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Common election between lies and truth: झूठ और सच के बीच हो रहा आम चुनाव

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तानाशाह एडोल्फ हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोयबल्स का एक मशहूर कथन है कि ‘किसी झूठ को इतनी बार कहो कि वह सच बन जाए और सब उस पर यकीन करने लगें।’ 17वीं लोकसभा के लिए देश में हो रहे चुनाव में यही हो रहा है। उच्चतम पदों पर बैठे लोग, जिनसे सच और ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, वो भी झूठ का इतना सहारा ले रहे हैं कि लोकतंत्र का यह महापर्व झूठ और सच की लड़ाई में तब्दील हो गया है। फैसला अंतत: जनता को ही करना है कि वो किसके साथ खड़ी होती है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लीचिंग के मामलों की सुनवाई करते हुए चिंता जताई थी कि क्या लोकतंत्र, भीड़ तंत्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की यह चिंता जायज थी क्योंकि झूठ का सहारा लेकर जिस तरह से हमले किये जा रहे हैं। देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले नेताओं का चरित्र हनन किया जा रहा है। झूठ बोलकर उन्हें तमाम बुराइयों का पुतला साबित किया जा रहा है, वह दुखद है। वो महानायक जिन्हें झूठ के सहारे बदनाम कर अपना कद बढ़ाने की सियासत हो रही है, अपना पक्ष रखने को मौजूद ही नहीं हैं।
अदालत में आतंकी होने का आरोप तय होने के बाद भी उस भाजपा ने प्रज्ञा सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया जो राष्ट्रवाद का रट्टा लगाते नहीं थकती। उसने भी देश के लिए शहीद होने वाले एक जांबाज पुलिस अफसर के चरित्र को कलंकित करने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया। अपने प्रत्याशी के बचाव में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने लगातार झूठ पर झूठ बोला। इस महिला को अगर छोड़ दें तो दूसरी महिला केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी हैं, जिन्होंने चौथी बार चुनाव आयोग को दाखिल अपने शपथ पत्र में ‘सच’ को बदला है। बार-बार उनके बदलते शपथ पत्र से उनका झूठ पकड़ा गया मगर चुनाव आयोग लाचार दिखा। सबसे बड़ा उदाहरण हमारे प्रधानमंत्री का है जिनके शपथ पत्र की भी सूचनाएं बदलती रही हैं। उन्होंने खुद को संत, महात्मा, फकीर साबित करने के लिए कई कहानियां बयां की हैं। कभी वह वीर बालक बन जाते हैं जो मगरमच्छ के मुंह से गेंद छीन लाता है, तो कभी वह चाय वाले और अब तो वह हिमालय-काशी के तपस्वी बालक भी बन गये हैं।
बहराल, हमें उनके इस महिमा मंडन से कोई आपत्ति नहीं क्योंकि यह उनकी मर्जी है। उनके समर्थक अगर इसमें खुश हैं तो हमें आपत्ति होनी भी नहीं चाहिए, मगर प्रधानमंत्री पद की गरिमा गिराने से आपत्ति जरूर है। इस पद पर बैठा व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं, बल्कि देश का आइना होता है।
मोदी मंत्रिमंडल की सदस्य रहीं उमा भारती ने प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए चोर की बीवी शब्द का इस्तेमाल किया। उमा भारती पर स्वयं गंगा सफाई के नाम पर धांधली का आरोप है। किसी महिला के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल करते उनको भारतीय संस्कार याद नहीं रहे। पिछले पांच साल से सरकार राबर्ट वाड्रा को चोर साबित करने में लगी है मगर अब तक एक भी आरोप पत्र नहीं बना पाई। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक के चरित्र से लेकर तमाम बातों में उनको कलंकित करने की झूठी कहानियां और फोटो फैलाई जाती हैं, जिनमें कोई सच्चाई नहीं हैं। यह सब हमारी संस्कृति और सभ्यता के खिलाफ हो रहा है। पुराने नेताओं के खिलाफ जहर बोने के लिए झूठ पर झूठ गढ़ा जा रहा है मगर हमारे नीति नियंता इस पर न सिर्फ चुप्पी साधे हैं, बल्कि उसको बढ़ावा दे रहे हैं। सियासी फायदे के लिए वह किया जा रहा है जो लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। हमारा संविधान हर व्यक्ति को इतनी शक्ति देता है कि वह अपना प्रतिनिधि चुन सके। सवाल वहीं खड़ा है कि क्या परोसे गये झूठ पर लोकतंत्र का निर्माण होने लगा है? क्या जीत का रास्ता झूठ से निकलता है और क्या झूठ पर ही हमारा मतदाता यकीन करता है? शायद जवाब हां आएगा क्योंकि मतदाता स्वयं सच तलाशना नहीं चाहता।
तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य चाणक्य ने कहा था कि व्यक्ति पद से बड़ा नहीं बनता, बल्कि व्यक्तित्व से बनता है। अपने व्यक्तित्व को बड़ा बनाने के लिए पूर्व में हुए महान व्यक्तित्व के लोगों को कलंकित करना अपराध है। ‘बड़ों’ से शब्दों की गरिमा की भी उम्मीद की जाती है मगर इस लोकतंत्र के उत्सव में शब्दों की गरिमा कथित बड़ों ने ही गिराई है। हमारे सैनिकों के कुछ छोटे आॅपरेशंस को झूठ के सहारे महिमा मंडित किया गया जैसे उन्होंने कोई देश फतह कर लिया हो। पूरा विश्व जानता है कि भारत पाकिस्तान के बीच 1947, 48, 65 और 71 में सीधे युद्ध हुए। इन सभी में पाकिस्तान को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। 1965 में हमारी सेनाओं ने लाहौर में तिरंगा फहराया और 1971 में न केवल तिरंगा फहराया, बल्कि पाक सेनाध्यक्ष सहित 92 हजार सैनिकों को बंदी बनाया गया। पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये गये। इसके बाद पाकिस्तान की आज तक सीधे युद्ध की हिम्मत नहीं हुई। 1999 में कारगिल में पाकिस्तान की घुसपैठ पर उन्हें खदेड़ा गया मगर यह युद्ध नहीं था। 2017 और 2019 में चुनाव के तुरंत पहले सेना के एक आॅपरेशन को ऐसे प्रस्तुत किया गया, जैसे हमने बड़ा युद्ध जीत लिया हो। झूठ और सच के बीच सैन्य कार्रवाई को चुनाव जीतने का आधार बना लिया गया। सवाल फिर वहीं खड़ा हो गया कि क्या भारत का मतदाता इतना मूर्ख है, जो सच और झूठ के बीच अंतर नहीं कर पाता? वह झूठ को ही स्वीकार कर लेता है क्योंकि इतना झूठ बोला जाता है कि वह सच लगने लगे!
हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। लोकतंत्र में सिर गिने जाते हैं, वो सिर नैतिक लोगों के हों या अनैतिक लोगों के। इसी बात का फायदा उठाने के लिए हर तरह से झूठ बोला जा रहा है। इस वक्त कोई देशभक्ति और देश के लिए अपना सबकुछ देने वालों पर चर्चा नहीं कर रहा। चर्चा ‘वाद’ पर हो रही है। कहीं जातिवाद, कहीं धर्मवाद, कहीं क्षेत्रवाद तो कहीं राष्ट्रवाद। आश्चर्य की बात तब लगती है जब हम देखते हैं कि वो लोग राष्ट्रवाद की बात कर रहे हैं जिन्होंने राष्ट्र के लिए कुछ नहीं किया है। वह लोग धर्मवाद कर रहे हैं जिन्हें धर्म का ज्ञान ही नहीं है। वो लोग जाति के संरक्षक बने हैं जो जातियों के नाम पर सालों से सुख भोगते रहे मगर किया कुछ नहीं। वह लोग क्षेत्रवाद की बात करते हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र को उन्नत बनाने के लिए कुछ नहीं किया। हम गलती उन नेताओं की नहीं मानते जो झूठ बोल रहे हैं, बल्कि गलती उस मतदाता की है जो झूठ को बगैर परखे स्वीकार कर लेता है।
हम उम्मीद करते हैं कि खुद को शिक्षित कहने वाले मतदाता कम से कम सच और झूठ में अंतर करना सीखेंगे। वो सच के साथ खड़े होने का हौसला दिखाएंगे। अगर हम झूठ के साथ खड़े रहे तो सच की हत्या होगी। झूठ का राज जब स्थापित होगा तो फिर हमको किसी भी उस चीज की अपेक्षा करने का अधिकार नहीं होगा जो एक अच्छे शासन और शासक से की जाती है। यह आम चुनाव झूठ और सच के बीच हो रहा है, फैसला आपको करना है कि किसे चुनेंगे।

जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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