Home विचार मंच Challenge of saving school students with fire: अग्निकांड से स्कूली छात्रों को बचाने की चुनौती

Challenge of saving school students with fire: अग्निकांड से स्कूली छात्रों को बचाने की चुनौती

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सूरत के तक्षशिक्षा अपार्टमेंट में हुए अग्निकांड ने देश को झकझोंड़ कर रख दिया है। हादसे की खबरों ने लोगों को विचलित कर दिया, जिसने में भी टीवी पर बच्चों को चौथी मंजिल से छलांग लगाते हुए देखा उसकी रुह कांप गई। हृदय विदारक हादसे को देख आंखें नम हो गई। जिन परिवारों के बच्चे थे उनकी उम्मीद खत्म हो गई। सपने टूट गए, अब आंसू के सिवाय उनके पास कुछ नहीं बचा है। जांच और मुवावजा तो सरकारी राहतें हैं लेकिन वह हादसा उनके दिमाग से कभी नहीं उतरेगा। हंसते-खेलते घर से निकले बच्चे आग की दरिया में भस्म हो गए।
संवेदनाएं और आर्थिक सहायता क्या उन परिवारों की खुशियां लौटा सकती है, जिनकी उम्मीदें हमेशा के लिए खत्म हो गई। देश में अनगिनत इस तरह के हादसे हुए हैं जिसमें स्कूली छात्रों की मौत हो चुकी है। गुजरात की यह घटना कोई अपने में अकेली नहीं है। दक्षिण से लेकर उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक हादसों अग्निकांड जैसे हादसे इतिहास पटा है। लेकिन आज तक हमारी सरकारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से जिस तरह बच्चे कूद रहे थे वह दृश्य बेहद भयावह और कल्पना से परे था। छात्रों की चीख-पुकार सुनकर दिल दहल गया, वहां मौजूद लोग बच्चों को बचा नहीं पाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस हादसे पर संवेदना व्यक्त की हैं।
सूरत के जकातनाका की जिस तक्षशिक्षा अपार्टमेंट की चौथी मंजिल पर कोंिचंग चलाई जा रही थी वह मंजिल ही अवैध तरीके से बनाई गई थी। नगर निगम की तरफ से सिर्फ तीन मंजिला निर्माण की अनुमति मिली थी, लेकिन अफसरों को घूस खिला कर गैर कानूनी तरीके चौथी मंजिल टांग ली गई। अगर अनुमति तीन मंजिला की थी तो चौथी मंजिल क्यों और कैसे बनाई गई।
नगर निगम प्रशासन और जिम्मेदार अफसर क्या कर रहे थे। उन्होंने कभी जांच की कि आखिर एक मंजिल अतिरिक्त कैसे बन गई। पूरा आपार्टमेंट फाइबर से बना था। सार्ट शर्किट से लगी आग के बाद धुंआ इतना फैला कि छात्रों का दमघुटने लगा। दस से अधिक छात्र चौथी मंजिल से नीचे कूद गए। कई छात्र जो नीचे की तरफ भागे उनकी जान बच गई। छलांग लगाने वाले दस में तीन की मौत हो चुकी है। फायर दल सूचना के बाद भी बिलंब से पहुंचा और आया भी तो मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 20 किमी दूर पानी भरने के लिए भेज दिया गया। जिसकी वजह से आग ने दरिया का रुप पकड़ लिया। कोचिंग में कुल 60 छात्र थे जिसमें से अब तक 23 की मौत हो चुकी है। आग की शुरूवात पहली मंजिल से हुई जिसके बाद छात्र उपर की तरफ भागे और वहीं फंस गए। हादसे में मरने वाले बच्चों की उम्र 15 से 20 साल के बीच है।
सूरत हादसे ने 15 साल पूर्व केरल के कुंभकोणम हादसे की याद ताजा कर दिया जिसमें तकरीबन 84 स्कूली छात्रों की अग्निकांड की वजह से मौत हो गई थी और 100 अधिक छात्रा झुलस गए थे। इस हादसे ने पूरे देश को हिला दिया था, लेकिन डेढ़ दशक बाद भी हमने इतनी बड़ी घटना से कोई सबक नहीं लिया और स्कूलों में सुरक्षा के इंतजाम हम बेहतर नहीं कर पाए। इससे बड़ी हमारी नाकामी और क्या हो सकती है। इस हादसे के बाद देश में पता नहीं कितने अग्निकांड हुए जिसमें स्कूली छात्रों को अपनी जान गवांनी पड़ी। जिस दौरान यह हादसा हुआ था वहां 900 से अधिक स्कूली छात्र का दाखिला था, लेकिन घटना के दिन उनकी तादात सिर्फ 200 थी। सबसे अधिक छात्राओं की मौत हुई थी।
