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Conflicts of government formation!: सरकार बनाने के द्वंद!

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अब बस लोकसभा चुनाव का एक चरण बाकी रह गया है। कुल 484 सीटों पर वोट पड़ चुके हैं, शेष 59 सीटों पर रविवार को मतदान संपन्न हो जाएगा। इसलिए अब मेल-मिलाप और कुशल-क्षेम पूछने का सिलसिला शुरू हो गया है। खांटी राजनीतिक और समझौता कराने में माहिर लोग भी सक्रिय हो गए हैं। क्योंकि नतीजे का काफी कुछ अनुमान लगने लगा है। एक अनुमान तो यह है, कि भाजपा अकेले दम पर बहुमत पा लेगी और उसकी अगुआई वाले एनडीए के घटक दलों से उसे और ताकत मिलेगी। तब फिर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वाभाविक रूप से ही अगले प्रधानमंत्री होंगे। दूसरी बात, जिसकी संभावना प्रबल है, वह यह कि संभवत: इस चुनाव में कोई भी पार्टी स्पष्ट बहुमत तक नहीं पहुंच पाएगी। और शायद भाजपा के लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे। लेकिन बहुमत से वह भी दूर ही होगी। ऐसे में उसके गठबंधन के दलों की ‘डिमांड’ और ‘बारगेनिंग पॉवर’ बढ़ेगी।
ऐसी स्थिति में अगर भाजपा किसी तरह जोड़-तोड़ कर सरकार बना भी लेती है, तो उसको कई तरह के दबावों को झेलना होगा। अब सवाल उठता है, कि ऐसे में भाजपा का कौन-सा नेता ऐसा होगा, जो अपने सहयोगी दलों के साथ बीच का कोई रास्ता निकाल सकने में सक्षम होगा! पिछली लोकसभा में भाजपा पूरे बहुमत के साथ आई थी, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निर्लद होकर सरकार चलाते रहे। उनका अपना जो मिजाज है, वह सबके साथ मिलकर चलने का नहीं रहा है। चाहे वह उनका मुख्यमंत्रित्तव काल हो या बतौर प्रधानमंत्री उनका राज-काज रहा हो। लेकिन क्या वे गठबंधन दलों की तुनक-मिजाजी और बार-बार की उनकी डिमांड को बर्दाश्त कर पाएंगे? यह लाख टके का सवाल है! अब प्रश्न है, कि वे नहीं तो कौन? इसे लेकर भाजपा के अन्दर जबरदस्त मार-काट है। इस बिंदु पर आकर कोई कुछ भी टिप्पणी नहीं कर पा रहा। मोदी जी ने अपनी कैबिनेट में और पार्टी के राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह ने किसी को भी नंबर दो बनने ही नहीं दिया। हालांकि भाजपा का ऐसा कैरेक्टर पहले कभी नहीं रहा। चाहे वह पूर्ववर्ती जनसंघ रही हो, या 1980 में अस्तित्त्व में आई भाजपा। उसके अन्दर पहली, दूसरी और तीसरी कतार के नेताओं की कमी नहीं रही। अटलबिहारी बाजपेयी जब भाजपा के सर्वोच्च नेता थे, तब भी लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी कमतर नहीं थे। लेकिन आज स्थिति यह है, कि आडवाणी और जोशी ठंडे बस्ते डाल दिए गए हैं तथा राजनाथ सिंह मौन धारण किए रहते हैं। थोड़ा बहुत नितिन गडकरी मुंह खोलते भी हैं, तो तब ही जब आरएसएस उन्हें उकसाता है।
अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि आरएसएस प्रमुख भी मोदी का मूड देख कर बात करते हैं। प्रधानमंत्री की अपनी ताकत के लिए यह अच्छी बात है, किंतु लोकतंत्र में कोई भी संसदीय दल चलता तो आंतरिक लोकतंत्र से ही है, जो अब भाजपा में नहीं बचा है। इसीलिए पार्टी के अन्दर सन्नाटा है। एक और अनुमान यह है, कि निश्चय ही कांग्रेस इस बार पहले से बहुत ज्यादा ताकतवर हो कर उभरेगी। उसके अन्दर नेतृत्त्व का संकट भी नहीं है, और राहुल गांधी ने इधर काफी उदारता दिखाई है। खासकर कर्नाटक में जिस तरह उन्होंने जेडी(एस) के कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री बनने दिया, उससे क्षेत्रीय दलों में उनके प्रति भरोसा बढ़ा है। लेकिन अहम सवाल यह है, कि क्या