Home संपादकीय सड़क पर बचपन, क्यों नहीं होते ठोस प्रयास : डॉ. निवेदिता शर्मा

सड़क पर बचपन, क्यों नहीं होते ठोस प्रयास : डॉ. निवेदिता शर्मा

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डॉ. न‍िवेदिता शर्मा

बच्चे परिवार तथा समाज की महत्वपूर्ण धुरी होते हैं तथा वह देश का भविष्य हैं। क्यों कि यह बच्चे ही भविष्य में देश के कर्णधार बनेंगे। लेकिन समाज में बच्चों के प्रति पनपती संवेदनहीनता व गैर जिम्मेदारी उन्हें कुंठित, असहाय व नशे की आदी तक बना रही है। मौजूदा दौर में बाल मजदूरी न सिर्फ एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है बल्कि विश्व स्तर पर भी इसका खासा दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। जहां अपने खेल-कूद, मौज मस्ती व पढ़ाई लिखाई की उम्र में बच्चे बाल मजदूरी व पारिवारिक खर्च का बोझ उठाते हुए नजर आ जायंगे।

यह एक बड़ी विकृति है तथा राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं एवं संगठनों द्वारा इस दिशा में प्रयास किये जाने के बावजूद अपेक्षित नतीजे सामने न आने से यह भी स्पष्ट है कि मानवीय मूल्यों का लगातार पतन हो रहा है तथा देश ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों की सोच आत्मकेन्द्रित व स्वार्थपूर्ण हो चुकी है। जो अपने व्यावसायिक व अन्य हितों को पूरा करने के लिये बच्चों से न सिर्फ बाल मजदूरी करवा रहे हैं बल्कि उन्हें कम मेहनताना देकर उनका शोषण भी कर रहे हैं। होटलों, बड़े रासायनिक कारखानों में काम करने वाले बच्चे कई बार दुर्घटनाओं का शिकार होकर असमय काल का ग्रास भी बन जाते हैं तथा कई बार तो उनके माता-पिता व परिजन उन्हें ढूंढ़ भी नहीं पाते। क्यों कि जो लोग बच्चों से अपने यहां बाल मजदूरी करवाते हैं वह बच्चों का रिकार्ड भी नहीं रखते क्यों कि बाल मजदूरी करवाना एक अपराध है तथा रिकार्ड संधारित करने में उन्हें कानूनी झंझटों में फंसने का डर रहता है। इसलिये वह थोड़ा मेहनताना देकर बच्चों से बाल मजदूरी करवाते हैं तथा इस बीच बच्चे यदि किसी हादसे का शिकार हो गये तो जिम्मेदार लोगों द्वारा मामले से अनभिज्ञता जताते हुए पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया जाता है।

कहने के लिये तो सरकार द्वारा बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में तमाम प्रयासों का दावा किया जाता है वहीं बचपन बचाओ आंदोलन जैसे कार्यक्रमों के संचालन के साथ-साथ बच्चों को बाल मजदूरी से बचाने के लिये कई संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन इसके बावजूद सार्थक नतीजे सामने न आने से स्पष्ट है कि लोग स्वस्फूर्त ढंग से इस समस्या के समाधान में एक तो अपनी भूमिका निभाना ही नहीं चाहते और जो लोग या संगठन इस दिशा में कुछ काम करना भी चाहते हैं तो उनके सामने तमाम चुनौतियां और दुस्वारियां हैं। केंद्र व राज्य सरकारें जोर-शोर से 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का पता विभिन्न कार्य क्षेत्रों में सर्वे के माध्यम से लगा रही हैं व आवश्यकतानुसार कार्यवाही भी जारी है लेकिन बाल-कल्याण के ऐसे अभियान इस दिशा में कोरे हथियार ही साबित हो रहे हैं। क्यों कि इस दिशा में प्रयास भले ही किये जा रहे हैं लेकिन इसमें संवेदनशीलता और जवाबदेही का अभाव तो है ही साथ ही सार्थक नतीजों की गारंटी का ध्यान भी नहीं रखा जाता है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के आधार पर दुनियां के बच्चों की स्थिति देखी जाये तो बाल मजदूरी पर लगाये गये तमाम प्रतिबंध कोरी कागजी कार्यवाही ही साबित हुए हैं। हालांकि इसमें निहित कानूनों द्वारा ऐसे उद्योगों में जहां कम उम्र के बच्चे खतरनाक कार्य कर रहे हैं, दबाव पडऩे पर निकाल अवश्य दिये गये हैं लेकिन आर्थिक मजबूरी इन्हें पहले से भी ज्यादा खतरनाक उद्योगों में खींच ले गयी। साथ ही बाल मजदूरी को बढ़ावा देने के लिये जिम्मेदार लेगों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की जाती, जिससे उनके हौसले बुलंद रहते हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट में खतरनाक उद्योग धंधों में लगे बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन व मानवीय सभ्यता के विरूद्ध अपराध की संज्ञा दी गयी है किंतु इस मिथक की अवधारणा को भी गलत साबित करार दिया गया है कि बाल मजदूरी महज गरीब और विकासशील देशों की समस्या है। विकसित देशों में भी यह समस्या विकराल है।