घटना 16 जुलाई 2004 में हुई थी। हादसे स्कूली बच्चों के लिए भोजन पकाने के दौरान हुआ था। उत्तर प्रदेश के भदोही में इसी साल जनवरी में स्कूली वैन में सिलेंडर फटने के एक दर्जन बच्चे झुलस गए थे जिसमें तीन की मौत हो गई थी। जिस दौरान यह हादसा हुआ चालक वैन का दरवाजा खोलने के बाजाय खुद भाग गया। बच्चों को बचाने में दो महिलएं झुलस गई थीं। वैन सीएनजी के बजाय एलपीजी से चलाई जा रही थी। पूरे देश में इस तरह की एक नहीं कईयों घटनाएं हैं, लेकिन हम हादसों से सबक नहीं लेते जिसकी वजह से इस तरह के हादसे होते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रुपाणी ने घटना पर दुख जताया है और रिपोर्ट तीन दिन के भीतर देने का आदेश दिया। हादसे के शिकार छात्रों के परिजनों को मुवावजा की भी घोषणा हुई है। कोचिंग संचाल समेत तीन लोगों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। लेकिन यह सब एक प्रक्रिया है उसकी तरह होता है। गुजरात सरकार इस घटना को गंभीरता से लेना चाहिए। दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलानी चाहिए। लेकिन ऐसा संभव नहीं दिखता है। क्योंकि हादसों के बाद जनाक्रोश को शांत करने के लिए सरकारें जांच का आदेश और मुवावजा की थैली थमा देती हैं और बाद में स्थिति पूर्ववत हो जाती है।
इसके बाद दूसरी घटना हो जाती है। सूरत और पूर्व की घटनाओं से साबित हो गया है कि पूरा सिस्टम भ्रष्ट है, सिर्फ सत्ता बदलने से कुछ नहीं होता। जब तक हमारे अंदर नैतिक जिम्मेदारी और जबाबदेही नहीं आएगी इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी और सरकारें असहाय बनी रहेंगी। अग्निकांड जैसे हादसों से बचने के लिए हमारे पास नीति है लेकिन नीयति नहीं। कई भीषण हादसों के बाद हमने इसकी जरुरत भी नहीं समझी। संवेदना व्यक्त कर देने भर से सरकारें अपनी जिम्मेदारी और जबाबदेही से नहीं बच सकती। निश्चित तौर पर सूरत प्रशासन बेगुनाह छात्रों की मौत के लिए जिम्मेदार है। इस तरह के हादसे हमारी संसद की चर्चा क्यों नहीं बनते। राजनेता इस पर संसद से वाक आउट क्यों नहीं करते। घटिया मसलों पर संसद ठप करने वाला विपक्ष क्या अग्निकांड जैसे हादसों को लेकर अपनी आवाज बुलंद करेगा। स्कूली छात्रों की सुरक्षा के लिए कोई आयोग बनाने और उसकी संस्तुतियों को लागू करने की वकालत की जाएगी।
स्कूली छात्रों की सुरक्षा को लेकर तमाम ऐसे सवाल हैं जिसका जबाब मिलना चाहिए। राज्य सरकारों के साथ केंद्र को भी इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए। स्कूली छात्रों को अग्निकांड के साथ दूसरे हादसों से बचाने के लिए एक आयोग गठित किया जाना चाहिए। आयोग की रिपोर्ट पर जरुरी कदम उठाने चाहिए। हादसे के जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वक्त रहते इस पर विचार नहीं किया गया तो फिर हमें हालातों से समझौता कर लेना चाहिए। क्योंकि इस तरह की घटनाएं सिर्फ लापरवाही का नतीजा हैं।
प्रभुनाथ शुक्ल
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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