Congratulate Ravish kumar: रवीश को बधाई दीजिए!

एक पत्रकार का आकलन उसकी लेखन-शैली या प्रस्तुतीकरण के कौशल से नहीं होता। उसका आकलन उसके द्वारा उठाये गए सवालों और मुद्दों से होता है। पत्रकार का अपने समय के सरोकारों और उन पर तत्कालीन सरकार के रवैये की समीक्षा करना, ज्यादा बड़ा कम  है। वह कैसा लिखता है, या किस तरह की चीजों को पेश करता है, यह उसकी व्यावसायिक कुशलता है। लेकिन प्राथमिकता नहीं। रवीश कुमार में यही खूबी, उन्हें आज के तमाम पत्रकारों से अलग करती है। रवीश कुमार के प्रोफेशनलिज्म में सिर्फ कौशल ही नहीं एकेडेमिक्स का भी योगदान है। रवीश की नजर तीक्ष्ण है और उनका टारगेट रहा है कि आजादी के बाद शहरीकरण ने किस तरह कुछ लोगों को सदा-सदा के लिए पीछे छोड़ दिया है, उनकी व्यथा को दिखाना। उन्हें मनीला में विश्व का प्रख्यात रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला है। चयनकर्ताओं ने उनकी इसी कसौटी को परखा, कि वे मुद्दे कौन से उठाते हैं। जाहिर है, आज जन-सरोकारों के मुद्दे अकेले रवीश उठा रहे हैं। लेकिन ऐसा वे कोई आज से नहीं कर रहे हैं, बल्कि तब से जब उन्होंने पत्रकारिता शुरू की थी मुझे याद है, आज से कोई दस साल पहले अचानक एक दिन मैंने देखा, कि एनडीटीवी पर कापसहेड़ा की एक लाइव रिपोर्ट चल रही है। कापसहेड़ा पश्चिमी दिल्ली का एक गांव हुआ करता था, अब वह लालडोरा में आ गया है। वहां पर किस तरह से मकान मालिक अपने किरायेदारों को अपना बंधुआ बनाकर रखते हैं। जो युवक इस रिपोर्ट को पेश कर रहा था वे थे रवीश कुमार। अकेले उस रिपोर्ट ने मुझ पर ऐसा जादू किया कि आज तक शायद ही रवीश की कोई रिपोर्ट या बाद में शुरू हुआ उनका प्राइम टाइम न देखा हो। रवीश की रिपोर्ट से ही इस एंकर के अपने रुझान और अपनी रुचियां साफ कर दी थीं। लगा कि इस नवयुवक में टीवी की झिलमिलाती स्क्रीन में भी कुछ धुंधले पक्ष दिखाने की मंशा है। रवीश कुमार की यह प्रतिबद्घता उन्हें कहीं न कहीं आज के चालू पत्रकारिता के मानकों से अलग करती है। जब पत्रकारिता के मायने सिर्फ चटख-मटक दुनिया को दिखाना और उसके लिए चिंता व्यक्त करना हो गया हो तब रवीश उस दुनिया के स्याह रंग की फिक्र करते हैं। आज स्थिति यह है, कि जब भी मैं किसी पत्रकारिता संस्थान में जाता हूं, और वहां के छात्रों से पूछता हूं, कि कोर्स पूरा क्या बनना चाहते हो, तो उनका जवाब होता है, टीवी एंकर या टीवी रिपोर्टर। कोई भी अखबार में नहीं जाना चाहता। क्योंकि टीवी में चकाचौंध है, जगमगाहट है और नाम है। लेकिन इसके विपरीत अखबार में निल बटा सन्नाटा! हर उभरते पत्रकार की मंजिल होती है, रवीश कुमार बन जाना। लेकिन कोई भी रवीश की तरह पढ़ना नहीं चाहता, रवीश की तरह अपने को रोजमर्रा की घटनाओं से जोड़ना नहीं चाहता, रवीश की तरह वह विश्लेषण नहीं करना चाहता। मगर वह बनना रवीश चाहता है। कितने लोग जानते हैं, कि आज जिस मुकाम पर रवीश हैं, वहां तक आने के लिए उन्होंने कितना श्रम किया।

बिहार के मोतिहारी जिले के गांव जीतवार पुर के रवीश की शुरूआती शिक्षा पटना के लोयला स्कूल में हुई। फिर वहीं के बीएन कॉलेज से इंटर साइंस से किया। दिल्ली आए और देशबंधु कॉलेज से बीए किया। हिस्ट्री में एमए करने के लिए किरोड़ीमल कॉलेज में दाखिला लिया। एम.फिल, को बीच में ही छोड़ कर भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता की पढ़ाई की। कुछ दिनों तक उन्होंने जनसत्ता के लिए फ्री-लांसिंग की। तब मंगलेश डबराल जनसत्ता के रविवारीय संस्करण के संपादक थे। मंगलेश जी इसी रविवारी जनसत्ता के लिए उन्हें स्टोरी असाइन करते, और वे उसे लिख लाते। इसके बाद जब वो एनडीटीवी में गए, तो जाते ही एंकरिंग करने को नहीं मिली। बल्कि उनका काम था सुबह के शो गुड मॉर्निंग के लिए चिट्ठियां छांटना। इस काम के बदले उन्हें पहले सौ रुपए रोज मिलते थे, जो बाद में बढ़ा कर डेढ़ सौ कर दिये गए। इस शो के दर्शक देश भर से चिट्ठियां भेजते थे। वे चिट्ठियां बोरों में भर कर आतीं, जिन्हें रवीश छांटते। इसके बाद वहीं पर अनुवादक हुए। फिर रिसर्च में लगाया गया। इसके बाद रिपोर्टर और तब एंकर। आज वे एनडीटीवी में संपादक हैं। और उनका शो प्राइम टाइम अकेला ऐसा शो है, जिसे देखने और समझने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी। आप कह सकते हैं कि यह भी संयोग रहा कि एनडीटीवी स्वयं भी लीक से हटकर जनोन्मुखी है, पर कॉरपोरेट की एक सीमा होती है। वह उससे एक कदम भी   आगे नहीं बढ़ सकता। अब यह तो वहां काम कर रहे प्रोफेशनल का ही कमाल होता है कि वह उस कॉरपोरेट से कितनी छूट हासिल करता है।
रवीश कुमार अपने इस मिशन में सौ फीसद कामयाब रहे हैं। रवीश बनना आसान नहीं है। उन जैसे सरोकार तलाशने होंगे। उन सरोकारों के लिए एकेडिमक्स यानी अनवरत पढ़ाई जरूरी है। रवीश बताते हैं कि वे साहित्य या फिक्शन की बजाय वह इकोनामिक्स, सोशियोलाजी और साइंस पढ़ते हैं। इन्हीं विषयों की किताबें खरीदते हैं। वे निरंतर पुस्तकें पढ़ते रहते हैं। यह जरूरी भी है। सरोकार का टारगेट समझना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक उस सरोकार से होने वाले विकास को समझना। विकास द्विअर्थी शब्द है, जिसका प्रतिक्रियावादी और प्रगतिकामी कई अलग अर्थ बताते हैं। जन-सरोकारों के उनके सवालों से कुढ़े कुछ लोग उनको मोदी विरोध या मोदी समर्थन के खांचे में रख कर यह घोषणा कर देते हैं, कि वे मोदी विरोधी हैं, और इसीलिए उन्हें यह मैग्सेसे सम्मान मिला है। मुझे लगता है, कि ऐसे लोग धूत  हैं। रवीश तब भी ऐसी ही रिपोर्टिंग करते थे, जब देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे। रवीश ने हर सरकार के कामकाज की समीक्षा की है। मेरा स्पष्ट मानना है, कि मोदी से न उनकी विरक्ति है न आसक्ति। जितना मैं उन्हें जानता हूं, निजी बातचीत में कभी भी उन्होंने मोदी के प्रति घृणा या अनुराग का प्रदर्शन नहीं किया न कभी कांग्रेस का गुणगान किया। वे एक सच्चे और ईमानदार तथा जन सरोकारों से जुड़े पत्रकार हैं। कुछ उन्हें जबरिया एक जाति-विशेष के खाने में फिट कर देते हैं। उनका नाम रवीश कुमार पांडेय बता कर उनके भाई पर लगे आरोपों का ताना मारने लगते हैं। पर जितना मुझे पता है, मैं अच्छी तरह जनता हूं कि उनके भाई ब्रजेश पांडेय अपनी ईमानदारी और कर्मठता के बूते ही बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने थे। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में टिकटों के वितरण के वक्त कुछ लोग उनसे फेवर चाहते थे, लेकिन उन्होंने कोई सिफारिश नहीं सुनी, पैसा नहीं लिया। इसलिए उनके विरुद्ध कांग्रेस और राजद वालों ने ही षड्यंत्र किया था। बाद में भाजपा के लोगों ने तिल का ताड़ बना दिया। ब्रजेश जी की बेटी की शादी रुक गई । उन्हें बिहार में कोई वकील नहीं मिला। सच तो यह है, कि रवीश गणेश शंकर विद्यार्थी की परंपरा के पत्रकार हैं। उन्हें बधाई दीजिये।

Hindi binds the nation in the thread of unity: देश को एकता के सूत्र में पिरोती है हिन्दी

हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है। भारत की मातृ भाषा हिन्दी को सम्मान देने के लिये प्रति वर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद 1953 से सम्पूण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है जो हिंदी भाषा के महत्व को दर्शाता है।
हिन्दी ने भाषा, व्याकरण, साहित्य, कला, संगीत के सभी माध्यमों में अपनी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं वर्चस्व कायम किया है। हिन्दी की यह स्थिति हिन्दी भाषियों और हिन्दी समाज की देन है। लेकिन हिन्दी समाज का एक तबका हिन्दी की दुर्गति के लिए भी जिम्मेदार है। अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी होता है यह धारणा हिन्दी भाषियों में हीन भावना लाती है। हिन्दी भाषियों को इस हीन भावना से उबरना होगा, क्योंकि मौलिक विचार मातृभाषा में ही आते हैं। शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा होनी चाहिए क्योंकि शिक्षा विचार करना सिखाती है और मौलिक विचार उसी भाषा में हो सकता है जिस भाषा में आदमी जीता है। हिन्दी किसी भाषा से कमजोर नहीं है। हमें जरूरत है तो बस अपना आत्मविश्वास को मजबूत करने की।
हिन्दी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली राज्यों की राजभाषा भी है। राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है। लेकिन विश्व भाषा बनने के लिए हिन्दी को अब भी दुनिया के 129 देशों के समर्थन की आवश्यकता है। भारत सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है, उससे यह संभावनाएं जता सकते हैं कि शीघ्र ही हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा में शामिल कर लिया जायेगा। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी विदेश यात्रा के दौरान अधिकतर उस देश में अपना सम्बोधन हिन्दी भाषा में ही देते हैं, जिससे हिन्दी भाषा का महत्व विदेशी धरती पर भी बढ़ने लगा है। चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। नेपाल, पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी को हिंदी बोलना, लिखना, पढ़ना आता है। बांग्लादेश, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। फिजी, सुरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश की सरकारें तो हिंदी भाषियों द्वारा ही चलायी जा रही हैं। पूरी दुनिया में हिंदी भाषियों की संख्या करीबन सौ करोड़ है। हिन्दी के ज्यादातर शब्द संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा से लिए गए हैं। यह मुख्य रूप से आर्यों और पारसियों की देन है। इस कारण हिन्दी अपने आप में एक समर्थ भाषा है। जहां अंग्रेजी में मात्र 10,000 मूल शब्द हैं, वहीं हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या 2,50,000 से भी अधिक है। बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में हिन्दी का अन्तरराष्ट्रीय विकास बहुत तेजी से हुआ है। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैकड़ों छोटे-बड़े केन्द्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध के स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है। विदेशों से हिन्दी में दर्जनों पत्र-पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। हिन्दी भाषा और इसमें निहित भारत की सांस्कृतिक धरोहर सुदृढ और समृद्ध है। इसके विकास की गति बहुत तेज है। हिंदी भाषा एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए बहुत आसान और सरल साधन प्रदान करती है। यह प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है। हिन्दी विविध भारत को एकता के सूत्र में पिरोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उस भाषा के प्रति आज भी इतनी उपेक्षा व अवज्ञा क्यों? प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिन्दी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेता है। इसलिए इसे सामान्य जनता की भाषा अर्थात जनभाषा कहा गया है। हिन्दी के प्रयोग एवं प्रचार हेतु मनाया जाने वाला हिन्दी-दिवस न केवल हिन्दी के प्रयोग का अवसर प्रदान करता है, बल्कि इस बात का ज्ञान भी दिलाता है कि हिन्दी का प्रयोग भारतीय जनता का अधिकार है। जिसे उससे छीना नहीं जा सकता। हम जानते हैं कि इतने बड़े जनसमुदाय वाले देश में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ना आसान नहीं है। यदि महात्मा गांधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, पंडित मदनमोहन मालवीय, राजषि पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य केशव सेन, काका कालेलकर तथा गोविन्दवल्लभ पन्त जैसे अनेक महान व्यक्तियों के अनेक वर्षों में किये गये अथक प्रयासों से हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने का अधिकार मिला है, तो हम उसे क्यों छोड़े? हिन्दी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिये। देश में तकनीकी और आर्थिक समृद्धि के एक साथ विकास के कारण, हिन्दी ने कहीं ना कहीं अपना महत्ता खो दी है। प्रत्येक क्षेत्र में सफलता पाने के लिये हर कोई अंग्रेजी को बोलना और सीखना चाहता है। किसी भी देश की भाषा और संस्कृति उस देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हिन्दी और देवनागरी के मानकीकरण की दिशा में अनेक क्षेत्रों में प्रयास हुये हैं। हिन्दी भारत की सम्पर्क भाषा भी हैं। अत: हम कह सकते है की हिन्दी एक समृद्ध भाषा हैं। भारत की राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने में हिन्दी भाषा का बहुत बड़ा योगदान हैं। हिन्दी दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिये की हम पूरे मनोयोग से हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना निस्वार्थ सहयोग प्रदान कर हिन्दी भाषा के बल पर भारत को फिर से विश्व गुरु बनवाने का सकारात्मक प्रयास करेंगें। अब तो कम्प्यूटर पर भी हिन्दी भाषा में सब काम होने लगे हैं। कम्प्यूटर पर हिन्दी भाषा के अनेको सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जिनकी सहायता से हम आसानी से काय कर सकते हैं। कोई भी भाषा तब और भी समृद्ध मानी जाती है, जब उसका साहित्य भी समृद्ध हो। आदिकाल से अब तक हिन्दी के आचार्यों, सन्तों, कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं हिन्दी-प्रेमियों ने अपने ग्रन्थों, रचनाओं एवं लेखों से हिन्दी को समृद्ध किया है। परन्तु हमारा भी कर्तव्य है कि हम अपने विचारों, भावों एवं मतों को विविध विधाओं के माध्यम से हिन्दी में अभिव्यक्त करें एवं इसकी समृद्धि में अपना योगदान दें।

रमेश सर्राफ धमोरा

Mukatibodh:Some memories: मुक्तिबोध : कुछ यादें

मुक्तिबोध को सबसे पहले 1958 में साइंस कॉलेज रायपुर के प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में मैंने देखा सुना था। ललित मोहन श्रीवास्तव के अध्यक्ष तथा ऋषिकुमार तिवारी के सचिव पद की समिति का मैं कक्षा-प्रतिनिधि बनाया गया था। ललित मोहन श्रीवास्तव बाद में भौतिकशास्त्र के प्राध्यापक बने। मूलत: वे कवि थे। उनका काव्यसंग्रह ‘दीपक राग नए’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ। राजनांदगांव निवासी ऋषिकुमार तिवारी छात्र जीवन में धोती कुरता की पोषाक के कारण भीड़ से अलग होते थे। वे भी एक अच्छे कवि थे। विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए मुक्तिबोध का यश पूरी तौर पर अजूबा और अपरिचित था।
मुक्तिबोध के प्रति ललित मोहन श्रीवास्तव की भक्ति इस कदर थी कि समिति को आवंटित कुल जमा पचहत्तर रुपयों की राशि उद्घाटन कार्यक्रम में ही खर्च हो गई। उसमें से मुक्तिबोध को यथासम्भव पारिश्रमिक भी दिया गया। हलके रंग का सूती कोट पहने मुक्तिबोध ने गंभीर मुद्रा के अपने भाषण के बाद एकल काव्यपाठ भी किया। विज्ञान के विद्यार्थियों के कारण ‘मुर्गी अपनी जान से गई लेकिन खाने वालों को मजा नहीं आया’ वाला मामला हुआ। कोई छ: वर्ष बाद मैं बालाघाट के शासकीय महाविद्यालय में ललित मोहन श्रीवास्तव का प्राध्यापकीय सहकर्मी बना। तब तक मुक्तिबोध से परिचय और आत्मीयता का दौर प्रगाढ़ होकर उनके निधन के कारण खत्म भी हो गया था। कविता लिखने से मेरा बैर रहा है। कवियों को सुनना अन्यथा अच्छा लगता रहा। बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं कविता नहीं लिख पाया। मुक्तिबोध के निधन का समाचार मुझमें भूकंप रच गया। मुक्तिबोध की यादें धूमिल होकर भी गुम नहीं हो सकीं। उनके व्यक्तित्व का असर जिस पर भी पड़ा, स्थायी हुआ है। मैं 23 का था, मुक्तिबोध 46 के और बख्शर जी 69 के। मेरे कुछ स्कूली सहपाठी पढ़ाई में व्यवधान होने के कारण संयोगवश मेरे छात्र हो गए थे। वे मुंहलगे मित्र-शिष्य हम तीनों अध्यापकों को कॉलेज से निकलकर खपरैल से बनी झोपड़ी में चाय की दूकान की ओर आते जाते देखने पर 23 का पहाड़ा पढ़ने लगते। मुक्तिबोध पितातुल्य उम्र के थे और बख्शीजी मेरे पिता के शिक्षक रहे)। मुक्तिबोध अमूमन चाय पीते, बख्शी जी कई बार कॉफी। मुक्तिबोध सिगरेट और बिड़ी दोनों पी सकते थे, बख्शी जी लगातार बिड़ी। बख्शी जी को इमरती भी भाती और भजिए कचौरी भी। मुक्तिबोध खाने से बचते, लेकिन दूसरा कप चाय पीने से पहले कप के बनिस्बत ज्यादा खुश होते। तीन पीढ़ियों का यह काफिला खाली पीरियड के पैंतालीस मिनटों में लौट आने की मयार्दा में बंधा रहता क्योंकि बख्शी जी के शिष्य, मुक्तिबोध के नियोक्ता और मेरे चाचा जी ही तो प्राचार्य थे। मुक्तिबोध के निधन के तीस वर्षों बाद मध्यप्रदेश गृह निर्माण मण्डल का अध्यक्ष पद मुझे मिला। मैंने अध्यक्षीय आदेश के तहत गृह निर्माण मण्डल की राजनांदगांव स्थित तीन कॉलोनियों का नामकरण बख्शीनगर, मुक्तिबोधनगर तथा बलदेवनगर रखा। राजनांदगांव को छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक केंद्र कहते नहीं अघाते भद्रजनों को अब तक यह अहसास नहीं है कि इन कॉलोनियों को इनके अधिकृत नामों से ही पुकारा जाए। रायपुर में तो माधवराव सप्रे नगर और कबीरनगर नामधारी हैं लेकिन मेरे गृहनगर ने ही इन शलाका पुरुषों को विस्मृत कर नाम धरा लिया है।
मुक्तिबोध के निधन का समाचार मुझे बालाघाट में मिला था। उनके अंतिम संस्कार में तत्काल पहुंच जाने का समय, प्रबंध और उद्यम कुछ भी हासिल नहीं था। उसी रात मैंने कवि के अवसान पर अपने जीवन की एकमात्र कविता लिखी और उसे जबलपुर के एक दैनिक में प्रकाशन के लिए भेज भी दिया। वह कविता पता नहीं कहां है। मुक्तिबोध परिवार के लिए पत्र लिखना भी मेरे लिए न जाने क्यों संभव नहीं हो पाया। थक हारकर मैंने एक तार रमेश के नाम से भेजा। मुझे मालूम था कि बालाघाट में मेरे नाम का अन्य कोई उनका परिचित नहीं होगा। इसलिए मैंने पूरा नाम लिखने के बदले तार में अंगरेजी में प्रेशक का नाम केवल तिवारी ही लिख दिया। तार विभाग की लापरवाही के कारण अंगरेजी के पहले दो अक्षरों ‘टी.आई.’ के बदले ‘आई.टी.’ लिख दिया गया। तार अपने लक्ष्य तक पहुंचा लेकिन मेरी संवेदना नहीं पहुंची। एक अरसा बाद रमेश से मुलाकात हुई। उन्होंने सभी सूचनाओं, चिट्ठियों और प्रतिक्रियाओं आदि को सहेजकर रखा था। रमेश ने उलाहना दिया कि मेरे लिए मुक्तिबोध का जाना मानो कोई घटना ही नहीं है। मैंने सफाई दी कि मैंने उसी दिन तार भेजा था। रमेश की फाइल में वह तार पड़ा था। उसे मुझ ‘तिवारी’ के बदले किसी ‘इतवारी’ ने भेजा था। रमेश को यह समझ ही नहीं आया था कि बालाघाट में कौन इतवारी है जो मुक्तिबोध के नहीं रहने पर त्वरित गति से द्रवित हो गया था। अंगरेजी में छपे हुए सूत्रबद्ध संदेशों का संबंधित नम्बर डालकर मैंने केवल अपना उपनाम लिख दिया था। मुक्तिबोध भी तो गजानन माधव नामक अपनी व्यक्तिवाचक संज्ञा के परे होकर पारिवारिक उपनाम के सार्थक ब्रांड अंबेसडर हो गए थे। इस घटना के कारण लेकिन मुझे अपने उपनाम से कोफ्त हो चली थी। कवि के परिवार से आज तक आत्मीय रूप से जुड़े रहने का मुख्य कारण रमेश का मुझे मेरे प्रथम नाम से पुकारना है। मुक्तिबोध मुझे इस नाम से नहीं पुकारते थे। वे अमूमन तो नाम से संबोधन ही नहीं करते थे। कभी करते तो मेरे नाम के पीछे जी लगा देते। वह ध्वनि उनकी कविता की पंक्ति में गूंज रही है ‘मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।’
(लेखक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

