Home संपादकीय पल्स Congress away from Patience, service, tolerance and compassion: सब्र, सेवा, सहनशीलता और संवेदना से दूर कांग्रेस

Congress away from Patience, service, tolerance and compassion: सब्र, सेवा, सहनशीलता और संवेदना से दूर कांग्रेस

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17वीं लोकसभा के लिए चुनाव का जनादेश नरेंद्र मोदी को सशक्त बनाने का मिला। कांग्रेस को एक बार फिर से सत्ता बाहर रहकर जमीनी हकीकत से रूबरू होने और आत्ममंथन करने का हुक्म जनता ने दिया है। मतदाताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व को सकारात्मक दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहितभी किया है।कांग्रेस को पिछली बार से आठ सीटें अधिक मिली हैं। जनमत के शेयर में उसके वोट भी बढ़े हैं।पांच साल पहले कांग्रेस को जनता से जुड़ने का जनादेश मिला था मगर वह इस अवसर का लाभ उठाने के बजाय आपस में ही ताकत अजमाइश करती रही। अबकी बार भी नेताओं में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। कांग्रेस के क्षत्रपों का घमंड अभी भी दिमाग पर चढ़ा हुआ है। वे यह नहीं समझ पा रहे कि कांग्रेस की यह हालत असल में उनके पिछले कर्मों का फल है, जिसे देश को आजादी दिलाने वाली पार्टी कांग्रेस को भुगतनी पड़ रही है। तमाम वे क्षत्रप जो बड़े बोल बोलते थे, कि पार्टी उनके कारण खड़ी है, वे खुद जमीन पर उतरते ही बेनकाब हो गये। वे वातानुकूलित जीवनशैली से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं हैं जबकि जनता तमाम दिक्कतों से जूझ रही है। यह वही जनता है,जिसने उन्हें यह वातानुकूलित माहौल दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की समस्या यह है कि वह अकेले ही कांग्रेस और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में व्यस्त रहे। नतीजे आने के बाद वह भी हार से सबक सीखने और भविष्य में बड़ी जीत के लिए जमीन तैयार करने के बजाय मैदान छोड़कर भागते दिख रहे हैं। उनकी शैली, मुकाबला करने की नहीं बल्कि बुरे हालात में कांग्रेस को असहाय छोड़ने की नजर आ रही है।
सबसे पहले बात राहुल गांधी की करते हैं। जब पहली बार 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी अमेठी पहुंचे और वहां से जमानत भी न बचा सके थे, तो उन्होंने हार से सबक लिया। तीन साल बाद उसी अमेठी से वह रिकार्ड मतों से जीते क्योंकि उन्होंने अमेठी से जमीनी जुड़ाव पैदा किया। उनके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने भी अमेठी में जन जन से नाता रखा। वह जब जो बन पड़ा अमेठी के लिए किया। राहुल गांधी को अमेठी ने मौका दिया मगर उन्होंने वहां अपनी जमीन तैयार नहीं की। यही कारण है कि वहां स्मृति ईरानी को राहुल के खिलाफ अपनी जमीन तैयार करने का मौका मिल गया। उन्होंने बार-बार हारने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और एक मजबूत आधार तैयार कर लिया, जो उनकी जीत का कारण बना। संवेदनाओं और सहनशीलता से दूर अभिमान में राहुल ने अमेठी की जनता से चर्चा किये बिना ही उसे छोड़ने की योजना बना ली। वहां से जाते वक्त अमेठी के लोगों का आशिर्वाद लेना भी जरूरी नहीं समझा। कमोबेश यही स्थिति देश के तमाम राज्यों में कांग्रेस के नेताओं की भी रही। कांग्रेस के नेताओं के घमंड की एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। हम अपने एक टीवी कार्यक्रम के लिए केंद्र और राज्य के तमाम मंत्रियों के साथ चर्चा करते हैं। इसके लिए हमने जब भी जिस नेता को बुलाया, वह सहर्ष स्टूडियो पहुंचा मगर जब कांग्रेस के एक नेता को बुलाया तो वह बोले मैं तो किसी स्टूडियो में नहीं जाता। हमने भी कह दिया तो हम भी आपके साथ कार्यक्रम नहीं कर पाएंगे। चुनाव में उन्हें हमारे सबसे अधिक टीआरपी वाले कार्यक्रम की जरूरत थी मगर नहीं हो सका। जनता ने उनको इसी घमंड का जवाब दिया और वह अपनी धरती पर ही पस्त हो गये।