आज पूरे विश्व में 14 वर्ष से कम उम्र के 25 करोड़ बच्चे मजदूरी करने को विवश हैं जिनमें 47 प्रतिशत अफ्रीका में, 16 प्रतिशत मध्यपूर्व में व उत्तरी अफ्रीका में, 34 प्रतिशत दक्षिण एशिया में तो 12 प्रतिशत लेटिन अमरीका में, 6 प्रतिशत एशिया (पूर्व) व प्रशांत क्षेत्रों में तथा 13 प्रतिशत अन्य राष्ट्रकुल देशों में हैं। बाल मजदूरी व बाल शोषण के क्षेत्र में भारत जैसे प्रगतिशील देश की गिनती सबसे ऊपर है जहां 15 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी कर रहे हैं जिसमें अब भी 3 करोड़ बच्चे खतरनाक उद्योगों में कार्यरत हैं। यहां 2 करोड़ बच्चे खेतों में व लघु उद्योगों में बंधुआ मजदूर के तौर पर अपना जीवन बिता रहे हैं। देश में गरीब परिवारों की आमदनी का 23 प्रतिशत भाग उनके बच्चे ही कमाकर दे रहे हैं। यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इन बच्चों के जीवन में स्कूली शिक्षा, मनोरंजन व स्वास्थ्य के लिए कोई महत्व नहीं है। उनकी जिंदगी में तो बस जिल्लत व मजबूरी से ही उनका कदम-कदम पर सामना होता है।

हालांकि बाल मजदूरों की समस्याएं हल करना काफी जटिल कार्य हैं लेकिन इनके समाधान के प्रयास जहां ईमानदारी से हों, वहीं बाल मजदूरों पर आश्रित परिवारों के संदर्भ में भी सोचना जरूरी है, साथ ही बच्चों परबाल मजदूरी का जुल्म थोपने वाले लोगों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई किये जाने के साथ ही उनकी मनोदशा में बदलाव आना भी जरूरी है। सही मायने में यदि विश्व के तमाम देश बालश्रम जैसी समस्या का ठोस व रचनात्मक निदान करना चाहते हैं तो उन्हें लचीली श्रम शक्ति की तलाश में बढ़ती बाल मजदूरी प्रथा के बारे में नये सिरे से सोचना होगा ताकि देश के भावी निर्माता, बच्चों का हर क्षेत्र में शोषण न हो सके। देश की बाल शक्ति की अनदेखी व उपहास की प्रवृत्ति पर अकुंश लगाना होगा, तभी हम एक समृद्ध राष्ट्र की कल्पना कर सकेंगे।

आज आवश्यकता इस बात की भी है कि सरकार इस मामले में सही मायने में ठोस कदम उठाए तथा बच्चों को बाल मजदूरी व भिक्षावृत्ति से उबारने की दिशा में सक्रिय संगठन सिर्फ दिखावे व स्वार्थपूर्ति तक सीमित न रहकर मानवीय, राष्ट्रीय सरोकार की भावना से प्रेरित होकर जिम्मेदारी पूर्वक कार्य करें। इसके अलावा इस दिशा में कारगर ढंग से काम कर रहे लोगों, संगठनों को हतोत्साहित करने का प्रयास भी सरकार या संगठित गिरोहों द्वारा नहीं होना चाहिये। दुनिया के देशों में यह समस्या भले ही विकराल है लेकिन भारत में इस समस्या का रौद्र रूप दिखाई देना और भी ज्यादा शर्मानाक है क्यों कि भारत तो ऋषियों, मनीषियों तथा तपस्वियों का देश है जहां हमेशा ही मानवतावादी मूल्यों पर जोर दिया जाता रहा है। ऐसे में देश में बच्चों को बाल मजदूरी व भिक्षावृत्ति से मुक्ति दिलाने का काम तो कारगर ढंग से पूरा होना ही चाहिये।

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