Increasing despair among youth is the reason for self-murder: युवाओं में बढ़ती निराशा आत्म हत्या की वजह

 आत्म हत्याओं को हम समय रहते रोक सकते हैं, लेकिन हमारे भीतर ऐसी सोच पैदा नहीं होती है। आधुनिक जीवन शैली बेहद प्रतिस्पर्धात्मक हो चली है। व्यक्ति हर बात को अपनी सफलताओं और असफलताओं से जोड़ देता जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं होती हैं। पूरी दुनिया में हर साल 10 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। विश्व में होने वाली कुल आत्महत्याआें का 21 फीसदी भारत में होता है। मानोचिकित्सक मानते हैं कि सामाजिक जागरुकता की वजह से ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है। दुनिया भर में जिंदगी की बढ़ती व्यस्तताओं और काय के मानसिक दबाब के साथ जिंदगी का मूल्याकंन अर्थ से जुड़ गया है। जिसकी वजह से युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति सबसे अधिक है। विदेशों में आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक बुजुर्ग हैं लेकिन भारत में यह स्थिति उलट है।
आत्महत्या जिंदगी का सबसे प्राणघातक फैसला है। जीवन में कई स्थितियां ऐसी बनती हैं जब इंसान उससे लड़ नहीं पाता। जब उसे समस्या का निदान नहीं दिखता तो उसके पास एक मात्र विकल्प आत्महत्या होती है। आत्महत्या कोई भी आदमी कर सकता है। वह उच्च शिक्षाविंद्, वैज्ञानिक, अभिनेता, राजनेता, महिलाएं, युवा या फिर आम आदमी। आत्महत्या के संबंध में यह तक मनगढ़ंत हैं कि पढ़े-लिखे लोग आत्महत्या कम करते हैं या नहीं करते। भारत में कई उदाहारण हैं जहां सफल व्यक्ति अपनी जिंदगी से पस्त होकर ऐसा कदम उठाता है। जिसके बारे में आम आदमी यह सोच भी नहीं सकता है कि संबंधित व्यक्ति इस तरह का भी फैसला ले सकता है। देश में कई आईएएस, आईपीएस, राजनेता, फिल्मी हस्तियां आत्महत्या कर चुके हैं। दक्षिण भारत में काफी किंग के नाम से मशहूर हस्ती इसका ताजा उदाहरण हैं। जिन्होंने भारी आर्थिक नुकसान की वजह से ऐसा कदम उठाया। आत्महत्याओं को हम समय रहते रोक सकते हैं, लेकिन हमारे भीतर ऐसी सोच पैदा नहीं होती है। आधुनिक जीवन शैली बेहद प्रतिस्पर्धात्मक हो चली है। व्यक्ति हर बात को अपनी सफलताओं और असफलताओं से जोड़ देता जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं होती हैं। पूरी दुनिया में हर साल 10 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। विश्व में होने वाली कुल आत्म हत्याआें का 21 फीसदी भारत में होता है। मानोचिकित्सक मानते हैं कि सामाजिक जागरुकता की वजह से ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है।
दुनिया भर में जिंदगी की बढ़ती व्यस्तताओं और काय  के मानसिक दबाब के साथ जिंदगी का मूल्याकंन अर्थ से जुड़ गया है। जिसकी वजह से युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति सबसे अधिक है। विदेशों में आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक बुजुर्ग हैं लेकिन भारत में यह स्थिति उलट है। यहां युवा और महिलाएं अधिक संख्या में आत्म हत्या करते हैं। लोगों को आत्महत्या से बचाव के लिए इस वर्ष नया नारा दिया गया है। आत्महत्या के बचाव के लिए मिल कर काम करें। भारत में प्रति एक लाख व्यक्ति में 11 व्यक्ति आत्महत्या करते हैं जबकि जापान में यह आंकड़ा 20 व्यक्ति का है। भारत में आत्म हत्याओं के मामले में महाराष्टÑ पहले नंबर पर है। इसके बाद की पायदान पर तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल,  कर्नाटक और मध्यप्रदेश शामिल हैं। भारत में कुल आत्महत्याओं में 51 फीसदी की हिस्सेदारी इन्हीं पांच राज्यों की है। पांडेचेरी में आत्महत्या की दर सबसे अधिक हैं। यहां प्रति 10 लाख में 432 लोग आत्महत्या करते हैं जबकि जबकि सिक्किम में यह दर 375 की है। एक शोध से पता चला है कि भारत में पुरुषों से चार गुना अधिक महिलाएं आत्महत्या करती हैं। दक्षिण भारत में दूसरे राज्यों की अपेक्षा शिक्षा दर और लिंगभेद बेहद कम होने के बाद भी यहां महिलाओं की आत्महत्या दर अधिक है। पूरी दुनिया में मौत के कारणों में दसवां कारण आत्महत्या यानी सेल्फ मर्डर का है।
इंसान के भीतर जीवन की असफलताओं की वजह से नकारात्मक विचार पैदा होने लगते हैं। काय क्षेत्र में विफल होने की वजह से वह अपना मूल्याकंन कम कर आंकता है। जिसकी वजह से वह ऐसे कदम उठाता है। आत्महत्या के मुख्य कारणों में जीवन के प्रति निराशावादी सोच। जिंदगी खत्म करने के लिए प्रेरित करती है। समस्या का समाधान न दिखाई देना। अचानक व्यवहार में परिवर्तन। एकांतवास करना और मित्रों व परिवार से दूर रहना। नशीली वस्तुओं और दवाओं का सेवन करना। अत्यधिक जोखिम भरे कार्य करना। जिंदगी के प्रति उदासीन नजरिया रखना जैसे मुख्य कारक हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में एआरटी सेंटर आईएमएस में तैनात एक वरिष्ठ परामर्शदाता एवं मनोचिकित्सक डॉ. मनोज कुमार तिवारी के विचार में इस प्रवृत्ति को सामाजिक सोच में दबलाव लाकर रोका जा सकता है। अभियान चलाकर हद तक सफलता प्राप्त की जा सकती है। अगर कोई व्यक्ति आत्म हत्या की सोचता है तो उसके भीतर तीन प्रमुख कराण उभरते हैं। समय रहते उस बदलाव को समझ कर व्यक्ति की सोच को बदला जा सकता है। जिस व्यक्ति में उपयुक्त निराशावादी सोच पैदा हो रही हैं। उसकी दैनिक जीवनचर्या बदल जाती है। उस व्यक्ति से आप यह पूछ सकते हैं कि आप आत्महत्या कब करना चाहते हैं। यदि वह व्यक्ति ऐसे समय का उल्लेख करता है जब वह अकेला होता है और उसके पास घर का कोई सदस्य या पारिवारिक करीबी नहीं होता है। उस स्थिति में आत्महत्या की स्थिति अधिक बढ़ जाती है। लेकिन जब व्यक्ति इस सवाल जबाब इस तरह देता है कि वक्त आएगा तो बाताएंगे तो समझिए आत्म हत्या पर उसका निश्चय दृढ़ नहीं   है। दूसरा सवाल वह आत्म हत्या के किस तरीके को अपनाएगा। अगर वह कहता है कि रेल से कट जाऊंगा, पुल से छलांग लगा लूंगा। नदी में डूब मारूंगा, गोली मार लूंगा या फांसी लगा लूंगा। ऐसे संसाधन जिनकी उपलब्धता आसान है। उस स्थिति में समझिए संबंधित आदमी आत्म हत्या कर सकता है। तीसरा अहम सवाल कि वह आत्म हत्या क्यों करना चाहता है। उसके प्रति उत्तर में अगर जीवन की हताशा। निराशावादी सोच, जिंदगी की असफलता, अपने किसी करीबी या प्यार में धोखे की बात आए तो समझिए आत्म हत्या की संभावनाएं अधिक हैं। बताते हैं कि आत्म हत्या के दस प्रमुख कारण हैं। जिसमें इंसान में नशे और जुए की लत। मानसिक अवसाद। दवाओं का गलत उपयोग। गंभीर बीमारी जैसे एड्स, कैंसर, ह्दय रोग और दूसरी असाध्य बीमारियां शामिल हैं। जीवन में आर्थिक नुकसान भी जीने की उम्मीद खत्म कर देता है। इसके अलावां आसानी से आत्म हत्या के संसाधनों की उपलब्धता। सामाजिक आर्थिक स्थिति। अनुवांशिकता। पारिवारिक कलह और सोशल मीडिया भी आत्म हत्या के कारणों में प्रमुख हैं। एक शोध के अनुसार मानसिक अवसाद के कारण आत्म हत्या की सोच अधिक बढ़ती है। जिसकी वजह से 8.6 फीसदी लोग आत्म हत्या का प्रयास करते हैं। मनोविकार की स्थिति से 50 फीसदी लोग ऐसा प्राणघातक कदम उठाते हैं। ऐसे लोगों में यह खतरा 20 गुना अधिक रहता है। सिजोफ्रेनिया से और व्यक्तित्व विकार से ग्रसित 14 फीसद लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं। एक आंकड़े के अनुसार जो लोग ऐसा प्रसास कर चुके होते हैं, उनमें 20 फीसदी दूसरी बार भी ऐसा करते हैं। जबकि इस 20 फीसदी में एक फीसद लोग साल भर में इसी प्रयास की वजह से मौत को गले लगाते हैं। जबकि पांच फीसदी लोग 10 साल बाद पुन: आत्महत्या का प्रसास करते हैं। जुआ खेलने वालों में 24 फीसदी लोग कभी न कभी आत्महत्या का प्रसास करते हैं।  आत्म हत्या के मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं जिसकी वजह से लोग ऐसा घातक कदम उठाते हैं। लोगों को मानोवैज्ञानिक काउंसिंलिंग कर बचाया भी जा सकता है। इसके लिए सामाजिक जागरुकता पहली आवश्यकता है। अवसाद से ग्रसित व्यक्ति के साथ परिवार और दोस्तों का नजरिया सकारात्मक होना चाहिए। भारत में सबसे खतरे की बात यह है कि युवाओं में आत्महत्या की सोच तेजी से पैदा हो रही है। यह सबसे घातक है। जिसकी वजह बेगारी, प्रेम में असलता, नशे की लत और दूसरे प्रमुख कारण हैं। इस पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकारी स्तर पर एक राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए। जिस पर ऐसे लोगों के प्रति संवेदना रखी जाए और उनकी काउसिंलिंग कराई जाए। लोगों की समय-समय पर जांच करायी जाए। मनोचित्सक के जरिए परामर्श दिया जाए। आत्महत्या के आसानी से सुलभ होने वाले संसाधन जैसे कीटनाशक, अस्त्र-सस्त्र, जहरीली वस्तुएं और दूसरे संसाधनों की आसानी से उपलब्धता पर रोक लगाई जाए। ऐसी स्थिति में पहुंचे लोगों में जीवन के सकारात्मक पहलू को पुन: स्थापित किया जाए। ऐसे उपायों से हम ऐसी समस्या से हद तक निजात पा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सोच पैदा करनी होगी।

Hindi hai hum, vatan hai…change your mind and see: हिन्दी हैं हम, वतन हैं… सोच बदल कर तो देखें

हर वर्ष 14 सितंबर को हम हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं। हिन्दी की उत्सवधर्मिता तो पहले से ही प्रारंभ हो जाती है। इस समय पूरे देश में हिन्दी पखवाड़े से लेकर हिन्दीसेवियों के सम्मान की होड़ सी लगी हुई है। ऐसे में हिन्दी पर सोच बदलने का दबाव भी साफ दिख रहा है। हिन्दी पखवाड़े पर चिंतन की चिंता हिन्दी भाषियों के साथ उन लोगों में भी दिखाई देती है, जिनके चिंतन का माध्यम हिन्दी नहीं है। वे अंग्रेजी में सोचते हैं, अंग्रेजी में सोचने वालों को श्रेष्ठ मानते हैं और परिणाम स्वरूप हिन्दी दिवस को हिन्दी डे में बदलकर अपना वैशिष्ट्य साबित करना चाहते हैं। पूरी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी के लिए इससे अधिक चिंतित करने वाली परिस्थितियां और कुछ नहीं होंगी। अब हमें सोच बदल कर आगे बढ़ना होगा। यह संपूर्ण देश व समाज के लिए भी श्रेयस्कर साबित होगा। हिन्दी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग की जरूरत महसूस की जा रही है। भारत आर्थिक दृष्टि से दुनिया की महाशक्ति बनने की तैयारी में है। हम अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने का लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ रहे हैं। इसकी प्राप्ति के लिए भी अंग्रेजी को माध्यम बनाने के स्थान पर हिन्दी को ही माध्यम बनाने की पहल करनी होगी। यह पहल अंग्रेजी से शत्रुता करके नहीं की जा सकती। इसके लिए हिन्दी को भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर पहल करनी होगी। भारतीय भाषाओं की समृद्धि के साथ हिन्दी के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समृद्धि का पथ प्रशस्त होगा। वैसे भी एक राष्ट्र के जिस चिंतन पर इस समय जोर दिया जा रहा है, उसमें हिन्दी को अपनी भगिनी भारतीय भाषाओं के साथ आगे बढ़ना होगा। भारतीय भाषाओं के साथ हिन्दी का यह भाव निश्चित रूप से देश के कुछ हिस्सों में बीच-बीच में होने वाले हिन्दी विरोध की समाप्ति की राह खोलेगा।
हिन्दी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती भाषाई सौंदर्य के साथ अपने मूल अस्तित्व को बचाए रखने की है। हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता के बीच देश के अंदर जिस तरह अंग्रेजी को लेकर दबाव का वातावरण बन रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी सहित किसी भी भारतीय भाषा को सीखना अनुपयोगी नहीं कहा जा सकता, किन्तु हिन्दी या भारतीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषा, विशेषकर अंग्रेजी न जानने वालों को जिस तरह समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। कुछ वर्ष पूर्व देश में सभी प्रमुख परीक्षाओं में हिन्दी माध्यम वाले विद्यार्थियों का बोलबाला रहता था। अब स्थितियां बदली हैं। अब तो देश के चर्चित हिन्दी माध्यम के विद्यालय भी स्वयं को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में परिवर्तित कर रहे हैं। अंग्रेजी के इस दबाव से अध्यापन के स्तर पर भी मुक्ति जरूरी है। हिन्दी के प्रति अनुराग की वृद्धि के बिना यह संभव नहीं है। हिन्दी के अस्तित्व संरक्षण के लिए प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हिन्दी या भारतीय भाषाओं को बनाया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
दुनिया में आधुनिकीकरण के दौर में हिन्दी सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानी जा रही है। कम्प्यूटर के लिए संस्कृत को सबसे निकटस्थ भाषा बताए जाने की पुष्टि तो तमाम बार हो चुकी है, ऐसे में संस्कृत परिवार की भाषा हिन्दी को आगे कर पूरी दुनिया में श्रेष्ठतम भाषागत सौंदर्य का सृजन किया जा सकता है। इसके लिए सरकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। भारत में हिन्दी स्वतंत्रता के बाद से लगातार सरकारी उपेक्षा का शिकार रही है। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया, किन्तु इसकी सर्वस्वीकार्यता के लिए सतत व गंभीर प्रयास कभी नहीं किये गए। सरकारी कार्यालयों में महज वर्ष में एक बार हिन्दी दिवस मनाने व पंद्रह दिन का राजभाषा सप्ताह मनाने भर से इस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है। लोगों के हिन्दी से आत्मसंवाद की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। साथ ही सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की स्थापना के गंभीर प्रयास करने होंगे। जिस तरह योग की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता के लिए 177 देशों का समर्थन जुटाने में भारत ने सफलता पायी, उसी तरह संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनने के लिए भी पहल की जानी चाहिए। हिन्दी के तमाम शब्द अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किये जा चुके हैं। हिन्दी भी नए रूप में दुनिया की अन्य भाषाओं के शब्दों को स्वीकार कर रही है। यह पारस्परिक स्वीकार्यता निश्चित रूप से हिन्दी को मजबूती प्रदान करेगी। हिन्दी के लिए सभी को सोच बदलनी होगी। साथ ही निर्णायक स्थितियों में बैठे लोगों की विचार प्रक्रिया में भी शोधन करना होगा। दरअसल निर्णायक स्थितियों में बैठे लोग आज भी भारतीय भाषाओं में सोचने की शैली नहीं विकसित कर पाए हैं। इसमें बदलाव लाकर ही हिन्दी को श्रेष्ठ स्थान दिलाया जा सकता है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

New vehicle act swinging in the vortex of praise and criticism: प्रशंसा और आलोचना के भंवर में झूलता नया वाहन अधिनियम

कानून कोई भी हो। उसके मूल में जनहित होता है। कानून बनाने के पीछे जनता के लाभालाभ का विचार जरूर किया जाता है। भारत सरकार के नए वाहन अधिनियम की प्रशंसा भी हो रही है और आलोचना भी। अगर यह कहें कि प्रशंसा का प्रतिशत कम है और आलोचना का अधिक तो यह कदाचित गलत नहीं होगा। सरकार ने ब्राजीलिया घोषणा पत्र पर दस्तखत कर अगले साल तक देश में हादसों और इनमें हताहतों की संख्या को आधा करने की जो प्रतिबद्धता जताई है, वह तो इस कानून से पूरी हो जाएगी लेकिन आम आदमी पर जो जुमार्ने की मार पड़ेगी, उसका क्या?
नए वाहन अधिनियम के तहत बिना लाइसेंस वाहन चलाने वालों को पांच हजार रुपए अर्थदंड देना होगा। खतरनाक ड्राइविंग पर पहले अपराध पर एक साल तक की कैद या 5 हजार तक जुर्माना व इसके तीन साल के भीतर दोबारा ऐसा करने पर दो साल तक कैद अथवा 10 हजार रुपए जुर्माना देना पड़ेगा। शराब पीकर वाहन चलाने पर पहली बार 10हजार रुपए तक जुर्माना या छह माह तक कैद का प्रावधान किया गया है। दूसरी बार ऐसा करने 3 हजार  रुपए जुर्माना या दो साल तक कैद हो सकती है। ओवर स्पीड पर पहले  400 रुपए का जुर्माना था, जिसे 1000 से 2000 तक और मध्यम व मालवाहक वाहनों के लिए 2000 से 4000 तक कर दिया गया है। इसके अलावा दोबारा ऐसा करने पर लाइसेंस जब्त कर लिया जाएगा। एंबुलेंस सहित सभी इमरजेंसी सेवाओं को रास्ता नहीं देने पर अब 10 हजार रुपए जुर्माना देना होगा व छह माह तक की कैद भी हो सकती है। दुर्घटना करने पर पहले अपराध पर 5 हजार तक जुर्माना या छह माह तक कैद तथा दूसरे अपराध पर 10 हजार तक जुर्माना या एक साल की कैद होगी। सीट बेल्ट न लगाने और हेलमेट न पहनने पर अब 1हजार रुपए जुर्माना देना होगा। बिना इंश्योरेंस के वाहन चलाने पर 2 हजार रुपए देने होंगे। सड़क सुरक्षा ध्वनि व वायु प्रदूषण के मानकों का उल्लंघन करने पर पहली बार तीन माह तक की कैद या 10 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है। नियम बुरा नहीं है। भय के बिना प्रीति नहीं होती। सरकार की साख कड़े कानून से ही बनती है लेकिन कानून की सख्ती पर संयम का अंकुश तो होना ही चाहिए।
कहते हैं कि चोर वही जो पकड़ा जाए। न पकड़े गए तो आपका भाग्य। आपका प्रारब्ध। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनके पास दुनिया भर के ऐब हैं लेकिन उन्हें कोई ऐबी नहीं कहता। डेली ड्रिंकर हैं लेकिन क्या मजाल को कोई उन्हें शराबी कह दे। शराब विरोधी,नशा विरोधी संभाषण उनसे बेहतर कोई दे नहीं सकता। जल संरक्षण का पुरस्कार भी उन्हें ही मिलता है जो निजी जीवन में सर्वाधिक पानी बर्बाद करते हैं। वैसे गलत लोग कम पकड़े जाते हैं। इसकी वजह यह है कि वे घाट-घाट का पानी पी चुके होते हैं।
जब हम सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की बात करते हैं तो सर्वप्रथम हमें इसके क्रम पर विचार करना होगा। विश्वास के बिना सबका साथ संभव नहीं है और सबके साथ के बगैर सबका विकास संभव नहीं है। हर आदमी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती। ‘मुंडे—मुंडेमतिर्भिन्ना’ वाली बात यूं ही तो कही गई गई है। एक पिता की चार संतानों के गुण धर्म और विचार एकरूप नहीं होते। एक पिता के विपुल कुमारा। पृथक—पृथक गुण धर्म अचारा। फिर पूरे देश की एकराय कैसे हो सकती है? इस सवाल का जवाब आज नहीं तो कल तलाशना ही होगा। जब भी सरकार कोई नियम—कानून बनाती है तो उसमें जनता की राय जानने—समझने की कोशिश की जानी चाहिए। केंद्र सरकार ने मोटर वाहन संशोधन कानून, 2019 के 63 प्रावधानों को लागू कर दिया है। इसे लागू करने से पहले उसने देश का मिजाज समझने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की है। वाहन चलाने वाले के मन में कानून का भय होना चाहिए। यह वक्त की जरूरत भी है लेकिन जिस तरह से जुर्माना सौ गुना कर दिया गया है, वह किसी भी व्यक्ति के गले उतरता नजर नहीं आता।  मोटर व्हीकल एक्ट 2019 में 25 नए जुर्माने शामिल किए गए हैं। जिसमें रोड रेगुलेशन का उल्लंघन, अनफिट या डिफेक्टिव वाहन चलाना भी शामिल है। गति सीमा जब 40 किलोमीटर प्रतिघंटा है तो ऐसे वाहन क्यों बनाए जा रहे हैं जो एक घंटे में सौ—डेढ़ सौ किमी. की स्पीड देते हैं। जुर्माना तो वाहन निर्माता कंपनियों पर लगना चाहिए। वाहनों की आयुसीमा तय होनी चाहिए कि कौनसा वाहन कितने साल तक सड़कों पर चलेगा? दिल्ली में 15 साल से ऊपर के वाहन हटाए भी गए थे। वे सारे वाहन दूसरे राज्यों में चलने लगे। दिल्ली में प्रदूषण मायने रखता है तो क्या अन्य राज्यों को वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की चपेट में आने दिया जाना चाहिए? शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं और अपनी और दूसरों की जिंदगी खतरे में डालते हैं तो सरकार इस समस्या की जड़ शराब पर ही प्रहार क्यों नहीं करती? शराब बनना ही बंद हो जाए तो न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कम से कम शराब के प्रभाव में सड़क हादसे तो नहीं ही होंगे।  कांग्रेस शासित पांच राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब ,पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में तो सरकार ने इसे लागू ही नहीं किया है। भाजपा शासित राज्य गुजरात में भी अभी तक इस नए कानून पर असहमति बनी हुई है। भारत में 1914 में सबसे पहले मोटर वाहन एक्ट बना था। 1939 में नया कानून बना। 1988 में संसद ने फिर नया कानून पास किया और इसे 1989 में लागू किया गया। गडकरी के नए मोटर वाहन कानून  को  संसद से भी पास होने में दो साल लग गए। 2017 में लोकसभा में पास होने के बावजूद यह राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया। सवाल उठता है कि जिस कानून को पास करने में राज्यसभा को भी आपत्ति थी, उस कानून को इस देश की जनता सिर झुकाकर कैसे बर्दाश्त कर पाएगी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री को इस तथ्य पर मंथन करना चाहिए कि कहीं यह कानून आम आदमी को परेशान करने वाला तो नहीं है और अगर इसका जवाब हां है तो उसका जवाब भी तलाशा जाना चाहिए। सरकार देश के सपनों को पूरा करना चाहती है लेकिन वाहन के बिना वह कैसे पूरा होगा? यह अपने आप में बड़ा और जटिल सवाल है। वाहन व्यक्ति की जिंदगी आसान करते हैं लेकिन नए कानून से लोग परेशान हो रहे हैं। यह देश कानून व्यवस्था का सम्मान करता है लेकिन भारी भरकम जुर्माना लोगों की  अर्थव्यवस्था को कहां ले जाएगा, यह किसी से छिपा नहीं है।

