Home विचार मंच Deepak in the temple and the glory of the mosque ! मंदिर में दीपक और मस्जिद की शान!

Deepak in the temple and the glory of the mosque ! मंदिर में दीपक और मस्जिद की शान!

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बात 1991 की है। मेरे एक मुस्लिम दोस्त के बहनोई लखनऊ में सीबीआई के डीआईजी थे। एक बार उन्होंने मुझे अपने घर पर खाने को बुलाया। खाने के बाद जब वे अपना घर मुझे दिखा रहे थे तब एक बंद कमरे को देखकर मैने पूछा कि इसमें क्या है तो उन्होंने उसे फौरन खोल दिया। कमरा खुलने पर मैने देखा कि वहां एक मंदिर है उस पर दिया जल रहा है। मुझे आश्चर्य हुआ। मैने कहा कि यहां दिया कौन जलाता है तो वे बोले पास के मंदिर से पुजारी बुला लेता हूं। वही जला जाता है। फिर वे विस्तार से बताने लगे कि मेरे से पहले यहां एक पंडित जी रहते थे। उनके जाने के बाद मैने देखा कि इस कमरे में तो मंदिर है। अब मुझे दो कमरे से ज्यादा की जरूरत है नहीं और इस कोठी में चार कमरे हैं। इसलिए यह कमरा मैने मंदिर के लिए बना रहने दिया और यहां का दिया निरंतर जलते रहने देने के लिए पास के पुजारी जी को बुलवा लिया। वे सज्जन कालपी की एक रियासत बावनी के नवाब परिवार से थे। उन्होंने बताया कि हमारी रियासत से मस्जिद के लिए भी दान जाता था तो अपने इलाके के मंदिरों के लिए भी। यह थी उस समय में लोगों की सदभावना। किसी भी तरह के धार्मिक पक्षपात से परे हम हर एक को बराबर के भाव से देखते थे। उन्होंने कहा कि मंदिर में दीपक जलने से मस्जिद की शान और निखरती है।
यह लेखक के निजी विचार हैं।
मैं अपने बचपन से अब तक देखता हूं तो पाता हूं कि समाज में परस्पर वैमनस्य और धार्मिक पाखंड बढ़ा है। क्या यह नई शिक्षानीति का असर है अथवा हमारे इतिहास और समाज बोध के लगातार कुंद होते जाने का नतीजा। मेरे बचपन में हम इतने हिंदू-मुसलमान नहीं थे जितने कि आज हैं। कोई ऐसा नहीं कि हमें अपनी धार्मिक या सामाजिक पहचान की समझ नहीं थी, सब समझ थी पर तब आज की तरह धार्मिक पहचान हमारे सामाजिक संबंधों में आड़े नहीं आया करती थी। तब मुस्लिम मेहमान हमारे घरों में आते थे तो बैठक में उनके मर्दों को चाय जरूर कांच के गिलासों में दी जाती और चीनी मिट्टी के बर्तनों में परोसी भोजन। लेकिन उसी मुस्लिम मेहमान की महिलाएं जब घर के अंदर जातीं तो यह सारा भेदभाव दूर हो जाता। परस्पर एक दूसरे की साड़ी और गहनों की तारीफ की जाती और नेग-न्योछावर होती। पर क्या मजाल कि एक दूसरे के धर्म को लेकर कोई टीका टिप्पणी हो। हिंदू घरों में आया मुस्लिम मेहमान नमाज के समय जाजम बिछाकर नमाज पढ़ लेते और हिंदू तीज-त्योहार के दिनों में मुस्लिम घरों से मंदिर के लिए या रामलीला अथवा श्रीमदभागवत कथा के आयोजन पर चढ़ावा आता। रामलीला के अधिकतर पात्र, खासकर राम, लक्ष्मण और परशुराम ब्राह्मण ही होते। पर दशरथ, विभीषण, सुग्रीव, जामवंत और रावण गैर ब्राह्मण। पर राम बारात निकलती और गांव में घूमती तो अपनी-अपनी अटरिया से मुस्लिम महिलाएं भी न्योछावर फेंकती और हाथ जोड़ा करतीं। हमें पता रहता कि