मतदाता किसी भी पार्टी को हमेशा के लिए सत्ता सौंपना पसंद नहीं करता। उसे जब लगता है, उसने जिसे सत्ता सौंपी है वह दल या नेता बहुत अहंकारी हो गये हैं तो वो कमजोर पक्ष को जनादेश दे देता है। कांग्रेस को समझना होगा कि उसको किसी दुश्मन ने नहीं खुद उसके लोगों ने ही धूल में मिलाया है। कांग्रेस के जन्म 1885 से लेकर अब तक एक बात सत्य है कि कांग्रेस का कभी कोई काडर वोट नहीं रहा। उसका वोट जन अपेक्षाओं के अनुरूप काम से बना। अंग्रेजी हुकूमत की कमियों पर टीका टिप्पणी के साथ जनता की बात करने से कांग्रेस खड़ी हुई। धार्मिक भेदभाव रोकने के लिए हिंदू महासभा से लेकर मुस्लिम लीग और दलित-पिछड़ो तक की बात करने वाला यही एकमात्र दल था। सब की बात करते हुए भी इस दल ने कभी किसी एक जाति धर्म की वकालत नहीं की। यही कारण है कि तमाम कट्टर सोच वाले लोग इससे अलग होकर संगठन बनाते चले गये। इन सब के बाद भी कांग्रेस सर्व समाज और स्वशासन की लड़ाई लड़ती रही। उसके नेता अभिमान में चूर नहीं थे, जबकि वे बड़े घरों के लोग थे। उन्होंने आमजन को ध्यान में रखकर जमीनी संघर्ष किया। इसी का नतीजा था, कि पूरा देश कांग्रेस के पीछे खड़ा हो गया। देश की आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू को जो भारत मिला था, वो नुचा, खुचा, लुटा, पिटा और बरबाद हालत में था। उसे बनाने का संघर्ष देश की आजादी से बड़ा था क्योंकि जनता की अपेक्षायें बड़ी थीं मगर जब नेहरू ने आमजन को उससे जोड़कर काम शुरू किया तो तेजी के साथ देश आगे बढ़ा। ऐश ओ आराम में पले नेहरू ने सादा जीवन जीने का फैसला किया। वह किसी लग्जरी साधन या वातानुकूलित माहौल में नहीं बल्कि प्राकृतिक हाल में जीने लगे थे। यही कारण था कि उनके साथ जनता पीछे भागने में गर्व महसूस करती थी।
अब कांग्रेस की हालत यह है कि उसके जमीनी संगठन गुम हैं। जनता अपने स्वार्थसिद्ध के लिए नैतिक-अनैतिक कोई भी तरीका अख्तियार करने को तैयार है। जरूरमंद के लिए कांग्रेस का सेवादल, किसान-मजदूर संघ, महिला, युवक कांग्रेस और छात्र संगठन कहीं नजर नहीं आते हैं। जाति-धर्म की सियासत कांग्रेस शुरूआत से ही नहीं करती थी मगर अब जब अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़ों की सियासत करती है, तब वह वर्ग सवाल उठाता है जिसने कांग्रेस को खड़ा किया था। जब कांग्रेस अपने बुरे दौर से गुजर रही है तो उसे यह समीक्षा करनी होगी कि भाजपा या मोदी अचानक देश के हीरो कैसे बन गये? उन्होंने अगर हिंदू अतिवाद किया तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़ों के हितों की भी बात की। उसने अगर राष्ट्रवाद की सियासत की तो उनके मूल संगठन आरएसएस ने जनता की सेवा का कोई मौका नहीं छोड़ा। उसने कांग्रेस की मूल नीति को अपना लिया। राहुल गांधी को भागने के बजाय अपने अहम को छोड़कर कांग्रेसको एक बार फिर से अपने संगठन की पुरानी नीतियों और नेताओं से सीखने की जरूरत है। कांग्रेस के नेताओं को वातानुकूलित माहौल छोड़कर जमीनी संगठनों को मजबूत करके जनता से जुड़ाव बनाना पड़ेगा। सभी वर्गों और समुदाय की बात करनी पड़ेगी मगर सिर्फ सोशल मीडिया या मीडिया पर नहीं बल्कि जमीनी संघर्ष करके। जनता मेंयह विश्वास जगाना होगा कि कांग्रेस ही उनकी अपनी पार्टी है। खुद को मठाधीश समझने वाले नेताओं को सड़क पर दौड़ाना होगा। जनता की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके साथ खड़ा होना होगा। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक हवाई नेताओं से कुछ नहीं निकलेगा। मोदी को गाली देने के बजाय अपने जन जुड़ाव और सरकार की नीतियों पर जमीनी हमले करके ही फिर से कांग्रेस को सशक्त बनाया जा सकता है।अब जो कांग्रेस आई है वह राहुल टीम है, उस टीम को सादगी के साथ संघर्ष करने उतार दीजिए, इंदिरा जी की तरह।
जय हिंद!

 अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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