वाहन उत्पादन कंपनियां वैसे ही कथित आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही हैं। यदि लोगों ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेना आरंभ कर दिया तो क्या होगा? पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर भी दबाव बढ़ेगा। व्यक्ति के श्रम, समय और धन तीनों की बबार्दी होगी। ऐसे में कितने लोग बेरोजगार होंगे, सरकार को इस ओर भी विचार करना चाहिए। सरकार इस बात से खुश हो सकती है कि प्रदूषण का लोग सर्टिफिकेट प्राप्त करने लगे हैं लेकिन जब प्रदूषण का सर्टिफिकेट पेट्रोल पंप वाले को ही देना है तो इतना भारी भरकम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चलाने की जरूरत क्या है? नए वाहन कानून से देश की जनता त्राहि—त्राहि कर रही है। सरकार को चाहिए कि जिनके पास हेलमेट नहीं है, यातायात पुलिसकर्मी उसे पकड़ता है तो वह उससे हेलमेट की फीस जमा कराए और उसे हेलमेट पहनाकर रवाना कर दे। जिसका लाइसेंस नहीं है, उसकी गाड़ी तब तक के लिए जब्त कर ले, जब तक वह लाइसेंस बनवाकर नहीं आता। जनता पर अर्थिक भार दिए बिना भी यह सब हो सकता है और इसमें सामान्य जुर्माना भी सरकार को मिलता रहेगा लेकिन जिस तरह की व्यवस्था की गई है, उससे तो वाहन चालक हर क्षण डरा—सहमा रहेगा। उसकी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा जुमार्ने में ही चला जाएगा। कई जगहों से खबर आ रही है कि भारी—भरकम जुर्माना से नाराज होकर लोगों ने अपनी मोटर साइकिल यातायात पुलिस के सामने ही फूंक दी। यह समस्या का निदान नहीं है। उत्तेजित होने की बजाए जनता को भी अपने कागजात दुरुस्त रखने चाहिए ताकि उन्हें बेवजह परेशान न होना पड़े। सरकार का दावा है कि अगर पुलिस जन ट्रैफिक कानून का उल्लंघन करते पाए गए तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी लेकिन ट्रैफिक वालों के सामने से पुलिस वाले बिना हेलमेट के निकलते हैं लेकिन उनका बाल बांका भी नहीं होता। अलबत्ते खबर छापने वालों को ही जेल की हवा खानी पड़ जाती है। कानून के अनुपालन में सबके साथ समान व्यवहार होना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास ने तो बहुत स्पष्ट तौर पर लिखा है कि ‘ खेलन में को काको गुसइयां। अर्थात खेलने में न कोई मालिक होता है और न ही कोई सेवक। ‘कहां राजा भोज कहां गंगू तेली’ का सिद्धांत वहां लागू नहीं होता। राजा का आदेश सिर माथे पर लेकिन दंड उतना ही होना चाहिए जितना कि बर्दाश्त हो सके। अनुशासन एक सीमा में ही अच्छा लगता है। जिस तेजी के साथ देश में महंगाई बढ़ रही है। डीजल—पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं। खाद्यान वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। स्कूलों की फीस बढ़ी है। बिजली की दरें बढ़ी हैं। उसे देखते हुए दंड का यह स्वरूप एकबारगी आम आदमी की टूटी कमर पर एक डंडा और मारने जैसा है। इस पर मंथन वक्त की जरूरत है। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी बता रहे हैं कि उन्होंने सरकारी राजस्व बढ़ाने के लिए कड़े परिवहन कानून नहीं बनाए हैं। उनकी मंशा सड़क हादसों में होने वाली मौतों को रोकने की है। सड़क हादसों के लिए अनेक कारण जिम्मेदार हैं। सड़कों में गड्ढे भी सड़क हादसों के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। सड़कों को गड्ढामुक्त करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? जनता सरकार को टोल टैक्स भी देती है और रोड टैक्स भी? वाहन खरीदते वक्त ही अगर हेलमेट खरीदना बाध्यकारी हो जाए तो जुर्माना वसूलने की नौबत ही न आए। वाहन चालक की गलती से अगर किसी की मौत होती है तो संबंधित चालक को सजा का प्रावधान है लेकिन सड़क में गड्ढे की वजह से हुए हादसे में मौत होती है तो किस पर जुर्माना लगेगा, कौन जेल जाएगा, यह भी तो बताना होगा? दिल्ली सरकार ने कह दिया है कि अगर ट्रैफिक पुलिसकर्मी उल्लंघन में लिप्त मिले तो उनसे दोगुना जुर्माना वसूला जाएगा। इस आदेश का कितना अनुपालन होगा, यह तो समय बताएगा लेकिन हर राज्य में इस तरह की सख्ती जरूरी है। विचारणीय यह है कि केंद्र सरकार को इतने सख्त कानून की जरूरत क्यों पड़ गई। उसका तर्क है कि सड़क हादसों में हताहतों की बढ़ती तादाद से वह चिंतित है। वर्ष 2004 से 2016 के बीच सड़क दुर्घटना में मौतों की संख्या में 64 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2004 में जहां देश भर में 91,463 लोगों की सड़क हादसों में मौत हुई थी जबकि 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 1.50 लाख हो गया। 2017 में जहां सर्वाधिक सड़क हादसे तमिलनाड़ु में हुए, लेकिन मृतकों की सर्वाधिक संख्या उत्तरप्रदेश में रही।

सियाराम पांडेय ‘शांत’

Road safty and new road safty rules: सड़क सुरक्षा और नया मोटरयान कानून

देश मे मोटरयान अधिनियम (संशोधन) 2019 लागू हो गया है। यह अधिनियम, 1988 में पारित एमवी एक्ट में कतिपय संशोधन कर के बनाया गया है। सबसे पहला एमवी एक्ट 1938 में लागू किया गया था। तब से आज तक आबादी, सड़कों का जाल, मोटर व्हीकल की संख्या और तकनीकी आदि सभी कुछ बढ़ चुकी हैं और यह प्रगति अब भी जारी है। आज का विमर्श इसी विंदु पर है। एक वक्त ऐसा था जब भारत में कारों की गिनती कुछ गिनी चुनी ही थी। पर आज,  कारों की भीड़ की वजह से शहर तो शहर, बल्कि गांव और कस्बों की सड़कों पर भी जाम लगने लगा है। भारत में चलने वाली पहली मोटर कार 1897 में  कलकत्ता में मिस्टर फोस्टर के मालिक क्रॉम्पटन ग्रीवस  ने खरीदी थी। इस के बाद बम्बई में सन 1898 में चार कारें खरीदी गई। धीरे धीरे कारो की तकनीक बदलती गयी और लोगों की जरूरतें भी। आज पूरे देश मे, मई 2017 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार,  कुल पंजीकृत वाहनों की संख्या 25,23,24,000 है। 1897 की एक कार से सवा सौ साल बाद इतने वाहनों का सफर इस बात का भी प्रतीक है कि हमारी जीवन शैली, समृद्धि और दिनचर्या में पर्याप्त प्रगति हुयी है। 1951 में यह आंकड़ा 3,06,000 का था।
सड़क पर हमारा व्यवहार, हमारी सभ्यता को भी प्रदर्शित करता है। आज से चालीस पचास साल पहले जब हम सब स्कूलों में पढ़ते थे, तो सड़क पर चलने की मूलभूत बातें स्कूलों और घरों मे बतायी जाती थीं। जैसे, फुटपाथ पर चलना, बाएं तरफ ही चलना, सड़क पार करते समय दायें बायें देख कर उसे पार करना आदि आदि। तब अधिकतर के पास एक अदद सायकिल होती थी। कोई मोटर वाहन था नहीं तो लाइसेंस आदि का कोई बवाल भी कम ही लोगों के जिम्मे था। दो ही मॉडल की मोटर कारें लोकप्रिय थीं। एक एम्बेसेडर और दूसरी फिएट। 1985 से मारुति ने जरूर अपना सबसे पहला मॉडल 800 निकाला था, पर वह तब लोकप्रिय नहीं था। धीरे धीरे वक्त बदला और मारुति आज देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कम्पनी बन गयी है। 1991 में होने वाली मुक्त अर्थव्यवस्था ने दुनियाभर के कार निर्माताओं को भारत की ओर आकर्षित किया। आज देश मे हर मॉडल और हर कंपनी की मोटरसाइकिल, कार, व्यावसायिक वाहन उपलब्ध हैं। भारत मे मोटर वाहनों का इतिहास लगभग सवा सौ साल पुराना है।
हत्या के अपराध की सजा फांसी है। लेकिन इस सजा से, हममें से अधिकांश नहीं डरते हैं। क्योंकि हत्या को हम सब एक जघन्य अपराध और पाप मानते हैं। फांसी या आजीवन कारावास की सजा का भय हमें सीधे न तो प्रभावित करता है और न ही चिंतित करता है। इस जघन्य अपराध का अपराध बोध हमें वह, अपराध करने से रोक देता है। यहां हम एक विधिपालक व्यक्ति बन जाते हैं। पर जब हम सड़क पर चलते हैं तो सड़क पर चलने के कानून का पालन करते हुए, विधिपालक के बजाय एक ऐसे असरदार व्यक्तित्व के रूप में दिखना चाहते हैं कि सड़क पर हम अपनी मनमर्जी से सारे सड़क कानून को धता बताते हुए चल सकते हैं और न तो सड़क कानून तथा न उक्त कानून का पालन कराने वाला हमारा कुछ बिगाड़ सकता है। हम, ‘जहां तक मैं देखता हूँ, मेरा ही साम्राज्य है,’ के मनोभाव के अतिरेक में डूब जाते हैं। कानून दोनों ही हैं, सजा दोनों में ही है, पर हमारा दृष्टिकोण दोनों ही कानूनों के प्रति अलग अलग हो जाता है ।
हर वैधानिक अधिकार के दो पक्ष होते हैं, जिसे कानून की भाषा मे पॉजिटिव और निगेटिव ओबलीगेशन कहते हैं। जैसे अभिव्यक्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, हर व्यक्ति को यह अधिकार संविधान से प्राप्त है। पर इस अधिकार का हर व्यक्ति उपभोग कर सके, यह जिम्मेदारी राज्य की है। वह फ्री प्रेस, मुक्त आवागमन, सेमिनार, गोष्ठियां, आदि बेरोकटोक हों यह सुनिश्चित करना राज्य का काम है । वैसे ही, सड़क पर हर व्यक्ति का अधिकार है कि वह सुरक्षित चले, पर यह सुरक्षा तभी संभव होगी जब हर व्यक्ति  कानून का पालन करे और राज्य का यह दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सभी सड़क पर चलने वाले लोग, कानून के अनुसार चलें। पर क्या यातायात नियंत्रण के संदर्भ में यह होता है ? अफसोस, यह नहीं होता है।
अब कुछ ऐसे उदाहरण पढ़िये जो आप सबके सामने भी निश्चय ही घटा होगा, जहां ट्रैफिक नियमों का जमकर उल्लंघन होता है और कार्यवाही शून्य होती है।  राजनीतिक दलों के जुलूस में जब झुंड के झुंड बाइकर्स अपने नेता के पीछे नारे लगाते हुये चलते हैं तो, न तो वे हेलमेट पहने होते हैं और न ही एक बाइक पर दो ही सवारी बैठी होती है। कागज हैं या नहीं यह तो बाईक वाला जाने। राजनीतिक दलों के जुलूस में चलने वाले नेता, या तो कार के ऊपर बैठे या बाहर निकल कर दरवाजे खोल कर फुटबोर्ड पर खड़े रहते हैं। सीट बेल्ट उल्लंघन भूल जाइए। धार्मिक जुलूसों में भी ऐसे बाइकर्स और वाहन अराजक होकर चलते हैं, और उनके साथ पुलिस भी रहती है, पर यहां भी कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और कोई कार्यवाही नहीं होती है।  इस संदर्भ में, यह कहा जा सकता हैं कि यातायात चेकिंग से अधिक जरूरी है शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस को निकलवा देना। यह बात बिलकुल सही है। लेकिन यह सार्वजनिक तौर पर किया गया ट्रैफिक उल्लंघन अधिकांश, विशेषकर युवा मन मे यह धारणा बैठा देता है कि, ट्रैफिक कानून कोई कानून ही नहीं है और इसे तोड़ने में कोई हर्ज नहीं है। इसे लागू करने वाली पुलिस या तो नागरिकों को तंग करने के लिये चौराहे चौराहे पर चेकिंग के लिये खड़ी रहती है या फिर पैसा वसूली के लिये। हालांकि यह आरोप बेवजह नहीं है पर ट्रैफिक चेकिंग का उद्देश्य भी यह बिलकुल नही  है।  नये अधिनियम में जुमार्ने की राशि तीन गुनी तक बढ़ा दी गयी है। अब इस अधिनियम के अनुसार, जो जुमार्ने लगाए जा रहे हैं वे इतने अधिक हैं कि लोग न केवल आक्रोषित हैं बल्कि जगह जगह पुलिस से मारपीट की भी खबरें आ रही हैं। आजकल सबके पास वीडियो कैमरा है, नेट कनेक्शन सुलभ है, लोग तुरंत वीडियो शूट करते हैं और उसे सोशल मीडिया पर डाल देते हैं। घंटे भर में वह खबर हजारों दर्शकों तक पहुंच जाती है। ऐसी खबरें न केवल आक्रोश उपजाती हैं बल्कि समूह को विधिविरुद्ध होने के लिये भी उकसाती हैं। अर्थदंड की अवधारणा के पीछे यह बात भी सरकार को ध्यान में रखनी चाहिये कि जिस जनता पर यह दंड लगाया जा रहा है क्या उसकी भुगतान क्षमता इतनी है भी। सबसे अधिक चालान दोपहिया वाहनों के होते हैं। पर यह तबका जिस वर्ग से आता है वह निम्न मध्यवर्ग या अधिकतर मध्यवर्ग का होता है। अधिकतर छात्र या छोटी नौकरियों के साधारण लोग,  इस तबके में आते हैं। वे इतना जुर्माना नहीं दे सकते हैं। उनकी इस बढ़े जुर्माने की तुलना में इतनी आय भी नहीं है। इसका परिणाम या तो सड़कों पर झगड़े होंगे या पुलिस पर आरोप लगेंगे। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि विदेशों में चालान की दरें बहुत अधिक हैं। पर वहां पर सड़क अनुशासन भी हमारे यहां की तुलना में कहीं  अधिक है। हमारे समाज को सड़क पर चलने के किसी नियम को गंभीरता से लेने की आदत भी नहीं है। जबकि विदेशों में ऐसा बिल्कुल नहीं है। एमवी एक्ट 2019 की धारा 210 इ. के अनुसार, “कोई अधिकारी, जो इस अधिनियम के प्राविधानों को लागू  करने हेतु अधिकृत है, यदि उसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन, अपराध किया जाता है तो, वह इस अधिनियम में, उस अपराध के लिये निर्धारित दंड से दुगुना दंड के लिये दंडनीय होगा।” यह प्रविधान समान अपराध के लिये समान दंड के सिद्धांत के विरुद्ध है।  यह ट्रैफिक का एक सिद्धांत है। पर शायद ही कोई शहर हो, जहां के फुटपाथ, अतिक्रमण से भर कर बाजार न हो गए हों, सड़के पार्किंग केंद्र न बन गयीं  हों, चौराहो पर पान आदि की दुकानें, ठेले वाले न जमें रहते हों, ऐसे आवागमन वाले मार्ग पर केवल जुर्माना लगा कर जब ट्रैफिक रेगुलेट करने की बात सरकार सोचेगी तो लोगों में आक्रोश उपजेगा ही । सड़क पर लोगों के सुरक्षित रूप से चलने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये यह राज्य का सकारात्मक दायित्व है कि वह अतिक्रमण और गड्ढा मुक्त  सड़कें उपलब्ध कराए। केवल सघन चेकिंग के साथ और चौराहो पर दौड़ा दौड़ा कर चालान काट कर ही इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। सड़कों पर ट्रैफिक चेकिंग के समय ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ इधर कुछ अराजक तत्वों ने मारपीट की घटनाएं की हैं। यह एक्ट न तो पुलिस ने लागू किया है और न ही इसके चालान के नियम पुलिस मुख्यालय से तय हुये हैं। यह नियम सरकार ने संसद में मंजूरी के बाद लागू किया है, बस उस अधिनियम का उल्लंघन न हो, यह देखना यातायात पुलिस का काम है। ऐसा भी नही  कि यह नियम जब से आया है तब से ही ट्रैफिक चेकिंग शुरू हुयी है। बड़े शहरों में यह यातायात चेकिंग बराबर चलती रहती है।  देश भर में यातायात पुलिस की सक्रियता अक्सर महत्वपूर्ण क्षेत्रो और चौराहो पर होती है। इसका एक बड़ा कारण है यातयात पुलिस की कमी। पूरे देश मे, पुलिस जनशक्ति की कमी है और यातायात पुलिस में तो यह कमी और भी है। क्योंकि यह विभाग,  पुलिस की प्राथमिकता में उतना नहीं आता है जितना अपराध के अन्वेषण, और कानून व्यवस्था से जुड़े पुलिस के मुख्य विभाग आते हैं। ब्यूरो आॅफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट, बीपीआरडी, की एक रिपोर्ट के अनुसार, ” पूरे देश मे कुल ट्रैफिक पुलिस के जवानों की जनशक्ति 72,000 से थोड़ी अधिक है जबकि सड़क पर चलने वाले कुल वाहनो की संख्या लगभग 25 करोड़ है। यह रिपोर्ट 2017 की संस्थान के अध्ययन में दी गयी है। लेकिन अभी भी अगर इसमे दो वर्ष और जोड़ लें तो, यह संख्या अब भी बहुत अधिक नहीं बढ़ी होगी। वाहन और यातायात पुलिस के संख्यागत अनुपात को देखते हुये यह स्पष्ट है कि ट्रैफिक पुलिस की संख्या वाहनों के अनुपात में बहुत कम है। अगर इसका अनुपात जनसंख्या से जोड़ा जाएगा तो, संख्या और भी कम हो जायेगी।  पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक, यानी 8,500 यातायात पुलिस के जवान हैं कर्नाटक में, 6,000 और दिल्ली में यह संख्या 6,600 है। यह सारी जनशक्ति केवल बड़े और मझोले शहर में ही दिखेगी, जबकि कस्बों, और छोटे शहरों में यातायात पुलिस की उपस्थिति बहुत ही कम होती है। जवानों की कमी के कारण ही यातायात प्रबंधन के लिये इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सहायता ली जाती है। सुरक्षित चलने के लिये, और चौराहों पर किसी भी रोक टोक ठोक से बचने के लिये जरूरी है कि हम आप सब यातायात नियमों का पालन करें, बजाय इसके कि अपनी ड्यूटी पर खड़े सिपाही जो इसी समाज का अंग है से उलझें और उससे मारपीट करें। यह अनुचित और निंदनीय तो है ही साथ ही भारतीय दंड संहिता में दंडनीय अपराध भी है।