कांग्रेस इतनी सीटें ला पाएगी, जिसके बूते वे सरकार बना सकें? इसके अलावा क्या क्षेत्रीय दल कांग्रेस को समर्थन देंगे? क्योंकि गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई दलों में अब नेता ज्यादा हैं अनुयाई कम। उधर इन क्षेत्रीय दलों के बीच दूरियां इतनी अधिक हैं, कि उनमें से किसी के नाम पर सहमति बननी मुश्किल है। कोई भी क्षत्रप खुद के अलावा किसी और का नाम प्रधानमंत्री के पद के लिए बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का प्रदर्शन भले बहुत अच्छा रहे, किंतु फिर भी वे अलग-अलग कितने पा पाएंगे? ममता बनर्जी, एन. चन्द्रबाबू नायडू सब के अपने-अपने स्वार्थ और महत्त्वाकांक्षाएं हैं। कौन अपनी महत्त्वाकांक्षा को कितना दबा पाएगा? ऐसे में एक समाधान यह भी है, कि कांग्रेस को ही मौका दिया जाए! राहुल गांधी चीजों को मैनेज कर लेंगे। मगर अभी तक कांग्रेस ने ऐसी स्थिति में गद्दी सदैव नेहरू-गांधी परिवार से अलग शख्स को दी है। चाहे 1991 में पीवी नरसिंह राव रहे हों, या 2004 और 2009 में मनमोहन सिंह। दस जनपथ ने प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं ली। तब क्या राहुल गांधी के लिए यह कुर्सी ‘सेफ’ रहेगी? अभी यह सवाल अनुत्तरित है। नेहरु-गांधी परिवार के बाहर इस समय नेतृत्त्व की क्वालिटी भी किसके पास है। बहुमत मिलने से कोई भी पार्टी अनियंत्रित तो हो जाती है, लेकिन पांच साल तक लोकसभा चलते रहने का सुभीता तो होता ही है। गठबंधन अगर लाइक माइंडेड दलों के बीच हुआ, तब तो ठीक। अन्यथा वह ‘कट’ बंधन बन जाता है, और आपस में ही वे दल एक-दूसरे को काटने लगते हैं।
ऐसे में यह प्रश्न आता है, फिर कैसे बनेगी सरकार? देश में आज कई ऐसे नेता हैं, जिनका विजन और जिनकी लगन सही में तारीफ के काबिल हैं। लेकिन उनमें से अधिकतर क्षेत्रीय दलों के नेता हैं। और वे चाहें भी तो सत्ता में बहुमत लाइक दूर, दहाई से ऊपर नहीं बढ़ सकते। ओड़ीशा के नवीन पटनायक की ईमानदारी और उनकी लगन बेजोड़ है, पर ओडीसा में मात्र 21 सीटें ही हैं। और दूसरे राज्यों में उनका कोई आधार नहीं है। इसी तरह आंध्र में चंद्र बाबू नायडू ने बहुत अच्छे काम किए हैं, लेकिन क्या अकेले दम पर वे सत्ता में आ सकते हैं? जाहिर है, सत्ता में आने की दम-खम वही रख सकता है, जिसकी या तो पार्टी राष्टÑीय स्तर की हो या वह उत्तर प्रदेश सरीखे किसी बड़े राज्य से हो, जहां 80 सीटें हैं। इस वजह से नेता तो वही बन सकता है, जिसके पास लोग हों, या भीड़ हो। लोकतंत्र की यह मजबूरी है, कि यहां नेतृत्त्व किसी राजनेता के अपने गुण से नहीं बल्कि भीड़ को बटोरे रखने की क्षमता से तय होता है। जो आसार दिख रहे हैं, उससे लगता है, कि 2019 की लोकसभा रंग-बिरंगी होगी।
इसमें विविधता इतनी ज्यादा होगी, कि तय करना शायद मुश्किल होगा कि कौन क्या रंग दिखा देगा! मायावती, ममता, तो हैं ही, इनके अलावा टीडीपी, शिव सेना, टीआरएस सब के सब अपनी-अपनी इच्छाएं पाले हैं। प्रधानमंत्री कोई भी बने, पर इन सब से पार पाना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। 1989 में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी, लेकिन बहुमत से दूर थी। इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राष्टÑपति श्री वेंकट रमन के बुलावे पर साफ कह दिया था, कि उन्हें बहुमत नहीं है, इसलिए वीपी सिंह की जन मोर्चा को ही सरकार बनाने का पहले मौका दिया जाए। आज तीन दशक बाद ऐसी स्थिति आने पर क्या होगा, यह देखना बाकी है।
शंभूनाथ शुक्ल
(लेखक वरिष्ठ संपादक रहे हैं)

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