वक्त सरकारें भी कारपोरेट घराने चला रहे हैं। जो सदैव से जल, जमीन और जंगल पर काबिज होना चाहते हैं।
समस्या यहीं है। हाल के दिनों में पुलवामा में दर्दनाक हादसा हुआ। सरकार कहती है कि एक स्थानीय युवक आतंकी संगठनों का टूल बन गया। उसने आरडीएक्स से लदी कार को सुरक्षा बल की बस में टकरा दी। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि कश्मीर का हर तीसरा युवा बागी हो रहा है? उसके मन में भारत के शेष लोगों के प्रति गुस्सा क्यों है? यह एक दिन की कहानी नहीं है। इसका कारण लंबे वक्त तक सैन्य बलों और सरकार की वे नीतियां, कार्यकलाप हैं, जिन्होंने कश्मीरियों के जीवन में जहर बोया है। उनकी संपत्तियों पर कब्जे के लिए कारपोरेट ऐसे साजिशें रचता रहा है, जिससे उसे कश्मीर की अकूत प्राकृतिक संपदा पर मालिकाना हक मिले। संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण यह नहीं हो पाया। 1990 में जनता दल सरकार के दौरान उन कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर भगा दिया गया जो कश्मीरियत का मूल थे। आस्थिर सरकारों और कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृह मंत्री बनने से हालात और बिगड़े। नरसिम्हां राव सरकार में इसे संभालने के नाम पर कारपोरेट को कश्मीर में प्रवेश देने की शुरूआत हुई, जो अब तक जारी है। मालिकाना हक न होने के कारण कारपोरेट को दिक्कत है। जिससे सरकार अनुच्छेद 370 खत्म करने के लिए जनमत बनाने में लगी है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कश्मीर में सरकार ने कुछ ऐसा नहीं किया कि कश्मीरियों में भारतीय होने का गर्व पैदा हो। न ही कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने की कार्ययोजना पर काम किया गया।
यह देखने में आ रहा है कि न्यायपालिका मूल कार्यों से अधिक कार्यपालिका के कार्यों में रुचि ले रही है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने संवैधानिक दायित्वों और सीमाओं में काम करने के बजाय शक्ति केंद्र बनने के लिए काम करता दिखता है। नतीजतन वह मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अपने निजी हितों को साधने में लगे हैं। सरकारें और कारपोरेट मिलकर उसे संचालित करते दिखते हैं। सियासी दलों की महात्वाकांक्षाओं की पूर्ति में न्यायपालिका अहम भूमिका निभाने लगी है। यह चिंता का विषय है। शायद तभी अब लोगों के दिलों से न्यायपालिका के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों को इस दिशा में गंभीर चिंतन करना होगा, नहीं तो वे भी दूसरी संस्थाओं की तरह बेइज्जत होते दिखेंगे।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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