Ma Vaishno Devi shrine became an example of cleanliness: स्वच्छता की मिसाल बना मां वैष्णों देवी तीर्थ स्थल

हर सरकार देश में कई अभियान चलाती है। जिसे देश के कुछ लोग या सस्थाएं स्वीकारती है तो कुछ नहीं। लेकिन जब खबर किसी तीर्थ स्थल को स्वच्छ रखने की आए तो दिल खुश हो जाता है। बीते शुक्रवार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सफाई को लेकर श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को देश के सर्वश्रेष्ठ स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थान के लिए पुरस्कार दिया है।
पूरे यात्रा मार्ग और बोर्ड के भवनों में स्वच्छता और वर्षा जल संचयन के अलावा कई अन्य तरीकों से वैष्णो देवी तीर्थ ने स्वर्ण मंदिर और ताज महल के अलावा कई स्थलों को पछाड़ कर प्रथम स्थान प्राप्त किया। जैसा कि मां वैष्णो के दरबार में प्रतिवर्ष देश-विदेश से करीब सवा करोड़ श्रद्धालु दर्शन करने जाते हैं। श्राइन बोर्ड के करीब 1250 सफाई कर्मचारी दिन-रात लगे रहते हैं। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह कूड़ादान की सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा रहा हैं। प्रतिदिन करीब 35 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस तीर्थ स्थल को स्वच्छ बनाने में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को अपनाया गया है। जैसा कि यहां भवन तक पहुंचने में पैदल के अलावा घुड़सवारी के द्वारा भी जाया जाता है जिससे जगह-जगह घोड़े की लीद से गंदगी व बदबू से लोगों को भारी परेशानी होती थी लेकिन पिछले कुछ समय से रास्ते को साफ करने के लिए 24 घंटे सफाईकर्मी खड़े रहते हैं। साथ ही लीद को एकत्रित करके खाद बनाकर खेतीबाड़ी व पौधों के लिए प्रयोग की जाने लगी। जलरहित मूत्रलाय बनकार कई हजार लीटर पानी को व्यर्थ होने से बचाया जा रहा है। करीब 45 क्रश वेंडिंग मशीन लगाते हुए प्लास्टिक पूरी तरह के प्रतिबंधित की हुई है जिस वजह से यह सब हो पाया है।
पूरे देश में आप चाहे किसी भी तीर्थ स्थल पर जाएं वहां गंदगी तो रहती है साथ में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलती हैं। शौचालयों की बात करें तो कहीं है तो कई जगह नही हैं और यदि कहीं दिख भी जाए तो वह बेहद गंदे व बदबूदार होते हैं। महिला शौचालय की बात करें तो कहीं नही दिखता जिसके चलते भारी परेशानी होती है। श्राइन बोर्ड से अन्य सफाई बोर्ड व संस्थाओं को इससे प्रेरित होकर अपने आप को सुधार करना चाहिए जिससे तीर्थ स्थल पर आने वालों को परेशानी न हों। इसके अलावा इस लेख माध्यम से एक महत्वपूर्ण बात यह भी कहना चाहते हैं कि तीर्थ स्थलों में दर्शन के लिए लाइन महिला व पुरुष के लिए अलग अलग होनी चाहिए जिससे जो बदतमीजियां होती है उन पर अंकुश लगेगा। साथ ही लाइन को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के लिए सिस्टम अपटेड होना चाहिए।
अक्सर देखा जाता है कि बड़े तीर्थ स्थलों पर घटों लाइन लगी होती है यदि किसी को बीच में शौचलय जाना पड़ जाए तो समझो उसकी आफत आ जाती है क्योंकि वह लाइन से हट गया तो दोबारा लगने का कोई विकल्प नहीं होता और यदि किसी तरीके से चला भी जाए तो उसको परिसर में आस पास कोई शौचलय नहीं मिलता। खासतौर पर महिलाओं के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बन जाती है। कई जगह तो इतनी गंदगी होती है कि वहां खड़ा होना मुश्किल हो जाता है। तमाम ऐसे तीर्थ स्थल हैं जहां भीड़ अनियंत्रित हो गई और कई श्रद्धालुओं को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। ऐसी दुर्घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है। इसलिए राज्य सरकार व केंद्र सरकार के साथ मंदिर प्रबंधन को इस मंथन करने की जरुरत है। 2 अक्टूबर गांधी जयंती पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत हुई थी जिसके बाद इस देश में बहुत बदलाव देखने को मिला था।
बहुत ज्यादा नही लेकिन जितने भी लोगों ने इसे अपनाया उससे बदलाव की ब्यार तो आई है। बहुत मुश्किल होता देश की जनता को यह समझाना कि जैसा आप अपने घर को साफ रखते हैं वैसे ही अपने मौहल्ले,राज्य व देश को भी साफ रख सकते हैं क्योंकि यह भी तुम्हारा है। कुछ लोग सिर्फ अपने घर को ही साफ रखने में विश्वास रखते हैं बाकी जगहों से उनका कोई मतलब नहीं होता। हमें ऐसी सोच को बदलना होगा क्योंकि एक-एक से अनेक बनते हुए कारवां बनता है। वैसे तो हर तीर्थ स्थलों पर हमेशा भीड़ रहती है लेकिन पिछले दो दशकों से बच्चों की छुट्टियों के दौरान अब बहुत ज्यादा भीड़ रहने लगी जिस वजह से बच्चे गायब हो जाते हैं। इसलिए तीर्थ स्थलों पर सीसीटीवी कैमरे जरूर लगे होने चाहिए। वैसे तो प्रबंधन दावा करता है कि कैमरे ठीक है लेकिन घटना होने पर सब गड़बड़ हो जाती है। इसके अलावा भी कई ऐसी चीजें हैं जिन पर अभी काम करने की जरुरत है।
जैसा कि वर्ष 1986 में तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन ने श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का गठन किया था। बोर्ड के अनुसार उस वक्त सालाना करीब 15 लाख श्रद्धालु मां वैष्णो देवी के दर्शन करते थे। लेकिन समय के साथ जनसंख्या भी बढ़ गई तो श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ गई जिसके चलते व्यवस्था को दुरुस्त किया गया। बहराहल, श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को देश के सर्वश्रेष्ठ स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थान के लिए पुरस्कार दिया गया तब से वहां जाने वाले श्रदालुओं में एक खुशी की लहर है। इसके अलावा देश विदेश से तारीफ बटौर इस खबर से हमारे सम्मान में चार चांद लग गए। अब हम चाहते हैं कि ऐसी खबर हर तीर्थ स्थल से आए।

योगेश कुमार सोनी
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

Begani shadi main abdula diwana: बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

वर्षों पहले मैं हिसार रेंज में आईजी था। रोज की तरह सवेरे दफ्तर में लोगों से मिल रहा था। उनकी तरह-तरह की शिकायतें थी। कई तो डरे-सहमे थे। अपनी बात कह भी नहीं पा रहे थे। कई पहले से फोन करवा के पूरी टोल के साथ पधारे थे। हर किसी की एक कहानी होती थी। उसमें वे अपने को शिकार और बाकी को शिकारी बताते थे। अधीनस्थ पुलिस कर्मियों पर उनकी पूरी कृपा होती थी।
उनके बारे में कुछ ऐसा बखान करते कि मुझे शर्म आती कि मैं उनका अफसर क्यों हुं। कई तो थानेदार से फोन पर हुए बातचीत का रिकॉर्डेड ब्योरा भी सुनाने लगते। मुझे अचंभा होता कि आखिर फटेहाल से दिखने वाले इस शख्स ने फोन-काल टेप करना सीखा कहां से? कई तो वीडियो भी दिखा देते। कुछ साल पहले तक अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हमारे हर तरफ टेप रिकॉर्डर और कैमरा होगा और उसे मिनटों में सारी दुनिया में फैलाने के लिए लगभग मुफ्त का इंटरनेट भी होगा। उसी क्रम में एक दुबली-पतली सी लड़की मिली। सोचा वही शादी का रोना रोएगी। हमारे यहां शादी का टूटना जिंदगी बर्बाद होना माना जाता है। लड़के और उसके परिजनों के खिलाफ कानून की सारी धाराएं लगा दी जाती है।
समझदार किस्म के पुलिसकर्मी इसके विश्वव्यापी एवं त्वरित कार्रवाई में विशेष रुचि लेते हैं। अगर लुटेरे और दहेज के आरोपी में से एक को पकड़ने का विकल्प हो तो वे  दहेज के भेड़िए की तरफ ही लपकेंगे। महिला आरोपियों को खास तवज्जो देते हैं। हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा। इस कानून ने सबके के लिए जेल के दरवाजे खोल दिए हैं। अगर मियां-बीवी में खटपट हो गई तो बीस साल से अमेरिका में रह रही बुआ और नब्बे साल की दादी भी दायरे में आ जाती है। खैर, इस लड़की का नाम अनु था और उसके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। उसने बताया कि वो ‘भीख नहीं किताब दो’ नाम की सहयोगी संस्था चलाती है। झोपड़-पट्टी में फंसे गरीब बच्चों को पढ़ाती है। बाद में उसके कहने पर मैं उसके इलाके में भी गया। उसके बच्चों से भी मिला।
इस बात से अनभिज्ञ कि प्रबुद्ध लोग उनकी फटेहाली का झूठा रोना रोकर शोहरत और पैसा बटोर रहे हैं, वे अपनी दुनियां में मस्त मिले। एक-एक परिवार में 10-10 बच्चे थे। एक बूढ़े से पूछा कि इनका ख्याल कैसे करते हो। जवाब मिला कि सब हो जाता है। अगर एक-दो मर भी गए तो और पैदा कर लेंगे। दो सबक मिला। एक, कुछ अच्छा करने के लिए कुछ विशेष होने की जरूरत नहीं है। बस हौसला होना चाहिए। दो, लोग परिस्थितियों के हिसाब से सोच बना लेते हैं। खाते-पीते लोग गरीबों को साधनहीन, दयनीय समझते हैं। बदले में गरीब भी उनको कंजूस, बीमार और झगड़े में उलझा हुआ ही समझते हैं।
उसी दौरान मेरा हिसार के डीसी दफ्तर में भी जाना हुआ। अक्सर अफसर जहां बैठते हैं उसके पीछे एक बोर्ड लगा होता है। इसमें उनके पूर्ववर्तियों और उनके सेवा-अवधि के बारे में लिखा होता है। वहां एक वेड्डेरबर्न नाम के महाशय भी तख्ती-नशीं थे। विशेष बात ब्रैकेट् में थी कि वे 1857 में बागियों के हाथ मारे गए। भाव कुछ शहादत वाला था। वैसे तो ये छोटी बात है लेकिन एक तरह से देखें तो इसके मायने बड़े हैं। भारत में सिविल सेवा अभी भी अपने को अंग्रेजों से जोड़कर ही देखती है। भले ही वे आक्रामक थे और एक खाते-पीते देश का बेड़ा गरक कर गए। पिछले 8-10 दिनों में दो-तीन अपेक्षाकृत युवा सरकारी अधिकारियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी। पहले कश्मीरियों के अभिव्यक्ति के अधिकार के हनन से क्षुब्ध थे।
दूसरे का कहना था कि प्रजातंत्र के ढांचे से खिलवाड़ हो रहा है और ऐसे में सरकार का हिस्सा बने रहना अनैतिक है। चूंकि खानदानी आदमी थे और अपने त्याग को उन्होंने एक ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दे से जोड़ दिया था, टीवी-अखबार वाले दौड़ पड़े। कुछ आशिकाना अंदाज में उन्होंने गले न उतरने वाली अपनी कुर्बानी की दास्तां चैनल दर चैनल दोहराई। जैसे कि ये कोई नई क्रांति का सूत्रपात कर रहे हैं। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक तरफ जहां रोजगार को लेकर हल्ला मचा हुआ है, ये कौन लोग है जो पैंतीस साल की जागीर को ठोकर मार रहे हैं। वो भी उस कश्मीर के लिए जिसके बारे में उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा के इतिहास के जनरल नॉलेज पेपर के लिए ही पढ़ा होगा। शायद ही कभी उधर कदम भी रखा हो। वैसे तो इस तरह की आला नौकरी एक समय में सुभाष चंद्र बोस ने भी छोड़ दी थी। लेकिन इनकी तो मुझे जबरदस्ती की शहादत ही लगती है।
खाते-पीते घरों, रियायती दरों पर महंगी शिक्षा प्राप्त कर कोचिंग के रास्ते सरकार की पहली कतार में घुस आए ये अपनी मर्जी की तैनाती चाहते हैं। काम के बारे में किसी सवाल-जवाब से इन्हें सख्त परहेज है। नौकरी तो हम शौक के लिए करते हैं का भाव लिए घूमते हैं। जिद करते हैं कि सामंती हुकूमत बनी रहे। जैसा अंग्रेज कह गए वैसा ही होता रहे। देखने वाली बात ये है कि इनका अगला कदम क्या होगा। आईएसआईएस का रूख करेंगे या अपने रसूख और सरोकार का इस्तेमाल कर किसी देशी-विदेशी कंपनी में एडजस्ट हो जाएंगे? नौकरी जब मर्जी छोड़ें लेकिन एक संवेदनशील मुद्दे पर ऐसे ही हांक देना बारूद को तीली दिखाने जैसा है। इन्हें पता भी है कि सीरिया और अफगानिस्तान से फारिंग होते ही पेशेवर जेहादी उनकी तरह कोई कंपनी या पार्टी में भर्ती नहीं होंगे? वे कश्मीर पर ही हल्ला बोलेंगे।
भारत में सिविल सेवा की परीक्षा, इसकी संरचना एवं प्रशिक्षण में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है। कुछ ऐसा करने की जरूरत है कि इसमें लोगों की समस्या का समाधान का हौसला रखने वाले ही घुस पाएं, टिक पाएं।(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

Importance of fit india campaign: फिट इंडिया अभियान की अहमियत

हम सब जानते हैं कि भारतवर्ष आज युवाओं के देश के रूप में जाना जाता है क्योंकि हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा युवाओं का है। युवा वर्ग आज न केवल बहुत मेहनती और कल्पनाशील है बल्कि इनका फोकस भी बहुत स्पष्ट है और इनमें उच्चशृंखला के बजाए ठहराव ज्यादा है। इसके बावजूद क्या यह जानकर हमें दुख नहीं होता कि हमारा देश बीमार लोगों का देश है।
हम भारतीय अकल्पनीय रूप से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। भक्ति साधना के अतिरिक्त योग और व्यायाम का देश होने के साथ-साथ हम प्राकृतिक चिकित्सा के भी ध्वजवाहक हैं फिर भी ऐसा क्यों है कि हमारे देश की अधिकांश आबादी बीमारों की है ? क्या आपको मालूम है कि चीन के बाद हमारे देश में मधुमेह, यानी डायाबिटीज से पीड़ित लोगों की संख्या विश्व भर में सर्वाधिक है? क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है ? जी हांए यह भयावना सच है कि हम युवाओं का देश होने के साथ-साथ बीमार लोगों का देश बन कर रह गये हैं। नशा और दुर्घटनाएं मिलकर जितने लोगों को असमय मृत्यु का ग्रास बना देते हैं उतने ही लोग अज्ञानतावश गलत खान-पान के कारण काल-कवलित हो जाते हैं। मैं जब सवेरे सैर के लिए निकलता हूं तो सैर करते हुए युवाओं को देखकर मन खुशी से भर जाता है लेकिन उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो लंबे समय से सैर कर रहे हैं पर स्वस्थ नहीं हैं। खुद मैं भी अज्ञानता का शिकार रहा और अब कुछ – कुछ समझ में आने लगा है कि अपनी अज्ञानता के कारण मैंने अपने शरीर के साथ कितना अन्याय किया है। मुझे सदैव से गर्व था कि मैं शाकाहारी हूं, नशा नहीं करता, मेहनती हूं और हमारे घर का वातावरण सात्विक है।
सन् 2003 में मैं उच्च रक्तचाप से पीड़ित पाया गया और तब से लगातार मैं हर रोज दवाई ले रहा था। हमारा व्यवसाय ऐसा है कि मार्च का महीना साल का सर्वाधिक व्यस्त महीना होता है। लेकिन इस वर्ष मार्च में मेरी तबीयत लगातार खराब रहने लगी। सिर भारी हो जाता था, शरीर में थकावट रहती थी, पिंडलियां दर्द लगातार करती थीं, वगैरह – वगैरह। अपने डाक्टर की सलाह पर जब खून की जांच करवाई तो पता चला कि मेरा कलेस्ट्रोल गड़बड़ था, यूरिक एसिड बढ़ा हुआ था और मैं डायबिटिक हो जाने के मुहाने पर था। ब्लड प्रेशर का मरीज तो मैं था ही। यह मानो वैसा ही अनुभव था जैसा न्यूटन के सिर पर सेब गिरने पर हुआ था। मैं मानो नींद से जाग गया। मुझे महसूस हो गया कि अगर मैंने अब सिर्फ अपने स्वास्थ्य को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं बनाया तो मैं शेष सारी उम्र दवाइयां निगलता रहूंगा। मैंने सैर शुरू की और अपने डाक्टर की सलाह पर खान – पान में सुधार किया। सैर करते समय अपने पुराने मित्र अमित शर्मा से मुलाकात हुई। अमित शर्मा सन् 2017 में 121 किलो के थे, आज उनका वजन 68 किलो है। अमित शर्मा के संसर्ग ने मुझे खान-पान पर और शोध की इच्छा बलवती की और मैंने स्वतंत्र रूप से भी इस पर काम करना शुरू किया। आज मैं न केवल दवा मुक्त स्वस्थ जीवन जी रहा हूं बल्कि खान- पान के प्रति जागरूकता पैदा करने के अभियान में भी जुटा हूं। यह खुशी की बात है कि केंद्र सरकार ने देश में व्याप्त स्वास्थ्य की समस्या का संज्ञान लेते हुए फिट इंडिया अभियान की शुरूआत की है और केंद्रीय खेल मंत्री किरन रिजजू की अध्यक्षता में 28 सदस्यों की समिति का गठन किया है जो इस अभियान की देखरेख करेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल से देश में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का नया दौर आयेगा और स्वच्छ भारत अभियान की ही तरह यह जनमानस की चर्चा का विषय बनेगा। समस्या यह है कि हम स्वास्थ्य को समग्रता में नहीं देखते। हम में से ज्यादातर लोग कसरत को सेहत की कुंजी मानते हैं। व्यायाम और खान-पान के नाम पर हम बड़ी भ्रांतियों के शिकार हैं। खेद का विषय है कि अधिकांश नामचीन डाक्टरों, डाइटीशियनों और स्लिमिंग सेंटरों ने स्वास्थ्य को लेकर अज्ञानता को और बढ़ावा दिया है तथा लोगों का शोषण किया है। मैं जब बाजार जाता हूं तो जगह-जगह मुझे ऐसे पोस्टर लगे मिलते हैं जिन पर लिखा होता है… अपने बॉस खुद बनो, समय का बंधन नहीं, कोई सेल नहीं, कोई कागजी तामझाम नहीं, पच्चीस हजार रुपए महीना तक कमाओ। किसी जमाने में भारत में ऐसे लोगों की भी बड़ी शोहरत थी जो तीन महीने में आपका धन दुगना करने की गारंटी देते थे।
कोई व्यायाम नहीं, कोई दवाई नहीं, कोई डायटिंग नहीं, वजन घटाओ, गारंटी से जैसे विज्ञापनों से प्रभावित होकर अपने स्वास्थ्य के मामले में भी हम ऐसे ही सपनों का शिकार बन रहे हैं। याद रखिए, स्वास्थ्य और खान-पान के मामले में एक ही साइज सबको फिट आये, ऐसा संभव नहीं है। आपकी व्यक्तिगत आवश्यकताएं, आपकी फिटनेस का स्तर, आपके व्यायाम की रुटीन, आपका व्यवसाय, दिन भर की व्यस्तताएं, आपके शहर की जलवायु और भोजन के मामले में आपकी पसंद को ध्यान में रखे बिना डाइट और एक्सरसाइज की सही सलाह देना संभव नहीं है। फिर भी कुछ मोटे-मोटे नियमों से शुरूआत की जा सकती है, जैसे, भोजन में सलाद की मात्रा को दुगुना कर देना, दाल और सब्जी की मात्रा बढ़ाकर रोटी या चावल की मात्रा कम कर देना, हरी सब्जियां ज्यादा खाना, रात को सोने से तीन घंटे पहले रात का भोजन कर लेना और नियमित रूप से व्यायाम करना। खान-पान की समीक्षा में व्यक्ति के निवास स्थान की जलवायु का भी बहुत महत्व है। कोलकाता के निवासी किसी व्यक्ति का खान-पान, कानपुर में रहने वाले किसी व्यक्ति जैसा नहीं हो सकता, नहीं होना चाहिए। अगर कोई बंगला भाषी व्यक्ति कानपुर में बस जाए तो उसे अपने खान-पान के तरीके में भी बदलाव ले आना चाहिए। जलवायु के इस महत्व को समझे बिना कुछ भी खा लेना उचित नहीं है। खान-पान दरअसल गहरे शोध का विषय है। इसके बावजूद मैं फिर से जोर देकर कहना चाहूंगा कि केवल शुरूआत भी ठीक है, और इसके परिणाम भी अच्छे ही होंगे। पूर्णत: स्वस्थ रहने के लिए अपने खान-पान और व्यायाम का प्रबंधन एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसके लिए किसी अच्छे डाक्टर या डाइटीशियन की सलाह लेना जरूरी है। उम्मीद करनी चाहिए कि फिट इंडिया अभियान से इस दिशा में हमारी जागरूकता बढ़ेगी और शीघ्र ही हम सिर्फ एक युवा देश ही नहीं बल्कि स्वस्थ युवाओं के देश के रूप में जाने जायेंगे।

पी.के. खुराना

लेखक वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और राजनीतिक रणनीतिकार हैं।

Aazam khan and BJP: आजम को घेरने के लिए हर हथकंडा!