मुस्लिमों का शबेबरात कब है, मुहर्रम कब है और रमजान कब शुरू होगा। इसी तरह मुस्लिम भी जानते कि निर्जला एकादशी कब है और पंचक कब लगे। हमारे यहां एक मुसलमान खटिया बिनने वाले ने खटिया बिनने से इसलिए मना कर दिया था कि पंचक लगे हुए थे। किंवाड़-दरवाजे मुसलमान ही बनाते और चौखट पर लगी गणेश जी की मूर्ति भी। हम मुस्लिम घरों में जाते तो चाय व शरबत कहीं और से आती पूरी-सब्जी पास के ठाकुर जी के यहां से। पर खानपान की कुछ भी कहें बैर-भाव कतई नहीं था। कुछ आर्यासमाजी परिवारों में जरूर मुस्लिमों के प्रति सत्यार्थ प्रकाश वाला गुस्सा रहता लेकिन सनातनी परिवारों में कतई नहीं। न मुसलमान हिंदुओं का मजाक उड़ाते न हिंदू धार्मिक आधार पर मुसलमानों पर टिप्पणी करते। ड्राई फ्रूट्स खानबाबा ही लाते और उनकी अटपटी हिंदी-उर्दू मजेदार होती जिसमें लिंगभेद का आलम यह था कि खानबाबा सबको स्त्रीलिंग से ही संबोधित करते।
अब जरा आज देखिए, खानपान का भेद भले न हो। हम मुसलमान के साथ एक थाली में भले खा लें पर एक-दूसरे पर तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ते। जब आप हिंदू धर्म या हिंदू रीति-रिवाजों की खिल्ली उड़ाते हो तो मुसलमान खुश होता है और जब इस्लाम को आड़े हाथों लेते हो तो हिंदू गदगदायमान हो जाता है। तब गांव में अहीर, कुर्मी, ठाकुर, लाला, कोरी, काछी, नाऊ, साहूकार या ब्राह्मण लगभग पास-पास ही रहते और परस्पर मित्र भाव भी था। दलित खासकर जाटवों का मोहल्ला अलग होता था पर आज भी वही हाल है। लेकिन तब सब एक दूसरे पर सब निर्भर थे। जातीय भेदभाव था लेकिन दलितों के साथ ही और वह आज और तीखा हो गया है। वाल्मीकि तब भी जाटवों के मोहल्लों में नहीं बसते थे और आज भी वही हाल है। ठाकुर तब भी लाठी चलाते थे और अहीर उनके इशारे पर दलितों को खदेड़ते थे आज ठाकुरों के इशारे पर अहीर लाठी नहीं चलाते बल्कि खुद अपनी प्रभुता के लिए दलितों पर लाठी चलाते हैं और फिर स्वांग भी करते हैं। कोरी, काछी, नाऊ, लोहार आदि पेशेवर जातियां गांव छोड़ गई हैं। उन्होंने शहर जाकर पैसा कमाया है पर दलित आज भी वैसे ही हैं। तरक्की मध्यवर्ती जातियों यथा- यादव, कुर्मी ने ही की। वे वैचारिक रूप से भी बढ़े, ताकत से भी, परिवार पर एकाधिकार बनाए रखने में भी और बाहुबल में भी। राजनीति में तो यादव पीछे रह गए लेकिन यादवों के नाम पर कुछ परिवार जरूर बढ़े और मजा देखिए कि परिवार का विरोध यादव कभी नहीं करता चाहे वह बिहार हो या यूपी। ब्राह्मण, बनिए और लाला तो पचास के दशक से ही गांव छोड़ गए पर ठाकुर आज भी गांव में पड़ा है और पुराने दिनों की जिद पकड़े है। अब ऐसे आपाधापी के माहौल में शिक्षा का सबसे अधिक ह्रास हुआ है। न इतिहास पढ़ा न समाजशास्त्र अलबत्ता परिवार को बनाए रखने की तजबीजें खूब फली-फूली हैं। जब परिवार बढ़ेगा तो बाकी के परिवारों से द्वेष होगा ही। अगर आपको वाकई समाज में कुछ नया करना है तो परिवार की राजनीति करने वालों को हांकना सीखो। तब ही प्रेम से रह सकते हो क्योंकि परिवार नफरत सिखाता है।

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