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान को घेरने के लिए भाजपा हर तरह के छद्म करने को उतारू है। उनकी पत्नी, बहन, बेटा और भानजे सब पर मुकदमे ठोक दिए गए हैं। ऐसा लगता है, जैसे आजम खान कोई राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि शातिर अपराधी हैं। इनमें से कई मुकदमों की तो ठीक से पड़ताल तक नहीं की गई। आरोप लगा, और मुकदमा ठुका। इसके पीछे लगता है, कि भाजपा की आजम खान से खुन्नस कम समाजवादी पार्टी से ज्यादा है। क्योंकि आज की तारीख में अकेले समाजवादी पार्टी ही योगी आदित्यनाथ सरकार से भिड़ने का हौसला रखती है। इसलिए योगी सरकार का एकमात्र लक्ष्य है, येन-केन-प्रकारेण सपा को कमजोर करना। और यह तब ही संभव है जब सपा के सारे दिग्गज नेता घेर लिए जाएं। यह कितना अमानवीय लगता है, कि इस बुजुर्ग नेता की 75 वर्ष की बहन को पुलिस खींच कर ले गई, मानों वह कोई भगोड़ा हों।
दरअसल आजम खान को माइनस कर समाजवादी पार्टी का कोई अस्तित्त्व नहीं बचता। इसलिए सपा को खड़ा करने वाले मुलायम सिंह भी अब अपनी उम्र, अस्वस्थता और अस्थिरता के बावजूद उनके समर्थन में आ गए हैं। मंगलवार को उनकी प्रेस कान्फ्रेंस इसी वजह से हुई। आज उत्तर प्रदेश की योगी आदित्य नाथ सरकार जिस तरह से आजम खान की चौतरफा घेरेबंदी कर रही है, उससे यह तो साफ ही है, कि छोटे-छोटे आरोप लगाकर योगी सरकार असल में तो यूपी से सपा का पत्ता साफ करने की तैयारी में है। कुल ढाई साल बाद ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव है। और योगी सरकार के पास अपनी उपलब्धियां बताने को कुछ नहीं है। यहां तक कि उन संसाधनों को भी ढाई साल की योगी सरकार ने नष्ट कर दिया है, जो पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार छोड़ गई थी। उत्तर प्रदेश में बिजली, सड़क और पानी के मामले में मायावती और अखिलेश सरकारों ने क्रांतिकारी काम किया था। किन्तु योगी सरकार के वक्त ये सब समाप्त हो गया। इसलिए जीत के लिए कुटिल चालें खेली जा रही हैं। इसका पहला निशाना बड़बोले आजम खान बने हैं। क्योंकि आजम खान ही वह कुंजी हैं, जिसको माइनस कर सपा के असर को खत्म किया जा सकता है।
यूपी का किला फतेह करने के लिए, एक तो पिछड़े वोटों का साथ चाहिए, दूसरे मुसलमानों को अलग-थलग कर देने की चाल। बस दांव पूरा। मुसलमान यदि सपा के साथ रहता है, तो मुलायम सिंह अपने पिछड़े वोटों के बूते सत्ता तक पहुंच ही जाते हैं। यूं भी मुसलमान अब बसपा के पाले में जाने से रहा, लेकिन यदि मुसलमान सपा का साथ छोड़ता है, और कांग्रेस के पास जाता है, तो नतीजा सिफर। क्योंकि कांग्रेस के पास अब कोई वोट-बैंक नहीं बचा है। ऐसे में आजम की घेरेबंदी कर भाजपा अपना खेल खेल रही है। इन मुस्लिम वोटों के लिए आजम खान जैसे मुंहफट और साफ बात करने वाले नेता की सपा को सख्त जरूरत है। क्योंकि पिछड़ों में अब सिर्फ यादव ही उनके पास बचा है। कुर्मी, जाट, गूजर तथा अन्य पिछड़े वर्गों पर अमित शाह ने कल्याण सिंह के बूते अच्छी पैठ बना ली है। ऐसे में आजम खान को फंदे में ले लेना भाजपा की बड़ी राजनीतिक चाल है। यह पहली बार हुआ होगा, कि उत्तर प्रदेश की राजनीति की रग-रग से वाकिफ आजम खान पर कोई सरकार 80 मुकदमे लाद दे। इनमें से कुछ तो इतने पोच हैं, कि हो सकता है कि वे कोर्ट में स्टैंड ही न कर पाएं। मगर आज की तारीख में भाजपा सरकार ने आजम खान को लाचार तो कर ही दिया है।
मजे की बात, कि आजम खान खुद ही कानून के ही जानकार हैं। सक्रिय राजनीति में आने के पूर्व वे वकालत ही करते थे। 1974 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की थी। 1977 में वे जनता पार्टी से जुड़े। 1980 में आजम खान ने पहली बार विधानसभा का चुनाव जीता। 1992 में मुलायम सिंह ने जब जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई, तब वे ही उनके साथ थे। यूं भी उत्तर प्रदेश में 1990 में बनी पहली मुलायम सरकार में वे काबीना मंत्री भी रहे थे। लगातार नौ बार वे विधायक रहे। यूपी में मुस्लिम मतदाताओं के बीच आजम खान की अच्छी पकड़ है। लेकिन मुलायम सिंह और आजम खान की दोस्ती को एक झटका 2009 में तब लगा, जब अमर सिंह मुलायम सिंह के साथ जुड़े। वे एक तो भाजपा के तब बागी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को समाजवादी पार्टी में लाए, दूसरे जया प्रदा को रामपुर से चुनाव लड़ाया। यहां पर आजम खान को पराजित और लज्जित होना पड़ा। 2009 में सपा ने 39 लोकसभा जीतीं और जया प्रदा आजम के विरोध के बावजूद राम पुर से लोकसभा जीत गईं।
सपा ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। तब अमर सिंह का जादू मुलायम पर सवार था। लेकिन इसके बावजूद आजम खान ने संयम बरता, और मुलायम सिंह के बसरे में कभी कोई टिप्पणी नहीं की। किन्तु बाद में मुलायम सिंह को अपनी भूल का अहसास हुआ। 2010 में अमर सिंह को पार्टी से बाहर किया गया, और आजम खान की चार दिसंबर 2010 को सम्मान के साथ वापसी हुई। आपसी बोलचाल में भी दोनों नेताओं ने सदा ही संयम बरता है। मुलायम सिंह सदैव आजम खान को आजम साहब बोलते हैं, और आजम खान उन्हें नेता जी। आजम ने एक बार मुलायम पर शेर कहा था, ‘इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा,  करते हैं कत्ल और हाथ में तलवार तक नहीं।’ यही कारण है, कि भाजपा ने मुलायम सिंह को अकेला छोड़ देने के लिए ही आजम खान पर तमाम मुकदमे ठोके हैं। रामपुर में गरीब बच्चों के लिए जौहर यूनिवर्सिटी बनाने का आजम खान का एक सपना रहा है। शायद यह यूनिवर्सिटी अगर बन जाती, तो हिंदुस्तान में बेजोड़ होती। मगर भाजपा ने इसी को लक्ष्य बनाकर उन्हें घेरा है। जिस प्रदेश में जगह-जगह प्राइवेट यूनिवर्सिटी की दूकानें चल रही हैं, उसका जौहर यूनिवेर्सिटी के प्रति यह रोष उसकी कुंठा को जाहिर करता है। मगर अब जब मुलायम सिंह ने आजम खान के समर्थन में आकार ताल ठोक दी है, तो भाजपा की यह कोशिश निष्फल ही जाएगी।

Ranu Mandal the singer: ठहरी हुई जिंदगी का नया मुकाम है रानू मंडल

जिंदगी में कभी-कभी आपकी लाख कोशिश मुकाम नहीं दिला पाती। लेकिन कभी मंजिल आराम से मिल जाती है। उसके लिए कोई अतिरक्त प्रयास भी नहीं करने पड़ते। ऐसा भी होता है जब किस्मत को गढ़ने और तराशने में काफी कुछ लुट जाता है और सब कुछ पीछे छूट जाता है। यह भी सच है कि जब भगवान देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। हर इंसान की कामयाबी के पीछे एक भगवान छुपा होता है। वह चाहे इंसान के रुप में ही क्यों न हो। इसलिए जिंदगी में रियाज और प्रयास को कभी अलविदा मत कहिए। पश्चिम बंगाल के रानाघाट की रानू मंडल आज बॉलीवुड के साथ गूगल और इंटरनेट दुनिया की स्टार बन गई हैं। रानाघाट रेलवे स्टेशन पर कुछ दिन पूर्व गुमना सी जिंदगी जिने वाली रानू विकिपीडिया में बतौर संगीतकार दर्ज हो गई हैं। दुनिया भर में करोड़ों लोग इंटरनेट पर उसे सर्च कर रहे हैं।
एक बेहद गरीब परिवार की महिला अपनी आवाज की बुलंदियों की बदौलत सिनेमाई दुनिया में तहलका मचा दिया है। स्वर कोकिला लता मंगेसर के गाए गीत एक प्यार का नगमा है ने रानू को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। कभी इसी गीत को गाकर रानाघाट रेलवे स्टेश पर दो वक्त की रोटी तलाशती थीं। कहते हैं वक्त बदलते देर नहीं लगती। यह भी सच है कि किस्मत को गढ़ना बेहद मुश्किल है। रानू की जिंदगी बदलने में सबसे बड़ा हाथ तो ईश्वर का है। लेकिन असली भाग्य विधाता तो धरती का भगवान सॉफ्टवेयर इंजीनियर यतींद्र चक्रवर्ती है जिसने उसका वीडियो वायरल कर हिमेश रेशमिया तक पहुंचाया। हिमेश रेशमिया बॉलीवुड की नामचीन हस्तियों में शुमार हैं। हिंदी फिल्मों में आज उनके गीत और संगीत का जलवा है। सोशलमीडिया पर रानू मंडल का वायरल हुआ वीडियो हिमेश को इतना भाया की उन्होंने अपनी आने वाली फिल्म हैप्पी- हार्डी और हीर के लिए दो गाने भी रानू से गवाए। जिसकी वजह से उसकी ख्याति और बढ़ गई। हिमेश की तरफ से लॉन्च किए जाने के बाद अब पूरा बॉलीवुड उसे हाथों-हाथ लेना चाहता है। संगीतकार ए रहमान और सोनू निगम भी उसके साथ गाना गाना चाहते हैं। इसी को कहते हैं तकदीर। कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा। मुझे मालूम है किस्मत का लिखा भी बदलता है। मशहूर शायर बशीर वद्र का यह शेर रानू की जिंदगी पर फिट बैठता है। हाथ की सारी लकींरे कभी मिटने के बाद उग आती हैं। शायद रानू मंडल के साथ भी यही हुआ।
हालांकि बॉलीवुड की दुनिया में उसका कैरियर बहोत लंबा नहीं है क्योंकि रानू जिंदगी के 60वें मोड़ पर पहुंच चुकी है। वह 1960 में पैदा हुई। उसने कहा भी है कि उसकी जिंदगी में इतने मोड़ हैं जिस पर पूरी फिल्म बन सकती है। रानू जब छह माह की थीं तभी उसका साथ माता-पिता से छूट गया। दादी ने किसी तरफ पालन पोषण किया। बाद में उसने अपनी शादी बॉलीवुड स्टार फिरोज खान के रसोइए बाबू मंडल से कर ली। जिसके बाद वह मुंबई चली आई। लेकिन इस शादी के बाद से उसके जीवन का संघर्ष शुरू हो गया। परिवार में दरार बढ़ने लगा। बाद में उसके पति की मौत हो गई और जिंदगी चलाने के लिए उसने रानाघाट को अपनी मंजिल बना लिया। स्टेशन पर रफी साहब के गीत जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। उसी सदाबहार गीत एक प्यार का नगमा है को गाकर आजीविका चलाने लगी। रानू मंडल की आवाज में गजब की कशिश है। जिस आवाज को अब तक कोई नहीं पढ़ पाया था। उसे यतींद्र चक्रवर्ती ने पढ़ा और वीडियो सूट कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। जिस पर हिमेश रेशमिया के साथ कई नामचीन हस्तियों की निगाह पड़ी।
लेकिन कहते हैं हीरे की पहचान जौहरी ही करता है। आखिर हिमेश सबसे पहले बाजी मार ले गए। हिमेश के साथ गाए रानू के वीडियो इतने वायरल हुए  की वह बॉलीवुड कि स्टार गीतकार बन गई। जबकि उसका भाग्य विधाता यतींद्र चक्रवर्ती रानू उसका मैनेजर बन कर कामधाम संभालने लगा है। रानू के पास एक बेटी भी है, लेकिन मां के दिन जब गर्दिश में थे तो उसने भी किनारा कर लिया था। अब रानू के लाखों चाहने वाले हो गए हैं। जबकि पूर्व में उसे कोई पहचानता तक नहीं था। आज उसकी आवाज की कीमत करोड़ों में हो गई है। क्योंकि रानू की आवाज अभी सस्ते में बिकेगी और फिल्मी दुनिया के लोग चाहेंगे की जितना अधिक से अधिक हो उसकी आवाज का इस्तेमाल किया जाए। हालांकि रानू की उम्र और पढ़ाई-लिखाई भी कामकाज में बांधा बन सकती है। लेकिन यतींद्र सब कुछ संभाल लेगा। क्योंकि रानू के साथ अब उसका भी भविष्य जुड़ गया है। फिल्मी दुनिया में रानू की सफलता का रास्ता हिमेश ने खोल दिया है। आइडियल सीजन-10 के विजेता सलमान अली ने भी उसके साथ एक गीत गाया है।
वह भी सोशल मीडिया में खूब धमाल मचा रहा है। अब तक उसे करोड़ों लोग देख चुके हैं। टीवी शो सुपर स्टार सिंगर के जजों से मिलने के बाद उसका गया गीत भी तेजी से वायरल हो रहा है। दुनिया भर में उसकी पहचान एक भारतीय संगीतकार के रुप में हो गई है। लोग दिन-रात उसे इंटरनेट पर खोज रहे हैं। युवाओं की वह पहली पसंद बन गई है। वह हर आम और खास के बीच चर्चा का मसला बन गई है। यू-ट्यूब पर जो भी व्यक्ति उसकी आजवा सुन रहा है वह रानू का मुरीद हो जा रहा है। जिसकी वजह से दुनिया भर में इंटरनेट पर उसके फालोवर बढ़ते जा रहे हैं। वह मुंबई में अपना एक घर चाहती है। उसकी कामयाबी का राज इसी से पता चल सकता है कि बॉलीवुड के साथ दक्षिण भारतीय और बंग्ला फिल्म उद्योग में मांग बढ़ने लगी है।
रानू मंडल की इस सफलता में भारतीय रेल का भी बड़ा हाथ हैं। अगर उसे रेल की शरण न मिली होती तो शायद यह कामयाबी उसे नहीं मिल पाती। उसकी सफलता की दूसरी सबसे बड़ी वजह सोशल मीडिया है। सोशल मीडिया आज की स्थिति में चाहे जिसे आम से खास बना दे। रानू की सफलता में सबसे बड़ा हाथ सोशलमीडिया का है। आज की युवापीढ़ी इसकी ताकत को पहचानती है। सोशलमीडिया न होती तो शायद रानू रानाघाट स्टेशन पर ही दो वक्त रोटी के लिए संघर्ष करती दिखती। उसकी प्रतिभा का सम्मान  कैसे होता। लोग उसे कैसे जानते।
अगर आपके पास टैंलेंट है तो आप भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपनी प्रतिभा को पूरी दुनिया में नई पहचान दिला सकते हैं। यतींद्र चक्रवर्ती जैसे लोगों की कमी भी नहीं है जो रानू मंडल को रातों-रात स्टार बना देते हैं। बस हमें वक्त के साथ अपने नजरिए को बदलना होगा। दुनिया आपके साथ खड़ी है बस एक कदम आगे बढ़ाने की जरुरत है। हालांकि रानू मंडल के सामने अभी बड़ी चुनौतियां भी हैं। जिसके निपटना आसान नहीं होगा। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि उसने जिंदगी को नए सिरे से परिभाषित किया है। रानू अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल कर जल्द की भारतीय फिल्म उद्योग में नया मुकाम हासिल करेगी। समाज में उस जैसे लाखों लोग हैं, लेकिन हम अपनी जिंदगी की जद्दोजहद से निकलकर दूसरों के लिए सोचते हीं नहीं। ऐसी प्रतिभाओं को खोजकर सरकार, समाज के सामने लाने की जरूरत है।

Guru ji Guruji chamchatiya: गुरु जी गुरु जी चामचटिया

हम बच्चे प्रायमरी स्कूल में ‘गुरु जी गुरु जी चामचटिया, गुरु जी मर गए उठाओ खटिया’ जैसा चटपटी हिंसा का दोहा मासूमियत के साथ ताली बजा बजाकर गाते थे। गुमान नहीं था कि हम सहपाठी भारतीय शिक्षा की स्थिति का भविष्यवाचन कर रहे हैं। प्रकट में गुरु हमारे लिए मां बाप से ज्यादा बड़ा संरक्षक, तानाशाह और जिन्न होता था। उसमें हमारे भविष्य को अपनी समझ की मुट्ठी या संभावनाओं की बोतल में कैद करने की ताकत होती थी। हम शिक्षक, गुरुजी, सर या मास्टरजी के बिना पानी पीने या पेशाब करने का अधिकार भी नहीं रखते थे।
हमारे दिमाग का अंतरिक्ष नजर का एक बिन्दु बनकर गुरु के व्यक्तितत्व पर टिका होता था। उसका असर, साया या प्रभाव स्थायी प्रभाव की तरह ही पड़ चुका है। आज भी कभी-कभी शुरूआती कक्षाओं के छात्र बनकर सपनों में भी उनकी यादों से मुक्त नहीं हो पाते हैं। यह अजीब रिश्ता घुट्टी में पिलाए गए संस्कारों के उपचेतन में बैठ गया है। हिंदुस्तानी शिक्षक पेशेवर ज्ञानदाता भर नहीं है। वह ईश्वर से भी बड़ा अपरिपक्व बुद्धि के बच्चों को समझ आता रहा है।
रस्मअदायगी, शगल, औपचारिकताएं वगैरह नागरिक जीवन के चोचले हैं। कैलेंडर का एक-एक दिन समाज के किसी वर्ग या गतिविधि के लिए बुद्धि द्वारा कैद कर दिया जाता है। मसलन स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती और पुण्यतिथि, वेलेंटाइन डे, मदर्स, फादर्स और डॉटर्स डे, बड़ा दिन और नए साल का आगाज तयशुदा अंग्रेजी तारीखों पर आकर अपनी तीक्षणता के अनुपात में हलचल करने की कोशिश करते हैं। उत्सवों की फेहरिस्त में पांच सितंबर भारत के राष्ट्रपति रहे प्रसिद्ध दार्शनिक डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन ढूंढ़ा गया। डॉक्टर राधाकृष्णन सर्वोच्च विदेशी उपाधियां हासिल कर सीधे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त किए गए थे। इस इलाके में उनकी असाधारण प्रतिभा को चुनौती नहीं दी जा सकती। संविधान बनाने वाली सभा के सदस्य भी थे। आजादी की आधी रात संविधान सभा में उनका भाषण भी कराया गया। उनके बनिस्बत शिक्षक और शिक्षा की मूलक्रांति का श्रेय मदनमोहन मालवीय का बनता है।
यक्ष प्रश्न है क्या डॉक्टर राधाकृष्णन औसत भारतीय शिक्षक के समानार्थी माने जा सकते हैं। जो मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा होते हैं, राधाकृष्णन इस अंग्रेजी जुमले के भारतीय संस्करण हैं। इसके बरक्स हिंदुस्तान के लाखों लाख स्कूलों से विश्वविद्यालयों तक गफलत, जलालत, अपमान और आर्थिक बदहाली में जीते रहे हैं। वेतन आयोग और सुधार आयोगों का मकड़जाल होता है। होता कुछ भी नहीं है। सरकारी शिक्षण संस्थानों में पहले से बेहतर वेतन है। सरकारी संस्थाओं को धीरे धीरे उस तरह मारा भी जा रहा है जैसे विष्णुगुप्त चाणक्य ने कांटे के पौधे की जड़ में मठा डाला था। शिक्षा का निजी रोजगार फैल चुका है कि कैंसर भी उससे शरमा रहा है। लगभग बेशर्मी और षड़यंत्र के साथ सेठियों के बड़े बड़े तिजारती-कुल कालाबाजारी, जमाखोरी और मुनाफाखारी से कमाए गए धन को सुरक्षित व्यापार में लगाने शिक्षादाता बन गए। धंधे में राइस मिल, आइल मिल, खनिकर्म, पेट्रोल पंपों की तरह पुलिस और इंस्पेक्टरों के छापों और लाइसेंस की परेशानियां नहीं झेलनी पड़तीं। कमाने की खुली छूट है। सुप्रीम कोर्ट ने 11 सदस्यीय बेंच के फैसले में यहां तक कह दिया यदि अच्छी शिक्षा पाना है तो मुनासिब फीस देनी पड़ेगी। यह भी कि अच्छी और ऊंची शिक्षा पाने का किसी विद्यार्थी को मौलिक अधिकार नहीं है लेकिन शिक्षा का व्यवसाय करना मूल अधिकार है।
अधिकांश निजी संस्थाओं के शिक्षक पूरी तनख्वाह नहीं पाते। मालिकों की गैरशिक्षकीय चाकरी बजानी पड़ती है। शिक्षकों को प्रधानमंत्री से लेकर विधायक तक की परेडों में बच्चों सहित शामिल होना पड़ता है। उन्हें मर्दुमशुमारी, अकाल, बाढ़, महामारी मतदाता सूची और तरह तरह की सरकारी शतरंजों का प्यादा बनाया जाता है। समाज में भी उनकी अहमियत नहीं होती। पहले भी कहां थी? गुरु द्रोणाचार्य को दरबारी शिक्षक होने के बावजूद बेटे अश्वत्थामा को पानी में खड़िया घोलकर दूध कहते बरगलाया जाता था। अपनी पीठ ठोकने वाले सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को इसका जवाब नहीं सूझता।
मुख्यमंत्री का बेटा विधायक, सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक बने। कलेक्टर का बेटा किसी तरह कलेक्टर बन ही जाए। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद तक बाप बेटों की युति रही है। शिक्षक का बेटा बहुत कुछ बन जाने का प्रारब्ध समेटे भारत की धरती पर क्यों नहीं आता? शिक्षक की बेटियां ब्याह के बाद बेहतर घर परिवार क्यों नहीं पातीं? मां बाप का बेहतर इलाज क्यों नहीं होता? शिक्षकों की कौम भी पूरी तरह दोषमुक्त नहीं है। गांवों और आदिवासी इलाकों के शिक्षक पढ़ाने नहीं जाते। कभी कभार मासूम बच्चियों के साथ उनके द्वारा अनाचार की शिकायतें उजागर होती हैं। विधायकों और मंत्रियों सहित पंचों, सरपंचों की ड्योढ़ी पर कोर्निश बजाते हैं। चुनाव प्रचार करते हैं। भूमियां हड़पते हैं। कई धंधों में पैसा भी फंसाते हैं। ऐसे में शिक्षक दिवस की किस तरह याद की जाए। शिक्षा नीति को लॉर्ड मैकाले ने लंदन के हाउस आॅफ कॉमन्स में भाषण के जरिए बर्बाद करने का षड़यंत्र सुनाया था।
विवेकानन्द ने सबसे पहले केवल शिक्षा को भारतीय जीवन की नैतिकता की इस्पाती बुनियाद कहा था। शिक्षित, अशिक्षित, अल्पशिक्षित, अर्धशिक्षित राजनेता चेते नहीं हैं। विधायिका में लगभग आधे सदस्य अपराधी वृत्ति के हैं। वहां शिक्षक दिवस पर सोचने की किसे फुरसत है? नकल मारने के कारण बर्खास्त हुए छात्र, विधायक और मंत्री बनकर अपने ही गुरुओं से सम्मान कराते हैं। अभद्र भाषण, गलत उच्चारण और व्याकरणहीन संबोधन के जरिए वे कभी कभी शगल में बच्चों को पढ़ाने चले जाते हैं। वहां उन्हें शिक्षक दिवस पर झूठे कार्यकमों की बाढ़ आती है। किसी के मन में सम्मान या सद्भावना नहीं होती। पहाड़ा याद नहीं आता। शब्दों का हिज्जा नहीं कर पाते। उत्कृष्टता का शिक्षा से जनाजा ही उठता जा रहा है। दुनिया के पहले दो सौ विश्वविद्यालयों में भारत नहीं है। पता नहीं शिक्षक दिवस पर स्तुतिनुमा झूठे वाचन कब तक नासमझी की प्रतिध्वनि बनते रहेंगे?(लेखक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

These are kids..they know everthing: ये बच्चे हैं… सब जानते हैं!

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद के फाफामऊ स्थित एक इंटर कॉलेज की 17 वर्षीय छात्रा एक दिन स्कूल में बेहद परेशान नजर आ रही थी। दरअसल सीआरपीएफ का एक जवान अचानक रास्ता रोककर उसे परेशान कर रहा था। एक दिन उसने उसे 20 रुपए दिए… फिर दूसरे दिन 500 रुपए।
परेशान छात्रा ने अपनी अध्यापिका को पूरी कहानी सुनाई तो अध्यापिका ने उसकी काउंसिलिंग की। अगले दिन वह सीआरपीएफ जवान फिर रास्ते में खड़ा था, तो छात्रा ने मुंह पर 500 रुपए फेंके और उसे पुलिस के हवाले किया। ऐसा सिर्फ उक्त छात्रा के साथ नहीं हुआ, बल्कि यूपी ही नहीं पूरे देश के लिए ऐसे किस्से आम हैं। बच्चे सब जानते हंो और वे खुल भी रहे हैं। जिस तरह बच्चा चोरी की घटनाओं और अफवाहों पर मॉब लिंचिंग की घटनाएं हो रही हैं, वे भी इसी अविश्वास का परिणाम हैं।
बच्चों के साथ हो रही घटनाएं तेजी से चर्चा का विषय हैं। इसमें भी सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि बच्चे इस ओर जागरूक भी नहीं हैं। यूनिसेफ द्वारा हाल ही में कराए गए एक सर्वे में बच्चों की जागरूकता को लेकर अनूठे तथ्य सामने आए हैं। पता चला कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले 37 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी तरह की शारीरिक अभद्रता के प्रति जागरूक थे, वहीं अन्य स्कूलों के बच्चों में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था। प्राइमरी स्कूलों के 34 फीसद बच्चे ही गलत स्पर्श को समझते थे, जबकि अन्य स्कूली बच्चों में गलत स्पर्श के प्रति जागरूक बच्चों की संख्या 52 प्रतिशत मिली। बच्चों ने बताया कि तमाम बार लोग उन्हें गलत तरीके से स्पर्श करने के साथ बड़ों को न बताने की नसीहत भी देते हैं। सरकारों ने बच्चों की मदद के लिए 1090 पर डायल करने सहित कई हेल्पलाइन भी बना रखी हैं किन्तु अधिकांश बच्चों को उसके बारे में पता ही नहीं था।
सिर्फ सात प्रतिशत बच्चे महिला हेल्पलाइन के बारे में जानते थे। देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। उत्तर प्रदेश के बाल विकास विभाग की पहल पर स्कूल-स्कूल जाकर चले जागरूकता अभियान में बचपन की ऐसी तमाम हकीकतें सामने आर्इं। बच्चे खुलकर बोल रहे हैं।
इस दौरान बच्चों ने घर से बाहर तक असुरक्षा की कई कहानियां सुनार्इं। विभाग की प्रमुख सचिव मोनिका एस गर्ग के मुताबिक इस दौरान बच्चों से लेकर शिक्षकों तक जागरूकता की मुहिम चली तो स्थितियां बदली सी नजर आर्इं। न सिर्फ बच्चे खुले, बल्कि उनकी जागरूकता का स्तर भी सुधरा। यूनिसेफ की उसी टीम ने दोबारा सर्वे किया तो आंकड़े बदले। अब बच्चों की जागरूकता का स्तर कुछ मामलों में 75 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। अब बच्चों को कुपोषण से बचाने की पहल भी हुई है।
इसमें बच्चों तक संवाद के साथ उन्हें पोषणयुक्त भोजन पहुंचाना सुनिश्चित किया जा रहा है। हाल ही में स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस दिशा में आगे आए हैं। दरअसल उत्तर प्रदेश की यह पहल पूरे देश के लिए प्रेरणास्पद भी है और चुनौती भरी भी। पूरे देश में बच्चे व उनके माता-पिता डरे हुए हैं। जगह-जगह बच्चा चोरी की अफवाह में मॉब लिंचिंग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। हालात ये हैं कि पूरे देश में अफवाहों से बचाने की पहल करनी पड़ रही है। पहले से डरे माता-पिता जान ही नहीं पा रहे हैं कि कब उनके बच्चे सुरक्षित होते हैं और कब अफवाहें उनका पीछा कर रही होती हैं। तमाम बार बच्चों को लेकर उनकी आशंकाएं सच भी साबित होती हैं।
हाल ही में पुलिस तक जाकर भी शिकायतें दर्ज न होने के कई मामले भी सामने आए हैं। इससे निपटने के लिए भी सकारात्मक पहल की जरूरत है। सरकारों को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। यह असुरक्षा का भाव ही है कि कहीं बच्चा चोरी के शक में मूक-बधिर महिला की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है, तो कहीं भिखारी मार डाले जाते हैं। इसमें सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी जमकर हो रहा है। जिस तरह से डरावने वीडियो वायरल हो रहे हैं, उससे माता-पिता भी नहीं जान पा रहे हैं कि वे बच्चों को कैसे समझाएं। इन स्थितियों में माता-पिता के साथ बच्चों के बीच संबल होना भी जरूरी है।
हाल ही में महाराष्ट्र पुलिस की जांच में पता चला कि वहां वायरल हुआ एक वीडियो पाकिस्तान में बच्चा चोरी के प्रति जागरूकता के लिए बनाए वीडियो को काट-छांट कर वायरल कर दिया गया। ऐसे शरारती तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। इन सबके बीच बच्चों की आवाज की अनसुनी बहुत महंगी पड़ सकती है। वे वोटर नहीं हैं किन्तु भविष्य उनके ही हाथ में है। हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे बच्चे हैं… वे सब जानते हैं!

One month after Jammu and Kashmir sanctions: जम्मू-कश्मीर प्रतिबंधों के एक माह बाद

5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 2019 पास हुआ था और यह राज्य दो हिस्सों में बंट कर दो केंद्र शासित राज्यों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बंट गया। साथ ही अनुच्छेद 370 के अधीन प्राप्त राज्य का विशेष दर्जा भी समाप्त कर दिया गया। लेकिन इस निर्णय के कुछ दिन पहले से ही शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए, एहतियातन कई कदम उठाए गए थे।
अमरनाथ यात्रा को बीच मे ही रोक कर यात्रियों को वापस कर दिया गया, सामान्य पर्यटक जो इस सीजन में जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अंग होते हैं उन्हें जहां हैं जैसे हैं राज्य छोड़ कर जाने के लिए कह दिया गया। सेना सहित अन्य सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई। हुर्रियत के नेता तो जेलों में बंद कर ही दिए गए, पर मुख्य धारा में चुनाव लड़कर संसद और विधानसभा में पहुंचने वाले तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं को भी उनके घरों में हिरासत में रख दिया गया। आज लगभग एक माह कश्मीर में सामान्य गतिविधियों को बाधित हुए हो रहा है और अब तक सरकार का एक भी कदम ऐसा नहीं दिख रहा है जिसके आधार पर यह कहा जाय कि अब स्थिति सामान्य होगी।
जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 2019 के पारित होने के बाद, देश में व्यापक प्रतिक्रिया हुई। अनुच्छेद 370 के खत्म करने का वादा भाजपा के कोर वादों में से एक वादा था, तो सरकार समर्थक इस वायदे के पूरा होने से खुश हुए, अन्य सामान्य लोगों ने यह उम्मीद की थी कि, इससे जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से चली आ रही आतंकी और हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगेगी और राज्य में अमन चैन की बहाली होगी, तो वे इस उम्मीद में तनावमुक्त हुए, विरोधी दलों ने यह आशंका जताई कि इससे जम्मू-कश्मीर की अंदरूनी स्थिति और बिगड़ेगी तथा तनाव बढ़ेगा, स्थिति और भड़केगी तथा राज्य का वह तबका जो अलगाववादियों के खिलाफ शुरू से ही रहा है, वह अब अपने को अलग-थलग और ठगा सा महसूस करेगा, क्योंकि उसकी कोई भूमिका इस बिल के पारित होने में नहीं है, तो उन्होंने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए, कानून के जानकार इस कानून में संविधान संशोधन की प्रक्रियागत खामियों पर बात करने लगे, कहने का आशय यह कि देश के अंदर हर तरह के लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया हुई।
इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सात जनहित याचिकाएं भी दायर हुर्इं हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सुनवार्इं भी शुरू कर सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया है। अब आगे क्या होता है, यह भविष्य के गर्भ में है। विदेशों से भी प्रतिक्रिया मिली है। सभी बड़ी ताकतों ने भारत के इस कदम को उसका आंतरिक मामला बताया है और कश्मीर सहित भारत पाकिस्तान के आपसी विवाद को आपस मे मिल बैठ कर बात करने और समस्या सुलझाने के लिए भी कहा। कूटनीतिक क्षेत्र में यह हमारे लिए राहत की बात है कि विश्व बिरादरी आज भी भारत-पाक संदर्भो में शिमला समझौता और लाहौर डिक्लेरेशन को प्रासंगिक मानती है। पर अभी यूएस के डेमोक्रेट नेता बन्नी सांडर्स ने कश्मीर के मामले पर विशेषकर कश्मीर में प्रतिबंधों के संदर्भ में एक असहज करने वाला बयान दिया है कि भारत सरकार कश्मीर से प्रतिबंध हटाए। हालांकि यह भारत का आंतरिक मामला है कि कानून व्यवस्था की स्थितियों को देखते हुए हम कहां-कहां क्या एहतियाती कदम उठाते हैं।
यूएस में नए राष्ट्रपति का चुनाव 2020 में होना है। यह बयान यूएस के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कूटनीतिक स्टैंड को निशाने पर लेने के लिए अधिक है न कि भारत के संदर्भ में, ऐसा मेरा मानना है। एक प्रतिक्रिया पाकिस्तान से भी आई है और अब भी वह अधिक जोर शोर से आ रही है। कश्मीर का एक हिस्सा जिसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है पाक के कब्जे में 1948 से ही है। पाकिस्तान ने उसका कुछ भाग चीन को भी दे दिया है। इस भूखंड को जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है, पाकिस्तान का कानूनी भाग आज तक नहीं बन पाया है।
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में इस भूभाग को अपने क्षेत्राधिकार में मानने से मना कर दिया है। यह भूभाग, उपेक्षित और अनेक जन सुविधाओं से महरूम है। यह एक प्रकार से पाकिस्तान के लिए आतंकवादी ब्रीडिंग सेंटर के रूप में हैं। वह यहां आतंकी शिविर चलाता है और कश्मीर में होने वाली सारी आतंकी घटनाओं को पाकिस्तान यहीं से संचालित करता है। पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया भी उसके अपने देशवासियों को यह जताने के लिए अधिक है कि वह कश्मीर मसले पर खामोश नहीं है बल्कि वह कुछ न कुछ कर रहा है। पाकिस्तान को यह भय है कि अनुच्छेद 370 के संशोधन के बाद भारत, पाक अधिकृत कश्मीर को लेने के लिए कदम बढ़ा सकता है। इसलिए उसके लिए यह जरूरी है कि कश्मीर में अशांति बनी रहे। उसने इसी अशांति को बनाए रखने के लिए न केवल यूएन में शोर मचाया बल्कि चीन, यूएस सहित अन्य देशों के सामने भी गुहार लगाई।
चीन को छोड़कर किसी भी देश और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी उसकी एक न सुनी। चीन का पाकिस्तान और पीओके में जबरदस्त आर्थिक हित हैं तो उसकी यह विवशता है कि वह पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखे। यूएस को भी लंबे समय से अफगानिस्तान में फंसे होने का एहसास है और वह वहां से निकलना चाहता है। ऐसे अवसर पर वह पाकिस्तान की बात पर भी कभी कभी ध्यान दे देता है। पर वह हमारे विरुद्ध नहीं है। कश्मीर के समक्ष, आज की तिथि में मुख्य समस्या है, वहां की नागरिक आजादी पर प्रतिबंध, संचार के साधनों पर रोक, हालांकि, अखबारों पर कोई प्रतिबंध नहीं है पर संचाराविरोध के कारण उनका प्रकाशन अनियमित है। इसे लेकर कश्मीर टाइम्स की प्रबंध संपादक ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर कर रखी है। कहा जा रहा है कि, इस मीडिया ब्लैकआउट के कारण वहां से वास्तविक हालात की खबरें नहीं आ पा रही हैं। विदेशी मीडिया और कुछ स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा कुछ वीडियो और लेख सोशल मीडिया पर लगभग रोज ही पोस्ट हो रहे हैं उनसे तो यही लगता है कि वहां स्थिति सामान्य नहीं है। हाल ही में हुए राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओ के दौरे को श्रीनगर एयरपोर्ट पर ही रोक दिए जाने से यही बात फैल रही है कि वहां स्थिति असामान्य है।
अभी हाल ही में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से अपने घर मे ही विरुद्ध अपने एक विधायक से मिलने के लिए श्रीनगर गए। उन्हें अपने विधायक से मिलने की अनुमति तो थी पर शहर में कहीं और जाने की अनुमति मिली थी। अब आज लगभग एक माह के ब्लैकआउट के बाद, सबसे बड़ा सवाल सरकार के सामने यह है कि जब प्रतिबंध हटेंगे तब क्या होगा। कश्मीर की हालत आज की तिथि में, उस मरीज की तरह है जो अभी आईसीयू में एक बड़े आॅपरेशन के बाद लेटा है। उस पर गम्भीर नजर रखी जा रहीं है। जब वह कुछ स्वस्थ हो और आईसीयू से निकल कर वार्ड में और फिर अस्पताल से निकल कर घर आए तो यह पता चले कि इस आॅपरेशन का क्या लाभ हुआ है। इस कदम को जम्मू-कश्मीर की जनता ने कितनी प्रसन्नता और सदाशयता से लिया है इसकी समीक्षा अभी सम्भव नहीं है। हालांकि सरकार ने बीस दिन पहले ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का श्रीनगर के एक बाजार में कुछ स्थानीय लोगों के साथ बातचीत और जलपान करते हुए एक फोटो जारी किया था। लेकिन पृष्ठभूमि में बंद दुकानें और सन्नाटा यह बता रहा था कि यह एक भरोसा उत्पन्न करने की ड्रिल है। अत: अभी केवल इंतजार ही किया जा सकता है।
कश्मीर में 5 अगस्त को लिए गए फैसले में कश्मीर की जनता के प्रतिनिधियों की राय न लेना, आगे चलकर यह एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। अभी तक अलगाववादी नेताओं और तत्वों के खिलाफ वहां के स्थानीय नेता मजबूती से खड़े होते थे और इससे दुनियाभर में यह संदेश जाता था कि अलगावाद कश्मीर का कोई स्थाई भाव नहीं है बल्कि वह पूरी तरह से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का ही एक रूप है। पर जब सारे प्रतिबंध सामान्य होंगे, सभी नेता बाहर निकलेंगे, जब जनता के बीच जाएंगे और अपनी बात कहेंगे तो उनका स्वर और दृष्टिकोण क्या होगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
लेकिन यह विश्वास करना कठिन है कि अनुच्छेद 370 के संशोधित होने और राज्य के बंटवारे का निर्णय जिस प्रकार सबको निरुद्ध कर के लिया गया है उसे वे आसानी से स्वीकार कर लेंगे। सरकार को भी ऐसी संभावनाओं का अंदाजा होगा और सरकार ने उस स्थिति के लिए भी कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था सोच रखी होगी। जम्मू-कश्मीर का मामला न तो मात्र कानून व्यवस्था का मामला है और न ही हिंदू मुस्लिम का मामला है। यह एक राजनीतिक मामला है और इसका समाधान राजनीतिक रूप से ही संभव है। आतंकवाद भी अपने आप मे एक कानून व्यवस्था का मामला ही नहीं है बल्कि यह एक राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने का एक हिंसक उपाय है। केवल सुरक्षा बलों के सहारे इस व्यधि से नहीं निपटा जा सकता है। लंबे समय तक सुरक्षा बलों की तैनाती सुरक्षा बलों के मनोबल और उनके उद्देश्य पर भी असर डालती है। पंजाब के आतंकवाद को याद कीजिये, वहां का आतंकवाद तभी समाप्त किया जा सका, जब वहां के स्थानीय जनता का साथ मिला और उनको विश्वास में लिया गया। कश्मीर के आतंकवाद और अलगाववाद को भी बिना कश्मीरी जनता के समर्थन और उन्हें विश्वास में लिए बिना खत्म नहीं किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर एक दुश्मन मुल्क नहीं है और न ही वहां के सभी नेता भारत विरोधी। जो भारत विरोधी और अलगाववादी हैं उन्हें पहचान कर राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर के अप्रासंगिक करना होगा और शेष नेताओं को जो देश के संविधान के अनुसार संवैधानिक प्रक्रिया के साथ शुरू से ही हैं उनको और कश्मीर की जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि, अनुच्छेद 370 का यह संशोधन राज्य के विकास और जनता के हित में है।
(लेखक सेवानिवृत्त
आईपीएस अधिकारी हैं)

New era: नया दौर

तकरीबन सौ साल पहले दुनिया में परिवर्तन का एक नया दौर शुरू हुआ। स्थितियां तेजी से बदली। जबरदस्ती लोगों को गुलाम और बंधक बनाने वालों की पकड़ ढीली पड़ने लगी। उपनिवेशवादी देशों ने पीछे हटने में ही भलाई समझी। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में सैकड़ों देशों ने आजादी की सांस ली। सवाल ये है कि आखिर किन परिस्थितियों में एक देश दूसरे पर कब्जा जमा लेता है? वहां के संसाधनों का दोहन अपने हित के लिए करता है? सामरिक संधियों, फौजी ताकत और भौगोलिक स्थिति की भूमिका हमेशा से ही निर्णायक रही है।
जहां तक उपनिवेशवाद की बात है, ये देशों को औद्योगिक क्रांति में पिछड़ने की मिलने वाली सजा थी। उद्योग-सैन्य गठबंधन ने कच्चे माल और सस्ते मजदूर की तलाश में चढ़ाइयां शुरू कर दी। आपस में ही लड़ रहे देश उनके चपेट में आ गए। ब्रिटेन के बारे में ये कहा जाने लगा कि इसके साम्राज्य में सूरज कभी डूबता ही नहीं। इसका पतन भी यूरोपी देशों में वर्चस्व को लेकर हुई आपसी लड़ाई के कारण हुआ। एक समय आया जब इनके लिए उपनिवेशों पर काबिज रहना फायदे का सौदा नहीं रह गया। स्थानीय लोगों का प्रतिरोध एवं विश्व युद्ध की वजह से बदलता अंतरराष्ट्रीय परिवेश – देश एक के बाद एक इनकी गिरफ्त से निकलते गए। अलग-अलग देशों ने अपनी आजादी की नई स्थिति को अलग-अलग तरह से लिया।
भारत की आजादी में द्वितीय विश्व युद्ध का बड़ा हाथ था। इसकी आग में झुलसे ब्रिटेन में इतना दम नहीं बचा था कि वे स्थानीय प्रतिरोध के वावजूद इधर डटे रहते। सो लड़ाई खत्म होते ही मन बना लिया कि अब निकला जाय। ऊपर से नई महाताकतों ने स्पष्ट कर दिया कि उपनिवेश खाली करो। हमें भी वहां अपना सामना बेचना और पैर पसारना है। स्थानीय प्रतिरोध का नेतृत्व कर रहे ज्यादातर लोग इंग्लैंड में ही पले-बढ़े थे। नई व्यवस्था के निर्माण की जहमत उठाने के बजाय ब्रिटिश व्यवस्था ही चलाए रखना का फैसला कर लिया। सत्ता परिवर्तन तो हो गया। व्यवस्था पुरानी ही चलती रही। अंग्रेजों की हां-में-हां मिलाने वाले प्रजातंत्र में फिट हो गए। राजा-राजा बने रहे। लोग लोग ही रहे।
इतिहास लड़ाइयों की कहानी है। इसमें विजेताओं का महिमंडन होता है। स्वाभाविक है कि जब जंगल का इतिहास शिकारी लिखेंगे, तो ये उनकी वीरगाथा ही होगी। असल में इतिहास की दशा मिलिट्री का जनरल नहीं, नॉलेज का जनरल करता है। बारूद की खोज ने सैन्य-समीकरण रातों-रात बदल दिया। समुद्री बेड़े और और लड़ाकू विमानों के आगमन से युद्ध का स्वरूप ही बदल गया। नाभिकीय अस्त्र और मिसाइल ने एक देश को लगभग अभेद्य बना दिया है। ऊर्जा के नए श्रोतों ने धूल उड़ा रहे देशों के भौगोलिक-सामरिक-आर्थिक हैसियत को देखते-देखते आसमान चढ़ा दिया। तत्काल हम एक और नए दौर से गुजर रहे हैं। दो चीजें दुनियां को बदलने में लगी हुई हैं। पहली है आबादी का स्वरूप। अपेक्षाकृत समृद्ध देश में उम्रदराज लोगों की भरमार है।
गरीब देशों में युवाओं की भीड़ है। सरकारें चिंतित हैं कि इन्हें संभालें कैसे। दूसरा है सूचना क्रांति का सूत्रपात। राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक साइबर-दुनियां है। सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की संध्या महादेश से बड़ी हो चली है। अकेले फेसबुक से 240 करोड़ लोग जुड़े हैं। साइबर-युद्ध की क्षमता नई सैन्य शक्ति बन कर उभरी है। आर्टिफिशल इंटेलिजेन्स, मशीन र्लनिंग, रोबोटिक्स एवं इंटरनेट ओफ थिंग्स की सीधी प्रतिस्पर्धा लोगों से है। दावा किया जा रहा है कि ब्लाकचेन टेक्नोलॉजी एवं क्वांटम कम्प्यूटिंग सारे बिचौलियों की छुट्टी कर देगी। बैक बंद हो जाएंगे। प्रत्यक्ष प्रजातंत्र में लोग हर फैसले मोबाइल-आधारित वोटिंग से लेंगे। सरकारों की जरूरत ही नहीं रहेगी। डाटा नया डीजल-पेट्रोल बन गया है। इसके राष्ट्रीयकरण की मांग जोर पकड़ रही है। जानकारों का मानना है कि आने वाले दस-बीस सालों में ही लोगों का एक यूजलेस क्लास खड़ा हो जाएगा। मशीनीकरण और आॅटमेशन की वजह से इनकी कोई जरूरत ही नहीं रह जाएगी।
चुनौती ये है कि फिर इनका होगा क्या? ये कैसे कमाएंगे? खाएंगे क्या? यूनिवर्सल बेसिक इंकम, सिटिजन वेजेज जैसे विकल्प हैं पर सवाल है कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा? बेकार आबादी आखिर करेगी क्या? अगर करीब से देखें तो दुनिया के देश दो परस्पर विरोधी तरीके से इस नई स्थिति से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सारे अपनी-अपनी कर रहे हैं। देशों की सीमाएं सख्त की जा रही है। सरकारें अपने नागरिकों के प्रति दिन-रात अपनी प्रतिबद्धता दोहरा रही है। गैर-कानूनी तरीके से घुस आए को बाहर का रास्ता दिखा रही है। वहीं देश के अंदर बहुसंख्यकवाद जोर पकड़ रहा है। राजनैतिक दल इस बहाव में बहे जा रहे हैं। क्या अमेरिका-रूस, क्या चीन-जापान, क्या भारत-ब्राजील सबको इसका बुखार चढ़ा हुआ है।
दक्षिण एशिया में लगभग पचास करोड़ लोग 10-24 साल के आयु वर्ग में हैं। अकेले भारत में ऐसे 36 करोड़ और पाकिस्तान में 6 करोड़ लोग हैं। इनमें से अधिकांश स्मार्टफोन के माध्यम से आपस में जुड़े हैं। अमेरिका, चीन, जापान एवं यूरोप के देशों में लोग बूढ़े हो चले हैं। इन दो तरह के देश समूहों को मिल-बैठकर फैसला कर लेना चाहिए कि विकासशील और गरीब देशों के युवा-वर्ग को क्या सिखाएं कि वे बूढ़े हो चले देश की जरूरतें पूरी कर सकें। एक बड़ा रोचक उदाहरण अफगनिस्तान और फिनलैंड का है। अफगानी पालतू जानवरों की देख-रेख का कोर्स करने फिनलैंड जा रहे हैं फिर वहां के कुत्ते-बिल्ली के देखभाल के लिए वहीं बस जा रहे हैं। डराने वाले जो भी कहें, कोशिश करते रहने चाहिए कि दुनियां इसी दिशा में आगे बढ़े। बिखराव पर फैज अहमद फैज ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी:
हमने धरती और आसमान बनाया,
तुमने तुर्की और ईरान बनाया।
एक अंतर-निर्भर विश्व-व्यवस्था ही विश्व शांति की सबसे बड़ी गैरंटी है।
(लेखक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।)

Dil ko Dil k kareb lati hai boliyan: दिल को दिल के करीब लाती हैं बोलियां!

वर्ष 2000 से 2002 के दौरान मैं कोलकाता में एक प्रतिष्ठित राष्टÑीय हिंदी दैनिक का सम्पादक था। मेरी रूचि कोलकाता के साहित्य, संस्कृति और रंगकर्म में खूब थी। कोलकाता में बांग्लादेश के डिप्टी हाई कमिश्नर हामिद साहब को भद्र लोक से मिलने में आनंद आता। वे स्वयं भी बांग्ला में कविताएं लिखते थे और उनकी बेगम भी। वे हर शनिवार को बंगबंधु शेख मुजीब सरणी स्थित अपने आवास पर बांग्ला भद्रलोक को बुलाकर दावत देते। बांग्ला के शीर्षस्थ लेखक/कवि सुनील गंगोपाध्याय से लेकर कई नामचीन लेखक/कवि जैसी हस्तियां वहां आतीं। रंगकर्मी और टालीवुड के बांग्ला फिल्मकार भी। हिंदी के लोगों में से मुझे भी बुलाया जाता। कुछ और गैरबंगाली भी वहां जाते। इनमें मशहूर रंगकर्मी बसंत रूंगटा, बेलारूस के महा वाणिज्यिक दूत और मारवाड़ी सभा के अध्यक्ष सीताराम शर्मा तथा नेपाल के कांसूलेट जनरल जंगबहादुर थापा। अब रूंगटा की तो वहां पर कई पीढ़ियां गुजर चुकी थीं, इसलिए वे बोली-बानी में बांग्ला ही थे। सीताराम शर्मा के बाबा कोलकाता आकर बस गए थे इसलिए उनकी भी शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में ही हुई। अत: उन्हें भी बांग्ला समझने और बोलने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। थापा बांग्ला समझ लेते थे पर बोल नहीं पाते थे। अब बचा अकेला मैं, जो इस ग्रुप में ऐसा था जिसे न बांग्ला बोलनी आती थी न समझ सकता था।
मैं इस ग्रुप अलग-थलग न पड़ जाऊं इसलिए उच्चायुक्त महोदय की बेगम ने एक मशहूर बांग्ला अभिनेत्री को हिदायत दी कि वह ग्रुप में होने वाली बातचीत को शुक्ला जी को ब्रीफ करती चले। यहां यह बता दूं, कि बांग्ला भद्र लोक अपनी भाषा और संस्कृति को बहुत प्यार करता है। विश्व में कहीं भी दो बांग्ला भाषी मिलेंगे तो वे बंगाली में ही बात करेंगे। भले वे भारत स्थित पश्चिम बंगाल के बंगाली हों अथवा बांग्ला देश के। वार्तालाप के बीच एक शब्द आया ‘तड़ातड़ी’ तो मेरे कान में वे बांग्ला अभिनेत्री शताब्दी राय फुसफुसाईं- तड़ातड़ी मीन्स हरी। मैंने कहा- आई नो, वी आल्सो यूज इट, वी काल इट हड़बड़ी। थोड़ी देर बाद फिर एक शब्द बोला गया और शताब्दी ने फिर उसका अंग्रेजी अनुवाद किया। मैंने फिर कहा, आई नो. यह सुनकर शताब्दी राय ने उच्चायुक्त महोदय की बेगम से कहा मैडम मिस्टर शुक्ला नो बांग्ला वेल। बेगम साहिबा उर्दू समझ लेती थीं इसलिए मैंने उन्हें हिंदी-उर्दू में बताया कि मैडम मैं बांग्ला तो नहीं जानता पर मेरी अपनी बोली अवधी में ये शब्द हैं। फिर मैंने उन्हें समझाया कि मैडम बोलियां दो भाषाओं के बीच पुल का काम करती हैं। क्योंकि बोलियां भाव को समझती हैं, और भाव दिल को जोड़ते हैं। फिर मैंने उन बांग्ला देशी बेगम को बताया कि मेरे परबाबा मनीराम सुकुल अपने गांव के जमींदार के गुमाश्ता थे। इसलिए उनकी जमींदारनी जब भी तीरथ को जातीं तब हमारे परबाबा को भी उनके साथ जाना पड़ता। साथ में दो नौकर और जाते। एक लठैत और एक टहल करने वाला घरेलू नौकर। एक तरह से उनकी टिकट लाने से लेकर उनके ठहरने का इंतजाम मेरे परबाबा करते और लठैत रखवाली। टहल करने वाला कुली का काम करता। यानी पूरा राज उनके साथ चलता। वे जमींदारनी पूरा हिन्दुस्तान घूमी। रामेश्वरम से लेकर बद्री-केदार तक और जगन्नाथ पुरी से लेकर द्वारिका तक। वह भी आज से सवा सौ साल पहले। जहां तक ट्रेन जाती वहां तक ट्रेन से और बाकी जगह पालकी से। ट्रेन में तो खैर, सब बैठ लेते लेकिन जब पालकी चलती तो परबाबा और बाकी के दोनों नौकर पालकी के पीछे भागते। इस तरह वे सब पूरा हिंदुस्तान घूम आए। जबकि तीनों को अपनी बोली कन्नौजी-बुन्देली मिश्रित अवधी के और कोई भाषा नहीं आती थी। बेगम भौंचक्की-सी मेरा मुंह ताकती रहीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि चार लोग, जिनमें एक महिला थी और जो न अंग्रेजी जानते थे न खड़ी बोली हिंदी-उर्दू कैसे हिन्दुस्तान घूम आए!
मैंने उन्हें समझाया कि मैडम हिंदुस्तान में अनगिनत भाषाएं और बोलियां हैं तथा घाट-घाट पर अलग-अलग स्वाद का पानी है। इसलिए जैसे धरती के अंदर का पानी आपस में हिला-मिला रहता है वैसे ही बोलियां भी दिल के भाव समझती हैं। और हर व्यक्ति दूसरे के मन के भाव ही नहीं समझता बल्कि बोली भी समझता है। बोलियां प्रकृति के करीब हैं इसलिए उनमें कई शब्द एक जैसे हैं। बेगम ने पूछा कि आपने अपने परबाबा को देखा है? मैंने जवाब दिया नहीं। पर हमारे परिवार में उनके इतने किस्से प्रचलित थे कि मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैंने अपने परबाबा को नहीं देखा। बेगम को बोलियों में दिलचस्पी हुई तो मैंने उन्हें बताया कि बांग्ला का ओरीजिन संस्कृत है लेकिन फारसी के शब्द उसमें ऐसे घुले-मिले हैं, मानों वह ईरान के पड़ोस की भाषा हो। जैसे बांग्ला में पानी को तो जल बोलते हैं पर गैरकानूनी को बेआईनी। जबकि यह विशुद्ध फारसी शब्द है। मैंने कहा जैसे मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान को सफर करता है वैसे ही बोलियां भी। भारतवर्ष में 21 या 22 भाषाएं हैं और तीन हजार के आसपास बोलियां। हर कोस पर बोली बदल जाती है और उसे बोलने का लहजा भी। एक ही गाँव में एक ही बोली को अलग-अलग जातियां अलग-अलग लहजे में बोलती हैं। अगड़े, पिछड़े, दलित और मुसलमान एक ही शब्द को अलग-अलग लहजे में ही नहीं कई बार तो उनके अलग-अलग पर्यायवाची  इस्तेमाल करते हैं पर कोसों दूर बैठा आदमी उस शब्द को फील कर लेता है। मसलन मां शब्द चाहे जैसे   बोला जाए उसकी ध्वनि एक जैसे होगी। पिता, चाचा, बुआ, मामा और मौसी के लिए भी। यही बोलियों की विशेषता है कि वे दिलों के भाव को समझती हैं। उच्चायुक्त महोदय की पत्नी को मेरी बात बहुत भायी। उन्होंने कहा कि इस पर तो शोध होना चाहिए। जो दूरियां बोलियां कम करती हैं उसे भाषाएं बढ़ाती हैं। कभी सोचा गया कि भारत में आज से ही नहीं ईशा-पूर्व तीन सौ साल पहले से ही विदेशी हमलावर आने लगे थे। सिकन्दर से लेकर अंग्रेज तक। अब ये सब के सब तो वापस नहीं चले गए। कुछ यहीं बस गए और यहीं की सभ्यता-संस्कृति में रच-बस गए। उनकी अपनी बोलियां भी यहीं खप गईं। यही कारण है कि भारत में जितने मनुष्य उतनी बोलियां तक कहा जाने लगा। ज्यादा दूर की बात न करें तो अकेले मध्य प्रदेश में ही अवधी, बघेली, बुंदेली, ब्रज, मालवी आदि असंख्य बोलियां बोली जाती हैं और एकाधिक भाषाएं। मराठे यहां मराठी लाए तो भोपाल का नवाब खानदान उर्दू-फारसी। इसके अलावा गुजराती, पंजाबी और सिन्धी भाषाएं बोलने वाले यहां खूब हैं और आदिवासी समाज की अपनी बोलियां हैं। लेकिन बावजूद इसके सब एक-दूसरे के भावों और विचारों को खूब समझते हैं। यह पारस्परिक समझ ही लोगों को एक करती है। यही इस देश की खासियत है कि यहां विभिन्नता में भी एकता है। बोलियां भाषाओं के वैविध्य को खत्म करती हैं। और यह अकेले मध्य प्रदेश की ही बात नहीं बल्कि सारे मुल्क में कमोबेश यही हाल है। बोलियां अनेक पर समझ एक! पूरे भारत के दिल को जोड़ती हैं बोलियां! मगर देश को एक सिरे से दूसरे सिरे को जोड़ती है हिंदी। आज विज्ञापन का माध्यम हिंदी है तो बालीवुड फिल्मों के कारण मनोरंजन की भाषा भी। टीवी के एंटरटेनमेंट चैनलों ने हिंदी को घर-घर पहुंचा दिया है। आज उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को हिंदी ही एक करती है। इसकी वजह है हिंदी का अपना लचीलापन और बोधगम्यता। हिंदी को दिल्ली का आदमी अलग अंदाज में बोलता है तो हैदराबाद का अलग। कलकतिया हिंदी अलग है और यूपी, एमपी, बिहार, राजस्थान का आदमी अलग ढंग से बोलता है। लेकिन इतने अलगाव के बाद भी हिंदी सबकी अपनी भाषा है और कोई भी उस पर अपना दावा ठोक सकता है। बोलियां हिंदी की जनक हैं और बोलियों से ही हिंदी समृद्ध होती है। इसलिए बोली से दिल जोड़ो और हिंदी से दिमाग।
बोलियां ही नहीं रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और समाज में व्यवहृत तरीके भी अलग-अलग हैं। लेकिन एकता भरपूर है और रही है। भले ही कुछ समय के लिए इस एकता में व्यवधान आए मगर यह हमारा भारतीय समाज ही ऐसा है कि जल्द ही ये व्यवधान स्वत: ही नष्ट हो जाते हैं। और फिर समाज अपनी स्वाभाविक गति से चलने लगता है। इसे भारतीय लोकतंत्र की खूबी कहा जाता है लेकिन मेरा मानना है कि यही भारतीय समाज का मूल चरित्र या मिजाज है। अब कुछ समय से अचानक कुछ लोग अपनी-अपनी बोलियों को राष्टÑीय भाषा का दर्जा यानी उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने लगे हैं। इसी तरह कुछ लोग हिंदी के विरोध पर उतर आए हैं। किन्तु वे भूल जाते हैं कि न तो आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाने से कोई बोली अपना साहित्य समृद्ध कर सकती है न ही उसकी लोकप्रियता बढ़ा सकती है। वह कागजों में एक भाषा बन जाएगी और एक दिन मर जाएगी क्योंकि उसके भाषा बनते ही उसे व्यवहृत करने वाले लोग ही उसे दफन कर देंगे। ठीक इसी तरह जो लोग हिंदी की जगह अपनी मातृभाषा को थोपने की बात करते हैं वे भूल जाते हैं कि हिंदी न तो किसी देस-प्रदेश की मातृभाषा है न ही वह बहुत प्राचीन भाषा है। वह तो मुगल काल के जाने और अंग्रेजों के आने के बाद उर्दू की तरह पूरे देश में समझी व जानी जाने लगी। उर्दू के साथ दिक्कत यह थी कि एक तो उसकी लिपि विदेशी थी दूसरे उसमें अरबी-फारसी के इतने अधिक शब्द भरे थे कि उसे मुगलों के अपने इलाके के अलावा और कोई समझता नहीं था जबकि संस्कृत के शब्द पूरे देश में समझे जाते थे। इसलिए संस्कृत शब्दों से भरी हिंदी जल्द ही पूरे देश की प्रचलन भाषा (लिंग्वा-फ्रैंका) बन गई। इसलिए अब हिंदी हटाने की बात करना एक तरह की हठधर्मी है।

Gauss Memorial shootout from the commission of inquiry: गॉस मेमोरियल गोलीकांड जांच आयोग के झरोखे से

26 और 27 अगस्त 1957 को ईसाई धर्म के रायपुर के सांस्कृतिक केन्द्र गॉस मेमोरियल में हुए दुर्भाग्यजनक गोलीकांड की जांच रिपोर्ट मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गणेश प्रसाद भट्ट ने 15 जनवरी 1958 को प्रशासन को प्रेशित की। अच्छी तरह याद है। कुछ दिनों पहले साइंस कॉलेज रायपुर में प्रथम वर्ष में भर्ती हुआ था। हंगामा बरपा होते वक्त घटनास्थल पर बहुत देर रहा। यादें धीरे धीरे कमजोर हो रही हैं। जांच रिपोर्ट भूला बिसरा याद करने का सहारा है।
जयस्तंभ चैक स्थित गॉस मेमोरियल सेंटर अमेरिकन इवान्जेलिकल मिशन के रेवरेन्ड जे. गॉस की स्मृति में 15 अगस्त 1951 को तैयार हुआ। उद्घाटन मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने किया। भूखंड प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र से 1941 में खरीदा गया था। पंजाब के मूल निवासी गुरबचन सिंह मूलत: सिख थे। वे युवावस्था में ईसाई हो गए थे। 1940 में रायपुर आकर वे गॉस मेमोरियल सेंटर और अमेरिकी मिशन से जुड़ गए थे। रायपुर में प्रकाश और मसीही समाज पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इन पत्रिकाओं में अन्य धर्मों और विशेषकर हिन्दू धर्म के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती थीं।
आरोप यह भी था कि उन्होंने दुगार्पूजा और हनुमान चालीसा वगैरह का पाठ करने से गॉस मेमोरियल में रुकने वाले अतिथियों को मना किया था। वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अरुण कुमार सेन द्वारा लिखित विप्लव की होली नामक नाटक में 15 अगस्त को मंच पर सरस्वती प्रतिमा रखी गई। 16 अगस्त को नटराज की मूर्ति रखे जाने पर गुरबचन सिंह ने आपत्ति की। 17 अगस्त को अरुण कुमार सेन के कहने पर महाकोशल के संपादक वैशम्पायन ने समाचार प्रकाशित किया। रायपुर में सनसनी फैली। 20 अगस्त को संयोजिका कुमारी प्रीति बोस ने कलेक्टर को गुरबचन सिंह के व्यवहार की शिकायत की। महाकोशल में 22 अगस्त को इसे कौन सा द्रोह कहा जाए शीर्षक से समाचार छपा। मुंशी मेहरुद्दीन ने कलेक्टर को चिट्ठी लिखी कि उत्तेजित छात्र सड़कों पर आने वाले हैं।
22 अगस्त की रात हिन्दी साहित्य मंडल की बैठक राजकुमार कॉलेज में हुई। उसमें मंडल के अध्यक्ष घनश्याम प्रसाद श्याम, ठाकुर हरिहर बख्श सिंह हरीश, राधिकाप्रसाद नायक और पूनमचंद तिवारी भी उपस्थित थे। कथित तौर पर श्री वैशम्पायन के कड़े रुख के कारण बैठक में रेवरेंड गुरबचन सिंह के खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पारित किया गया। कला संस्कृति प्रेमियों से गॉस ममोरियल का बहिष्कार करने की अपील भी की गई। यह समाचार 24 अगस्त को महाकोशल में प्रकाशित हुआ। 23 अगस्त को ही गुप्तचर विभाग ने कलेक्टर को सूचना दी कि छात्र जुलूस निकालने वाले हैं। महाकोशल में भी छपा।
शारदाचरण तिवारी ने प्रशासन से संपर्क किया। लेखक राधिकाप्रसाद नायक और पूनमचंद तिवारी उनके नजदीकी थे। 26 अगस्त को महाकोशल में फिर छपा कि 15 अगस्त को गॉस मेमोरियल सेंटर में राष्ट्रीय ध्वज आधा लटका था। इससे स्थिति भड़क गई। 26 अगस्त को हिन्दू हाईस्कूल से छात्रों का जुलूस निकला। उसमें पवित्र क्रॉस पर जूते लटकाए गए थे। शारदाचरण तिवारी और नगरपालिका अध्यक्ष बुलाकीलाल पुजारी से मदद मांगी गई। उन्होंने छात्रों को समझाने की कोशिश की। छात्र गॉस मेमोरियल कांड के नजदीक पहुंचे। दुर्गा कॉलेज के छात्र भी बाहर आए। गॉस मेमोरियल कांड का पुतला प्रतीक के तौर पर जलाया गया। शायद गॉस मेमोेरियल से कुछ पत्थर छात्रों पर फेंके गए। जवाब में छात्रों ने पत्थर बरसाए। छात्र छत्तीसगढ़ कॉलेज की ओर चले। सप्रे स्कूल के छात्र भी आ जुड़े। फिर पूरा जुलूस आजाद चौक की ओर मुड़ा।
साइंस कॉलेज, आयुर्वेदिक कॉलेज और छत्तीसगढ़ कॉलेज के छात्र भी आ जुडेÞ। संयुक्त जुलूस सदर बाजार कोतवाली होता हुआ गांधी चौक पहुंचा। फिर सेंट पॉल स्कूल की ओर बढ़ा। कुछ तोड़फोड़ भी हुई। सेंट पॉल स्कूल में छुट्टी कर दी गई। भीड़ हजारों की थी। छात्रों ने गॉस मेमोरियल और गुरबचन सिंह के पुतले जलाए और पत्थर भी फेंके। समझाइशें असफल हो रही थीं। पुलिस असमर्थ थी। छात्र गुरबचन सिंह से माफी मांगने और राष्ट्रीय ध्वज फहराने की जिद कर रहे थे। छात्रों ने कलेक्टर से कहा कि लिखित अभिवचन दिलाएं कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा। इसी बीच गॉस मेमोरियल में कई छात्र घुस गए। माइक छीन भडकाऊ भाषण होते रहे। लाठीचार्ज बिना चेतावनी के हुआ। गुरबचन सिंह गॉस मेमोरियल में ही छिपे हुए थे। पुलिस उनकी सुरक्षा लगातार कर रही थी। किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने की तैयारी थी। निकट स्थित पेट्रोल पंप की चिंता भी अधिकारियों को थी। इसी बीच गॉस मेमोरियल कांड की दुकान जला दी गई। आग बुझाने की कोशिश सफल नहीं हुई। भीड़ को तितरबितर करने उसे गैरकानूनी संगठन लाउड स्पीकर पर घोषित किया गया।
कुछ पुलिस अधिकारियों को हल्की चोटें लगीं। छात्र उत्तेजित होते रहे। पुलिसवालों को घेरना शुरू किया। टकराव बढ़ता रहा। इसी बीच भीड़ पर दूसरा लाठीचार्ज कर दिया गया। फिर जिला मजिस्ट्रेट ने गोली चलाने आदेश दिया। गोली चलने से भीड़ तितरबितर होकर भागने लगी। गोलीचालन के बावजूद पथराव होता रहा। लाड स्पीकर पर चेतावनी बिखेरी गई। डीआईजी ने दोबारा गोलीचालन की अनुमति मांगी। कलेक्टर ने दूसरी बार गोली चलाने का आदेश दिया।
इसमें हिन्दू हाई स्कूल के छात्र कृष्णकुमार की मृत्यु हो गई। उसके नाम से ही मौदहापारा मार्ग का नाम घोषित किया गया। घटना में वैशम्पायन की सकिय भूमिका रही है। उनके उत्साही समाचारों के कारण असंतोष का माहौल बना। जस्टिस भट्ट ने अपनी रिपोर्ट में रेवरंड गुरबचन सिंह के खिलाफ कुछ नहीं लिखा। छात्रों की अभूतपूर्व एकता, जोश, उन्माद, असहनशीलता, अनुशासहीनता लेकिन राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति प्रेम का यह ज्वार रायपुर में एकमेवो द्वितीयो नास्ति की घटना की तरह हो गया। साठ साल बीत गए हैं।
न्यायिक रिपोर्ट की लीपापोती में जस्टिस भट्ट ने भाषा पर नियंत्रण दिखाया। पीछे लौटकर देखता हूं। प्रशासन ने छात्रों को समझने में भूल की। एहतियात बरता होता तो बदनुमा गोलीकांड टल सकता था। छात्र घंटों घूम रहे थे। तब भी पर्याप्त सुरक्षा बल जुटाया जा सकता था। गुरुबचन सिंह खेद प्रकट कर देते तो घटना नहीं होती।  साहित्यकारों में शांति स्थापना के बदले माहौल भड़काने की वृत्ति थी। उनकी भाषा आत्मनियंत्रित हो सकती थी। नागरिकों की चेतावनी या समझाइश पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया। कोई नेता साहस के साथ छात्रों को रोक नहीं रहा था। प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में लाउडस्पीकर पर उन्मादी भड़काऊ भाषण मेरा भी था। मैं आत्मगौरव से पीड़ित हो गया था।
(लेखक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

Imran Mian! Leave Kashmir, handle the bowl: इमरान मियां! कश्मीर छोड़िए, कटोरा संभालिए

पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटाए जाने के बाद से बौखलाया हुआ है। खींसीयानी बिल्ली जैसी उसकी हालात है। वह करो और मरो की स्थिति में पहुंच चुका है। लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता और मर भी नहीं सकता है। बस! गीदड़ बबकी के सिवाय उसके पास कुछ नहीं है। वैश्विक मंच पर कश्मीर को लेकर वह सिर्फ अपना मुंह बजा रहा है। अब तक कश्मीर पर उसे किसी देश का समर्थन नहीं मिल सका है। चीन के सहयोग से उसने यूएन में भी मसला उठाया लेकिन मुंह की खानी पड़ी। भारत की मजबूत कूटनीति की वजह से यूएई, बहरीन और अरब जगत उसे घास तक नहीं डाल रहे हैं। भाई जान, मुसलमान होने की दुहाई देते फिर रहे हैं।
कश्मीर में मुसलमानों पर झूठी कहांनियां गढ़ रहे हैं। लेकिन इस्लामिक देश भी उनकी सुनने को तैयार नहीं हैं। जिसकी वजह से पाकिस्तान पूरी तरह से हताश और निराश हो चुका है। यूएन में चीन को छोड़कर सभी देशों ने कश्मीर मसले पर भारत की नीतियों का समर्थन किया। पूरी दुनिया ने इसे भारत का आतंरिक मामला बताया। लेकिन मियां की बौखलाहट बढ़ गई है। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कश्मीर संभाले कि कटोरा।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान के सामने सबसे बड़ा संकट है कि अगर वह कश्मीर पर कोई ठोस नीति नहीं अपनाते हैं तो सेना उनका तख्ता भी पलट सकती है। क्योंकि पाकिस्तान में लोकतंत्र और सरकारें सिर्फ नाम की होती हैं। वहां तो जनरल बाजवा का शासन चलता है। कश्मीर को लेकर इमरान खान खुद अपने घर में घिर गए हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टों ने उन्हें नंगा कर दिया है। बिलावल का साफ संदेश है कि पाकिस्तान अब कश्मीर की चिंता छोड़ मुज्जफराबाद यानी पीओके की चिंता करे। पाकिस्तान के जीतने भी विपक्षी दल हैं वह भारत के फैसले के खिलाफ मियां पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मजबूत कूटनीतिक संबंधों की वजह से पाकिस्तान को दुनिया से अलग-थलग कर दिया है। पाकिस्तान का चीन के अलावा कोई साथ देने वाला नहीं है। उसकी लाख गुहार के बाद भी मुस्लिम देशों ने उसकी एक भी नहीं सुनी है। भारत ने साफ कहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जीतने भी मसले हैं वह द्विपक्षीय हैं, इसमें तीसरे की दखल संभव नहीं है। अमेरिकी राष्टपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपनी नीति बदल दी है।
वह भी इस मसले पर भारत से नाराजगी नहीं लेना चाहते हैं। क्योंकि अगर चीन अमेरिका नीतिगत दबाब चाहता है तो उसे भारत के साथ खड़ा होना होगा। रसिया, फ्रांस और दूसरे देश भारत के समर्थन में हैं। भारत के लिए कश्मीर अब कोई मसला नहीं रह गया है। वह भारत का अभिन्न अंग बन गया है। कश्मीर भारत के दूसरे राज्यों की तरह ही इस गणराज्य का हिस्सा है। पाकिस्तान संयुक्तराष्टÑ संघ से लेकर दूसरे मंचों पर कश्मीर-कश्मीर का राग अलापता रहा है। दुनिया के किसी फोरम पर वह कश्मीर मानवाधिकार की आड़ में भारतीय फौज को कटघरे में खड़ा करता रहा है।
लेकिन अब कश्मीर पर हक जताने का सारा रास्ता साफ खत्म हो गया है। भारत ने एक झटके में कश्मीर से विशेष रियायती धाराओं के साथ अलगाव वादियों को मिलने वाली सुविधाओं को खत्म कर दिया है। पाकिस्तान के पास कश्मीर पर परमाणु हमले का राग अलापने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता है। पाकिस्तान के पास छद्म युद्ध के सिवाय कुछ बचता नहीं है। पाक सेना भारत में आतंकवाद की फसल तैयार करने नए सिरे से जुट गई है। इस काम में पाकिस्तानी सेना आतंवादियों की भरपूर मदद कर रही है। लेकिन भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां उसकी हर साजिश को नाकाम करने में लगी हैं। वह कश्मीर के अलावा भारत के बड़े शहरों में तबाही की नई इबादत लिखना चाहता है। समुद्र के जरिए आतंकवादियों की नई खेप भेजने में लगा है। खुफिया एजेंसियों की माने तो वह ऐसे आतंकवादी भेज रहा है जो पानी के अंतर तैर कर भारत की सीमा में प्रवेश कर सकते हैं। कश्मीर से सटे सीमावर्ती इलाकों में आतंकवादियों को घूसाने के लिए लॉन्च पैड तैयार किए गए हैं। वह आतंवादियों को हर हाल में कश्मीर में भेज कर भारत को अस्थिर करना चाहता है।
भारत सरकार कश्मीर को पुन: वह आजादी लौटाना चाहती है जिसके लिए वह दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन वहां के अलगाववादी सरकार की इस सोच को पूरा नहीं होने देंगे। कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाए जाने के 20 दिन बाद भी हालात सामान्य नहीं है। कश्मीर के हालात को लेकर देश में राजनीति हो रही है। कांग्रेस और दूसरे दल सरकार को कटघरे में खड़े कर रहे हैं। लेकिन अहम सवाल है कि सरकार कश्मीर में अमन लौटाने के लिए ही तो काम कर रही है। क्या इस हालात में कश्मीर से सेना हटाई जा सकती है। जब आतंकवादी आम नागरिकों को निशाना बना कश्मीरियों का गुस्सा भारत के खिलाफ भड़काना चाहते हैं। दो दिन पूर्व वहां दो आम नागरियों की हत्या कर दहशत फैलाने का काम किया गया है। लेकिन सेना पूरी तरह सतर्क और है और हर साजिश को नाकाम करने में लगी है। कश्मीर में अमन-चयन तभी लौटेगा जब आम कश्मीरी मुख्यधारा में लौटेगा। यह तभी संभव होगा जब लोगों का वहां के अलगाववादियों से मोहभंग होगा। सरकार अलगाववादियों पर पूरी तरह शिकंजा कसा है। कश्मीर की जेलों में बंद काफी संख्या में आतंकवादियों को देश के दूसरी जेलों में भेजा है।
यूपी में 120 से अधिक आतंकवादियों को लाया गया है। सरकार स्थिति को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश कर रही है। स्कूल खुल गए हैं संचार सेवाएं भी बहाल कर दी गई हैं। कुछ जिलों को छोड़ कर शांति हैं। अस्पतालों में लोगों को इलाज की सुविधा उपलब्ध है। बाजार खुले हैं, फल और सब्जी के अलावा रोजमर्रा की वस्तुएं मिलने लगी हैं। लेकिन कई ऐसे जिले हंै जहां हालात आज भी बुरे हैं। क्योंकि यहां अलगाववादियों का इलाका है। उनकी चलती है, जिसकी वजह से सेना को दिक्कते हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कश्मीर नहीं जा पाए। वहां के जमींनी हालात की पड़ताल उन्हें नहीं करने दिया गया जिसका उन्हें मलाल है। हवाई जहाज में उनसे कुछ महिलाओं ने बताया कि वहां के हालात सामान्य नहीं है। आम लोगों को दिक्कत हो रही है। बिल्कुल सच ऐसी बात वहां हैं। जिसने भी बताया है वह सच बताया है। राहुल गांधी की भी बात सच है। वहां के हालात सामान्य नहीं हैं। लेकिन राहुल गांधी को क्या यह नहीं मालूम है कि सरकार ने बड़ा फैसला लिया है।
यह फैसला कश्मीर के अगलगाववादियों के लिए बड़ा जख्म है। मैडम महबूबा, फारुख अब्दुल्ला और बेटे उमर अब्दुल्ला, गुलामनबी आजाद की राजनीति खत्म हो गई है। कश्मीर से कांग्रेस कब की गायब हो चुकी है। अगर कश्मीर में कांग्रेस का कोई वजूद बचा होता तो उसकी चिंता उन्हें करनी चाहिए थी। देश के वह युवा नेता हैं अपनी सोच को निश्चित दायरे से बाहर निकालें। कश्मीर पर राजनीति करने के बजाय सरकार के फैसले का समर्थन करें। सच्चाई यही है कि कश्मीर में हालात इतने जल्द सामान्य होने वाले नहीं है। कश्मीर गुरिल्ला युद्ध का स्थल बन गया है। वहां भारतीय सेना और आतंकवादियों के बीच इस तरह के हालात हैं।
कश्मीर पर सराकर की आलोचना करने वालों ने क्या यह सोचा है कि अगर वहां सेना हटा ली जाए तो क्या हालात होंगे। जब पूरा देश सरकर के साथ खड़ा है फिर कश्मीर पर राजनीति करने से क्या हासिल होने वाला है। पाकिस्तान कश्मीर पर अपनी नीति पर बदलाव करे। वह चीन के हाथों में खेलने से बाज आए। कश्मीर पर अटका रहा तो उसके हाथ में भीख का कटोरा बना रहेगा। परमाणु हमले का सपना बेवजह क्यों देखता है। तीन युद्ध की पराजय शायद उसे याद नही है।

Do not take away your engaged job: लगी-लगाई नौकरी तो न छीनिये हुजूर!

लखीमपुर निवासी रघुराज प्राइमरी स्कूल में अध्यापक हैं। दस साल पहले रघुराज पर घर वालों का जबर्दस्त दबाव था। सब चाहते थे कि दो बेटियों के बाद वह तीसरा बच्चा जरूर पैदा करें। उन्होंने परिवार नियोजन को अंगीकार किया और दो बच्चों के बाद विराम की नीति अपनाई। चार साल पहले वे चालीस के हुए तो सरकार ने उनके इस फैसले का सम्मान किया और उन्हें स्वैच्छिक परिवार कल्याण प्रोत्साहन भत्ते के रूप में 450 रुपए प्रति माह देना शुरू किया।
इस महीने एक सुबह वे सो कर उठे तो सरकार उनसे यह भत्ता छीन चुकी थी। रघुराज ने अपनी व्यथा आर्डनेंस फैक्ट्री में काम करने वाले सहयोगी अजीत को बताई तो वे बोले, आपका तो बस भत्ता छिना है, हमारी तो नौकरी जाने की नौबत आ गई है। रक्षा प्रतिष्ठानों के निजीकरण के भय से वहां के कर्मचारियों को नौकरी जाने की चिंता सता रही है। अब वे लोग यही गुहार कर रहे हैं कि मंदी के इस दौर में लगी-लगाई नौकरी तो न छीनिये हुजूर!
आर्थिक मंदी के इस दौर में वित्त मंत्री की कोशिशों व शेयर-बाजार के घटते-बढ़ते रूप के बावजूद आम आदमी अपने रोजगार को लेकर सबसे ज्यादा परेशान है। कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने से खुश देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की गलबहियां देखकर कुछ पल के लिए उत्साहित तो हो जाता है किन्तु अंत में उसे अपने बच्चे की फीस के साथ सप्ताह में एक दिन भी पनीर न खा पाने का दर्द याद आता है। इस समय सरकारें नौकरियों के साथ वेतन-भत्तों में कटौती की राह भी निकाल रही हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले छह भत्ते एकाएक बंद कर दिए। इनमें परिवार कल्याण को प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाने वाला स्वैच्छिक परिवार कल्याण प्रोत्साहन भत्ता भी शामिल है।
एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से परिवार कल्याण पर जोर देते हैं, दूसरी ओर सरकारें ऐसे भत्ते बंद कर कर्मचारियों का मनोबल गिराने का काम करती हैं। इन स्थितियों में उनमें असंतोष होना स्वाभाविक है। कर्मचारी राजनेताओं व कर्मचारियों के बीच समभाव न होने की बात भी उठा रहे हैं। सरकारों में शामिल सांसद-विधायक खुद के लिए पुरानी पेंशन बहाल किए हुए हैं, किन्तु कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रोक दी गई है। जब सरकारें विधानसभा से लोकसभा तक नई पेंशन की खूबियां गिनाती हैं तो कर्मचारियों की यह मांग स्वाभाविक है कि विधायक-सांसद अपने लिए इस नई पेंशन को स्वीकार क्यो नहीं करते? दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि कर्मचारियों की ये मांगें किसी राजनीतिक दल के लिए मुद्दा नहीं बन पा रही हैं।
पिछले कुछ महीनों से बेरोजगारी का संकट तो बढ़ता नजर ही आ रहा है, उससे बड़ी समस्या पुराने रोजगार समाप्त होने के रूप में सामने आ रही है। दुनिया का सबसे युवा देश होने का दंभ भरने वाले भारत के सामने इस समय बेरोजगार युवा ही सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल भारत में 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु वर्ग की है। इन्हें रोजगार की सर्वाधिक आवश्यकता है। इनके लिए रोजगार के अवसर सृजित न होने के मतलब है इस ऊर्जावान आबादी का खाली बैठना, दिग्भ्रमित होना और परिणाम स्वरूप नशे व अपराध में वृद्धि होना। इस समय की सबसे बड़ी चिंता व चुनौती भी यही है।
इसके अलावा चालीस से अधिक आयु वर्ग के वे लोग भी बेरोजगारी की जद में आ रहे हैं, जिनके बच्चे अभी पढ़ाई-लिखाई की दौड़ में हैं और उनके लिए रोजगार सांस लेने जैसी जरूरत है। आटो सेक्टर में लाखों नौकरियां जा चुकी हैं, एफएमसीजी सेक्टर में लाखों नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है। तमाम सरकारी प्रतिष्ठानों का निजीकरण कर उन कर्मचारियों की नौकरी खतरे में है। हाल ही में टेक्सटाइल सेक्टर ने भी 25 लाख तक रोजगार कम होने का दावा किया गया है। रोजगार के अवसर कम होने के साथ ही उच्च शिक्षा के प्रति रुझान भी कम हो रहा है।
कुछ वर्ष पूर्व पूरे देश में तेजी के साथ खुले इंजीनियिरंग व प्रबंधन कॉलेज उतनी ही तेजी से बंद हो रहे हैं। दरअसल इन कॉलेजों से उत्तीर्ण होकर निकलने वाले विद्यार्थियों को अपेक्षित रोजगार के अवसर ही नहीं उपलब्ध हो रहे हैं। अवसरों का यह चतुर्दिक संकट देश के लिए किसी भी तरह से सकारात्मक नहीं है। लोग डर रहे हैं। अब तो नई नौकरी मिलने की जगह पुरानी बची रहने का ही संकट सामने है। ऐसे में सरकारों को भी सकारात्मक ब्लूप्रिंट के साथ जनता के सामने आना होगा।